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दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (61)

 

  • पवन कुमार सिंह

 

सन्त जोसेफ्स स्कूल भागलपुर में जब योगदान किया था, उस समय प्राचार्य फादर वर्गीस अपनी पीएचडी के लिए विदेश प्रवास पर थे। कार्यवाहक प्राचार्य फादर जोसेफ तानी परमपिल थे। उन्होंने सभी शिक्षकों से मेरा परिचय कराया और वर्गतालिका सौंप दी। स्कूल की स्थापना दो साल पहले हुई थी। एलकेजी से स्टैण्डर्ड टू तक चार वर्ग मिलाकर कुल छः सेक्शन थे।
पहले दिन कक्षा एक के बच्चों को पढ़ाने के क्रम में शोरगुल कर रहे कुछ बच्चों को शांत करने के लिए मैंने कड़ी आवाज में डाँट दिया था। अगले ही दिन रजत ओसवाल नामक बच्चे के पिता का लम्बा शिकायती पत्र प्राचार्य को प्राप्त हुआ, जिसमें बताया गया था कि नये हिंदी शिक्षक ‘जल्लाद’ हैं। वे बच्चों को आतंकित और प्रताड़ित करते हैं। उनका व्यक्तित्व और आचरण शिक्षक बनने के योग्य नहीं है आदि आदि। रजत के पापा श्री ओसवाल एनटीपीसी के कहलगाँव प्रोजेक्ट में सीनियर मैनेजर थे। कहलगाँव में कोई इंग्लिश मीडियम पब्लिक स्कूल नहीं होने के कारण एनटीपीसी प्रोजेक्ट के लगभग एक दर्जन बच्चे एक छोटी बस से भागलपुर के माउण्ट कार्मेल और संत जोसेफ्स स्कूल आते थे। उनके साथ उनमें से कुछ की मम्मियाँ भी आती थीं और फिर बच्चों को साथ लेकर वापस लौटती थीं। इनमें श्रीमती ओसवाल, श्रीमती आर के अखौरी, श्रीमती बी एन यादव, श्रीमती आर पी सिंह और श्रीमती ए के झा प्रमुख थीं।
ओसवाल जी की शिकायत वाला पत्र प्राचार्य फा0 तानी ने मुझे दिखाया और कल की कक्षा में हुई गतिविधियों की जानकारी ली। फिर उन्होंने रजत की मम्मी को बुलाकर उन्हें समझाया कि मामला उतना गंभीर नहीं है, जितना वे लोग समझ रहे हैं। मैंने भी उनसे मिलकर सबकुछ बताया। स्थिति साफ हो जाने पर अभिभावकों ने उस लम्बे शिकायती पत्र के लिए खेद जताया था।

