मैं कहता आँखन देखी

भारत का कलंक बिहार

 

  • नवल किशोर कुमार

 

अभी हाल ही में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी संयुक्त राष्ट्र की आम सभा को संबोधित करते हुए कहा कि विश्व को भारत ने बुद्ध दिया है। वे ऐसा कहकर गर्व की अनुभूति कर रहे होंगे। ऐसा उनके वीडियो फुटेज को देखकर कहा जा सकता है। लेकिन जिस प्रांत ने बुद्ध को ज्ञान प्रदान किया, आज उसके हालत क्या हैं? आइए, गौर करते हैं।

दिल्ली के मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल ने कहा है – “एक बिहारी पांच सौ रुपए का टिकट कटाकर दिल्ली चला आता है। यहां इलाज कराता है। हमें खुशी होती है कि हम उन्हें भी इलाज की सुविधा प्रदान करते हैं। लेकिन दिल्ली की क्षमता सीमित है।” श्री केजरीवाल के इस बयान को लेकर बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने कोई उल्लेखनीय टिप्पणी नहीं की है। हालांकि भाजपा दिल्ली में होने वाले चुनाव को लेकर श्री केजरीवाल के बयान को चुनावी मुद्दा बनाने को तैयार दिख रही है। उसकी इस तैयारी की बड़ी वजह यह है कि दिल्ली में दिल्ली वालों से अधिक बिहार के लोग हैं। वैसे भी दिल्ली में दिल्ली के लोग हैं ही कितने। यह तो आंखों-देखा सच है कि दिल्ली में हर दस में से 9 आदमी दूसरे राज्य का है। स्वयं अरविन्द केजरीवाल मूलत: दिल्ली के नहीं हैं। उनका संबंध हरियाणा के हिसार जिले से है।

दरअसल, श्री केजरीवाल के बयान के कई मायने हैं। पहला तो यह कि बिहार में स्वास्थ्य सुविधाएं बदहाल हैं और बिहार सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। एनएचएफएस-4 के आंकड़े बताते हैं कि बिहार के शहरी इलाकों में 50 फीसदी लोग निजी अस्पतालों में अपना इलाज कराते हैं जबकि ग्रामीण इलाकों में 15 फीसदी लोग। दरअसल अस्पताल और डाक्टरों की उपलब्धता दोनों मामलों में बिहार बहुत पिछड़ा हुआ राज्य है। उपर से 13 करोड़ से अधिक की आबादी का बोझ। इस पर भी सरकार के पास कोई ठोस नीति का अभाव पूरी स्थिति को भयावह बना देती है। गांवों में सरकारी अस्पताल हैं तो वहां डाक्टर नहीं मिलते। शहरों में भी सरकारी अस्पताल हैं, वहां हालात यह है कि डाक्टर अपने चैम्बर के बजाय अपने प्राइवेट अस्पताल में धंधा चला रहे हैं। किसी को कोई परवाह नहीं है। फिर चाहे दिल की बीमारी हो या कोई और भयंकर रोग, आम बिहारी के पास कोई उपाय नहीं है सिवाय इसके कि वह पांच सौ रुपए का टिकट कटाकर दिल्ली आ जाय। आम आदमी तो छोड़िए, बिहार के राजनेताओं को भी यही करना पड़ता है। आप दिल्ली के एम्स में चले जाइए, कोई न कोई बिहार का राजनेता अपना इलाज करवाता मिलेगा।

ऐसे में अरविन्द केजरीवाल के बयान का विरोध कैसा? वह तो ठीक ही कह रहे हैं। बिहार है ही इसी लायक कि उसका मजाक उड़ाया जाय।

लेकिन रूकिए, यह केवल आधा पक्ष है। दूसरा पक्ष भी पढ़ लिजीए। सबसे पहले यह आंकड़ा कि वर्ष 2018-19 में दिल्ली में प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति आय  3 लाख 65 हजार 529 रुपए है। सनद रहे कि यह आंकड़ा राष्ट्रीय आंकड़े का तीन गुणा है। बिहार के आंकड़े से तुलना करें तो तस्वीर साफ होगी। वर्ष 2018-19 में बिहार सरकार द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष आय 31 हजार 316 रुपए है। दिल्ली के  3 लाख 65 हजार 529 रुपए के मुकाबले यह दसवें हिस्से से भी कम है। यदि प्रति महीने के हिसाब से आकलन करें तो एक बिहारी नागरिक एक माह में करीब दो हजार रुपए या इससे थोड़ा अधिक लगभग तेईस-चौबीस सौ रुपए।

बहरहाल, गजब के आंकड़े हैं न! यकीन ही नहीं आता कि भारत में बिहार भी है और दिल्ली भी। दिल्ली के मुख्यमन्त्री का घमंड कहिए या सचबयानी गलत तो नहीं ही है। गलत है तो बिहार और बिहार के शासकों की नीति। केंद्र सरकार की नीतियां भी कम जिम्मेदार नहीं रही हैं। लेकिन यह एक विस्तृत सवाल है। फिलहाल तो बिहार और बिहारियों के दुर्भाग्य पर सोचने-विचारने का समय है।

मेरे मन में आ रहा है कि दिल्ली में रहने वाले सभी बिहारी यदि एक सप्ताह तक हड़ताल कर दें तो कैसी तस्वीर बनेगी दिल्ली की। लेकिन जाने दें, यह तो मन की बात है। दिल्ली में रहने वाले बिहारी रोजी-रोजगार के लिए अपना घर-द्वार छोड़कर आए हैं। यदि उन्होंने हड़ताल कर दिया तो फिर बिहार उनके घर में चूल्हा कैसे जलेगा।

यही सच है। इसे स्वीकार कर ही लेना चाहिए कि बिहार के हुक्मरानों ने बिहार को भारत का कलंक बनाकर छोड़ दिया है। और कोई विकल्प भी नहीं।

 

लेखक फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली के सम्पादक (हिन्दी) हैं|

सम्पर्क-  nawal4socialjustice@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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