शख्सियत

धीमे भूकंप की तरह है सुबकना – यादवेन्द्र

  •  यादवेन्द्र 
देहरादून में रहने वाले हिंदी के अनूठे कवि श्री लीलाधर जगूड़ी को 2018 के अखिल भारतीय व्यास सम्मान से विभूषित किए जाने की घोषणा की गई है।
यह सम्मान उन्हें 2013 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित कविता संकलन “जितने लोग उतने प्रेम” के लिए दिया गया है।
इस संकलन में विभिन्न विषयों पर एक से एक बढ़िया कविताएँ हैं लेकिन एक कविता ऐसी है जिसे मैं बहुत-बहुत प्यार करता हूँ। इस संकलन को पढ़ने के पहले भी मैंने उनकी यह कविता पढ़ी थी और जब भी उनको मंच पर सुनने का मौका मिलता है मैं उनसे यह कविता जरूर सुनता हूँ। यह कविता साहित्य और शिल्प के स्तर पर तो श्रेष्ठ कविता है ही लेकिन मुझे यह उनसे अलग धरातल पर जाकर भी – सघन पहाड़ी परिवेश और
और अपनी दृश्यात्मकता के लिए, अपने प्योर विजुअल पावर के लिए –  बड़ी विशिष्ट और अनूठी कविता लगती है।
इस संकलन की भूमिका में जगूड़ी जी कहते हैं कि कविता आत्म संवाद तो है ही लेकिन साथ साथ जीवन पद्धति की आंतरिक खबर भी है…. जो प्रत्यक्ष दिखाई देता है उससे परे जो अदृश्य है लेकिन अनिवार्य रूप से चुपचाप घट रहा है, उसकी खबर भी कविता देती है।
सुबकना
सुखद दुखद या मनहूस जितने भी अर्थ होते हों
जीवन में हँसने रोने के
सबसे ज्यादा विचलन पैदा करता है सुबकना
सुबकना,निजी दुख रोना गाना नहीं बनने देता
विलाप का कोई आरोह अवरोह भी नहीं
जो उसे प्रलाप बना दे
दुख को वजन और नमी सहित धीमे भूकंप की तरह हिला रहा होता है सुबकना
वैसे देखा जाए तो सुबकना
रोने वाले की असीम एकरसता और पथराने को
कुछ कम करता दिखता है
जैसे भीतरी उमड़न भी खुद कोई उपाय सोच रही हो
चंगा होने को
किसी भारी मलबे के नीचे फफकता सुबकना
ढाल पर से मिट्टी सा खिसकता जैसे दूर फैले दुख के दलदल को सुखा देगा
और धीरज घाव पर खुरंट की तरह जम जाएगा
सुबकना यह भी बता रहा होता है कि जिसे अभी बहुत दिन साथ लगे रहना है सगे की तरह
उस अपने ही दुख को तुरंत बाहर कैसे किया जाए
गहरे कहीं दबा डूबा वह सुबकना जगत तक भर आए सूखे कुएँ सी आँखों में
कोई रास्ता तलाश रहा है विसर्जित होने का।
कवि ने सुबकने को निजी दुख का एक कारण बताया है, निजी दुख वह जो सगे की तरह किसी दुनियादार आदमी के साथ साथ चलता है और उसकी पीड़ा या भीतरी उमड़न को भौतिक रूप में प्रकट करता है।किसी डॉक्टर की तरह कवि स्पष्ट करता है कि सुबकना आम रोना गाना नहीं है, विलाप करना नहीं है प्रलाप करना नहीं है – इन सबसे अलग और विशिष्ट है जिसमें इंसानी मन में सबसे ज्यादा विचलन पैदा करने की क्षमता है।इस परिघटना को जिस बारीकी से कवि ने परिभाषित किया है,अद्भुत है।सुबकना रोने की एकरसता और पथराने को कम करने की प्रक्रिया तो है ही,साथ ही साथ दुख के प्रकट होने के आवेग और पूरी ताकत लगा कर उसको रोके रखने की प्रतिकूल क्रिया भी है इसीलिए रोने का यह एकदम अलग और अनूठा रूप है । इस  प्रक्रिया में सबसे मूल्यवान बात यह है कि चंगा होने की उम्मीद सदा उपस्थित है क्योंकि संताप के साथ बने रहना किसी का स्थायी भाव नहीं हो सकता।कवि को दुख के दलदल के सूख जाने की उम्मीद भी है और घाव पर खुरंट जम जाने की प्रत्याशा भी।वे किसी सजग सबाल्टर्न इतिहासकार की तरह पहाड़ी जीवन की परतें खोलते हुए इस मानवीय क्रिया को पहाड़ खिसकने जैसी प्राकृतिक आपदा के साथ बड़ी कुशलता से जोड़ देते हैं – भारी मलबे के नमी और ढलान पर खिसकने से आ जाने वाले धीमे भूकंप का हिला डालने वाला मंजर उपेक्षा और अभाव के अंधेरे में विस्मृत होते लोगों का सुबकना नहीं तो और क्या है? पर अंतिम पंक्तियों में जगूड़ी जी जब जगत तक भर आये सूखे कुएँ सरीखी आँखों की बात करते हैं तो आँखें नम होना स्वाभाविक है।सही है कि कविता को केवल भाषा में नहीं ढूँढा जाना चाहिए – देखिये,इस छोटे कलेवर की बड़ी कविता में कवि शब्दों के पंख लगा कर कैसे पाठक को विस्मृत होती दुनिया के दृश्य दिखलाता है।
लेखक वैज्ञानिक और साहित्यकार हैं|
सम्पर्क- +919411100294, yapandey@gmail.com  
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

One thought on “धीमे भूकंप की तरह है सुबकना – यादवेन्द्र

  1. Prabhat Milind Reply

    कविता तो अच्छी है ही, इस कविता की लेखकीय पुनर्व्याख्या भी बहुत अद्भुत है. सुबकने जैसे मनोवेग को पहाड़ों की दुश्वारियां और उनके भौगोलिक-भूगर्भीय संतापों से एकात्म करती पाठकीय अंतर्दृष्टि सचमुच विलक्षण है.

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