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मुद्दा

 बहुजनों को सत्‍ता में आना चाहिए – चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’

 

(समस्‍त दमित वर्गों की लामबंदी और उन्‍हें एक इकाई के रूप में साथ लाने की आवश्‍यकता पर अपना पक्ष रखते ओजस्‍वी दलित नायक)

 

उत्‍तरप्रदेश से आने वाले ओजस्‍वी दलित कार्यकर्ता चंद्रशेखर आज़ाद 2017 में उस समय सुर्खियों में छा गये जब सहारनपुर में हुये ठाकुर-दलित संघर्ष के लिए उन्‍हें एक साल से ज्‍यादा की जेल हो गई थी। भाजपा के राम के जबाव में निम्‍नवर्गीय चुनौती के रूप में अपने अनुयायियों द्वारा रावण के नाम से पुकारे जाने वाले आज़ाद ने जोर-शोर के साथ अपने गाँव में एक नाम पट्ट (साइनबोर्ड) लगाया। इस नाम पट्ट में लिखा है कि ‘ढडखौली के महान चमार आपका स्‍वागत करते हैं’।

32 साल के इस युवक को उभरते हुए क्रांतिकारी बहुजन आन्दोलन के एक चेहरे के रूप में देखा जाता है। उनकी घुमावदार मूछें, गहरे नीले रंग का प्रसिद्ध दुपट्टा और एनफिल्‍ड मोटर साईकिल – ये सब चीजें जहाँ वे जाते हैं, वहाँ एक वक्‍तव्‍य सरीखी बन जाती हैं। और यह स्‍पष्‍ट है कि हालिया बॉलीवुड फिल्‍म आर्टिकल 15 के निषाद नामक चरित्र के पीछे की प्रेरणा भी आप ही थे।

वे पुन: जेल में हैं। इस बार वे दिल्‍ली में रविदास मंदिर गिराये जाने के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन को लेकर जेल में हैं। यह मंदिर 16 वीं सदी में हुए संत कवि रविदास का था। दलितों की एक बड़ी संख्‍या इनकी अनुयायी है। अपनी गिरफ्तारी से कुछ दिन पहले जब वे कर्नाटक में थे, तो वे दि हिंदू से मिले थे। दि हिंदू के लिए के.वी. आदित्‍य भारद्वाज ने उनके साथ जो साक्षात्‍कार किया, उसका हिंदी अनुवाद इस प्रकार है :

रविदास मंदिर के ध्‍वंस ने दलितों और केंद्र के बीच तनाव का एक और बिंदु पैदा किया है। लेकिन सरकार का कहना है कि मंदिर गिराने का आदेश तो क्षेत्रीय मानकों के उल्‍लंघन के लिए सर्वोच्‍च अदालत ने दिया था।

यह सर्वोच्‍च अदालत नहीं अपितु दिल्‍ली विकास प्राधिकरण था जिसने मंदिर गिराने की मांग की थी। सरकार ने अपना लक्ष्‍य अर्जित करने के लिए अदालत का इस्‍तेमाल किया। इस मुद्दे का सबसे महत्‍वपूर्ण आयाम अंतत: बहुजन सांस्‍कृतिक प्रतीकों के सम्‍मान से जुड़ा है। इस साल की शुरुआत में प्राधानमंत्री मोदी वाराणसी में रविदास मंदिर गये थे और कहा था कि वे संत रविदास के उपासक हैं। अब उन्‍हें मंदिर की पुन: स्‍थापना के लिए अगुवाई करनी चाहिए, अन्‍यथा उनके पाखंड का खुलासा हो जाएगा। हम उसी स्‍थान पर इसकी पुन: स्‍थापना की मांग में राष्‍ट्र व्‍यापी विरोध प्रदर्शन शुरु करेंगे।

 

हाल में आई बॉलीवुड फिल्‍म अनुच्‍छेद 15’ में आपके अनुकरण पर आधारित एक चरित्र था। क्‍या आपने वह फिल्‍म देखीॽ इसकी आलोचना हुई है कि दलित के दृष्टिकोण से जातीय उत्‍पीड़न की कहानी कहने के बजाए फिल्‍म ने यह काम एक ब्राह्मण अधिकारी की दृष्टि से किया। आप इस पर क्‍या मत रखते हैंॽ

