आँखन देखीजम्मू-कश्मीर

कश्मीर का बिखरता समाज –  मणीन्द्र नाथ ठाकुर

 

  •  मणीन्द्र नाथ ठाकुर

 

पुलवामा की घटना ने पूरे देश को हिला कर रख दिया। लेकिन आज की यह अकेली घटना नहीं है। अभी-अभी न्यूज़ीलैंड में जिस तरह से   मस्जिद  के अन्दर जाकर निरीह और निरपराध लोगों को मारा गया, फ़्रांस में जिस तरह चार्ले हेब्डो पर हमला हुआ और न जाने कितनी ऐसी घटनाएँ रोज़ घट रही हैं, इन सबको देख कर आने वाले समय की भयावहता का अन्देशा हो रहा है। ऐसा नहीं कि ये  अचानक घट  रही हैं और इसके पीछे कोई ख़ास कारण नहीं हैं, ये कुछ ही लोगों के मस्तिष्क का फ़ितूर भी नहीं हैं अभी हम सांस्कृतिक  संकट के जिस दौर से गुजर रहे हैं उसकी आशंका हमें काफी पहले से होने लगी थी। विडम्बना यह कि इस संकट से उबरने के मामले में सामजिक रूप से  हम तो शिथिल ही रहे और हमारी राजनीति ने भी  इसे अपना मुद्दा नहीं बनाया| इसी का नतीजा हुआ कि यह संकट हमारी मानवता को ग्रसे हुए है|   स्पष्ट है कि अब भी यदि हमने इस स्थिति में  बदलाव के लिए कोई  सांस्कृतिक आन्दोलन नहीं चलाया, तो सिर्फ  मानवता ही  नहीं हमारी सभ्यता भी  ख़तरे में होगी।

सन 2003 के आसपास इस विषय पर हमलोग बहुत बातचीत कर थे और लगता था कि इसका न केवल अध्ययन ज़रूरी है, बल्कि उससे आगे भी कुछ करना लाज़िमी है। संयोग से इसी समय लंदन स्कूल ओफ़ इकोनोमिक्स के जान हेरिस के साथ मिलकर डेवेलपिंग कंट्रीज़ रीसर्च सेंटर की हमारी टीम कुछ महानगर की राजनीति पर शोध  कर रही थी। इस विषय पर बात चली और तय हुआ कि भारत के कुछ हिस्सों में हुए संघर्षों का अध्ययन किया जाना चाहिए। हमने कश्मीर, पंजाब, और उत्तरपूर्वी राज्यों  का तुलनात्मक अध्ययन करने का निर्णय लिया। इसी सिलसिले में कश्मीर जाने और उस समाज को नज़दीक से देखने का मौक़ा मिला। बाद में हम लोगों ने ‘वुंडेड हिस्ट्री एण्ड सोशल हीलिंग’ के नाम से अन्तर्राष्ट्रीय संवाद का एक कार्यक्रम चलाया।

इसके पहले तक तो कश्मीर केवल कल्पना में ही था। दो-चार मित्र बने थे, उनसे सुनी कहानियों के आधार पर ही कश्मीर के बारे में कोई धारणा  बनती थी। पहली बार कश्मीरियों से मित्रता हुई जब बचपन में कोचीन के एन सी सी कैम्प में था। दोस्ती अच्छी, लेकिन उनके ढीलेपन का कैम्प में मज़ाक़ उड़ाया जाता था, हम भी मज़े लेते थे। फिर इसी आसपास मानवाधिकार पर एक कार्यशाला आयोजित करने के सिलसिले में कुछ कश्मीरी बुद्धिजीवियों से बातचीत हुई तो स्थिति की गम्भीरता का पता चला। फिर इस प्रजेक्ट के लिए कश्मीर जाना भी हुआ और बहुत से लोगों से  मिलने का मौक़ा भी मिला।

