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लोकसभा चुनाव

भारत के भविष्य की दो तस्वीरें

 

  • जावेद अनीस

 

देश में 17वें लोकसभा चुनाव के लिये वोटिंग शुरू हो चुकी है कुल 7 चरणों में वोटिंग के बाद 23 मई को इसके नतीजे घोषित किये जाने हैं. माना जा रहा कि 23 मई स्वतन्त्र भारत के इतिहास में वह तारीख है जब यह निर्णायक फैसला हो जायेगा कि भारत किस रास्ते पर आगे बढ़ेगा? आजादी के आन्दोलन के गर्भ से निकले बहुलतावादी, उदार लोकतन्त्र के रास्ते पर या फिर बहुसंख्यकवाद, उग्र और एकांगी राष्ट्रवाद के रास्ते पर जिसकी लिये पिछले पांच सालों में इस कदर जमीन तैयार कर दी गयी है कि अब  सिर्फ फसल उगाना बाकी है .

वैसे तो हमारे यहां हर चुनाव के दौरान चहल-पहल देखते ही बनती है लेकिन इसमें सियासी पार्टियों के घोषणापत्र को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता है और अमूमन इस पर चर्चायें बहुत कम होती है. पार्टियां भी चाहती है चुनावी घोषणापत्र में किये गये वादों से इतर फोकस सिर्फ  बोगस और भावनात्मक मुद्दों पर बना रहे. लेकिन वर्तमान राजनीतिक माहौल में घोषणापत्र बहुत अहम हो गये हैं. देश की दोनों प्रमुख पार्टियों द्वारा जो घोषणापत्र पेश किया गया है उसमें स्पष्ट रूप से दो विपरीत धारायें उभर कर सामने आती हैं. जहां तरफ कांग्रेस कल्याणकारी, समावेशी राज्य की तरफ वापसी की पेशकश करती हुई दिखाई पड़ रही है वहीँ भाजपा ने बहुसंख्यकवादी उग्र राष्ट्रवाद का खाका पेश किया है.

नरम हिन्दुतत्व के रास्ते पर चलने को मजबूर कर दी गयी कांग्रेस ने इन पांच सालों में पहली बार अपने घोषणापत्र के जरिये एक काउंटर नैरेटिव पेश करने की कोशिश की है जो संघ और नरेंद्र मोदी की भाजपा के नैरेटिव से बिलकुल उलट है और उसकी अपनी नेहरु-गाँधी की विचारधारा के करीब है.

कांग्रेस ने अपने इस घोषणा पत्र में काफी हद तक देश की मौजूदा चुनौतियों को संबोधित करने की कोशिश की है जिसमें न्यूनतम आय योजना (न्याय) सबसे अहम घोषणा है.  “न्याय” के तहत देश के सबसे गरीब लगभग 5 करोड़ परिवारों की सालाना आय को कम से कम 72 हजार रुपए सालाना सुनिश्चित करने का वादा किया गया है. इसके आलावा बेरोजगारी और किसानों के को लेकर भी कई घोषनायें की गयी है साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में जीडीपी का 6 फीसदी हिस्सा खर्च करने और वर्ष 2023-24 तक सावर्जनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर जीडीपी का 3 प्रतिशत तक खर्च बढ़ाने का वादा भी किया गया है.

लेकिन इस घोषणापत्र सबसे महत्वपूर्ण घोषणा घृणा अपराधों को रोकने और सांप्रदायिक सद्भाव, भाईचारा को बढ़ावा देने को लेकर है. जिसके तहत अनुसूचित जातियों, जनजातियों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ होने वाले हिंसा,घृणा अपराधों और लिंचिंग को रोकने का वादा किया गया है साथ ही दंगों, उन्मादी भीड़ की हिंसा और घृणा अपराधों के मामलों के रोकथाम और दंड के लिये 17 वीं लोकसभा के पहले सत्र में ही नया कानून पारित करने की घोषणा की गयी है. इसी तरह से सामाजिक एकता, एकजुटता, सांप्रदायिक सद्भाव, भाईचारा और आपसी मेल मिलाप की प्रक्रिया को मजबूती प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय एकता परिषद् के पुर्नगठन की बात की गयी है साथ ही विभिन्न सम्प्रदायों, समुदायों और धार्मिक एवं सांस्कृतिक मान्यताओं को मानने वाले धर्म गुरुओं को शामिल करते हुए एक इंटर फेथ काउंसिल के गठन की भी बात की गयी है जो समाज में सहिष्णुता और बंधुत्व को बढ़ावा देने के लिये काम करेगी.

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कांग्रेस के घोषणापत्र में जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370  की यथास्थिति बनाये रखने और “अफस्पा” यानी (आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट) के समीक्षा करने और ब्रिटिश शासनकाल की राजद्रोह को परिभाषित करने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए को समाप्त करने की भी बात की है.

वहीँ दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने ‘संकल्प पत्र’ नाम से जारी किये गये अपने घोषणापत्र में बिलकुल अलग ही ट्रैक चुना है जिसमें  राष्ट्रीय सुरक्षा, बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद और आतंकवाद से जुड़े मुद्दों को  “सर्वोच्य  प्राथमिकता तो  दी गयी है लेकिन इसमें बेरोजगारी और कृषि जिअसे ज्वलंत मुद्दों को लेकर कोई ठोस बात नहीं की गयी है .

कांग्रेस के बरक्स भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्ज़ा देने वाले संविधान के अनुच्छेद-35ए को भेदभावपूर्ण और राज्य के विकास में बाधा बताया है और इसके साथ साथ ही धारा 370 को भी हटाने की बात की गयी है. इसी तरह से भाजपा के घोषणापत्र में अंग्रेजो के जामने से चले आ रहे राजद्रोह के कानून को दृढ़ता के साथ जारी रखने की बात की गयी है जिससे तथाकथित “देशविरोधी” सोच रखने वाले लोगों पर शिकंजा कसा जा सके.

भाजपा के घोषणापत्र में ‘समान नागरिक संहिता’ बनाने और देश भर में नागरिकता संशोधन कानून लागू करने की बात की गयी है. इस सम्बन्ध में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह द्वारा अपने एक चुनावी सभा के दौरान की गयी घोषणा भी काबिलेगौर है जिसमें उन्होंने कहा है कि उनकी पार्टी पूरी देश में एनआरसी को लागू करेगी जिसके तहत बौध्द, हिन्दू और सिखों को छोड़ सभी घुसपैठियों को चुन –चुन कर देश से बाहर निकाल दिया जायेगा.

जाहिर है दोनों प्रमुख पार्टियों से देश की जनता के सामने दो बिलकुल अलग विकल्प पेश किये गये हैं जो वैचारिक और सैद्धांतिक रूप से जुदा है. दोनों ने अपने वैचारिक पक्ष स्पष्ट रूप से सामने रख दिया है. उदारीकरण के बाद पहली बार कांग्रेस जनकल्याणकारी राज्य के वादे  के साथ वापसी का संकेत दे रही है जो क्रोनी पूंजीवाद और बहुसंख्यकवादी राष्ट्र्वाद का विरोध करते हुये विविधता और समावेशीकरण पर जोर देता है. जबकि भाजपा और खुले तौर पर अपने हिन्दुतत्व बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद के मसौदे के साथ मैदान में है. अब देखना बाकी है कि जनता इन दोनों में से किस विकल्प को चुनती है?

लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं|

सम्पर्क- +919424401459, javed4media@gmail.com

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