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दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (63)

 

  • पवन कुमार सिंह 

अप्रैल 1986 में भागलपुर कैथोलिक सोसायटी और एनटीपीसी प्रबंधन के बीच स्कूल खोलने के अनुबंध का निबंधन सम्पन्न हो गया। अनुबंध का मसौदा तैयार करने के लिए फादर वर्गीस और फादर तानी परमपिल ने मुझसे भी सुझाव लिये थे। मैंने एक जरूरी सलाह यह दी थी कि स्टाफ की नियुक्ति में एनटीपीसी की दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए। इस शर्त के साथ 30 वर्षों के लिए एग्रीमेंट हुआ था। नामांकन में एनटीपीसी कर्मियों के बच्चों को प्राथमिकता देते हुए यथासंभव बाहर के बच्चों से वर्ग को भरने की बात थी। आमदनी और खर्च के बीच के अंतर को घटानुदान से पाटना था। सभी स्टाफ को उनके संवर्ग के मुताबिक मुफ्त आवास, मुफ्त चिकित्सा सुविधा और सरकारी वेतनमान मिलना था।
मई 1985 में एनटीपीसी परियोजना का कहलगाँव में शिलान्यास हुआ था। अभी प्लांट का निर्माण- कार्य शुरू ही हुआ था। कहलगाँव हाट के पास कृष्णा इंडस्ट्रीज के खाली मकान में एनटीपीसी का अस्थाई गेस्ट हाउस चल रहा था। अनुबंध के लिए वार्तालाप के क्रम में दो-तीन बार फादर तानी के साथ वहाँ आना हुआ था। स्कूल खुलने की शुरुआत में नामांकन के लिए बच्चों का चयन करने का काम चल रहा था। फादर तानी के साथ उनकी जीप में रोज मैं आता था। मिस टेरेसा उर्फ कुंजम्मा, सिस्टर पॉलिन, सिस्टर सेलेट में से कोई दो आती थीं। निर्माणाधीन कॉलोनी में एक आम के पेड़ की छाया में हम सुबह 9 बजे से 1 बजे तक बच्चों और अभिभावकों के साक्षात्कार और चयन का काम करते थे। ततपश्चात गेस्ट हाउस में भोजन करके भागलपुर लौटते थे। एनटीपीसी के अधिकांश लोग युवा थे अतः बच्चे भी छोटे थे। इस कारण एलकेजी से स्टैंडर्ड टू तक स्कूल आरम्भ करने का निर्णय लिया गया था। एनटीपीसी के वार्डों का चयन हो जाने के बाद स्थानीय लोगों के बच्चों को चुनने का काम हुआ। मैं क्षेत्र के तमाम रिश्तेदारों और परिचितों को विभिन्न माध्यमों से संदेश भिजवाकर अपने बच्चों का एडमिशन कराने के लिए प्रेरित कर रहा था, जिसका सार्थक परिणाम भी मिला था। चारों कक्षाओं को मिलाकर सौ से अधिक बच्चों का नामांकन हो गया फिर स्कूल के उद्घाटन की तिथि तय हो गयी 13 जुलाई 1986। स्थापनाकाल में गोदाम के रूप में इस्तेमाल हो चुके एस्बेस्टस की छत वाले भवन में अस्थाई रूप से स्कूल चलाने और अगले सत्र से पहले स्थाई भवन बनाने की बात तय हुई थी।
इस बीच प्रस्तावित स्कूल के मनोनीत प्राचार्य फादर जोसेफ तानी परमपिल ने एक बार मुझसे कहा कि स्कूल मैनेजमेंट मुझे कहलगाँव भेजना चाहता है। मैं तो पहले से ही आश्वस्त था कि मुझे वहाँ भेजा जाएगा, पर थोड़ा बुद्धिविलास करने के ख्याल से अनमना- सा जवाब दे दिया कि कहलगाँव में ससुराल होने के कारण वहाँ नौकरी करना मेरे लिए मुफीद नहीं होगा। मैं चाहता था कि प्रबंधन यह नहीं समझे कि मुझे इसकी जरूरत है, बल्कि यह संदेश देना चाहता था कि प्रबंधन अपनी गरज से मुझे वहाँ भेज रहा है। इसे आप चाहें तो मेरी राजनीति कह सकते हैं। इसके दो-चार दिनों बाद फादर वर्गीस पनंगट ने कहा, “पवन सर, आपको एनटीपीसी स्कूल जाना है।”
“फादर,मुझे बड़े स्कूल से छोटा स्कूल क्यों भेज रहे हैं आपलोग?”

