Tag: कविता का रंगमंच और ‘प्रलय की छाया’

नाटक

कविता का रंगमंच और ‘प्रलय की छाया’ – आशा

 

  • आशा

 

पिछले दिनों रमा यादव के निर्देशन में श्रीराम सेंटर फॉर परफोर्मिंग आर्ट की वीकेंड थियेटर वर्कशॉप के तहत महाकवि जयशंकर प्रसाद की बहु-प्रसिद्द लम्बी कविता ‘प्रलय की छाया’ का मंचन हुआ l ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी के गुजरात पर किये गए अचानक आक्रमण के कारण अन्हिलवाड़ का राजा रायकरण बघेल हड़बड़ी में देवगिरि की ओर भाग गया l उसके भागते ही उसका कोष और मुख्य रानी कमलावती को शत्रुओं ने अपने अधिकार में कर लिया l कालान्तर में माणिक उर्फ़ खुसरू और तदन्तर गुजरात की ही परवारी जाति के हसन नामक व्यक्ति ने दिल्ली का राज्य हस्तगत कियाl ‘प्रलय की छाया’ का आधार यही ऐतिहासिक घटना है जिसका सहारा लेते हुए कवि जयशंकर प्रसाद ने अपनी उर्वर सृजनशीलता से रूपगर्विता स्त्री के अनेकमुखी मन से उपजे द्वंद्व को काव्यमय अभिव्यक्ति दी है l

जयशंकर प्रसाद

‘कविता का रंगमंच’ हिन्दी रंगमंच के लिए नयी अवधारणा नहीं है l 1970 के बाद कविताओं की मंचीय प्रस्तुति के प्रयोग बहुतायत से हुए l कविता और रंगमंच कई स्तरों पर एक-दूसरे से जुड़े हैं, दोनों में संवेगों की प्रधानता होती है, कई कविताएँ नाटकीय तनाव से भरपूर होती हैं l कविता को मुख्यतः अकेले बैठकर ही पढ़ा जाता है l पठनीय वस्तु को दृश्य-श्रव्य बनाने के लिए कविता की आतंरिक लय को पकड़ना निहायत जरूरी है l कविता की मंचीय प्रस्तुति में यह लय बिगड़ भी सकती है और सर्वथा नवीन अर्थों व आयामों का उद्घाटन भी कर सकती है, जो नाट्य-प्रस्तुति की सम्प्रेषण-स्थिति और सम्प्रेषण-शक्ति पर निर्भर करता है l इस रूप में कविता को रंगमंच पर उतारना अत्यंत चुनौतीपूर्ण है क्योंकि शब्दों के माध्यम से ही कविता अभिव्यक्त होती है, रंगमंचीय उपादानों का अत्यधिक सहारा मिलने पर उन शब्दों की अर्थवत्ता खोने की आशंका लगातार बनी रहती है l कविता के रंगमंच की सफलता का मूल दारोमदार अभिनेताओं की वाचन क्षमताओं और शारीरिक गतियों के इस्तेमाल पर रहता है l कविता अनुभूति पर आधारित होती है, जब तक उस अनुभूति को गहराई से समझा नहीं जाएगा, तब तक कविता की नाटकीयता मूर्तिमान नहीं हो सकेगी l हिन्दी रंगमंच में कई बार कविताओं को शास्त्रीय अथवा लोक शैली में प्रस्तुत करने के प्रयास भी हुए, किन्तु वे अधिक सफल नहीं हो सकेl ऐसे प्रयोगों में कविता की संवेदना के खो जाने का खतरा बना रहता है l कविता की मूल अनुभूति को समझने, उच्चारण की शुद्धता, सांकेतिक अभिव्यक्ति, श्रव्य पक्ष को अधिकाधिक उभारने के साथ ही दृश्य पक्ष की अधिकता से बचाव आदि कई पक्षों पर ध्यान देने के साथ ही, अभिनेता की अतिरिक्त परिपक्वता और कल्पनाशीलता से ही कविता का ‘स्व’ सुरक्षित रह पाता है l कविता के रंगमंच में अभिनय की स्थिति नाटक के अभिनय से विशिष्ट होती है l नाटक में अभिनेता के पास बनी-बनायी स्थिति होती है, उनकी भूमिका भी निश्चित होती है किन्तु कविता के मंचन में स्थिति अलग है l कविता का हर शब्द अपने-आप में एक स्थिति या भाव हो सकता है, उस शब्द को बोलना ही स्थिति या भाव को दिखाना होता है l इसीलिए कविता के रंगमंच में यथार्थवादी दृश्य-पद्धति से लगभग बचने का प्रयास रहता है l नाटकीय उपकरणों के न्यून प्रयोग का उद्देश्य यही है कि शब्दों के वाचन और शारीरिक गतियों के द्वारा ही कवितागत बिम्बों का निर्माण किया जाय l प्रकाश-संगीत-ध्वनि का प्रयोग भी अनुभूति को घनीभूत करने के लिए अपेक्षाकृत सीमित रूप में ही किया जाता है l