पहली बार हवाई अड्डे से विश्वविद्यालय जा रहा था। डर भी लग रहा था। पूरी तरह से चौकन्ना था। गाड़ी से अलग-बग़ल झाँकते जा रहा था। मन में यह बात बैठी हुई थी  कि इतनी हिंसा के बाद शहर उजड़ा-उजड़ा होगा। लेकिन सड़क के दोनों तरफ़ नये बने सुन्दर मकानों ने हैरत में डाल दिया। विश्वविद्यालय पहुँचते ही दोस्तों से पहला सवाल यही पूछा कि यह कैसे हो सकता है और किसके मकान हैं ये। तो पता चला कि इनमें ज़्यादातर घर उग्रवादी संगठनों के नेताओं के थे। एक  पुलिस अधिकारी ने बात चीत के दौरान कहा कि कोई कश्मीर की समस्या का समाधान नहीं चाहता है। यह दूधारू गाय है। दिल्ली और इस्लामाबाद की सत्तारूढ़ पार्टियों  के लिए, उग्रवादियों के लिए, पुलिस और सेना के लिए भी। और अब तो जनता भी मजे ले रही है। राजनीतिक पार्टियाँ चुनाव आने पर इसका इस्तेमाल करती हैं, पुलिस वालों को इससे असीम ताक़त और पैसा मिलता है और सेना को भी इसके चलते बहुत लाभ है। उग्रवादियों के लिए यह बढ़िया धन्धा है। लोग परेशान ज़रूर हैं। लेकिन जिस तरह से पैसे का आना कश्मीर में निरन्तर चलता है उसने लोगों को भी निकम्मा बना  दिया है। यह मत मेरा नहीं उस पुलिस अधिकारी का है, जो बहुत संजीदगी  से शान्ति  के लिए काम कर रहा था।

उसने हमारी मुलाक़ात हाजत में रह रहे कुछ उग्रवादियों से  करवायी। एक लड़का जो कई सालों से जेल में था, मेरे ख़याल से मुक़द्दमा अभी ठीक से शुरू भी नहीं हुआ था। उससे मेरी मुलाक़ात लगभग दो घंटे के लिए हुई। उसका कहना था कि उसे कहीं से धोखे से उठा लिया गया था। पुलिस का मानना था कि वह आतंकवादियों का ख़बरी था। सच जो भी हो लेकिन दुखद था। जेल से ही उसकी पढ़ाई चल रही थी, परीक्षा अभी-अभी ख़त्म हुई थी। उसके कमरे की दीवारों पर पाकिस्तान जिन्दाबाद  के नारे काले अक्षरों में लिखे थे, कुछ ‘ऐ के 47’ जैसे बन्दूकों  के चित्र बने थे। पूछने पर  बताया कि उसने तो नहीं बनाया है। हिज़्बुल मुजाहीदीन के एक ऐरिया कमाण्डर से मुलाक़ात हुई। दुबला पतला सा आदमी था, पैरों में ज़ंजीरें थीं, हाथ दोनों बन्धे हुए थे। पुलिस अधिकारी ने पूछा कि क्यों आतंकियों के साथ है, उसका जवाब था कि हमें आज़ादी चाहिए। किसी मुठभेड़ में उसके छह साथियों को मार दिया गया था, लेकिन कुछ सोच कर एक पुलिस वाले ने उसे जिन्दा  रहने दिया। उसके चेहरे पर डर नहीं था। आराम से बातें कर रहा था। ‘आपको भी मालूम है सर, कि मौक़ा मिलने पर आप मुझे मार डालेंगे और मैं भी आपको कहाँ छोड़ने वाला हूँ’  उसका यह वाक्य मेरे कानों में आज भी गूँज रहा है। उसने काफ़ी खुल कर बताया अपने इरादों के बारे में। पुलिस अधिकारी उसे सरकारी गवाह बनने  की सलाह दे रहा था, लेकिन उसके इरादे पक्के थे।

