पुस्तक-समीक्षा

सांस्कृतिक विरासत को बचाती हुई कहानियाँ – मकेश्वर रजक

 

  • प्रो॰ मकेश्वर रजक

 

पश्चिम बंगाल का आसनसोल-दुर्गापुर शिल्पांचल अनेक कथाकारों का सृजन-भूमि रहा है। इस भूमि पर संजीव, सृंजय, शिवकुमार यादव, महावीर राजे आदि कथाकारों ने हिन्दी कथा-साहित्य के जिस बट-वृक्ष को लगाया था, डॉ. रविशंकर सिंह उसके अगली कड़ी हैं। कथाकार रविशंकर सिंह यह स्वीकार करते हैं कि उन्होने संजीव जी से ही कहानी का ककहरा सीखा था। यह भी सत्य है कि संजीव की कहानियों पर शोध करने वाला प्रथम व्यक्ति रविशंकर जी ही हैं। पेशे से शिक्षक रविशंकर जी को कथा-लेखन में गहरी रुचि है और आए दिन उनकी कहानियाँ देश के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। ‘कथा-लघुकथा’ उनका प्रथम कहानी-संग्रह है। इस संग्रह की सभी कथाएँ और लघुकथाएँ राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुका है। समीक्षार्थ कथा-संग्रह बिखरे फूलों को एक माला बनाने का प्रयास है ताकि उनके विचारधारा साहित्य-क्षेत्र में स्थापित हो सके।

इस संग्रह में कुल आठ कथाएँ और तैंतालिस लघु-कथाएँ संकलित है। ये सभी कथाएँ और लघु-कथाएँ वर्तवान बाजारवादी, कट्टरवादी और पश्चात सभ्यता-संस्कृति के विरुद्ध भारतीय सांस्कृतिक विरासत को बचाने का एक मुहिम है। इस संग्रह की प्रथम कहानी- ‘अखाड़ा’ दो संस्कृतियों के बीच का अखाड़ा है। एक पूंजीवादी कम्पनी गजराज सिंह के बावन बीघा की पुश्तैनी जमीन पर कारख़ाना बनाना चाहता है, जिसे गजराज सिंह के पुरखों ने मेला-समिति को दान कर दिया था। यह केवल जमीन ही नहीं है, बल्कि उस गाँव का सांस्कृतिक-विरासत भी है। लेखक के शब्दों में, “गाँव के बाहर बावन बीघा जमीन में बना पोखर, शिवमंदिर और अखाड़ा उन्हीं के पुरखों की निशानी है। वहाँ हर बरस रामनवमी के अवसर पर बड़ा मेला लगता है। अखाड़े में कुश्ती-प्रतियोगिता होती है। विजेता पहलवानों को मेला-समिति की ओर से इनाम-इकराम दिया जाता है” (पृष्ठ-14)। उस जमीन पर बना विशाल पोखर उस गाँव के किसानों के खेती के लिए एक मात्र सिचाई का साधन है। एक स्थानीय विधायक गजराज सिंह को अति आधुनिकता का झाँसा देकर उस जमीन को उस कम्पनी को सौंपना चाहता है। उस जमीन पर आधुनिक शहर बसाए जाएँगे और कुसंस्कृति टांग पसारेंगे। प्रेमचंद के ‘रंगभूमि’ में महेन्द्र प्रताप के सहयोग से जॉन सेवक सूरदास के जमीन पर कारख़ाना बना लेता है। उसी प्रकार फकीरमोहन सेनापति(उड़िया उपन्यासकार) के ‘छ माण आठ गुंठ’(छः बीघा जमीन) उपन्यास में अत्याचारी रामचन्द्र मंगराज से भगिया अपने जमीन को बचा नहीं पाता है। परंतु गजराज सिंह समय रहते सचेत होकर अपनी जमीन को कम्पनी के हाथों जाने से बचाकर अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचा लेता है। कथाकार का स्पष्ट विचार है कि अब जनता सतर्क हो गया है और अब वे इन पूंजीवादी शक्तियों के झाँसे में आने वाले नहीं है। एक सभा में ‘अखाड़ा’ कहानी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कथाकार शिवमूर्ति ने कहा था-“कथाकार ने ‘अखाड़ा’ कहानी में बाजारवाद के लुभावने झाँसी में फँसते हुए लोगों की नियति और उससे उबरने के संकल्प को दिखाया है, तो भविष्य के खतरे के प्रति भी आगाह किया है”। इस कहानी में यह भी संकेत किया गया है कि सरकार के गलत नीतियों के कारण हमारे किसान आत्महत्या के शिकार हो रहे हैं। यथा “……और अब खेती में रखा क्या है ठाकुर साहब? खाद-पानी, बीज-मजूरी की कुल लागत भी उपज से नहीं निकलती है। किसान दोगुने दाम में बीज खरीदते हैं और अपनी फसल आधे दाम में बेचते हैं। वे बैंक का लोन भी नहीं चुका पाते। तभी तो किसान आत्महत्या कर रहे हैं” (पृष्ठ-17)।