मैंने फिल्‍म नहीं देखी है। लेकिन ऊँची जातियों और दक्षिणपंथ द्वारा इस फिल्‍म का विरोध यह दर्शाता है कि कैसे पूरा का पूरा तंत्र दलित के खिलाफ काम करता है। शायद यह समय मुख्‍यधारा में दलित के परिप्रेक्ष्‍य से कहानी कहने का नहीं है। लेकिन मैाने दलित नायकों वाली दक्षिण की हालिया फिल्‍मों के विषय में सुना है। मुझे लगता है कि जातीय वर्चस्‍व पर सवाल उठाने के लिए ऊँची जातियों के प्रगतिशीलों का सामने आना जरूरी है। लेकिन अब समय आ गया है जब हम अपने संघर्षों की अगुवाई खुद करें और अपनी कहानियाँ कहें और जो ऊँची जातियों से आते हैं, उनके लिए जरूरी है कि वे हमारा समर्थन करें।

बहुत से लोग भीम आर्मी के उद्देश्‍य को लेकर तो नहीं, किन्तु उसकी शैली को लेकर इसके आलोचक हैं। वे तर्क देते हैं कि हिंसा सिर्फ और अधिक हिंसा ही पैदा करती है। आपका मत क्‍या है ॽ

अपने अधिकारों के लिए लड़ना हमारा अधिकार है और हमें किसी भी दमन को सहना नहीं है। यह वह समय है जब हमारी आवाजें सड़कों पर बुलंद स्‍वर में फैल रही हैं। अपने दृष्टिकोण में भीम आर्मी अंबेडकरवादी है – शिक्षित बनिए, संगठित होइए और आन्दोलन कीजिए। हमारा विश्‍वास है कि बिना संघर्ष के कुछ भी नहीं मिलता है और हम किसी भी त्‍याग के लिए तैयार हैं। हम किसी पर आक्रमण नहीं कर रहे हैं, लेकिन कोई हमारे घर आता है और हमें मारता है तो हम अपने बचाव में बदला लेने से नहीं झिझकेंगे। जब तंत्र हमारे खिलाफ इतनी कमर कस चुका है, तो हम और क्‍या कर सकते हैं ॽ सहारनपुर की हिंसा का आरोप मुझ पर लगाया गया और मुझे गिरफ्तार किया गया। लेकिन कोई उस हिंसा पर बात नहीं करता जिसने हमें तबाह कर दिया। जो दलित अपनी आवाज़ उठाते हैं, राज्‍य उन पर नक्‍सली होने का ठप्‍पा लगा देता है, जैसा कि हमने भीमा कोरेगाँव में देखा। और मुसलमानों पर आतंकवादी होने का ठप्‍पा।

क्रांतिकारी दलित नायकों के उभार और युवाओं के बीच से आने वाले उनके व्‍यापक अनुयायियों से क्‍या मुख्‍यधारा की दलित राजनीति की असफलता इंगित होती है ॽ

मुख्‍यधारा के दलित दल बारंबार असफल हुए हैं। एक विद्यार्थी जिसके पास तमाम संसाधन हों किन्तु फिर भी वह बारंबार परीक्षा में अनुत्‍तीर्ण हो जाए, वह एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी होने का दावा नहीं कर सकता। हमारे नेताओं में से अधिकांश आज करोड़पति हैं; वे ऐसे राजवंशों से आते हैं जो हमारी समस्‍याओं को बिल्‍कुल नहीं जानते। हम उनकी नाकामयाबियों से  हमारे आन्दोलन को असफल नहीं होने दे सकते। भाजपा जैसी ब्राह्मणवादी पार्टी के साथ गठबंधन समेत वैचारिक स्‍तर पर ये दल भयावह रूप से समझौतावादी हैं। चूँकि ये नेता वातानुकूलित कक्षों में अटके रहते हैं, अत: युवा लोग नये नेताओं और उग्रपंथी आन्दोलन को जन्‍म देत हुए सड़कों पर संघर्ष करते हैं।

भाजपा अब डॉ. बी.आर. अंबेडकर की विरासत पर दावा करना चाहती है, यहाँ तक कि जम्‍मू और कश्‍मीर से अनुच्‍छेद 370 हटाने के बचाव में भी अंबेडकर की विरासत का दावा कर रही है। बसपा ने इस कदम का समर्थन किया है। सरकार जिस तरह से दलित मुद्दों को निपटा रही है, उसे आप कैसे देखते हैंॽ

भाजपा और इसके वैचारिक परामर्शदाता आर.एस.एस. के डीएनए में ही ब्राह्मणवाद है। ये उस मनुस्‍मृति को थोपना चाहते हैं जो शूद्रों और दलितों को कोई भी शक्ति आबंटित नहीं करती है। जबकि हम भारत के राष्‍ट्रपति बन सकते हैं किन्तु हम तब भी मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते। जिन सामाजिक ताकतों का मनोबल संरक्षण प्रदान करते हुए इस शासन ने बढ़ाया है, उसकी परिणति अल्‍पसंख्‍यकों, दलितों और आदिवासियों के खिलाफ अत्‍यारों की बढ़ोतरी के रूप में हुई है। भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा के सबसे ज्‍यादा शिकार दलित हैं, यहाँ तक कि ये मुसलमानों से भी ज्‍यादा इस हिंसा के शिकार हैं।

