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एतिहासिकदास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (58)

 

  • पवन कुमार सिंह

 

सुधा को फिल्में देखने का बड़ा शौक था। इस शौक के बढ़ने का एक खास कारण यह था कि कहलगाँव के कल्पना टॉकीज के मैनेजर पांडेय जी ससुर जी के मित्र थे। परिवार के लिए सिनेमा बिल्कुल फ्री था। उस हॉल में लगने वाली नयी फिल्में सुधा जरूर देख लेती थीं। बचपन की सहेली सीमा इस कार्यक्रम में साथ देती थीं। रविवार को नून शो या अन्य दिनों में मैटिनी शो में दोनों सहेलियाँ फिल्म बदलने पर एक बार जरूर देख आती थीं।
शादी के बाद लौटकर कहलगाँव आया था तो मैनेजर साहब ने हमें सिनेमा देखने को आमंत्रित किया था, किन्तु हम समय नहीं निकाल पाये थे। ससुराल से विदा होकर मैं भागलपुर आ गया था। पहली बार माय के बुलावे पर कहलगाँव आया तो भाभी (डॉ0 अनिता सिंह) को दिया वचन निभाने और सिनेमा देखने के निमित्त दो दिनों के भागलपुर प्रवास का कार्यक्रम बनाया गया। पहले दिन मैटिनी शो में उस समय की सुपरहिट फिल्म ‘प्रेम गीत’ देखने हम दोनों पिक्चर पैलेस गये थे। टिकट खिड़की पर ‘हाउस फुल’ का साइन बोर्ड लग चुका था, पर ब्लैक में धड़ल्ले से टिकट बेचा जा रहा था। एकल टिकट किसी ब्लैकियर के पास उपलब्ध नहीं था। एक के पास चार लोगों के लिए एक टिकट मिला, जिसे दोगुनी कीमत पर खरीदने को बाध्य होना पड़ा। इस प्रकार सुधा के साथ पहली फिल्म चार रिजर्व सीटों में से दो पर बैठकर आठ सीटों की कीमत चुकाने के बाद देखी थी। दो कलाकारों की कारुणिक प्रेम कहानी पर आधारित उस फिल्म ने हम दोनों को खूब रुलाया था और आँसुओं की धारा के बीच हमने निश्चय किया था कि इसे दोबारा देखेंगे। इसके पूर्व भी मदर इंडिया, गाइड, बॉबी और शोले को मैं कई-कई बार देख चुका था।
शादी के बाद ससुराल से लौटने पर सुधा छः महीने से अधिक समय तक मायके में रही थीं। इस दरम्यान लगभग हरेक सप्ताहांत में मैं कहलगाँव आ जाया करता था और लगभग हर पखवाड़े उसे भागलपुर ले जाकर फिल्में देखता था। समय मिलने पर भागलपुर के स्थाई निवासी मित्रों के घर जाकर उनके परिजनों से सुधा को मिलवाता था। कभी-कभार कहलगाँव के कल्पना सिनेमा के मैनेजर पांडेय जी के आमंत्रण पर वहाँ भी फिल्में देख आता था। वहाँ खूब दामादी खातिरदारी होती थी। इस कारण सिनेमा देखने का मज़ा दुगुना हो जाता था। कहलगाँव में एक और सिनेमा हॉल था नवचित्र मंदिर। था तो ठीक पुलिस थाना के सामने, किन्तु अनुशासनहीनता और हुड़दंग के लिए काफी कुख्यात था। हमने भी कभी वहाँ फ़िल्म नहीं देखी। उन दिनों जब भी मौका मिलता, मैं सुधा को सिनेमा दिखाने का प्रयास करता। पता था कि जल्द ही सुधा को हमारे गाँव जाकर लम्बी अवधि तक रहना है। वहाँ से निकलकर सिनेमा देख पाना असम्भव होना था। इसलिए मैं चाहता था कि उसका मन सिनेमा से भर जाए और गाँव में उसकी कमी न खले।
उस समय पीजी होस्टल के रिसर्च विंग में रह रहा था। अनिल अपने ससुराल वालों के साथ परवत्ती के पूर्णिया लॉज में रहते थे। उस परिवार के मुखिया प्रो0 शारदा प्रसाद सिंह (एमएलसी) पटने से आते तो वहीं ठहरते थे। हम रोज उनके पास शाम में जरूर बैठते थे। वे मछली खाने के शौकीन थे सो उनके भागलपुर रहते प्रायः मछली भात का भोज होता रहता था। मछली के प्रसंग में एक बड़ी ही प्यारी घटना याद आ गयी…
सुधा के मायके में रहते मैं लगभग हर शनिवार की शाम वाली लोकल ट्रेन से कहलगाँव आ जाता था और सोमवार की सुबह लौटता था। उस दिन स्टेशन जाते हुए अनिल से मिलने पूर्णिया लॉज पहुँचा तो पता चला कि मदरौनी बधाल से एक बोरी रोहू आयी है। मुझे लगा कि यदि शारदा बाबू से मिलूँगा तो मछली के नाम पर आज रुक जाना पड़ेगा। अनिल से मिलने के बाद चुपचाप छिटककर निकल जाना चाहता था कि किसी ने शारदा बाबू को खबर कर दी। वहाँ से निकल ही रहा था कि उनकी आवाज आयी, “पवन जी, कहलगाँव जाय रहल$ छौ की? एत्ते रहू के खैते?” अबतक सुना और जाना था कि मछली देखने से ‘जतरा का सगुन’ बनता है। पर उस दिन मदरौनी की मछली ने मेरी यात्रा बिगाड़ कर रख दी थी। वह ट्रंक कॉल बुक कराने का जमाना था। ससुराल में फोन नहीं था, सो अपने नहीं आ पाने की सूचना नहीं दे सका था। मछली-भात खाते हुए उसका स्वाद नहीं मिल पा रहा था। यह सोचकर परेशान हो रहा था कि वहाँ सभी लोग अंदेशे में डूबे होंगे। अगले दिन रविवार को सुबह की गाड़ी से कहलगाँव पहुँचा तब लोग आश्वस्त हुए थे।
बेरोजगारी के उस दौर में जब भी कहलगाँव आता तो न चाहते हुए भी पहाड़ी पर अवस्थित कॉलेज भवन पर नजर ठहर जाती। बहुत कड़वे माहौल में त्यागपत्र देकर उसे छोड़ दिया था। उसके बाद बेरोजगारी के झंझावात ने अंदर से हिला दिया था और पछतावा होने लगा था। काश, उस दिन अपने गुस्से को पी गया होता! थूककर पहाड़ी से उतरा था इसलिए कुछ परिचित या रिश्तेदार प्राध्यापकों द्वारा आग्रह करने के बावजूद कॉलेज कैम्पस नहीं जा सका। प्रधानाचार्य प्रो0 झा का भी संदेश मिला कि गुस्सा थूक दूँ और पढ़ाने आऊँ, पर उनकी बात नहीं मान सका। अन्य कई मौकों की तरह इस बार भी दंगल सिंह के निर्णय के आगे पवन कुमार लाचार सिद्ध हुए।
(क्रमशः)

 

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
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