मैं सोच रहा था कि क्या विचारधारा आदमी को इतना जकड़ ले सकता है। मैंने  निकारगुआ के लिबरेशन थीआलॉजी और मिसकितो राष्ट्रवाद के विश्लेषण के लिए अपने शोध के क्रम में फ़्रांसीसी चिंतक अल्थुसे के सिद्धान्त  का सहारा लिया था। इस सिद्धान्त  के अनुसार विचारधारा आदमी के सोचने समझने की शक्ति को कुंद कर देता है और उसके दिलो दिमाग़ पर क़ब्ज़ा कर लेता है। मुझे उसका जीवन्त  रूप दिख रहा था। उससे  बहस कर उसे समझाया नहीं जा सकता था। यह  सिद्धान्त मानता है कि किसी व्यक्ति पर विचारधारा का रंग कितना गहरा होगा वह इस बात पर भी  निर्भर करता  है  कि उसे विचारधारा के द्वारा पढ़ाया गया पाठ उसकी परिस्थिति के अनुसार  कितना सही लगता है। इसलिए बार-बार मेरा मन उन परिस्थितियों को समझने की ओर जा रहा था जिसने किसी व्यक्ति को इतना गहरा प्रभावित किया है। निकारगुआ के संदर्भ में मेरा मानना था कि वामपन्थी आन्दोलन  ने जिस तरह वहाँ ईसाई धर्म के मानने वालों को प्रभावित कर मुक्तिकामी धर्म की खोज की थी ताकि मार्क्सवादी आन्दोलन  का विरोध धर्म के नाम पर न हो सके, ऐसा कुछ वहाँ के मिसकितो समाज में नहीं हो पाया और बाद में औपनिवेशिक शक्तियों ने उसे ही क्रान्ति  के ख़िलाफ़ हथियार बनाया। इसी तरह गाँधीवादी आन्दोलन  ने जो काम भारत के कई क्षेत्रों  में किया, या धर्म सुधार आन्दोलन  जो भारत के बंगाल जैसे हिस्से में हुआ उसका बहुत महत्त्व  था ऐसा कुछ कश्मीर में नहीं हुआ। 

अभी बातचीत चल ही रही थी कि बम फटने की आवाज़  आयी । पता चला कि इसी पुलिस महकमे  पर आतंकवादियों का हमला हुआ है, उनका आकलन था कि इसी व्यक्ति को छुड़ाने के लिए ऐसा किया गया होगा। फिर अफ़रा तफ़री में बख्तरबन्द गाड़ियों में सवार होकर हम लोग वहाँ से बाहर निकल गये। याद रहे यह समय कुल मिलाकर शान्ति का समय था। राज्य में सबकुछ ठीक ठाक चल रहा था। पुलिस अधिकारी का मानना था कि अब पाकिस्तान केवल हर महीने दो लोग और कुछ लाख रुपए की  लागत से आतंकवाद को जिन्दा  रखने का प्रयास कर रहा है। लोगों में इसका कोई ख़ास असर नहीं है। उसने अपने एक मज़ेदार प्रसाशनिक काम के बारे में बताया। उसने वहाँ के इक़बाल पार्क में पुलिस का पहरा बिठा रखा था ताकि प्रेमी जोड़ियों को कोई तंग न कर सके, क्योंकि उसका मानना था कि लोगों में प्रेम बढ़ने से ही समाज में प्रेम बढ़ेगा।

