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राजनीति

सहयोगी की बढ़ती स्वहित की ख़्वाहिश – संतोष देव गिरि 

 

  • संतोष देव गिरि 

 

कहते हैं ख्वाहिशें अन्तहीन होती हैं जिनका कोई अन्त नहीं होता, लेकिन यदि ख्वाइशों का अन्त होता है तो परिणाम घातक होते हैं।  अन्तहीन ख्वाहिशों से राजनीति भी अछूती नहीं है। वह तब जब ख़्वाहिश जनहित, समाजहित से इतर स्वहित से जुड़ी हो। राजनीति के मौजूदा दौर में कुछ ऐसी ही ख्वाइशों को लेकर अपना दल नेतृत्व जूझ रहा है। केन्द्र की सत्ता में दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ वापसी करने वाले भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख सहयोगी दल अपना दल (एस) नेतृत्व को सत्ता सुख से इस कदर मोह बना हुआ है कि दूसरी बार मंत्रिमण्डल में जगह न मिले से उसकी ख्वाइशों का मानो जैसे अन्त हो गया हो। यही कारण है कि अपना दल नेतृत्व ने मुँह फुला रखा है। पहले से ही अपनी शर्तों पर भाजपा नेतृत्व को झुकाती चली आ रही अपना दल की संरक्षक और दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष गठबन्धन धर्म का पालन करने की बजाय सौदेबाजी करते आए हैं। कहा गया है कि

‘रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय,

तोड़े तो पुन: ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाए!’

कुछ ऐसा ही अपना दल और भाजपा के बीच होना बताया जा रहा है। संपन्न लोकसभा चुनाव 2019 के पूर्व भाजपा और अपना दल गठबन्धन के बीच टिकट बंटवारे को लेकर जिस तरह से रार मची रही है उसकी कल्पना भाजपा ने कभी नहीं की थी। लेकिन राजनीति जो ना करा दे, भाजपा नेतृत्व सब कुछ देखने सुनने के बाद भी खामोश बना हुआ अपने मिशन को सफल बनाने में जुटा रहा है। यही कारण रहा कि केंद्रीय व प्रांतीय नेतृत्व को समय-समय पर आँखें दिखाती आ रही अपना दल के नखरे को बर्दाश्त करता आ रहा भाजपा नेतृत्व यह अच्छी तरह से जान चुका है कि अपना दल की संरक्षिता अनुप्रिया पटेल जिस मीरजापुर संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रही हैं वहाँ इनका अपना कुछ भी नहीं है, जो भी है भाजपा का है। भाजपा कार्यकर्ता ना लगता तो इनकी नैया इस बार के लोकसभा चुनाव में पार हो पाना कठिन दिखाई दे रहा था। इनको चुनाव जितवाने के लिए भाजपा राष्ट्रीय एवं प्रांतीय नेतृत्व से लगाए संघ ने अपनी पूरी ताकत झोंक रखी थी। जिसका परिणाम यह रहा है कि यह तमाम विरोध के बाद भी उन्हीं भाजपा कार्यकर्ताओं के बलबूते जीत हासिल करने में कामयाब हुई है जिन्हें इन्होंने सदैव तिरस्कृत करने का कार्य किया है। ऐसे में मीरजापुर संसदीय क्षेत्र का मतदाता सवाल करता है कि 5 वर्ष तक मंत्री रहते हुए अनुप्रिया पटेल ने मीरजापुर जनपद के लिए कौन सी विकास परख योजना को क्रियान्वित कराया है? जिस विकास कार्यों की यह बखान करती है उसे पूर्ण होने में अभी काफी लम्बा समय है। विकास से संबंधित जो भी घोषणाएँ हुई है वह महज चुनावी वर्ष में चुनाव को करीब देखकर की गई हैं। जिन्हें कब ‘पर’ लगेंगे यह कहना अभी मुश्किल ही नहीं काफी कठिन भी है। अगर इस बार भी मंत्रिमण्डल में शामिल किया जाता तो मीरजापुर का क्या भला होता यह तो पता नहीं, लेकिन इतना तो तय ही था कि भला अनुप्रिया पटेल का होता है और आशीष पटेल (पति) का होता। भाजपा को आँख दिखाकर एमएलसी बन जाना, मंत्री बन जाना, भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं व पदाधिकारियों को अपमानित करना कम से कम अब लोग इससे दु:खी तो नहीं हैं।

 

