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उत्तरप्रदेश

बदली सियासी पटकथा: अब घोटाले के ‘आजम’

 

  •   शिवाशंकर पाण्डेय

 

नाम नहीं, सियासी दुनिया भी नहीं, बल्कि इन दिनों वे घोटाले के ‘आजम’हैं। आजम का शाब्दिक अर्थ होता है संसार। भ्रष्टाचार की कालिमा भरी राजनीति का एक अलग ही संसार। घोटाले और बदजुबानी के ‘महराजा’ बनने की ओर अग्रसर जनता के बीच चुना गया एक नेता। …पूरा नाम है आजम खां। रामपुर शहर से नौ बार विधायक और कई बार सांसद चुने जा चुके हैं। कैबिनेट मन्त्री तक पद की शोभा बढ़ाई। इस बार भी भाजपा की जयप्रदा को हराकर सांसद चुने गए हैं। रामपुर के कद्दावर नेता। सपा ही नही, सियासत की दुनिया में बड़ा नाम आजम खां। …राजनीति, जिसे समाजसेवा भी माना जाता है, उसमें रहकर घोटालों की दुनिया के नये सरताज निकले आजम खां। रामपुर के सांसद आजम खां के खिलाफ अब 82 मुकदमे दर्ज किए जा चुके हैं। जमीन कब्जाने के 30, इसके अलावा भैंस चोरी से लेकर किताब चोरी, बिजली चोरी समेत कई आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं, भड़काऊ भाषण के मुकदमे अलग। मुकदमों को दर्ज करने का सिलसिला अभी थमा नहीं है। कुल मिलाकर 29 मामलों में जमानत खारिज हो चुकी है। डकैती के चार और एक महिला की गैर इरादतन हत्या के प्रयास का मुकदमा अलग दर्ज है। कई मुकदमों में संगीन धाराएं हैं। तीन मामले में गिरफ्तारी के वारंट हैं। ऐसे में कहना गलत न होगा कि रामपुर के नवाब कहे जाने वाले आजम खां की मुश्किलें काफी हद तक बढ़ चुकी हैं।

समाजवादी पार्टी के दिग्गज कहे जाने वाले नेता आजम खां पर लोकसभा चुनाव के दौरान ही मुकदमों की शुरूआत हुई। आचार संहिता उल्लंघन और आपत्तिजनक भाषण देने के मामले में इनके खिलाफ रामपुर के विभिन्न थानों में 15 मुकदमे दर्ज कराए गए। लोकसभा चुनाव के बाद आजम खां के खिलाफ जमीन के मामले में 30 मुकदमे अलग से दर्ज हुए। तब से आजम खां पर मुकदमों की बाढ़ सी आ गयी है।

विवाद से पुराना नाता-कभी रामपुर में जेल की जमीन कब्जाने को लेकर आजम खां का नाम सुर्खियों में आया। इसके अलावा जल निगम में सहायक अभियंताओं की भर्ती के मामले में भी अनियमितता को लेकर आजम खां चर्चा में रहे। परिवारवाद की खुलेआम मुखालफत करने वाले आजम खां की पत्नी राज्यसभा सांसद और उनका बेटा अब्दुल्ला विधानसभा का सदस्य है। आजम खां के दुव्र्यवहार से नाराज होकर सचिवालय के कर्मचारियों ने तीन दिनों की हड़ताल भी किया था। राजनीतिक बयान और टिप्पणी आग लगाने वाले, जहर बुझे शब्दबाणों को लेकर कई बार बवाल मचा है। भाजपा के प्रदेश मुख्यालय लखनऊ दफ्तर को आतंकवादियों का अड्डा बताया तो पिछले लोकसभा चुनाव की जनसभा में भाजपा प्रत्याशी रहीं जयप्रदा के अन्तर्वस्त्र का कलर बताकर हंगामा करवा चुके हैं। कुछ महीने पहले संसद के भीतर स्पीकर पर बेहद अपमानजनक टिप्पणी करके भी चर्चा में आये।

जौहर विश्वविद्यालय- जांच की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि मन्त्री पद पर रहते हुए आजम खां ने अपने रसूख का बेजा इस्तेमाल जमकर किया। ड्रीम प्रोजेक्ट मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय बनाने में नियम-कानून की जमकर धज्जियां उड़ाई गयीं। तत्कालीन मुख्यमन्त्री मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल वर्ष 2006 में बनने वाले जौहर विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक दर्जा हासिल है। यह निजी विश्वविद्यालय है और आजम खां इसके आजीवन चांसलर हैं। वर्ष 2007 में मायावती मुख्यमन्त्री बनीं तो जौहर विश्वविद्यालय की बाउंड्रीवाल पर बुलडोजर चलवाकर तोड़वा दिया गया। आरोप था कि सरकारी जमीन पर कब्जा करके निर्माण कराया गया है। वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी की दुबारा सरकार बनीं तो बाउंड्रीवाल का फिर से निर्माण कर लिया गया। 18 सितंबर 2012 को इस विश्वविद्यालय का उद्घाटन हुआ। वर्ष 2014 में कार्यकारी राज्यपाल अजीज कुरैशी ने इसे अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय का दर्जा दिया। विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक का दर्जा दिए जाने पर दो पूर्व राज्यपाल टीवी राजेश्वर और बीएल जोशी ने साफ तौर पर मना कर दिया था उस पर आजम खां से काफी तीखी तकरार हुई थी। दोनों राज्यपालों पर भी घोर आपत्तिजनक टिप्पणी तक करने से नहीं चूके।