हमें श्रीनगर और उसके आस पास एक सर्वे करना था। लेकिन उसके पहले हमने वहाँ के बुद्धिजीवियों से लम्बी बातचीत की योजना बनायी। सबसे पहले हमने मुलाक़ात की वहाँ के मनोचिकित्सक से। पहली बार मेरा ध्यान गया कि आधुनिकता के प्रभाव में मानसिक चिकित्सालय को जेल के पास क्यों बनाया जाता था। यह एक तरह से डेकर्त के मन और शरीर के अलगाव का प्रभाव था। चिकित्सक से मिल कर मन भर आया। उन्होंने  बताया कि इस अस्पताल में पहले साल में  पाँच सौ लोग आते थे अब लगभग पचास हज़ार लोग आते हैं। ख़ास कर लड़कियों की संख्या बहुत बढ़ गयी है। उन्हें रात में चीख़ें सुनाई देती हैं, किसी का  भाई ग़ायब है, किसी का मंगेतर। रात में सोते समय कई बार सेना का घर में घुस आना, किसी  को उठा कर ले जाना और फिर उसका वापस नहीं आना, इन सबसे पूरे समाज को गहरा  मानसिक आघात लगा था। ऐसी स्थिति का प्रभाव केवल एक तरफ़ नहीं होता है। मुझे याद है दिल्ली के पड़ोसी कश्मीरी पण्डित  परिवार की कहानी। लगभग रोज़ हम लोग मिलते थे और उनके दुःख भारी गाथा सुनते थे। एक रात, अभी खाना शुरू ही किया था कि दरवाज़े पर ज़ोरों का दस्तक हुआ और सब जल्दी में भागे। कभी वापस नहीं जा पाए। कुछ दिनों के बाद उनके  घर के बीचोंबीच, उनकी पत्नी के विवाह के समय की साड़ी में छत से टंगी  हुई एक लाश का फ़ोटोग्राफ़ डाक से मिला। उसके बाद से पत्नी की तबियत ख़राब हो गयी। किसी ने बताया कि  कश्मीरी ब्राह्मण की महिलाओं की बहुत सी बीमारियाँ इस तरह की मानसिक प्रताड़नाओं का कारण होती हैं। कश्मीर में जितना लहू बहते दिखता है उससे कहीं ज़्यादा दुःख और तकलीफ़ दोनों तरफ़ के लोगों को झेलना पड़ रहा  है।

दो दिनों के कार्यशाला में   पहली बार हमें पता चला कि कश्मीर का मुद्दा इतना आसान नहीं है। इस सामज के सामूहिक चेतना में लम्बे समय से जातीय अस्मिता के बीज हैं और किसी समाधान के लिय उसकी गहरी पड़ताल भी ज़रूरी है। किसी शोधकर्ता ने हमारा ध्यान मुस्लिम समुदाय के वैवाहिक  लोकगीतों की ओर आकर्षित किया। उनमें भी इस धार्मिक संघर्ष का छाप दिखता है। जैसे एक गीत में दूल्हे के बारे में कहा जाता है कि ‘पाकिस्तान से ग़ाज़ी आया’। उनकी यादों में हिन्दू राजाओं का आतंक भी जिन्दा  है और पाकिस्तान के साथ धार्मिक समानता भी। पता यह भी चला कि वहाँ के मदरसों में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से आए  शिक्षकों की बहाली बड़े पैमाने पर होती रही है, जिन्हें कश्मीर की साझी संस्कृति जिसे कश्मीरियत कहा जाता है, उसकी कोई समझ नहीं है। उनमें से कई विद्वानों का मानना था कि ऐसी शिक्षा के कारण भी घाटी में कट्टरपन्थ  ने जन्म लिया है। इसके अलावा कश्मीर के इतिहास को अगर ग़ौर से देखें तो पता चलता है कि एक समय यहाँ वामपन्थ  का अच्छा प्रभाव था और उसके दवाब में भू-सुधार  की बातें भी होती थीं, लेकिन एक समय ऐसा भी आया कि शेख़ अब्दुल्ला ने राज्य में बिना किसी तैयारी  के भू सुधार की घोषणा कर दी।नतीजा यह निकला कि जो लोग पहले ज़मीन वाले पण्डितों  की ज़मीन का देख भाल करते थे वही  वर्ग  कश्मीर का नया ज़मींदार बना।इस वर्ग में हिज़्बुल मुजाहीदीन जैसे उग्रवादी संगठनों के समर्थक बड़ी संख्या में हैं।

