खुला दरवाजा

कवयित्री भी थी सुजाता – ध्रुव गुप्त

 

  • ध्रुव गुप्त 

 

बुद्ध की समकालीन जिन स्त्रियों की सबसे ज्यादा चर्चा हुई है, उनमें वैशाली की नगरवधू आम्रपाली के बाद सुजाता प्रमुख है। बौद्ध ग्रंथों और परवर्ती साहित्य में आम्रपाली के जीवन के बारे में बहुत सारे प्रसंग उपलब्ध हैं जिन्हें जोड़कर उसकी एक मुकम्मल तस्वीर बनती है। सुजाता के बारे ज्यादा नहीं लिखा गया। बुद्ध की कथाओं की सुजाता को हम उस स्त्री के तौर पर ही जानते हैं जिसने कठोर तप के कारण मरणासन्न बुद्ध को खीर खिलाकर उन्हें नया जीवन और जीवन के प्रति एक संतुलित दृष्टिकोण दिया था। इसके अतिरिक्त भी बौद्ध-ग्रंथों में सुजाता के जीवन, उसके ह्रदय परिवर्तन और उसके अंत के कुछ दूसरे छोटे-मोटे प्रसंग भी हैं जिनपर लोगों का ध्यान नहीं जा सका है। सुजाता बोधगया के पास सेनानी ग्राम के एक बड़े साहूकार अनाथपिण्डिका की पुत्रवधू थी। अत्यंत अहंकारी, वाचाल और उद्दंड। पति और ससुराल के लोगों से उसका रिश्ता बहुत कटु था। एक अरसे तक जब उसे संतान की प्राप्ति नहीं हुई तो उसने मनौती मांगी थी कि पुत्र होने पर वह गांव के निकट स्थित पीपल के वृक्ष-देव को खीर चढाएगी।

संयोग से इस मनौती के बाद उसे एक पुत्र की प्राप्ति हुई। पुत्र होने के बाद जब वह खीर चढाने पीपल के पास पहुंची तो वृक्ष के नीचे तपस्यारत कृशकाय बुद्ध को देखकर उन्हें वृक्ष का देवता समझ बैठी। सुजाता ने प्रणाम कर उनका परिचय पूछा और वस्तुस्थिति से अवगत हुई। बुद्ध की जर्जर हालत देखकर सुजाता ने उन्हें खीर और शहद अर्पण करते हुए कहा- ‘जैसे मेरी पूरी हुई, आपकी भी मनोकामना पूरी हो।’ मरणासन्न बुद्ध ने नदी में स्नान करने के बाद खीर खाकर उनचास दिनों का अपना उपवास तोड़ा। उस दिन बुद्ध को पहली बार लगा कि तपस्या की अति में वे आजतक अपनी देह से अनाचार ही करते रहे थे। उस देह से जो ज्ञान तक ले जाने की सीढ़ी है। पहली बार उन्हें बोध हुआ कि अति किसी भी वस्तु की ठीक नहीं – न भोग की, न योग की। जिस पीपल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को यह बोध मिला वह बोधिवृक्ष कहलाया और गया नगर के पास का वह क्षेत्र बोधगया के नाम से प्रसिद्द हुआ।

ज्ञान-प्राप्ति के बाद एक दिन बुद्ध सुजाता का आभार प्रकट करने उसके गांव सेनानी गए। सुजाता के घर के भीतर से उन्हें लड़ाई-झगडे का शोर सुनाई दिया। बुद्ध के आगमन की सूचना पाकर सुजाता के श्वसुर अनाथपिण्डिका बाहर आए। उन्होंने बुद्ध से क्षमा-याचना की और उनका आतिथ्य करते हुए दुखी मन से कहा कि उनकी बहू सुजाता घर में सास-ससुर-पति किसी की भी नहीं सुनती और उन्हें अपमानित करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ती। उसमें बड़े कुल की बेटी होने का अभिमान है। बुद्ध ने सुजाता को बुलाकर पहले तो उसका आभार प्रकट किया और फिर उसे स्त्रियों के कर्तव्य बताते हुए सफल गृहस्थ जीवन के कई सूत्र दिए। बुद्ध की बातें सुनकर सुजाता को अपनी भूल का बोध हुआ। उसने बुद्ध से और अपने परिवार के सभी सदस्यों से भी क्षमा मांगते हुए यह आश्वासन दिया कि वह अपने स्वभाव में परिवर्तन लाएगी और भविष्य में सभी का सम्मान करेगी।

