स्त्रीकाल

स्वयं सिद्ध होना ही स्त्री–मुक्ति – रंजना जायसवाल

 

  • रंजना जायसवाल

 

आजादी के इतने साल कम नहीं होते| महिलाओं की दृष्टि से देखे तो तमाम उलझनों और अडचनों के बावजूद आज देश की महिलाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में भरपूर कामयाबी हासिल कर भलीभांति यह सिद्ध किया है कि वे भी आत्मनिर्भर हो सकती हैं और उन्हें किसी बैसाखी की जरूरत नहीं है| “यत्र नारी पूजयन्ते, रमतो तत्र देवता” अर्थात जहाँ नारी की पूजा और सम्मान होता है वहाँ देवताओं का वास होता है, व्यापक अर्थ में हमारे सामने है|

“आधी-आबादी” पूरी तरह कामयाब दिख रही है| कल तक घरों में बैठ चूल्हा-चौका, बच्चों की देखरेख और सजने-सँवरने तक ही सीमित महिलाएँ खेल-जगत, कारोबार, शिक्षा, कार्पोरेट-जगत का सफलता पूर्वक संचालन, लेखन, फैशन से जुड़े व्यवसाय, स्टेज या समाजसेवा और राजनीति लगभग हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूती और कामयाबी के साथ दर्ज करा रही हैं…. आज की महिलाएँ लघु व कुटीर उद्योगों से लेकर बड़े-उद्योगों तक में अपना परचम लहरा रही हैं, फिर चाहे वह चित्रकारी के क्षेत्र की निदा महमूद हों या फैशन डिजायनर मोनिका बजाज या लक्ष्मी सीमेंट की मैनेजिंग-डाईरेक्टर विनीता सिंघानिया जिन्हें 1997 में बेस्ट वूमेन इंटरप्रेनर के अवार्ड से नवाजा गया था| तसलीमा नसरीन और शोभा डे जैसी अन्य अनगिनत हस्तियों ने अपने रचनात्मक कार्यों से महिलाओं का सम्मान बढ़ाया है| खेल जगत में भी लड़कियां जीत का फलसफा लिख रही हैं| वर्तमान समय में बढ़ते औद्योगीकरण, शहरीकरण, जागरूकता एवँ शिक्षा के प्रसार से औरतों की स्थिति में उत्साहजनक बदलाव और काफी सुधार भी आया है| स्थानीय निकायों की बैठकों से महिला प्रतिनिधियों के पतियों के प्रवेश पर पाबंदी लगाकर महिलाओं को निर्णय लेने की आजादी मिली है तो महिलाएँ शराब और जुए की खिलाफत भी करते दिख रहीं हैं। गाँव-कस्बों की लड़कियां भी साइकिल पर सवार होकर पढ़ने जा रही हैं|

आधी आबादी स्वयं सहायता समूह बनाकर सबला बन रही हैं।
नारी का यह नया सृजनशील रूप बेहद उत्साहजनक है…. नारी प्रकृति की एक बेजोड़ कृति है जिसे बनानेवाला शायद अब हैरान हो रहा हो….|

पर यह तस्वीर का मात्र एक पहलू है| दूसरा पहलू यह है कि फैशन, कला,विज्ञापन से जुड़े व्यवसायों ने महिलाओं के सम्मान को शर्मनाक स्तर तक गिराया भी है|आज औरत को भोग की वस्तु के रूप में परोसा एवं देखा जाने लगा है|

स्त्रियों में संभावनाएँ कम नहीं, पर दुखद यह है कि उन पर हिंसा बढ़ रही है| एसिड अटैक,बलात्कार, छेड़छाड़, तस्करी, घरेलू हिंसा, दहेज-हत्या बढ़ती ही जा रही है बलात्कार की तो इन दिनों बाढ़ सी आई हुई है| आनर किलिंग की घटनाओं की भी कमी नहीं है|

देश में दस हजार से अधिक अपराधी स्त्रियाँ जेल में हैं उनके लिए अलग जेल की व्यवस्था नहीं है और जेल अधिकारियों के पुरूष होने के कारण वहाँ भी उनका यौन-शोषण होता है |६ साल तक के उनके बच्चे माँ के साथ रहते हैं और माँ के साथ  बुरा व्यवहार होते देखते रहते हैं |कल्पना की जा सकती है कि इन सबका उनके दिमाग पर क्या प्रभाव पड़ता होगा |अधिकांश अपराधिनी समाज के गरीब,अभाव-ग्रस्त व उपेक्षित तबके की व निरक्षर तथा कमजोर होती हैं जो किसी विवशता के कारण अपराध कर बैठती हैं और जेल में भी अत्याचार सहने को मजबूर होती हैं |

लड़कियों को भी सोचना होगा कि उन्हें मुक्ति चाहिए कि सुरक्षा |सिर्फ सुरक्षा तो तभी मिलेगी जब वे पुरूष पर आश्रित होंगी |क्या वे इसके लिए तैयार हैं ?अगर नहीं तो वे स्वयं को स्वरक्षित बनाने में जुट जाएँ |सहानुभूति ,दया ,मेहरबानी की जिन्हें जरूरत हो,वे पुरूष का सहारा लें और यदि अधिकार चाहिए तो स्वयं को मजबूत बनाएँ |संविधान ने स्त्रियों को पुरूष के समानांतर अधिकार दिए हैं, जिसका सम्मान होना चाहिए |संविधान की धारा 51  में तो ‘उन प्रथाओं का त्याग करने को कहा गया है ,जो स्त्रियों के सम्मान के खिलाफ हो |इस दृष्टि से विवाह से जुडी  या सामान्य जीवन की ऐसी प्रथाएँ, जो स्त्री को दोयम दर्जा देती है ,का परित्याग जरूरी है |विवाह कम खर्चीला होगा तो लड़की के जन्म का स्वागत होगा |यह लड़की की मर्जी होनी चाहिए कि वह शादी करे या ना करे |पर यहाँ भी दोहरा मापदंड दिखाई देता है |ब्रह्मचारी पुरूष का सम्मान तो यहाँ विवाहित व पिता बन चुके पुरूष से ज्यादा है पर स्त्री को ब्रह्मचर्य का ना तो अधिकार है ,ना विवाहित स्त्री या माता के जितना भी उसका सम्मान ही है,अधिक की बात तो जाने ही दें|