इस संग्रह की दूसरी प्रमुख कहानी है- ‘ओल्ड एज होम’ जो वृद्धा-जीवन की समस्याओं पर केन्द्रित है। हमारे पुरखों के आदर्श, मूल्य और कर्तव्य-निष्ठता आज के युवा-पीढ़ी को फीका लगता है क्योंकि वे बाजारू और वैश्विक-संस्कृति के शिकार है जो भले ही बाह्य रूप से आकर्षक लगता हो, परंतु इसका परिणाम त्रासदीपूर्ण होता है। इस कुसंस्कृति के बहाव में आकर हम अपने वृद्ध माता-पिता को अपने से दूर रखना चाहते हैं, “लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्हीं की निगरानी में हमने बेहतर जीवन पाया है” (पृष्ठ-34)।  जिस पिता ने अपने बेटों की ज़िंदगी, पढ़ाई-लिखाई एवं उनके नौकरी के लिए जगह-जमीन तक बेच डाला, र्रिटायर्ड  होने के पश्चात ओल्ड एज होम में रहने के लिए बाध्य हो जाता है। तथापि उसके मन में अपने बेटों, बहुओं एवं पोते-पोतियों के प्रति स्नेह ही उमड़ता है जो हमारी अपनी संस्कृति की पहचान है। रविशंकर सिंह समय को दुहाई देते हुए कहते हैं- “एक समय वह था और एक समय आज है” (पृष्ठ-38)। क्या आज हमारी संस्कृति संकट में नहीं है–इस प्रश्न का उत्तर शायद हमारे युवा पीढ़ी के पास नहीं है।

