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मैं कहता आँखन देखी

 आरएसएस पर प्रतिबंध जरूरी

 

  •  नवल किशोर कुमार

 

अर्जुन आपद राय ने अपनी किताब ‘फियर ऑफ स्मॉल नंबर्स’ में परभक्षी अस्मिता की बात कही है। उनके मुताबिक एक गुट दूसरे गुट को मिटा देने की बात करता है और वह भी तब जब दोनों गुटों के बीच निजता और वैमनस्य के कई सारे बिंदू हैं। एक-दूसरे के प्रति असुरक्षा की भावना से हिंसा को बढ़ावा मिलता है। एक गुट यह सुनिश्चित कर लेना चाहता है कि मुल्क उसका है और उसकी अस्मिता ही राष्ट्र की अस्मिता है। इसमें वह गुट दूसरे गुट पर भारी पड़ता है जो बहुसंख्यक है। यह बहुसंख्यक गुट परभक्षी बन जाता है।

दो दिन पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सुप्रीमो मोहन भागवत ने बयान दिया है। उनके बयान से हर भारतीय को भय महसूस होना चाहिए। उनका यह कहना कि भारत हिंदू राष्ट्र है, भारत के लिहाज से अत्यंत ही खतरनाक है। यह वह बयान है जिसका असर दोनों गुटों पर पड़ेगा जिसकी चर्चा अर्जुन आपद राय ने अपनी पुस्तक में की है।

वैसे यह वाजिब सवाल हो सकता कि मोहन भागवत ने संविधान की मूल भावना के विरूद्ध बात कही है तो उनके खिलाफ भारत सरकार देशद्रोह का मुकदमा क्यों नहीं चला रही है, बशर्ते कि केंद्र में आरएसएस की सरकार नहीं होती। अब चूंकि सरकार आरएसएस की है तो फिर भागवत कुछ भी कह दें, सवाल होने का कोई सवाल ही नहीं उठता। वे चाहें तो संविधान को खारिज करने की बात कह दें। वे चाहें तो यह भी कह सकते हैं कि तिरंगा को भगवा से रीप्लेस कर दिया जाय। आरएसएस इतनी मजबूत हो चुकी है कि अब उसे किसी का भय नहीं है।

लेकिन वे सभी जो आरएसएस सहित सभी धर्मों के कट्टरपंथियों की विचारधारा को गलत मानते हैं, उनके लिए सवाल तो है ही। क्या सचमुच भारत हिन्दू राष्ट्र है? मुसलमानों के लिए इस देश में कोई जगह नहीं होनी चाहिए? कौन हैं ये मुसलमान? क्या ये सभी मुसलमान जिनका विरोध आरएसएस कर रहा है? क्या आरएसएस इन मुसलमानों का विरोध इसलिए तो नहीं कर रहा है कि अधिकांश मुसलमान वे हैं जिन्होंने हिंदू धर्म में व्याप्त जातिगत भेदभाव से तंग होकर इस्लाम कबूल किया और आरएसएस अब उन्हें सबक सिखाना चाहता है?

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वैसे इन सवालों को गौर से देखें तो ये वे सवाल हैं जिन्हें आरएसएस परोक्ष तरीके से उठाना चाहता है। वह चाहता है कि लोग इन सवालों को उठाएं और बहस करें। ऐसा करने आरएसएस की विचारधारा का प्रसार ही होगा। एक उदाहरण राजनाथ सिंह का ही देखिए। पेरिस में जाकर उन्होंने ऐन विजयादशमी के दिन राफेल के पहिए से नींबू कुचला और नारियल की बलि दी। भारत में वे लोग जो अंधविश्वास को गलत मानते हैं, ने राजनाथ सिंह का विरोध किया लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह भी हुआ कि नींबू-मिर्च के टोटके में उन लोगों का विश्वास बढ़ा जो सजग नहीं हैं। देश के रक्षा मंत्री ने राफेल पर नींबू-मिर्च लटकाया है, सिर्फ एक यही तथ्य करोड़ों लोगों के मन में अंधविश्वास व पाखंड के प्रति विश्वास पैदा करेगा। भागवत के शब्दों में आरएसएस का लक्ष्य कि भारत धर्म निरपेक्ष न रहकर हिन्दू राष्ट्र बने, इसका एक प्रयास राजनाथ सिंह ने किया है।