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“नये स्कूल को आपकी जरूरत होगी। आप एनटीपीसी और कहलगाँव के लोगों को जानते-समझते हैं। आपके अनुभव का लाभ स्कूल को मिलेगा।”
“किन्तु फादर, मेरे लिए कहलगाँव में नौकरी करना कठिन होगा, “क्योंकि वहाँ मेरी ससुराल है। ससुराल में रहना हमारे परिवार में वर्जित है।”
“वहाँ तो क्वार्टर मिलेगा। ससुराल में क्यों रहियेगा?”
“फादर, ऐसा है कि यदि मुझे योगदान करने से पहले क्वार्टर मिल जाए तो एक संकट दूर हो जाएगा। पहले क्वार्टर में सामान रखूँगा फिर स्कूल जॉइन करूँगा। अन्यथा एक बार ससुराल में सामान के साथ पहुँचा तो वहाँ से निकलना असंभव हो जाएगा।”
“ओके, ऐसा ही होगा। हम एनटीपीसी वालों से बात कर लेंगे।”
और हुआ भी ऐसा ही। 13 जुलाई से दो दिन पहले दो दिन की छुट्टी दे दी गयी कि मैं क्वार्टर लेकर सामान पहुँचा दूँ। एक दिन पहले मैं भागलपुर से एक ट्रेकर में सामान लादकर सुधा के साथ एनटीपीसी कॉलोनी पहुँच गया। अस्थाई टाउनशिप में अवस्थित कार्यालय गया। वहाँ भागलपुर विश्वविद्यालय अस्पताल के डॉ0 कलीम के बेटे जावेद कलीम कार्मिक अधिकारी थे। उनसे परिचय हुआ। उन्होंने टाईप टू 46 क्वार्टर की चाबी सौंपी और अपने सहकर्मी राकेश प्रसाद, प्रणव सिन्हा और श्री मिंज से मुलाकात करवायी। इन सभी से बाद के वर्षों में जुड़ाव बढ़ता गया। राकेश जी तो जीवनभर के लिए जुड़ गये हैं। आगे प्रसंगवश उनके विषय में लिखूँगा।
इस प्रकार प्रिंसिपल से भी पहले मुझे कॉलोनी में आवास मिल गया और मैं टाउनशिप में प्रथम ‘नॉन एनटीपीसी रेसिडेंट’ बन गया। उस समय जीएम बंगलो के अतिरिक्त एक दर्जन टाइप थ्री, पाँच दर्जन टाइप टू और दो दर्जन टाइप वन क्वार्टर ही बने थे। एनटीपीसी के सुविधायुक्त क्वार्टर में हमारा आवासन रेगिस्तान में नखलिस्तान की तरह प्रकट हुआ। कहाँ तो नयाबाजार में कालापानी वाला वह डेरा और कहाँ सर्वसुविधासम्पन्न यह नया आवास।
13 जुलाई 1986 को बड़े धूमधाम से संत जोसेफ्स स्कूल एनटीपीसी का उद्घाटन हुआ। तत्कालीन महाप्रबंधक जी सी सरकार और बिशप अर्बन मेगारी ने संयुक्त रूप से फीता काटकर और मंगलदीप जलाकर स्कूल का शुभारंभ किया। उस दिन भागलपुर संत जोसेफ्स को बंद रखा गया था और वहाँ के सभी लोग उद्घाटन समारोह में आये थे। अपने यार स्व0 अनिल व विनोद जी भी पहुँचे थे। उस अवसर पर ली गयी हम तीनों की एक तस्वीर मेरे पास अबतक सुरक्षित है। नये स्कूल में मेरे साथ सिस्टर सेलेट, सिस्टर क्लेयर, सिस्टर पुष्पा और मिस कुंजम्मा को पदस्थापित किया गया था। 14 जुलाई से विधिवत पढ़ाई शुरू हुई। और इस तरह मेरे जीवन का एक नया व बहुत महत्वपूर्ण अध्याय भी शुरू हो गया।

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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