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इस संग्रह की ‘दंगा’ कहानी साम्प्रदायिक हिंसा को केंद्र में रख कर लिखा गया है। भारतवर्ष की संस्कृति साम्प्रदायिक हिंसा, आपसी द्वेष, कलह, घृणा आदि में विश्वास नहीं करता तथापि इस देश का हर कोना किसी न किसी रूप में इस कुसंस्कृति का शिकार होता रहा है। बिहार का भागलपुर, उत्तर प्रदेश का कानपुर, गुजरात का गोदरा, पश्चिम बंगाल का आसनसोल आदि इसके ज्वलंत उदाहरण है। अंग्रेजों द्वारा फैलाये गए इस कुसंस्कृति का उपयोग आज के हमारे भ्रष्ट और स्वार्थी राजनेता आम जनता को गुमराह करने एवं राजनीतिक लाभ के लिए बखूबी कर रहे हैं। इस कहानी में जोगी साव का उपयोग शिवनाथ बाबू और स्थानीय विधायक द्वारा इसी रूप में होता है। स्थानीय विधायक एक तरफ हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच दंगा फैलाता है तो दूसरी तरफ अन्य पार्टी पर दंगा भड़काने का आरोप लगाकर आम जनता को अपने शरण में आने का आह्वान करता है जो वोट की राजनीति के सिवा और कुछ भी नहीं है। लेखक देश की संस्कृति का परिचय देते हुए कहते हैं-“मुसलमान रामनवमी के अखाड़े में कुश्ती खेलने जाते और हिन्दू ताजिये के जुलूस में शामिल होते xxx ताजिया हिन्दुओं के द्वार पर लगाया जाता था। हिन्दू युवक भी माथों पर पगड़ी, कमर और पैरों में घुंघरू बाँधकर पाइक दौड़ाते थे। मुसलमान युवकों को लाठी, भला, बल्लम, बाणा, तलवार और बर्छी चलाने के गुर सिखाने के लिए हिन्दू टोले से उस्ताद बुलाए जाते थे” (पृष्ठ-44)। लेकिन देश की वर्तमान व्यवस्था हमारे इस सुसंस्कृति पर प्रश्न-चिन्ह लगा दिया है। तभी तो लेखक कहते हैं- “अब हिन्दू ताजिये के जुलूस में नहीं आते और मुसलमान रामनवमी के अखाड़े में नहीं जाते। यह कैसा समय है?”(पृष्ठ-44)।  इस प्रकार के दंगों में क्षति तो आम जनता का ही होता है जो मिट्टी के घरौंदों में दरवाजों की जगह टाटी लगाकर रहता है। कहानी में यह भी संकेत है कि समाज में जो ईमानदार लोग है उसे बदलाम करने के लिए राजनेताओं द्वारा हर तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। दीपनारायन झा जैसे उच्च आदर्श और विचार वाले शिक्षक के साथ ऐसा ही होता है। विधायक जोगी साव को बलि का बकरा बनाते हुए कहता है- “कोर्ट में तुम्हें बस इतना कहना है कि दीपनारायन झा के कहने पर तुमने दंगे को अंजाम दिया है”(पृष्ठ-49)।  कहानी के अंत में जोगी साव को अपने कुकर्मों पर अफसोस होता है। वह अपनी पत्नी से कहता है- “मैंने जो भी पाप किया, बाल-बच्चों की खातिर किया, लेकिन आज एक देवता समान आदमी पर इल्जाम लगाते हुए मुझे जितनी ग्लानि हो रही है, इससे पहले कभी नहीं हुई”(पृष्ठ-50)।  लेखक जोगी साव के माध्यम से स्पष्ट कर देते हैं कि अब देश की भोली-भालि जनता इन भ्रष्ट शासकों के बहकावे में आने वाला नहीं है और अब देश में धर्म, जाति और संप्रदाय की राजनीति नहीं चलेगी।

 

इस संग्रह की ‘नागपाश’ कहानी दलित समाज पर केन्द्रित है। इस कहानी में यह दिखाया गया है कि संविधान में दलितों के उत्थान के लिए प्रावधान के बावजूद उच्च वर्गों द्वारा उसके हक मारे जा रहे हैं और व्यवस्था इसकी छानबीन न करके चुप्पी साधे हुये है। गाँव का धर्मवीर सिंह जो राजपूत परिवार का है, शहर में आकर रामचन्द्र रविदास के नाम पर नौकरी करता है। आश्चर्य की बात यह है कि धर्मवीर सिंह को रविदास अर्थात दलित बनकर सरकारी सुविधा लेने से परहेज नहीं है, पर गाँव में रविदास कहलाने से परहेज है। अन्तः धर्मवीर अपने ही जाल में फँसता चला जाता है। एक तरफ जाति की मर्यादा तो दूसरी तरफ नौकरी की चिंता। लेखक इसे ही नागपाश कहा है। कहना न होगा कि ‘नागपाश’ तात्कालीन समाज की झूठी मर्यादा और उसमें फंसे व्यक्ति की यथार्थ बयान है।

