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मुद्दासमाज

तार्किक होने की होड़ में पीछे छूटते वास्तविक प्रश्न – सौरभ सक्सेना

 

  • सौरभ सक्सेना

 

गत दिनों जैसे ही मध्यप्रदेश स्थित जबलपुर से जोमैटो संबंधित मामला सामने आया, वैसे ही सोशल मीडिया पर दो प्रकार की आवाज गूंज उठी। एक पक्ष में है, तो दूसरी स्वाभाविक रूप से विरोध में। दोनों धड़ों में एक दूसरे से तेज़, तीखा और तार्किक होने की होड़ दिख रही है। मामला पूरा मजहबी है, लिहाजा बात “झटका” और “हलाल” तक भी जा पहुंची। किंतु इसे लेकर देश के वर्ग द्वारा जिस प्रकार का विकृत विमर्श बनाने का प्रयास हो रहा है, वह समाज के भीतर व्याप्त एक बड़ी समस्या के कारण और उसके निवारण को समेटे हुए है।

पहले यह जानना आवश्यक है कि आखिर जोमैटो से जुड़ा पूरा मामला क्या है? जबलपुर में अमित शुक्ल ने जोमैटो के माध्यम से खाना ऑर्डर किया था। उसे जानकारी मिली कि भोजन पहुंचाने वाला गैर-हिंदू है, तो उसने जोमैटो से श्रावण माह होने के कारण गैर-हिंदू से खाना न लेने और दूसरा व्यक्ति भेजने का अनुरोध किया। जब जोमैटो ने ऐसा नहीं किया, तब उसने अपने खाने का आर्डर रद्द कर दिया। मामले को तूल पकड़ता देख जबलपुर पुलिस ने स्वत: संज्ञान लेते हुए अमित को चेतावनी के साथ नोटिस जारी कर दिया।

इस पूरे घटनाक्रम पर जोमैटो की ओर से जो ट्वीट, “खाने का कोई मजहब नहीं होता”- किया गया था, उसे देश के एक वर्ग को खूब पसंद किया, जिसमें अक्सर सेकुलरिस्ट वर्ग के स्वघोषित बुद्धिजीवी, उदारवादी, प्रगतिशीलवादी और राजनीतिज्ञ भी शामिल रहते है। जोमैटो के संस्थापक दीपिंदर गोयल ने भी अपनी कंपनी के रुख का समर्थन करते हुए ट्वीट किया, “हमें आइडिया ऑफ इंडिया और हमारे सम्मानित ग्राहकों और भागीदारों की विविधता पर गर्व है। हमें अपने मूल्यों के रास्ते में आने वाले किसी भी ग्राहक को खोने का खेद नहीं है।”

इस पृष्ठभूमि में मध्यप्रदेश के ही उज्जैन से सामने आए कुछ वर्ष पुराने मामले का उल्लेख करना आवश्यक है, जहां के मदरसा संचालकों ने मिड-डे मील का भोजन केवल इसलिए लेने से इनकार कर दिया था, क्योंकि ये खाना भगवान को भोग लगाने के बाद बच्चों को परोसने के लिए भेजा जाता है, जो उनके लिए इस्लाम के खिलाफ था। इस स्थिति में जो लोग जोमैटो के “खाने का कोई मजहब नहीं होता है” संबंधित ट्वीट को उदारवादी, प्रगतिशील और सेकुलर बता रहे हैं, उन्होंने अबतक उज्जैन में मदरसों की आपत्ति पर सुविधाजनक चुप्पी क्यों साध रखी है?

अभी हाल ही में पश्चिम बंगाल सरकार ने प्रदेश के कूचबिहार जिले को लेकर एक परिपत्र जारी किया था, जिसके अंतर्गत स्कूल प्रशासन को निर्देश दिए थे कि जिन विद्यालयों में 70 प्रतिशत या उससे अधिक छात्र मुस्लिम समुदाय के हैं, उनके लिए एक अलग भोजनकक्ष की व्यवस्था की जाए। अब यदि भोजन का वाकई कोई मजहब नहीं होता है, तो पश्चिम बंगाल की ममता सरकार ने क्यों गैर-मुस्लिम छात्रों से भेदभाव करते हुए मुस्लिम बच्चों के लिए अलग से भोजनकक्ष बनाने का निर्देश जारी किया? क्या इसके खिलाफ किसी स्वयंभू सेकुलरवादी ने आवाज उठाई?

