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दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (60)

 

  • पवन कुमार सिंह 

 

शादी के बाद पहली बार सुधा गाँव से लौटकर मायके आयी तो लगभग छः महीने तक रही। इस दरम्यान प्रायः प्रत्येक शनिवार-रविवार मैं कहलगाँव आता रहा था। ससुर जी कहलगाँव के सुप्रसिद्ध शारदा पाठशाला में विज्ञान के शिक्षक थे। वे तत्कालीन बंगाली टोला (पूरब टोला) में जिस मकान में पहले भाड़े पर रहे थे, बाद में उसे खरीद लिया था। ऐसे कई अन्य बंगाली परिवार अपने घर बेचकर बंगाल चले गये थे। फिर भी अस्सी के दशक में वह मुहल्ला बंगाली बहुल था। मेरी सासू माँ का मायका बंगाल के वीरभूम जिले में है, सो वह भी पूर्णतः बंगला संस्कार में पली-बढ़ी थीं। अतः मुहल्ले के बंगाली परिवारों के साथ इस परिवार का काफी अपनापा था। बंगाली समुदाय में जमाई बाबू के आगमन पर काफी चहल-पहल और चर्चा का माहौल रहता है। स्वाभाविक ही था कि हर हफ्ते मेरे कहलगाँव पहुँचने की चर्चा भी होती रही होगी। इन चर्चाओं से सुधा अत्यंत असहज हो जाती रही होंगी। शायद यही कारण रहा होगा कि एक-दो माह बीतने के साथ ही उसने मुझे टोकना शुरू कर दिया था। वह आग्रह करने लगी थी कि उसे गाँव पहुँचा दूँ। मैं धर्मसंकट में पड़ जाता था। गाँव में उस समय न तो बिजली थी और न सड़क। खाना पकाने के लिए गैस चूल्हा तो कल्पनातीत था। गाँव का कष्ट सहने लायक स्थिति में मैं उसे नहीं समझता था और वह लोकलाज से मायके में रहना नहीं चाहती थीं। उधर गाँव में अन्य लोगों का तो मालूम नहीं, पर माई की बड़ी इच्छा थी कि बहू कुछ दिनों के लिए ही सही, उनके पास आकर रहे।

सुधा की जिद पर मुझे उसको गाँव पहुँचाना पड़ा। फिर दो-चार माह के अंतराल पर उसका कहलगाँव और बाघमारा आने-जाने का सिलसिला चल पड़ा। गाँव में नौकर-चाकर की कमी उस समय नहीं थी, किन्तु रसोई का काम घर की महिलाओं को ही करने का रिवाज था। लकड़ी के चूल्हे और उसके साथ बने चबूतरे को मिट्टी के घोल से लीपना, चूल्हे को सुलगाना और लकड़ी के धुएँ को झेलना उसे नागवार गुजरता था। उसके कष्टों को कम करने के लिए छोटी बहन, भौजी और माई पूरा सहयोग करती थीं, किन्तु अतिरिक्त रूप से शिष्टाचार निभाने के चक्कर में वह स्वयं पीड़ा सहती थीं। माई को दया आ जाती तो कहतीं, “रे बउआ, छोटकी दुल्हिन के नहिरा पहुँचा दे।” सुधा कहतीं कि मायके से कोई लेने आएँगे तब जाएँगी। फिर भी मैं उसे कहलगाँव छोड़ आता था। यह क्रम तबतक चलता रहा, जब संत जोसेफ्स स्कूल में नौकरी करने के लगभग छः-आठ महीने बाद मैंने भागलपुर में डेरा ले लिया था। वह डेरा लेने के समय हमारा बेटा पइयाँ-पइयाँ चलना शुरू कर चुका था।
शादी हुए डेढ़ साल बीतते-बीतते गाँव और ससुराल दोनों जगह महिलाओं में हमारी संतानोत्पत्ति को लेकर कानाफूसी होने लग गयी थी। माँ बनने के लिहाज से सुधा की उम्र कम थी इसलिए इस प्रसंग के लिए हम तैयार नहीं थे। औरतों की खुसुर-फुसुर सुनकर सुधा कुनमुनाती तो मैं समझा देता था। पर, इस प्रकरण की अति उस दिन हो गयी जब माई ने सुधा को सीधे उलाहना देते हुए चिकित्सक से जाँच कराने का हुक्म सुना दिया। संयोगवश उसी दिन किसी छुट्टी में मैं देर शाम में घर पहुँचा था। पुल के बिना उस समय गंगा पार की यात्रा अत्यंत दुर्गम थी। जाने या आने में आठ-दस घंटे का समय लगता था। थका-थकाया घर पहुँचा और बड़ों को प्रणाम करके सुधा के कमरे में गया तो इस बात से काफी हैरानी हुई कि पहली बार उसने मुस्कुराकर मेरा स्वागत नहीं किया। उसका उतरा हुआ चेहरा साफ संकेत दे रहा था कि कुछ बड़ी बात हो गयी है। पूछने पर भी उसने मुँह नहीं खोला। गुमसुम-सी मुँह लटकाए बैठी रही। मैंने इधर-उधर की बातें करके काफी कुरेदा पर वह हाँ-हूँ करके जवाब देने से बचती रही। ऊहापोह की स्थिति में मैंने खाना खाया। खाते समय माई पास बैठी रहीं, किन्तु उनके हाव-भाव से भी मैं कुछ नहीं समझ सकाऔर माई से खोलकर पूछ भी नहीं सका। बात तब समझ में आयी जब आँसुओं के सैलाब में डूबते-उतराते सुधा ने मिन्नत की कि उसे बच्चा चाहिए। अब वह मायके से लेकर ससुराल तक की औरतों के ताने नहीं सह सकती। इन्हीं परिस्थितियों में हमें संतानोत्पत्ति के लिए तैयार होना पड़ा था।