बौद्ध ग्रंथों में इस घटना के बाद भी बुद्ध और सुजाता की भेट के दो संदर्भ मिलते हैं। अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में सुजाता साकेत के एक मठ में परिवार के साथ बुद्ध का प्रवचन सुनने गई थी।  बुद्ध के प्रभामंडल से वह इतना प्रभावित हुई कि उसी समय वह बुद्ध से धर्म की दीक्षा लेकर बौद्ध भिक्षुणी बन गई। दीक्षा लेने के बाद वर्षों तक वह साकेत के मठ में साधिका का जीवन जीती रही। सुजाता का एक बार और उल्लेख तब आया है जब वह वैशाली के पास स्थित एक आश्रम मे जाकर बुद्ध से अंतिम बार मिली थी। बुद्ध के साथ कुछ दिनों तक वह इसी आश्रम में रही थी और उनकी उपस्थिति में ही उसने अंतिम सांस ली थी।

बौद्ध ग्रंथ ‘थेरीगाथा’ में सुजाता की एक कविता संग्रहित है जिसपर खोजकर्ताओं का बहुत कम ध्यान गया है। वैसे तो बुद्ध के काल में और उनके बाद विपुल साहित्य रचा गया जिनमें ज्यादातर ग्रंथ इतिवृत्तात्मक हैं। बौद्ध साहित्य में दो ही ग्रन्थ ऐसे हैं जिनमें सिर्फ कविताएं संग्रहित हैं। पहला ग्रन्थ है ‘थेरागाथा’ जिसमें बौद्ध भिक्षुओं की कविताएं हैं और दूसरा ग्रन्थ है ‘थेरीगाथा’ जिसमें बौद्ध भिक्षुणियों की काव्य रचनाओं को जगह दी गई है। दोनों ग्रंथों की कविताएं बेहद सीधी-सादी हैं जिनमें बौद्ध भिक्षुओं और भिक्षुणियों ने अपने जीवन-संघर्षों, जीवन से उपजे वैराग्य और साधना के अपने अनुभवों को सरल शब्द दिए हैं। बौद्ध धर्म की श्रेष्ठता स्थापित करने के उद्धेश्य से लिखी गई इन कविताओं में कविता के उच्च मानदंडों की तलाश बेमानी होगी, लेकिन उनमें से कुछ गिनी-चुनी कविताएं ऐसी भी हैं जो अपने कथ्य और शिल्प से पढने वालों को चमत्कृत करती हैं। इन दोनों ग्रंथों में सैकड़ों भिक्षु-भिक्षुणियों  की कविताओं के बीच अनुभवों की गहराई और गहन संवेदना के कारण जो दो कवयित्रियां सबसे ज्यादा प्रभाव छोड़ती हैं, वे हैं आम्रपाली और सुजाता। सुजाता की जो कविता ‘थेरीगाथा’ में है उसमें उसने सांसारिकता की व्यर्थता को रेखांकित करते हुए निर्वाण की दिशा में अपनी यात्रा के अनुभवों को भविष्य की भिक्षुणियों के मार्गदर्शन के लिए साझा किया है।

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सुजाता की उस एकमात्र उपलब्ध कविता का मेरे द्वारा अंग्रेजी से किया गया भावानुवाद आप भी देखें !

 

खूबसूरत, झीने, अनमोल परदों में
चंदन-सी सुगंधित
बहुमूल्य आभूषणों और
पुष्प मालाओं से सजी मैं
घिरी हुई दास-दासियों
दुर्लभ खाद्य और पेय से
मैंने जीवन के सभी सुख
सभी ऐश्वर्य, सभी क्रीणाएं देखी
लेकिन जिस दिन मैंने
बुद्ध का अद्भुत प्रकाश देखा
मैं झुक गई उनके चरणों में
और देखते-देखते
मेरा जीवन परिवर्तित हो गया

उनके शब्दों से मैंने जाना
कि क्या होता है धम्म
कैसा होता है वासनारहित होना
इच्छाओं से परे हो जाने में
क्या और कैसा सुख है
और अमरत्व क्या होता है

बस उसी दिन मैंने पा लिया
एक ऐसा जीवन
जो जीवन के दुखों से परे है
और एक ऐसा घर
जिसमें घर है ही नहीं

 

लेखक भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी तथा कवि एवं कथाकार हैं|

सम्पर्क- +919934990254, dhruva.n.gupta@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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