रमा यादव

उपर्युक्त भूमिका के आलोक में रमा यादव के निर्देशन में हुई ‘प्रलय की छाया’ की नाट्य-प्रस्तुति पर चर्चा करना बेहतर होगा l ‘प्रलय की छाया’ छन्दमुक्त कविता है l आख्यानपरक होने कारण कविता में कथात्मकता, संवादात्मकता और नाटकीयता उपस्थित है l नाट्य-प्रस्तुति में रानी कमलावती के मन के विविध भावों को रूपायित करने के लिए पाँच अभिनेत्रियों को रखा गया, जो एक साथ कमलावती की जिजीविषा, ऊहापोह, व्यर्थता-बोध, पछतावे, स्मृति, रूप-गर्व आदि को प्रकट कर रही थीं l ‘थके हुए दिन के निराशा भरे जीवन की संध्या’ के व्यर्थता-बोध से शुरू हुआ रानी कमला का आत्मालाप एक प्रकार से फ़्लैश-बैक में चलता है l वैभवपूर्ण अतीत जीवन की स्मृतियों और वर्तमान की पीड़ा को आँखों में भरे कमला का एक रूप निरंतर मंच पर विद्यमान रहा l

अपने मादक रूप-सौन्दर्य के कारण धीवर-कन्या से गुर्जर-महीप की रानी बनाने का दर्प लगातार उसके भीतर बना रहता है l उन्हीं दिनों पूरे देश में मेवाड़ की रानी पद्मावती के जौहर की घटना मशहूर थी और भारतीय नारियों का आदर्श भी, किन्तु कमला भिन्न सोचवाली स्त्री थी –

“पद्मिनी जली थी स्वयं किन्तु मैं जलाऊँगी

वह दावानल ज्वाला

जिसमें सुलतान जले।

देखे तो प्रचंड रूप-ज्वाला की धधकती

मुझको सजीव वह अपने विरुद्ध।

आह! कैसी वह स्पर्द्धा थी?

स्पर्द्धा थी रूप की

पद्मिनी की वाह्य रूप-रेखा चाहे तुच्छ थी,

मेरे इस साँचे मे ढले हुए शरीर के

सन्मुख नगण्य थी।

देखकर मुकुर, पवित्र चित्र पद्मिनी का

तुलना कर उससे,

मैने समझा था यही।

वह अतिरंजित-सी तूलिका चितेरी की

फिर भी कुछ कम थी।

किन्तु था हृदय कहाँ?

वैसा दिव्य

अपनी कमी थी इतरा चली हृदय की

लघुता चली थी माप करने महत्त्व का”

– कवि प्रसाद द्वारा पद्मावती की प्रसिद्धि और कमलावती के ईर्ष्या मिश्रित रूप-मद के तुलनात्मक चित्रण को अभिनेताओं ने पूरी अर्थवत्ता के साथ प्रस्तुति में उभारा l

सुलतान द्वारा गुजरात और रानी कमलावती को हस्तगत करने वाले क्षणों में भी रूपगर्विता नारी का मद खंडित नहीं होता, बना रहता है –

“उस अभिमान में

मैने ही कहा था – छाती ऊँची कर उनसे –

“ले चलो मैं गुर्जर की रानी हूँ, कमला हूँ”

वाह री! विचित्र मनोवृत्ति मेरी!

कैसा वह तेरा व्यंग्य परिहास-शील था?

उस आपदा में आया ध्यान निज रूप का।

रूप यह!

देखे तो तुरुष्कपति मेरा भी

कितनी महीन और कितनी अभूतपूर्व ?