खास बात यह है कि जांच रिपोर्ट के अनुसार जौहर विश्वविद्यालय की 39 हेक्टेयर जमीन सरकारी है। किसानों से खरीदी गयी बाकी 38 हेक्टेयर जमीन भी सरकार के कब्जे में होने के योग्य है, ऐसा जांच रिपोर्ट में कहा गया है। जमीन कब्जाने में भी धांधलेबाजी की गयी। सत्ता की हनक के आगे अफसर नतमस्तक रहे। शासन-प्रशासन की मिलीभगत रही। सो, मानकों की जमकर धज्जियां भी उड़ाई गयीं। सींगनखेड़ा में खरीदी गयी जमीन के सर्किल रेट तीन बार बदले गए। इसमें कुछ भू-भाग को नदी का बहाव और बाढ़ का क्षेत्र बताकर गलत तरीके से सर्किल रेट घटाया गया। सर्किल रेट घटाने से इलाके के सैकड़ों किसानों का काफी नुकसान हुआ। नदी की पांच हेक्टेयर जमीन पर जहां अवैध तरीके से बाउंड्रीवाल बनी है, उस पर भी जांच टीम ने सवाल उठाए हैं। कहा है कि तालाब, पोखर, नदी की जमीन को वास्तविक रूप में बनाए रखने का हाईकोर्ट का निर्देश है तो इसे कैसे किसी को दिया जा सकता है? इसके अलावा सात हेक्टेयर जमीन रामपुर के तत्कालीन एडीएम ने नियम के विपरीत नवीन परती दिखाकर विश्वविद्यालय को दे दी। यह चकरोड, रेत और नदी की जमीन थी। जानकारों की मानें तो इस तरह की जमीन को नवीन परती में नहीं बदला जा सकता। जिस रेत वाली जमीन को जौहर विश्वविद्यालय के नाम आंख मूंदकर कर दिया गया उस जमीन का गैर वानिकी उपयोग वर्जित है। बताया जा रहा है कि यहां लगे हजारों की संख्या में पेड़ काट डाले गए। खास बात यह है कि 41 हेक्टेयर जो जमीन किसानों से ली गई है, उसमें तत्कालीन एडीएम पर भी फर्जीवाड़े के आरोप हैं। जौहर विश्वविद्यालय के जमीन फर्जीवाड़े को लेकर अजीमनगर थाने में 27 मुकदमे दर्ज किए गए हैं। 25 किसानों ने अलग-अलग मुकदमे दर्ज कराए हैं। प्रशासन ने आजम खां को भू-माफिया घोषित कर दिया है।

दलितों की करीब 104 बीघा जमीन कलेक्टर की अनुमति के बगैर मानक को धता बताकर जौहर ट्रस्ट के नाम कराके हड़प ली। इस पर मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय बना है। दलित खासकर अनुसूचित जाति के लोगों की जमीन बगैर कलेक्टर की अनुमति के खरीदने तथा ग्राम समाज की जमीन के बदले अनुपयोगी जमीन देने के 14 मुकदमे राजस्व परिषद में भी दायर हो चुके हैं। बिजली चोरी का एक और मामला सामने आया। डीएम से कुछ लोगों ने शिकायत किया था कि आजम खां व्यापक पैमान पर बिजली चोरी भी कर रहे हैं। जांच में खुलासा हुआ कि सरकारी धन से दो नलकूप लगे हैं जिसमें से पानी की सप्लाई सिर्फ आजम खां के ही खेतों के लिए किया जाता है। इसी तरह रिसोर्ट में बिजली सप्लाई की जाती है, वहां 50 से भी ज्यादा एसी लगे हुए हैं। असलियत छिपाने और जांच रिपोर्ट में हीलाहवाली करने पर दो अफसरों समेत तीन कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया है। हद तो तब हो गयी जब 12 सितंबर को आजम खां के विरुद्ध बकरी चोरी का भी एक मुकदमा दर्ज कर लिया गया। ताबड़तोड़ मुकदमों की कड़ी में सांसद आजम खां पर अब तक 82 मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। जिस तेजी से इन पर मुकदमा दर्ज किए जा रहे हैं, आश्चर्य नहीं कि जब आप यह रपट पढ़ रहे हों आजम खां पर दर्ज हुए मुकदमों का आंकड़ा सौ पार कर जाए। इसे लेकर राजनीति के गलियारे में एक नयी तरह की चर्चा शुरू हो गयी है। कुछ लोग इसे बदली हुकूमत का मिजाज बता रहे हैं तो कुछ लोग इसे बदले की राजनीति की मिसाल बताने से नहीं चूक रहे हैं। बहरहाल, असलियत का खुलासा तो वक्त करेगा पर अभी जो हो सामने है, वो एक अलग तरह की राजनीति है, जो साफ तौर पर दिख भी रही है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार, और सबलोग के यूपी ब्यूरोचीफ हैं|

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