अनुप्रिया पटेल

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में अति पिछड़े लोकसभा क्षेत्र -79 मीरजापुर से भाजपा के सहयोग से सांसद चुनकर पहली दफा देश की सर्वोच्च पंचायत में पहुंची अनुप्रिया पटेल को भाजपा नेतृत्व ने केन्द्र में सरकार बनने के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री बनाने का ना केवल कार्य किया, बल्कि बाद में इनके पति तथा नौकरशाही से राजनीति में पैर रखने वाले अपना दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष आशीष पटेल को एमएलसी भी बनाने का कार्य किया है। कभी अपनी माँ द्वारा बहन पल्लवी पटेल को राजनीति में उतारे जाने पर कड़ी आपकी दर्ज करा ‘परिवारवाद’ का नाम देकर विरोध करने वाली अनुप्रिया पटेल खुद अपने पति को राजनीति में स्थापित करने के लिए आगे खड़ी नजर आई हैं। लोकसभा चुनाव से पूर्व सीटों को लेकर यह भाजपा नेतृत्व को न केवल खूब छकाने का कार्य की हैं, बल्कि भाजपा राज्य इकाई पर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए विकल्प की तलाश में दूसरों दलों के चौखट पर भी हो आई हैं। यह अलग बात रही है कि यह जिस विकल्प को लेकर दूसरे दलों के चौखट पर गई हुई थी वहाँ से इन्हें निराशा ही हासिल हुई है। थक हार कर इन्हें भाजपा के ही चौखट पर मत्था टेकना पड़ा है। 21 फरवरी 2019 को कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव एवं पूर्वांचल प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा, कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया से मिलते हुए इन्होनें प्रियंका गांधी के आवास पर बैठकर गठबन्धन की संभावनाओं चर्चा भी कर चुकी हैं, लेकिन बात न बन पाने की दशा में बुझे मन से इन्हें भाजपा की ही चौखट पर आना पड़ा। जानकार सूत्रों की माने तो कांग्रेस के साथ अन्य दलो के चौखट पर भी इन्होंने मत्था टेका संतोष जनक बात न होने पर भाजपा का ही चौखट उपयोगी दिखलाई दिया है। बावजूद इसके भाजपा नेतृत्व ने सब कुछ भुलाते हुए भी इन्हें ना केवल आदर दिया है अपितु उत्तर प्रदेश में दो सीटों मसलन, मीरजापुर और सोनभद्र जिले की रॉबर्ट्सगंज सीट अपना दल की झोली में डालते हुए इनकी जीत सुनिश्चित कराने के लिए संघ से लेकर भाजपा कार्यकर्ताओं पूरी टीम को लगा रखा था। परिणाम स्वरुप दोनों सिटो पर अपना दल को कामयाबी मिली है। कुल मिलाकर देखा जाए तो चुनाव संपन्न होने के पश्चात नव गठित सरकार के नए मंत्रिमण्डल में जगह ना मिलने पर अपना दल का जो रवैया रहा है वह कहीं से भी सहयोग हित की भावना से भरा नहीं रहा है। ऐसे में भाजपा के सहयोगी दल अपना दल का यह स्वहित  भरा भाव कहीं ना कहीं से आहत करने वाला है। जिसके दूरगामी परिणामों को कदापि उचित नहीं कहा जा सकता है। भाजपा नेतृत्व समय रहते अपने इस सहयोगी दल के बढ़ते स्वहित भरे ख्वाहिशों पर नियंत्रण नहीं करता है तो इसके दुष्परिणाम भी झेलने पड़ सकते हैं ऐसा राजनीति के जानकारो का मानना है।