कश्‍मीर के संदर्भ में, दलितों का भविष्‍य पार्थक्‍यता में नहीं देखा जा सकता। यह कश्‍मीरियों की आकांक्षाओं के साथ जुड़ा हुआ है। बेहतर यही है कि भाजपा अंबेडकर को हथियाने की कोशिश छोड़ दे क्‍योंकि यह वह विरासत है जिसका दावा वे कभी नहीं कर सकते और इससे सिर्फ उनका दोगलापन ही उजागर होगा।

आर.एस.एस. प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण पर खुली बहस का आह्वाहन किया है।

आर.एस.एस.-भाजपा हमेंशा से आरक्षण विरोधी रहे हैं और उनका लक्ष्‍य आरक्षण को खत्‍म कर देना है। ऊँची जातियों में निर्धनों को आरक्षण देकर, उन्‍होंने बिल्‍कुल यही तो किया है। आरक्षण सदैव से सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने को लेकर रहा है, न कि आर्थिक पिछड़ेपन को लेकर। यह सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के विनिवेशीकरण को लेकर इच्‍छुक रही है जो अनिवार्यत: दलितों को प्रभावित करता है। कारण कि निजी क्षेत्र में कोई आरक्षण नहीं है। मोहन भागवत का वक्‍तव्‍य सिर्फ आर.एस.एस. – भाजपा की दलित विरोधी मानसिकता को व्‍यक्‍त करता है। हम मोहन भागवत के साथ आरक्षण पर बहस को तैयार हैं। पिछले सात दशकों में आरक्षण से वास्‍तव में जो हमने प्राप्‍त किया है, उस पर बहस होने दीजिए। यहाँ तक कि आज भी 54 प्रतिशत दलितों के पास कोई जमीन नहीं है। हम बता देंगे कि क्‍या हमने पाया है और इस समाज में जाति के कारण क्‍या हमने खोया है।

उत्‍तरप्रदेश में सपा-बसपा के महागठबंधन के बावजूद विपक्ष चुनावी स्‍तर पर भाजपा को हराने में असफल रहा है। आप भाजपा का मुकाबला कैसे कर सकते हैं जबकि बहुत सारे महत्‍वाकांक्षी शूद्र और दलित वर्ग इस पार्टी की ओर झुके हुए हैं ॽ

भाजपा के साथ लड़ने का एकमात्र तरीका है – लड़ाई को सड़कों पर ले जाना। संसद में उनके पास बहुमत हो सकता है लेकिन हम (बहुजन) सड़कों पर बहुमत में हैं। संविधान समर्थ सभी ताकतों को इस लड़ाई के लिए एकजुट होने की जरूरत है। यद्यपि चाहे हम एक बार असफल हो गये हैं किन्तु उससे हमें नहीं रुकना चाहिए। दलों के बीच राजनीतिक गठबंधन से कहीं ज्‍यादा हमें जमीन पर लोगों को लामबंद करने की जरूरत है। भाजपा के साथ कोई भी संबंध बहुजनों के हितों के खिलाफ है। हमें इसे उजागर करने और लोगों को समझाने की जरूरत है।

क्‍या सपा-बसपा गठबंधन विरोधाभासों से भरा हुआ था क्‍योंकि गाँवों में ओबीसी और दलित ही अक्‍सर एक-दूसरे के मुकाबले में होते हैं। क्‍या ओबीसी-दलित गठबंधन व्‍यावहारिक है ॽ

भीम आर्मी में हम विश्‍वास करते हैं कि बहुजन समुदाय में समस्‍त दमित-कुचले वर्ग शामिल हैं – दलित, आदिवासी, शूद्र और अल्‍पसंख्‍यक। और हम गाँवों में सामाजिक स्‍तर पर इन वर्गों को एक साथ लाने के लिए काम करेंगे। बहुजन एकता मुख्‍य हथियार होगी, उस व्‍यापक मनुवाद (मनुवादी दलों) का मुकाबला करने में जो आज हम पर शासनरत है।

एक तर्क रहा है कि वाम और दलित आन्दोलनों को एकजुट होना चाहिए। क्‍या आपको लगता है कि इन दो जन आन्दोलनों के बीच सहयोगात्‍मक संवाद का रास्‍ता आगे निलेगाॽ