सोशल मीडिया ट्विटर पर वायरल एक पोस्ट के अनुसार, वाजिद अब्दुल नामक व्यक्ति ने ट्वीट करते हुए जौमेटो द्वारा ऑर्डर खाना इसलिए लौटा दिया, क्योंकि वह गैर-हलाल था। जौमेटो ने इस पर खेद जताते हुए जांच की बात कही थी। अब यदि कंपनी इस संबंध में वाजिद की मजहबी मान्यता का सम्मान कर सकती है, तो अमित की आपत्तियों को कट्टरता से जोड़कर, पूरे मामले का सांप्रदायिकीकरण कर हिंदू समाज को क्यों कलंकित किया जा रहा है? यदि “खाने का कोई मजहब नहीं होता है”, तो वाजिद मामले में जोमैटो ने ऐसा ही ट्वीट करने से परहेज क्यों किया और क्यों उसके मालिक दीपिंदर गोयल ने वाजिद मामले में देश को “आइडिया ऑफ इंडिया” की जानकारी नहीं दी? यदि देश के स्वयंभू सेकुलरिस्टों, उदारवादियों और प्रगतिशीलवादियों के लिए अमित की आपत्तियां गलत और सांप्रदायिक है, तो उनके लिए वाजिद के सवाल संवैधानिक कैसे हो गया? क्या उनके लिए वाजिद की मांग कट्टरता की परिभाषा का हिस्सा नहीं है?

यह किसी से नहीं छिपा है कि अमित ने पवित्र श्रावण माह का हवाला देते हुए जोमैटो से मुस्लिम डिलिवरी ब्यॉय को बदलने की मांग की थी। अब जो लोग अमित की आड़ में पूरे हिंदू समाज कलंकित कर रहे है और सत्तारुढ़ भाजपा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक पर परोक्ष रूप से कटघरे में खड़ा कर रहे है, वह अमित की आपत्ति में श्रावण संबंधित तथ्य को छिपाने या जानबूझकर इसे नजरअंदाज करने की कोशिश क्यों कर रहे है? अब तो जबलपुर पुलिस, इस बात का भी खुलासा कर चुकी है कि अमित पहले जोमैटो से हैदराबादी बिरयानी (मांसाहारी व्यंजन) मंगवा चुका है और उस समय भी डिलिवरी ब्यॉय गैर-हिंदू था, तब उसने आपत्ति की नहीं थी।

यूं तो हिंदुओं में एक बड़ा तबका शुद्ध शाकाहारी है, जो लहसून, अदरक और प्याज आदि का सेवन ही नहीं, अपितु मांसाहार व्यक्तियों के संपर्क में आने से भी बचता है। क्या यह सत्य नहीं है कि उसी बहुसंख्यक समाज में एक वर्ग ऐसा भी है- जो मटन, चिकन, शूकर और मछली का सेवन तो करता है- किंतु नवरात्र, श्रावण, दीपावली, महाशिवरात्रि, हनुमान जयंती, गणेश चतुर्थी इत्यादि पवित्र दिनों में इसे पूर्ण रूप से वर्जित मानता है? क्या हिंदू समाज में इन दोनों वर्गों की आस्था, परंपरा और मान्यता को सम्मान देना, स्वघोषित सेकुलरिस्टों के लिए संवैधानिक और “आइडिया ऑफ इंडिया” का हिस्सा नहीं है?

जब मुस्लिम समाज गैर-हलाल मांसाहार व्यंजन, शूकर और शराब का सेवन हराम मानता है, जिसका सम्मान होटल-रेस्त्रां, जोमैटो जैसी कंपनी और देश के तथाकथित सेकुलर बुद्धिजीवी वर्ग भी करते है, तो वह सभी पवित्र श्रावण मास में एक हिंदू ग्राहक की आपत्ति में सांप्रदायिक रंग क्यों ढूंढ रहे है?

सच तो यह है कि जबतक गोवंशों और अन्य प्रतीकों को लेकर देश के करोड़ों बहुसंख्यक लोगों की आस्था, विश्वास और परंपराओं का सम्मान नहीं होगा और उनकी भावनाओं को सांप्रदायिक कहकर पर बार-बार आघात किया जाएगा, तबतक सौहार्दपूर्ण समाज की कल्पना असंभव है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं|

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