फिर भी यह चिंता का मूल विषय नहीं है। असल बात तो यह है कि यदि देश के सभी हिन्दू मुसलमानों के खिलाफ खड़े हो जाएं तब इस देश में क्या होगा? क्या गृह युद्ध की स्थिति न बन जाएगी? हालांकि अभी जो हालात हैं वह गृह युद्ध से थोड़े ही मायने में कम है। वास्तविकता यही है कि आज इस मुसलमानों को हिन्दू पसंद नहीं करते। इसके विपरीत भी यही परिस्थिति है। दोनों एक-दूसरे से इतने डर गए हैं कि दिल्ली में एक हिन्दू मकान मालिक किसी मुसलमान को किराये पर कमरा देना नहीं चाहता है। यही हालत मुसलमानों की भी है।

वैसे ताज्जूब होता है यह सोचकर कि आरएसएस की मंशा क्या है? क्या वह इस देश के सारे मुसलमानों को मार देना चाहता है? या फिर उन सभी को घर वापसी के लिए धमका रहा है और वह भी भारत सरकार की कनपटी पर बंदूक तान कर?

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यही वह पेंच है जिसके बारे में सोचा-विचारा जाना चाहिए। मेरी अपनी मान्यता है कि आरएसएस मुसलमानों की उंची जातियों का विरोध नहीं कर रहा है। उसने पहले भी नहीं किया है। वह विरोध तो उनका कर रहा है जो पसमांदा हैं, दलित मुसलमान हैं। बोहरा समाज के प्रति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगाव देखिए। शाहनवाज हुसैन और मुख्तार अब्बास नकबी चूंकि अशराफ मुसलमान हैं, इसलिए भाजपा को कोई समस्या नहीं है। पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्रस, दिल्ली द्वारा मार्च 2018 में जारी रिपोर्ट इसकी तसदीक करती है। रिपोर्ट में 5 मार्च 2016 से लेकर 25 फरवरी 2018 के बीच गाय को लेकर हुई मॉब लिंचिंग की 20 घटनाओं का जिक्र है। इन घटनाओं में कुल 29 लोग मारे गए। मारे गए लोगों में अधिकांश पसमांदा मुसलमान थे और अन्य मृतकों में दलित। मोहन भागवत ने मॉब लिंचिंग को पश्चिम के देशों से आया बताया है। हालांकि उनके अन्य आधारहीन तथ्यों में एक यह भी शामिल है। महाभारत में ही चक्रव्यूह का जिक्र है जब अभिमन्यू को कौरवों ने घेरकर मार दिया था।

बहरहाल, जिस तरह से मोहन भागवत संविधान का मजाक उड़ाकर बयानबाजी कर रहे हैं, और यदि उन पर समय रहते रोक न लगाया गया तो निश्चित तौर पर आने वाला समय भारत के लिए अच्छा नहीं होगा। आंतरिक कलह से यह देश जल उठेगा। आज जो इंसानियत कराह रही है कल त्राहिमाम करेगी। बेहतर तो यही है कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में निहित मूल्यों का मजाक बना रहे आरएसएस को आतंकी संगठन करार दिया जाना चाहिए और उसकी सभी गतिविधियों पर रोक लगायी जानी चाहिए। यह जितनी जल्दी हो, भारत के हित में रहेगा।

लेखक फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली के सम्पादक (हिन्दी) हैं|

सम्पर्क-  nawal4socialjustice@gmail.com

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