गौरतलब हो कि लोकसभा चुनाव पूर्व देश के पांच राज्यों में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में तीन राज्य में भाजपा को मिली करारी हार के बाद हार को लेकर चाहे जो भी कयास लगाए जा रहे थे। लेकिन इन सबसे इतर हट भाजपा नेतृत्व हार के कारणों पर मंथन करने के साथ-साथ मिशन 2019 के लक्ष्य को साधने की दिशा में जी जान से जुटा हुआ था। जिसका परिणाम यह रहा है कि 2019 के लोस चुनाव में भाजपा ने भारी बहुमत से एक बार फिर केन्द्र में सरकार बनाने में कामयाब हुई है। खासबात यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा एकमात्र वह दल है जिसने लगातार दूसरी बार केन्द्र में गैर कांग्रेसी सरकार बनायी है। निसंदेह इस भारी जीत के साथ ही नरेन्द्र मोदी और अमित शाह न केवल भाजपा बल्कि भारतीय राजनीति के क्षितिज पर एक महानायक बन कर उभरे हैं। जिनके कुशल राजनैतिक अनुभव और चुनावी नेतृत्व प्रबन्धन के चर्चे दूर तलक हो रहे हैं। आलम यह है कि भाजपा की इस जीत के मायने, उसके कारकों की तलाश और विश्लेषणों का दौर ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा है। हालांकि इसी बीच कुछ सहयोगियों के रवैये से अनेक सवाल भी उठ खड़े हो गए हैं। आँकलन किया जाने लगा है कि क्या भाजपा को ऐसे केवल जाति विशेष में काम करने वाले सहयोगियों की जरूरत है? क्या भाजपा की इस भारी जीत में सहयोगियों विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के सहयोगियों की कोई भूमिका है?  कहा जाता है कि देश की सर्वोच्च पंचायत दिल्ली पहुँचने का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही होकर जाता है। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद सारे कयासों को धता बताते हुए भाजपा ने उत्तर प्रदेश में विपक्ष की मजबूत मानी जा रही किलेबंदी को ध्वस्त करते हुए अपनी बढ़त बनाये रखी। ऐसे में एक सवाल उठना लाज़मी है कि आखिर कैसे?  इस कैसे का जवाब ढूंढना कठिन नहीं है। उत्तर प्रदेश और केन्द्र के चुनावी इतिहास के पन्नों को पलटने पर इसका जवाब खुद-ब-खुद मिलने लगता है। बात 1996 की है जब भाजपा ने पहली बार चुनावी राजनीति में उत्तर प्रदेश में “सोशल इंजीनियरिंग” शब्द का उपयोग कर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की धुर जातिवादी राजनीति को पटकनी दी| इसके सूत्रधार बने थे, भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय महामंत्री केएन गोविंदाचार्य और उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता पश्चिम उत्तर प्रदेश में खासा प्रभाव रखने वाली लोध जाति के सर्वमान्य नेता कल्याण सिंह और पूर्वी उत्तर प्रदेश की कुर्मी बिरादरी में प्रभाव रखने वाले नेता ओमप्रकाश सिंह| इन पिछड़े नेताओं और कलराज मिश्र जैसे ब्राह्मण चेहरे के साथ मिलकर भाजपाई रणनीतिकारों ने सोशल इंजीनियरिंग के माध्यम से व्यापारियों (बनियों) की पार्टी से राम जन्मभूमि आन्दोलन के बाद ब्राह्मणों की पार्टी बनी भाजपा में पिछड़ों और अतिपिछड़ों की रहनुमाई को आधार देकर पार्टी को नयी ऊंचाइयां प्रदान की थी। भाजपा की इस सोशल इंजीनियरिंग का परिणाम था कि पहली बार पूर्वी उत्तर प्रदेश की कुर्मी बिरादरी केवल एक दो विधानसभाओं में ही नहीं बल्कि पूरे पूर्वांचल में भाजपा के साथ खड़ी हुई और गरीबों-किसानों के नाम पर पटेलों की रहनुमाई करने वाली कम्युनिस्ट पार्टी का पूर्वी उत्तर प्रदेश में पूरी तरह से सूपड़ा साफ हो गया। वाराणसी के कद्दावर कम्युनिष्ट नेता उदल चुनाव हारकर राजनीति से बाहर हो गए। केवल वाराणसी ही नहीं बल्कि बुंदेलखंड, कानपुर, फतेहपुर, प्रयागराज, प्रतापगढ़, मीरजापुर, जौनपुर सहित अवध के विभिन्न जिलों में कुर्मी, लोध और अन्य पिछड़ी, अति पिछड़ी जातियों ने भाजपा के साथ जुड़कर उसे सत्ता के शिखर पर पहुंचाने का काम किया था। हालांकि इसका खामियाजा भी कल्याण सिंह और ओमप्रकाश सिंह को भुगतना पड़ा था। रामजन्मभूमि आन्दोलन के बाद से हिंदूवादी नेता की छवि धारण किये भाजपा के इन दिग्गज नेताओं को पार्टी और मीडिया के एक वर्ग ने जाति विशेष के नेता के तौर पर देखना और प्रचारित करना शुरू कर दिया था। भाजपा ने सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला भले ही 1996 में लागू किया लेकिन इसके प्रयोग बहुत पहले शुरू कर दिए थे। ओमप्रकाश सिंह पहली बार 1974 और फिर 1977 में विधायक बने। 