वस्तुतः रानी कमलावती जीवन-तत्व से भरपूर थी, उसकी जिजीविषा का एकमात्र सहारा उसका रूप-सौन्दर्य ही था l इसीलिए पति की ओर से जीवन-लीला खत्म करने का सन्देश मिलने के बाद भी वह जीवित रहने का निर्णय करती है –

“जीवन सौभाग्य हैं; जीवन अलभ्य है

चारों और लालसा भिखारिणी-सी माँगती थी

प्राणों के कण-कण दयनीय स्पृहणीय

अपने विश्लेषण रो उठे अकिंचन जो

जीवन अनन्त हैं,

इसे छिन्न करने का किसे अधिकार है?

जीवन की सीमामयी प्रतिमा

कितनी मधुर है?

विश्व-भर से मैं जिसे छाती मे छिपाये रही।

 

कितनी मधुर भीख माँगते हैं सब ही

अपना दल-अंचल पसारकर वन-राजी,

माँगती हैं जीवन का बिन्दु-बिन्दु ओस-सा

क्रन्दन करता-सा जलनिधि भी

माँगता हैं नित्य मानो जरठ भिखारी-सा

जीवन की धारा मीठी-मीठी सरिताओं से

व्याकुल हो विश्व, अन्ध तम से

भोर में ही माँगता है

जीवन की स्वर्णमयी किरणें प्रभा भरी

जीवन ही प्यारा है जीवन सौभाग्य है।”

जीने की इसी लालसा के वशीभूत ‘भारतेश्वरी’ कमला के लिए सुलतान का ‘सुवर्ण पिंजरा’, ‘रंगमहल’ बन जाता है l

अंततः गुजरात के ही एक अनुचर द्वारा की गयी सुलतान की हत्या और सत्ता-परिवर्तन से ‘स्वर्ण-पात्र के लोभ में जलकर धूम-रेखा बन चुकी कृष्णागुरुवर्तिका’ रानी कमला में बहुत गहराई से व्यर्थता-बोध उपजता है, जिसे प्रस्तुति के दौरान अभिनेताओं के वाचिक-आंगिक अभिनय, प्रकाश और ध्वनि के सहारे बेहतरीन ढ़ंग से मूर्तिमान किया गया –

“हाय रे हृदय! तूने

कौड़ी के मोल बेचा जीवन का मणि-कोष

और आकाश को पकड़ने की आशा में

हाथ ऊँचा किये सिर दे दिया अतल में”

प्रस्तुति के अंत में स्वयं रमा यादव की धीर-गंभीर आवाज़ में कविता की अंतिम कुछेक पंक्तियों का वाचन अभिनेताओं की शारीरिक भंगिमा के तालमेल से  सत्ता-परिवर्तन से उपजी कमलावती की विडंबना, संत्रास और यंत्रणा को घनीभूत कर गया l

‘प्रलय की छाया’ की यह प्रस्तुति आरम्भ से अंत तक रूपगर्विता स्त्री के मन की भीतरी तहों को खोलने वाली रही l मन में उमड़ने वाले लालसा, तृष्णा, प्रलोभन जैसे भाव रूप-मद का सहारा पाकर महत्वाकांक्षा का रूप धारण कर लेते हैं, सौन्दर्य के बूते दुनिया को वशीभूत करने का सपना कर्तव्य-मार्ग से विचलित कर देता है, सुलतान को मारने का संकल्प, विकल्प में बदल जाता है, अंततः असफल सृष्टि प्रलय की छाया में सोती रह जाती है – इस पूरे वितान को नाट्य-प्रस्तुति ने सशक्त रूप से धारण किया l

इस प्रस्तुति के कुछ दृश्य अप्रत्याशित रूप से प्रभावशाली बन पड़े l मसलन, शुरुआत में नाविकों द्वारा नाव खेना, मेवाड़ की रानी पद्मावती का जौहर, सुलतान द्वारा किये गए आक्रमण से गुजरात में मचा हाहाकार, अलाउद्दीन खिलजी के दिल्ली दरबार की काम-लोलुप मादकता और अंत में ‘स्वर्ण-पात्र में कृष्णवर्तिका’ का जलना – इन दृश्यों में कलाकारों द्वारा वाचन-पक्ष और शारीरिक गतियों के संचालन के लिए की गयी मेहनत साफ़ दिखाई पड़ी l शब्दों में छिपे अमूर्त भावों को दर्शकों तक पहुँचाने का उनका यह प्रयास सराहनीय रहा l शारीरिक गतियों का विविध उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल हुआ l लहराते हाथों ने नाव खेने का दृश्य भी व्यंजित किया तो कमला के मन की चंचलता और उधेड़बुन का भी l युद्ध, षड्यंत्र, हत्या, रक्पात के दृश्य भी सशक्त अंग-संचालन से प्रभावशाली बन पड़े l