‘जीवन खेल-तमाशा’ कहानी परंपरागत कुसंस्कृति जैसे- अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, पोंगा-पंडितों एवं ब्राह्मणवादी कुसंस्कृति तथा कर्मकांडों की विरोध की कथा है। हमारी पुरानी पीढ़ियाँ अशिक्षा और अज्ञानता के कारण अंधानुकरण एवं पोंगा-पंडितों के बनाए कर्मकांडों में फँस जाते हैं। दरअसल कर्मकांड ब्राह्मणवादी संस्कृति की देन है जो वर्षों से अपने इस जाल को समाज में फैला रखा है और आम जनता को मूर्ख बनाता आ रहा है। परंतु आधुनिक पीढ़ी इसे स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है। यही कारण है कि कथानायक दीवाकर की माँ सत्यनारायन व्रत-कथा के पश्चात जब उसे ब्राह्मण के पैर छूकर आशीर्वाद लेने के लिए कहती है तो वह इसका विरोध करता है। लेखक लिखते हैं- “व्रत-कथा सुनने के उपरांत माँ मुझे उस पंडित के चरण छूकर उन्हें दक्षिणा देने के लिए कहती। उस समय मेरा मन अंदर ही अंदर विद्रोह करता। में जानता था कि वह दिन भर गाँजा के नशे में टुन्न रहता और छोटी-मोटी चोरियों के इल्जाम में कई बार जेल जा चुका है। ऐसे व्यक्ति के चरण छूने में मेरे मन में घोर घृणा उपजती” (पृष्ठ-70)। लेखक के इस कथन से इन पोंगा- पंडितों के चरित्र भी सामने आ जाता है। दीवाकर की माँ पुराने खयालात की है। इसलिए वह रोज करोड़ों देवी-देवताओं की पूजा करती है। प्रतिदिन नहा-धोकर रामायण का पाठ करती है। एक दिन दीवाकर बिना नहाये उस ग्रंथ को पढ़ लिया तो उसकी माँ भड़क उठी क्योंकि ऐसा करके वह माँ की दृष्टि में सत्यानाश कर दिया। माँ के तरफ से आदेश हुआ कि वह नहा-धोकर ही रामायण पढे। लेकिन लेखक की दृष्टि में इस तरह की परम्परा अंधविश्वास है। लेखक के शब्दों में- “मानस-पाठ करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन स्नान, पूजा-पाठ जैसे कर्मकांड पर मेरा विश्वास नहीं था”(पृष्ठ-72)।

 