खीर भवानी मंदिर

एक महत्त्वपूर्ण  गाँव था तुलमुल जहाँ प्रसिद्ध मन्दिर  खीर भवानी अवस्थित है। इसकी बहुत सी कहानियाँ वहाँ प्रचलित हैं। मज़े की बात है अब वहाँ ज़्यादा मुस्लिम जनसंख्या है और उनमें से काफ़ी लोगों की आजीविका मन्दिर  के भरोसे  चलती है। हमने लोगों से बातें की तो उस साझी संस्कृति की झलक मिली। सर्वे के सिलसिले में जैसे ही हमलोग गाँव के एक चौराहे पर खड़े हुए कि बहुत से लोग वहाँ आ गये, हमें समझने की कोशिश करते रहे। हमारे साथ कश्मीर विश्वविद्यालय के कई छात्र थे, इसलिए संवाद बनाने में समय नहीं लगा। फिर हमें कई घरों में ले जाया गया, आराम से उनके साथ बैठ कर बातें हुई। एक परिवार की  मुझे याद है जिसके कई सदस्यों को उग्रवादियों ने मार दिया था। उनकी तीन लड़कियाँ थी और उन तीनों ने कश्मीर के  हालात का अद्भुत विश्लेषण किया था। यह कहानी अविश्वास, डर, धार्मिक कट्टरता, लोभ, बदला अस्मिता का अतिवाद और न जाने कितनी भावनाओं के ताने बाने पर बनी थी। पास के एक गाँव के विधान के एक भूतपूर्व सदस्य के घर चाय पर चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि उनके घर एक रात बहुत से उग्रवादी आ आ गए। बन्दूक  की नोक पर चर्चा शुरू हुई, गोश्त बना, भोजन हुआ और अन्त  में सुडान से आए हुए कुछ उग्रवादी अपने परिवार से बिछड़ने के ग़म में रोने लगे। उन्होंने बताया कि बहुत से सुडानी लोग यहाँ लाए जाते हैं, जिन्हें इस्लाम की सेवा के नाम पर उकसाया जाता है और उनके परिवार को कुछ पैसे मिलते हैं। यहाँ आ कर उन्हें लगता है कि उनके साथ धोखा हुआ है। यह बात कहाँ तक सच थी हमें पता नहीं था, लेकिन इस बात की पुष्टि कई लोगों से हुई। एक ऐसा भी गाँव मिला जहाँ हिंसा की कोई घटना नहीं घटी थी, वहाँ के सूफ़ी सन्त  से मुलाक़ात हुई, जिसने उग्रवादियों से बहस की कई घटनाओं का ज़िक्र किया। वहाँ के कई पत्रकारों और प्राध्यापकों से बात की तो पता चला कि कश्मीर में काला धन का बोलबाला है और इसलिए उस पुलिस अधिकारी की बात सही लगी कि अब तो जनता भी उग्रवाद को लाभदायक  समझने लगी है।

कश्मीर की कहानी का एक और आयाम है। अक्सर लोग 1947 के बाद की बात करते हैं। लेकिन कहानी की शुरुआत चौदहवीं सदी के पूर्वार्ध से होती है। राकेश कॉल अमेरिका में रहने वाला एक कश्मीरी पण्डित है, पेशे से अभियन्ता है। उसकी पुस्तक ‘कोटा रानी: द लास्ट  क्वीन ऑफ़ कश्मीर’ को पढ़ने से इस कहानी का बाँकी हिस्सा भी समझ में आता है। कश्मीर पर मध्य ऐशिया से मुस्लिम आक्रमण,  एक गाँव में रहने वाले मुस्लिम समुदाय का पूरे कश्मीर में विस्तार होना, सन 1339 में शाह मीर का  पहला मुस्लिम राजा बनना, शारदा सभ्यता का अन्त होना, कश्मीर को हिन्दू विहीन करने का प्रयास होना, बड़े पैमाने पर हिन्दुओं  का धर्म परिवर्तन करवाना, यह सब भी कश्मीरी सामूहिक अवचेतन का हिस्सा है।

कश्मीर की साझी संस्कृति से बहुत उम्मीद जगती थी और अभी भी है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उसका जो हाल हुआ है उससे डर लगने लगा है। क्या इतिहास के इन परतों को खोल कर समाज के अवचेतन की चिकित्सा सम्भव है? क्या उसके बिना हम कश्मीर को वापस स्वर्ग बना पाएँगे? जो लोग धर्मनिरपेक्षता को लेकर संजीदगी से सोचेते हैं, उन्हें यह भी सोचना होगा कि अवचेतन में छुपे उस डर, घृणा, भय, आसन्न  संकट की सम्भावना से कैसे मुक्ति मिले।

लेखक समाजशास्त्री और जे.एन.यू. में प्राध्यापक हैं|

सम्पर्क- +919968406430, manindrat@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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