1993 के विधानसभा चुनाव में समाजवादियों का गढ़ मानी जाने वाली मीरजापुर की चुनार विधानसभा में समाजवादी धुरन्धर यदुनाथ सिंह पटेल को हराकर विधानसभा में पहुंचे तो उनकी जीत का यह सिलसिला 2007 तक चला। 1999 के लोकसभा चुनाव के बाद से पार्टी के भीतर से ही इस सोशल इंजीनियरिंग को ध्वस्त करने की साजिशों से कल्याण सिंह और ओमप्रकाश सिंह जब कमजोर हुए तो भाजपा भी कमजोर होने लगी। 2004 के लोकसभा चुनाव में सत्ता से बहार हुई भाजपा को फिर एक दशक बाद ही दिल्ली और 15 वर्ष बाद 2017 में लखनऊ में तब जाकर फिर सत्ता नसीब हुई  जब नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने एकबार फिर न केवल पिछड़ों-अति पिछड़ों को पार्टी से जोड़ा बल्कि उन्हें सम्मानपूर्वक स्थान दिया। 2012 में चुनाव हारने के साथ ही ओमप्रकाश सिंह ने भले ही एक तरह से राजनीति से सन्यास ले लिया, लेकिन पार्टी ने कुर्मी बिरादरी को जोड़ने की पूरी कोशिश की। ओमप्रकाश की ही तरह कल्याण सिंह भले ही कमजोर हुए लेकिन पार्टी ने लोध जाति को जोड़े रखने के लिए कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह को आगे किया। परिणाम सामने था 2017 के विधानसभा चुनाव में जहाँ चुनार में पार्टी ने पूर्वांचल में सबसे बड़ी जीत दर्ज की तो राजवीर सिंह के पुत्र भी विधानसभा में पहुँच गए। इसके पूर्व 2014 में राजवीर स्वयं लोकसभा में पहुँच गए थे और मीरजापुर में भी भाजपा गठबन्धन को बड़ी जीत मिली। अब के लोकसभा चुनाव 2019 में भी सपा- बसपा के मजबूत गठबन्धन के बावजूद परिणाम न केवल भाजपा गठबन्धन के पक्ष में आया बल्कि गठबन्धन को चुनार विधानसभा में सर्वाधिक 120569 वोट मिले। जबकि, चुनाव के शुरुआती दिनों में माना जा रहा था कि मीरजापुर में अपना दल प्रत्याशी को जाति विशेष की नाराज़गी झेलनी पड़ सकती है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं है। देश के सर्वमान्य प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आभामण्डल में पहले की ही भांति भाजपा से जुड़े मतदाताओं ने और अधिक उत्साह से गठबन्धन को जीत भाजपा गठबन्धन को जीत प्रदान की है। बावजूद इसके अपना दल (एस) अध्यक्ष की शपथ ग्रहण समारोह के दिन की गई बयानबाजी समझ से परे है। चुनाव बाद अपना दल और चुनाव से पूर्व व चुनाव के दौरान सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के रवैये ने इस सोच को बढ़ावा दिया है कि जाति विशेष के नाम पर राजनीति करने वाले दलों के साथ भाजपा जैसी सक्षम नेतृत्व वाली पार्टी का सम्बन्ध कैसा हो।  यह ना केवल विचारणीय है बल्कि भाजपा नेतृत्वव को इस पर गंभीरता पूर्वक विचार करते हुए कारगर कदम भी उठाने चाहिए। यह सर्व विदित है कि भारतीय जनता पार्टी की इस विशाल जीत के तमाम विश्लेषण सामने आये हैं और आएँगे। लेकिन सच यही है कि केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अमित शाह ने सोशल इंजीनियरिंग के उसी पुराने फार्मूले को नए ढंग से लागू कर विपक्ष की जातिवादी राजनीति को पटखनी दी है। जिसके सहारे विपक्ष चुनावी नैया पार करने की जुगत में जुटा हुआ था। यह कहना तनिक भी गलत नहीं होगा कि मोदी और अमित शाह के आभामण्डल में सहयोगियों की भी नैया पार लगी है, क्या सहयोगी ऐसा सोचकर अपने बड़े और उदारवादी मन का परिचय देंगे? वैसे यह बात तो स्पष्ट हो गयी है कि भाजपा अगर अपने ही कुनबे पर ध्यान दे और उसका विस्तार करे तो भविष्य में शायद उसे छोटे दलों की वैशाखियों की जरूरत न पड़े।

लेखक पत्रकार हैं|

सम्पर्क- +919455320722, Girisantos4@gmail.com

 

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