सृजनशील निर्देशकीय परिकल्पना के बूते ‘प्रलय की छाया’ की यह नाट्य-प्रस्तुति आभिनेताओं की जीवंत उपस्थिति और मंचीय उपकरणों के सीमित प्रयोग से प्रसाद की कविता की मूल संवेदना और मार्मिकता को मंच के माध्यम से संप्रेषित करने में सफल रही l इस सफ़लता के पीछे अभिनेताओं की वाचन-क्षमता का हाथ विशेष रूप से रहा l कोमलकांत पदावली, तत्सम बहुलता, लाक्षणिक और बिम्ब-प्रधान भाषा प्रसाद-काव्य की अन्यतम विशेषता है l युवा पीढ़ी द्वारा इस भाषा की व्यंजना को पकड़ना तो दूर उच्चरित करना भी चुनौतीपूर्ण और लगभग असंभव-सा ही है l (कदाचित् इसीलिए रंगकर्मी प्रसाद की कविताओं के मंचन से बचते भी रहे हैं) किन्तु रमा यादव के निर्देशन में प्रत्येक कलाकार इस चुनौती को स्वीकार कर, प्रसाद की काव्य-भाषा के शब्दशः वैशिष्ट्य को बरकरार रखने में कामयाब  रहा l

कल्पनाशील प्रकाश-योजना ने इस प्रस्तुति को प्रभावशाली बनाने में महती भूमिका निभायी l प्रकृति के विभिन्न रूपों – दुपहरी, यामिनी, चाँदनी, पश्चिम जलधि, नदी की लहरें, संध्या के विविध रूपों – रागमयी, निराशा-भरी, रक्तमयी – को वाचन की लय और विविधवर्णी प्रकाश के बूते बेहतरीन ढंग से व्यंजित किया गया l कमलावती की मनःस्थिति, हर्ष-विषाद, विडंबना, द्वंद्व आदि को उभारने में भी प्रकाश-योजना का सहयोग रहा l पूरी प्रस्तुति के दौरान रिकार्डेड संगीत की धुनें प्रसंगवश मंद-मध्यम-तीव्र सुर पर बजती रहीं, जिससे ‘प्रलय की छाया’ की काव्यात्मकता बरकरार रखने में मदद मिली l कविता की पृष्ठभूमि के अनुरूप वस्त्र-विन्यास और मुख-सज्जा में प्रादेशिकता की छाप थी l स्टेज-सेटिंग भी प्रस्तुति के अनुसार उपयुक्त थी l

प्रसाद की कविता में छिपी नाटकीयता को सुन्दर ढंग से उभारने के साथ ही, यह नाट्य-प्रस्तुति ‘कविता के रंगमंच’ की क्षमताओं और संभावनाओं का विस्तार करती नज़र आयी l इस प्रस्तुति के माध्यम से ‘प्रलय की छाया’ की संवेदना रंगमंच का सहारा पाकर उन नवीन पक्षों और आयामों को साकार कर सकी जो कदाचित् पढ़े जाने पर पकड़ में नहीं आ पाते l दर्शकों की कल्पना-शक्ति को सकारात्मक रूप से उद्बुद्ध करने में भी यह प्रस्तुति सफल रही l व्यक्तिगत रूप से मुझे यह प्रस्तुति रानी कमलावती के साथ ही आज के इंसान की मनोवृत्ति को संकेतित करती भी लगी जो भोगवादी प्रवृति से उपजी अति-लिप्सा में शाश्वत जीवन-मूल्यों का निरंतर क्षरण करता जा रहा है l

लेखिका अदिति महाविद्यालय, दिल्ली में हिन्दी की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं|

सम्पर्क-  +919871086838, drasha.aditi@gmail.com

.