अगली बार लगभग एक महीने बाद गाँव पहुँचा तो सुधा की तबियत खराब थी। बुखार के साथ उल्टियाँ आती थीं।सारे परिजन परेशान और चिंतित थे। अगली सुबह चिकित्सक को बुलाया गया। कुर्सेला सरकारी अस्पताल के डॉ0 रावत ने जाँच करने के बाद एकांत में मेरी जिज्ञासा का शमन करते हुए बताया कि चिंता की नहीं, खुशी की बात है। मैं बाप बनने वाला हूँ। डॉक्टर साहब को विदा करके मैंने भौजी को खुशखबरी सुनाई तो कुछ ही मिनटों में आँगन हर्ष की किलकारियों से गूँज उठा। सुधा तो अस्वस्थता के बीच भी खिल उठी। डॉक्टर की पर्ची के अनुसार दवा मंगवायी गयी, पर एकाध टेबलेट खाने के बाद उसकी जरूरत नहीं रही। उसके बाद सुधा के आराम और खान-पान का खास ख्याल रखा जाने लगा। भागलपुर के लिए चला तो माई का आदेश हुआ कि ससुराल जाकर यह सुसमाचार उनकी समधिनी को सुनाऊँ और समधी साहब को उनकी ओर से कहूँ कि अपनी सहूलियत से आकर सुधा को लिवा जाएँ। आगे सबकुछ शुभ-शुभ होता रहा। सुधा लगभग दो महीने बाद कहलगाँव आ गयीं। भागलपुर की चिकित्सिका डॉ0 सेन गुप्ता की देखरेख में भ्रूण का सम्यक विकास होता रहा और कहलगाँव की माया दीदी के प्रसव गृह में 18 दिसम्बर की रात हमारे बेटे ने जन्म लिया। वह हमारी इच्छित संतान रहा था इसलिए हमारा जीवन खुशियों से सराबोर हो गया था। इसके पाँच वर्ष बाद दूसरी इच्छित संतान के रूप में हमारी बिटिया का जन्म 24 सितम्बर 1989 को हुआ।(बिटिया के जन्म की कथा भी काफी रोमांचक और मनोरंजक है। उसपर भी ससमय लिखूँगा।)
(क्रमशः)