बहुजन राजनीति कमजोर लोगों की राजनीति है और हम संविधान सम्‍मत तरीके से इस राजनीति में भागीदारी करने वाले हर किसी का साथ देने को तैयार हैं। मेरा मानना है कि स्‍वतंत्र रूप से काम करने वाले बहुत सारे संगठन हो सकते हैं किन्तु साझा मुद्दों पर लड़ने के लिए हमें एक साथ आने की जरूरत है, चाहे वे विभिन्‍न दलित संगठन हों या वामपंथी हों। लेकिन हम में से बहुतों ने दूसरों को वोट किया है उन्‍हें नेता बनाने के लिए, लेकिन अब हम चाहते हैं कि दूसरे हमारे नेतृत्‍व के लिए वोट करें। ऐतिहासिक रूप से इसके घटित होने का अब समय है।

भीम आर्मी विस्‍तारवादी चरण में है। उत्‍तरप्रदेश में आपकी सफलता सुव्‍यवस्थित रही है। क्‍या आप अन्‍यत्र इसे दोहरा सकते हैं ॽ

उत्‍तरप्रदेश में हमारी सफलता मुख्‍यत: हमारे द्वारा चलाई जाने वाली भीम शालाओं के कारण है। गाँवों और गंदी बस्तियों में भीशालाएँ शाम को और अवकाश के दौरान चलाई जाती हैं जहाँ हम बहुजन युवाओं को अंग्रेजी में शिक्षित करते हैं, अध्‍ययन में उनकी सहायता करते हैं और राजनीतिक शिक्षा प्रदान करके बहुजन चेतना को आगे बढ़ाने में उनकी सहायता करते हैं। भीम आर्मी उत्‍तरप्रदेश में ऐसे 1700 विद्यालय चलाती हैं जो हमें प्रतिबद्ध कार्यकर्ता देते हैं। हम जल्‍द ही देश भर में भीम शालाएँ शुरु करेंगे। भारत विविधता की धरती है और हम इस विविधता को शामिल करेंगे। भीम आर्मी सड़कों पर सर्वत्र बहुजनों के लिए सबसे ऊँची आवाज़ बनेगी।

क्‍या भीम आर्मी राजनीतिक दल बनने के अपने रास्‍ते पर है या क्‍या आप सामाजिक आन्दोलन बने रहने और चुनावी राजनीति में प्रवेश करने के बीच में फंसे हैंॽ

भीम आर्मी चुनावी राजनीति के खिलाफ नहीं है किन्तु यह एक ऐसा संगठन भी नहीं है जो सिर्फ राजनीतिक ही हो। हम हमेंशा एक व्‍यापक बहुजन आन्दोलन का हिस्‍सा रहेंगे; चुनावी राजनीति तो लक्ष्‍य को आगे बढ़ाने का सिर्फ एक माध्‍यम भर है। हम अंबेडकर और कांशीराम, दोनों का अनुकरण करते हैं और हम विश्‍वास करते हैं कि उस बहुजन समुदाय को सत्‍ता में आना चाहिए जो बहुमत में है।

 आपने रावणको अपने नाम से हटा दिया था किन्तु अब यह वापस आ गया है।

ये तो लोग हैं जो भाजपा का मुकाबला करने के लिए प्‍यार से मुझे रावण कहने लगे। लेकिन मैंने महसूस किया कि जब मैंने घोषणा की कि मैं नरेन्द्र मोदी के खिलाफ लड़ूंगा तो वाराणसी में राम और रावण के समर्थकों के रूप में भाजपा लोगों का ध्रुवीकरण करने की कोशिश करने लगी। इसीलिए मैंने अपने नाम से रावण हटाने की घोषणा की। लेकिन अब चुनाव गुजर गये हैं और लोग मुझे रावण कहना पसंद करते हैं अत: यह वापस आ गया है।

यह साक्षात्‍कार मूलत: 1 सितंबर, 2019 के दि हिंदू में छपा था जो आदित्‍य भारद्वाज द्वारा लिया गया था। आदित्‍य भारद्वाज का संपर्क ईमल है – adhitya.bharadwaj@thehindu.co.in

 

(अनुवादक :– डॉ. प्रमोद मीणा, सहआचार्य, हिंदी विभाग, मानविकी और भाषा संकाय, महात्‍मा गाँधी केंद्रीय विश्‍वविद्यालय, जिला स्‍कूल परिसर, मोतिहारी, जिला–पूर्वी चंपारण, बिहार–845401, ईमेल – pramod.pu.raj@gmail.com, pramodmeena@mgcub.ac.in; दूरभाष – 7320920958 )