हालांकि बहुत ही छोटी उम्र के बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहा था, पर आश्चर्यजनक रूप से मुझे इसमें आनंद का अनुभव होने लगा था। इस नये काम की तुलना 1982 में कॉलेज में पढ़ाने के अनुभव से करता तो लगता कि तब गोबर में घी ढार रहा था और अब दाल में घी डाल रहा हूँ। छोटे बच्चों को भाषा की शिक्षा देते हुए मेरे मन में स्पष्ट धारणा बन गयी है कि ककहरा, बारहखड़ी, मात्रा, संयुक्ताक्षर आदि पढ़ाने का काम योग्य, कुशल और अनुभवी शिक्षकों को ही करना चाहिए। आरम्भिक स्तर पर यदि अच्छे शिक्षक नहीं मिले तो वर्तनी और उच्चारण से सम्बंधित गड़बड़ियाँ लाइलाज बीमारी का रूप धारण कर लेती हैं और जीवन भर पीछा नहीं छोड़तीं। एक और बात मन में घर कर गयी है कि प्राथमिक कक्षाओं में भाषा और गणित के अच्छे शिक्षक की भूमिका विद्यार्थियों के कॅरियर बनाने में अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है। दुर्भाग्य से ऐसे शिक्षक हजारों में एक मिलते हैं।
उस स्कूल में पढ़ाते हुए भाँति-भाँति के माता-पिताओं से मेरा साबका पड़ा था, जिनमें से कुछ को तो कभी नहीं भूल सकता हूँ। एक थीं वसुधा की मम्मी। वसुधा यूकेजी में थी और मम्मी एमए, बीएड थीं। उस कक्षा में स्वर की मात्राओं से शब्द-निर्माण की जानकारी देनी थी। मैंने अभ्यास पुस्तिका में ऊ की मात्रा से ‘सूअर’ लिखवाया था। अगली सुबह मैडम शिकायत लेकर पहुँच गयीं स्कूल। तबतक फा0 वर्गीस ने योगदान कर लिया था। उन्होंने मुझे अकेले में बुलाकर बात की फिर आश्वस्त होकर पूछा कि क्या मैं वसुधा की मम्मी से मिलना चाहूँगा? मैं उनसे मिला तो वह काफी नाराज दिख रही थीं। मैंने नये सिरे से बात शुरू की।
“मैडम, क्या शिकायत है आपकी?”
“आप बच्चों को गलत सिखा रहे हैं। आपने ऊ की मात्रा से सूअर लिखवाया है, जो गलत है।”
“मैडम, मैंने सही लिखवाया है। हाँ, कुछ लोग ‘सुअर’ भी लिखते हैं।”
“नहीं, मुझे कहीं ‘सूअर’ लिखा हुआ नहीं मिला।”
“अच्छा! क्या आपने श्रीलंका देखा है?”
“नहीं, पर इससे क्या मतलब है?”
“आपने नहीं देखा तो क्या श्रीलंका इस धरती पर है या नहीं?”
“यह तो विचित्र बात आप कह रहे हैं।”
“नहीं, मैं ठीक कह रहा हूँ। जैसे आपने श्रीलंका नहीं देखा, पर वह है। उसी प्रकार ‘सूअर’ आपने नहीं देखा है, किन्तु वह होता है। मैडम, आप राजनीति शास्त्र से एमए हैं। मैं हिंदी से हूँ। शिक्षक पर भरोसा करना सीखिए।” और मैंने उन्हें तीन-चार शब्दकोशों के नाम सुझा दिये कि वे स्वयं देखकर अपनी जानकारी दुरुस्त कर लें। अनमने भाव से वे चली गयीं। अगले दिन लज्जित-सी माफी मांगते मुझसे मिलीं। बाद में मुझसे और अन्य शिक्षकों से बहुत इज्जत से पेश आने लगी थीं।
जीवन पर्यन्त याद रहने वाले दूसरे अभिभावक मिले मो0 अहमद हुसैन जी। वे भागलपुर के सरकारी कुक्कुट केन्द्र के प्रभारी सर्वोच्च अधिकारी थे। बंगाली मोशाय को बुढ़ापे की दहलीज पर बेटे का उपहार मिला था, सो उसके प्रति घातक मोह से ग्रस्त थे। बेटे को डाँटना भी उन्हें नागवार गुजरता था। एक दिन होमवर्क पूरा नहीं कर पाने के कारण मैंने क्लास वन के उस बच्चे की हथेली पर एक छड़ी लगा दी थी। अगली सुबह प्रार्थना सभा के तुरंत बाद ही अहमद हुसैन जी फा0 वर्गीस से उलझ गये। धाराप्रवाह अंग्रेजी में वे मेरे विरुद्ध भड़ास निकाल रहे थे। बजरंगी नामक आदेशपाल ने मुझे आकर प्रिंसीपल चेम्बर का पूरा हाल सुना दिया था। थोड़ी देर बाद प्राचार्य ने मुझे बुलाकर अकेले में बात की और पूछा कि क्या मैं उस अभिभावक से मिलना चाहूँगा? वे मीटिंग पार्लर में इंतजार कर रहे थे। मैं जैसे ही कमरे में घुसा कि वे बरस पड़े। खालिस अंग्रेजी में जितने अपमानजनक शब्दों का प्रयोग वे कर सकते थे, कर रहे थे। उनके कहने का सार यह था कि मैं शिक्षक का पद और पेशा डिजर्व नहीं करता हूँ। कसाई और निर्वंश हूँ इसलिए बच्चों के लिए दया या वात्सल्य प्रेम नहीं है। मैंने उन्हें बीच में नहीं टोका। पूरा बोल लेने दिया फिर बोला, “सर, मैं आपके बच्चे का दुश्मन नहीं हूँ। उसका शिक्षक हूँ और उसे सुधारने के लिए थोड़ा डराया है।”
“आप बच्चा को डराता है। हम बाबा-माँ उसे ऊँची आवाज में भी नहीं बोलता है।”
“आप दोनों नहीं डाँटते हैं इसीलिए तो मुझे डराना पड़ता है।”
“नहीं, हम कभी भी उसको डाँटना-पीटना अलाउ नहीं कर सकता। आवार मारेगा तो हम केस कर देगा।”
इतनी देर में मेरा धैर्य जवाब दे चुका था। धीरे से उठकर मैंने दरवाजा बंद करके कुंडी लगा दी। वे घबराकर बोले, “क्या करता है, फाटक काहे बंद कर दिया?”