इस संग्रह की ‘डरे हुए लोग’, ‘गाली’, ‘और आदमी….?’, ‘सुखी आदमी’, ‘बहेलिया’, ‘प्रतीक्षा’, कारोबार’, ‘सभ्य बस्ती’, प्रतिक्रिया’, झूठा-सच’, ‘भोलू सियार का राज-पाट’, आत्मविश्वास’, ‘पथ-प्रदर्शक’, ‘गृह-प्रवेश’, ‘दीया और बाती’, ‘शिक्षित गाँव’ आदि लघु-कथाएँ विभिन्न दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण रहा है। ‘डरे हुए लोग’, ‘गृह-प्रवेश’ तथा ‘और आदमी….?’ समाज में व्याप्त अंधविश्वास, जाति-पाति, ब्राह्मणवादी संस्कृति एवं पाखंडियों पर प्रहार करते हुए एक स्वच्छ सांस्कृतिक विरासत की माँग करता है। ‘गाली’ और ‘पथ-प्रदर्शक’ लघु-कथा तात्कालीन भ्रष्ट राजनेताओं के चरित्रहीनता एवं दिखावटी देशभक्ति को उजागर करता हुआ स्पष्ट करता है कि पार्टी के कार्य-करता कभी भी जनता को सही रास्ता नहीं दिखाता है। एक अनजान शहर में जब लेखक पार्टी के एक कार्य-कर्ता से अपने गंतव्य तक पहुँचने का रास्ता पूछा तो वह उसे गलत रास्ता बता दिया। पर एक बूढ़ा आदमी लेखक को सही रास्ता बताते हुए सतर्क किया- “तुम्हारा गंतव्य यहीं पास में है बेटा। तुम फलां गली से पैदल चलकर पंद्रह मिनट में वहाँ पहुँच सकते हो। तुम इनकी बातों में न आओ। ये लोग या तो खुद गुमराह हैं या तुम्हें गुमराह कर रहे हैं। आजादी के बाद से ये लोग जनता के साथ यही सलूक करते रहे हैं”(पृष्ठ-116)। ‘कारोबार’ और ‘झूठा-सच’ भी भ्रष्ट नेताओं,कम्पनियों और अफसरों के झूठी बयान बाजी की कथा है। लेखक के शब्दों में- “बाबूजी, झूठ तो सभी बोल रहे हैं। जितनी बड़ी कंपनी उतना ही बड़ा झूठा विज्ञापन, जितना बड़ा नेता उतना ही झूठा भाषण”(पृष्ठ-105)। ‘भोलू सियार का राज-पाट’ यह सिद्ध करता है कि जनता के खून को चूसकर ही शासक वर्ग अपना राजपाट कायम किए हुए है। अतः हमे ऐसे शासक की तलाश करनी चाहिए जो बिना खून चूसे हमे सुंदर शासन दे सके। लेखक कहते हैं- “तब से जंगल के जानवर ऐसे राजा की तलाश में हैं जो उन्हें बिना खून के ही सुंदर शासन दे सके”(पृष्ठ-109)।

‘हादसा’, ‘दीया और बाती’, ‘बहेलिया’ आदि कथाएँ मनुष्य के मनुष्यता पर प्रश्न-चिन्ह लगता है। कथा में दिखाया गया है कि एक दुर्घटना में मारे गए एवं घायल लोगों के सहायता के लिए कोई सामने नहीं आया, जबकि एक कौए का दुर्घटना में मारे जाने पर हजारों कौए जमा हो गए। उसी प्रकार ‘दीया और बाती’ में बस दुर्घटना के समय बटमार किसी के बैग छीनने में व्यस्त थे तो प्रेस-रिपोर्टर घायल-मृत लोगों की तस्वीर खींचने में व्यस्त थे, पर घायल लोगों की सहायता के लिए कोई सामने नहीं आ रहा था। कहना न होगा कि इस मामले में मनुष्य पशु-पक्षियों से भी कमजोर हो गया है। खैर, कुछ स्थानीय लोग इस बचाव कार्य में आगे आते हैं। अंत में लेखक कहते हैं- “मुझे लगता है इस सघन अंधेरे में कुछ दीयों में अभी तक तेल और बाती है। जब तक इन दीयों में तेल और बाती है, तब तक इस अंधेरी दुनिया में थोड़ी मानवता बाकी है”(पृष्ठ-135)। ‘बहेलिया’ कथा रंगभेद,जातिभेध, धर्मभेध आपसी द्वेष-कलह, घृणा एवं मतभेध को भूलकर एवं एक रंग में ढलकर समाज विकास की बात करता है।

‘सभ्य-बस्ती’ और ‘प्रतिक्रिया’ स्त्री जीवन पर जुल्म, अत्याचार और शोषण की कथा है। ‘प्रतिक्रिया’ में जहाँ स्त्री अपने ही पति द्वारा प्रताड़ित होती है, वहीं ‘सभ्य-बस्ती’ में वह सभ्य समाज द्वारा प्रताड्ना और शारीरिक शोषण का शिकार होती है। वर्तमान सभ्य समाज का यही स्वरूप तैयार हुआ है। ‘प्रतिक्रिया’ में लेखक एक बच्ची के माध्यम से लेखक कहते हैं- “मुझे लगा, जैसे पापा तुम्हें मरते हैं, उसी तरह गुड्डा भी मेरी गुड़िया को थप्पड़ मरेगा”(पृष्ठ-103)।