“आपको समझाना है। कोई और नहीं देखे कि कैसे समझाया गया है। अब बोलिए कि अभी दस जूते लगा दूँ तो कौन बचाएगा? कुछ बच्चों को नहीं, बाप को पीटने की जरूरत होती है। अभी पीटूँगा और टीसी देकर भगाऊँगा।” मेरी भाषा और भाव-भंगिमा का चमत्कारी प्रभाव हुआ। उन्होंने मेरे पाँव पर झुकते हुए माफी मांगी। मैं थोड़ी देर चुपचाप बैठा रहा फिर बिना कुछ उत्तर दिये दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। वे फादर के पास जाकर बोले कि उन्हें गलतफहमी हो गयी थी, अब सही बात समझ गये हैं। बाद में फा0 वर्गीस ने मुझसे पूछा भी था कि “पवन सर, कैसे समझाया था मि0 अहमद को?” मैं मुस्कुरा कर मौन रह गया था।
इस घटना के अगले दिन शाम में अहमद हुसैन जी पीजी होस्टल के मेरे कमरे में पहुँच गये। अपनी प्रतिक्रिया पर खेद प्रकट करने के बाद उन्होंने मेरी प्रशंसा शुरू कर दी। मैंने टोककर उन्हें समझाया, “सर, जानवर का बच्चा जानवर ही पैदा होता है तथा जानवर बनकर ही जीता और मर जाता है। इंसान के बच्चे को ठोक-पीटकर और काट-छाँटकर इंसान बनाना पड़ता है। इसके लिए दंड-पुरस्कार-प्रलोभन-प्रोत्साहन का सहारा लेना पड़ता है। इस कारण एकाध बार कभी सही समय पर पिटाई की जरूरत पड़ जाती है। गलतियों को सुधारने के लिए हल्का-फुल्का शारीरिक दंड सर्वथा अनुचित नहीं है।” वे ध्यान से मेरी बात सुनते रहे। फिर पूछा, “सर, आप बर्ड खाना पसंद करता है?”
“क्यों पूछ रहे हैं?”
“बाज लोग नहीं भी खाते हैं। इसीलिए।”
मैं उनका संकेत नहीं समझ पाया था सो बोला, “फॉरेन बर्ड और कुछ देसी बर्ड तो हमलोग शिकार करके खाते हैं।”
“अरे नहीं समझा आप। हम मुर्गा की बात पूछ रहा है सर। चिकेन-अंडा वगैरह? खाता है न?” मेरे हाँ कहने के बाद वे जाने लगे। मैंने आग्रहपूर्वक उन्हें चाय पिलायी तब जाने दिया। आगे जो हुआ, उसके बारे में मैंने कल्पना भी नहीं की थी। अगले दिन से लगभग हर दो-तीन दिन पर कुक्कुट विभाग का एक चपरासी एक-एक झोला मुर्गा या अंडा लाकर हमारे होस्टल के रिसर्च विंग में पहुँचाने लगा। कुछ दिनों तक तो सभी साथी पार्टी मूड में मजे लेते रहे, किन्तु बाद में सभी अकछा गये। अहमद जी लगभग एक साल और भागलपुर में रहे थे। इस बीच उन्होंने हमें इतने मुर्गे और अंडे भेजे कि होस्टल के कुत्ते-बिल्ली तक अघा गये थे।
(क्रमशः)

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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