कहते हैं- शिक्षा मनुष्य के आँखों को खोल देता है। मनुष्यों के बीच दूरियाँ कम कर देती है। शिक्षित समाज भेदहीन होता है, परंतु भूमंडलीकरण के इस दौर में इस समाज में जितने भेदभाव देखे जा रहे हैं, उतने भेधभाव पूर्ववर्ती समाज में नहीं था। ‘शिक्षित गाँव’ लघुकथा में लेखक ऐसे समाज पर व्यंग करते हैं- “अब गाँव की छाती पर नागिन की तरह तारकोल की सड़क लेटी है। कंधे पर हाई-वोल्टेज तार लादे दैत्याकार खंभे खड़े हैं। गाँव में अस्पताल, विद्यालय, बैंक और बाजार है। अब लोगों के दिलों की तरह ताजिये का आकार भी छोटा हो गया हाई। अब ताजिया हिंदुओं के दरवाजों पर नहीं आता। मुसलमान हिन्दू के अखाड़े में कुश्ती खेलने नहीं आते हैं। अब हमारा गाँव शिक्षित हो गया है”(पृष्ठ-137)। कहना न होगा कि भूमंडलीकृत शिक्षा समाज मे कुसंस्कृति को ही उत्पन्न किया है।

‘सुखी आदमी’ लघुकथा सुखी मनुष्य पर व्यंग है। वस्तुतः सुखी मनुष्य वह नहीं है जिसके पास अपार धन-दौलत और ऐशों आराम की ज़िंदगी है, वरन सुखी मनुष्य वह है जो अपने मन से अभावों में भी संतुष्ठ है। एक प्रश्न के उत्तर में एक चायवाला लेखक को कहता है- “बाबू, मै चैन की बंशी अभी भी बजाता हूँ। मुझे उन लोगों पर तरस आता है, जिनके जीवन में पैसों का योग है, लेकिन भोग नहीं। उनके पास बढ़िया पलंग है, पर नींद नहीं, बढ़िया भोजन है, पर भूख नहीं। अब मुझे देखिये, अफर कर खाता हूँ और बिथर कर सोता हूँ”(पृष्ठ-91)। ‘आत्मविश्वास’ कथा के माध्यम से कथाकार कहते हैं कि इस संसार में ईश्वर नाम की कोई चीज नहीं है। मनुष्य की शक्ति, उसका आत्मबल और आत्मविश्वास ही श्रेष्ठ है जिसपर कायम रहकर सफलता प्राप्त कर सकता है।

इस संग्रह की अन्य कथाएँ एवं लघुकथाएँ भी भाव और कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। लेखक को लोक-भाषा, लोक-संस्कृति एवं लोक-परंपरा में अटूट विश्वास है। यहि कारण है कि वे अपनी रचनाओं में इसका पूरा खयाल रखते हैं। अधिकांश कथाओं में आत्मकथात्मक शैली का प्रयोग हुआ है जिससे कथानक में विश्वसनीयता बनी हुई है। भाषा सरल,सहज, सुस्पष्ट और पात्रानुकूल है। भाषाई दृष्टिकोण से इनकी कहानियाँ कहीं भी बोझिल नहीं हुई है। उनकी बोली में ‘अंगिका’ का मिठास है। उनका हंसमुख चेहरा किसी को भी अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है। ऐसे कथाकार से हिन्दी साहित्य को काफी उम्मीदे हैं।

पुस्तक-समीक्षा

पुस्तक—कथा-लघुकथा (कहानी-संग्रह)

लेखक—रविशंकर सिंह

प्रकाशक—बोधि प्रकाशन, जयपुर-6

मूल्य- रु॰ 120/-

समीक्षक—प्रो॰ मकेश्वर रजक

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समीक्षक मानकर कॉलेज, मानकर, बर्दवान(प॰बं॰), में हिन्दी विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं|

सम्पर्क- +919332653595, makeswar.rajak@rediffmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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