राजनीति में भी आधी आबादी की स्थिति को लेकर आज भी कई भ्रामक बातें हैं। एक तरफ जहाँ महिलाओं को लेकर सोशल इंजीनियरिंग का एक ऐसा मॉडल पेश किया जाता है जिससे स्थानीय निकाय चुनावों में महिलाओं को पचास फीसदी आरक्षण मिलता है। वहीं संसद में अगर बात महिलाओं की हो तो इन परिस्थितियों को उलट होते देर नहीं लगती है। जहाँ पंचायतों में महिलाएँ 50 प्रतिशत से भी अधिक सीटों पर चुनाव जीतकर एक खामोश क्रांति की सूचक बनती हैं तो वहीं लोकसभा चुनाव में वस्तुस्थिति बिलकुल अलग दिखती है। दरअसल राजनीति में मौकापरस्ती शुरू से ही हावी रहा है। हमारे नेता महिलाओं को पंचायत, ग्राम कचहरी, पंचायत समिति एवं जिला परिषद में 50 प्रतिशत आरक्षण दिलाकर महिला न्याय के झंडाबरदार बनने का नायाब प्रयास करते हैं पर वहीं अपने ही इस सामाजिक न्याय को लेकर विधानसभा एवं लोकसभा चुनावों में उम्मीदवारों की फेहरिस्त में महिलाओं को तरजीह न देकर भ्रम की स्थिति भी पैदा करते हैं। आम चुनाव में भी आधी आबादी के प्रतिनिधित्व पर जदयू, भाजपा, राजद, लोजपा, कांग्रेस समेत विभिन्न राजनीतिक दल एक अजब सी चुप्पी साधे दिखे। किसी भी राजनीतिक दल में महिला उम्मीदवारों को चुनाव में उतारने को लेकर प्रबल इच्छाशक्ति का अभाव दिखता है। इसी रवैये के चलते संसद में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण को लेकर विधेयक अभी भी लंबित है।महिलाओं का यह मुद्दा सभी राजनीतिक दलों के द्वारा दरकिनार किया गया है। जो दल संसद में 33 प्रतिशत महिलाओं के आरक्षण की मांग करते दिखे वे भी 33 प्रतिशत महिला उम्मीदवारों को उतारने से परहेज करते नजर आए| आंकड़ें बताते हैं कि सभी दल मौका देखकर ही प्रत्याशी उतारते हैं।हालांकि स्थिति सुधरी है | चुनावों में महिलाओं की मतदान प्रतिशत में भी रिकार्ड स्तर पर वृद्धि दर्ज की गई है। पर जब विधायिका में महिलाओं की हिस्सेदारी बननी शुरू होती है। कहीं न कहीं सोशल इंजीनियरिंग की रफ्तार धीमी पड़ जाती है। कहने को महिला आरक्षण विधेयक घोषणा पत्र में हो सकता है पर इतना तो जाहिर है कि सभी दल महिला वोट बैंक को रिझाने का खोखले प्रयास भर करते रहे हैं। राजनीतिक दल जब कभी भी किसी महिला उम्मीदवार को उतारने की चर्चा करते हैं तब उनके आला कमान को यह डर सताने लगता है कि यह जीत दिला पाएगी कि नहीं? फिर वहीं ढाक के तीन पात! पितृसत्तात्मक सोच किसी पुरूष को उम्मीदवार बना देता है। महिलाओं के प्रति समाज की सोच आज भी बदली नहीं है। देश में महिला सशक्तिकरण को लेकर भी अनेक भ्रांतियां हैं| जबकि स्त्री अस्मिता का प्रश्न व्यक्तिगत अस्मिता का नहीं, बल्कि सामाजिक अस्मिता का प्रश्न है जिसके सामने बड़ी चुनौती पितृ सतात्मक संबंध,मूल्य और संस्थाएँ हैं परन्तु उससे भी विकट है स्त्री की स्वयं की इच्छा,जिसकी स्वतंत्र भारत में भी घोर अनादर हो रहा है|

आज तक स्त्री को आर्थिक,सामाजिक ,धार्मिक ,राजनीतिक गुलामी से मुक्ति नहीं मिली है| ‘इंडिपेंडेंस’और फ्रीडम या मुक्ति और आजादी समानार्थी शब्द नहीं हैं| वे भिन्न धर्मी शब्द हैं| आज स्त्री को सभी प्रकार की गुलामी से मुक्ति चाहिए| उसे जीने का, फलने-फूलने का अधिकार चाहिए| उसका आज का आंदोलन मुक्ति का आंदोलन है|

यह सच है कि यदि लगन और पक्का इरादा हो तो किसी भी लक्ष्य को पाने में न गरीबी रोड़ा बनेगी, न लिंग-भेद और न ही जाति या धर्मगत रूढिवादिता| कलकत्ता के अनेक गरीब मुस्लिम परिवारों की लड़कियों ने मुक्केबाजी जैसा खेल अपनाकर यह साबित किया है| बीबीसी के अनुसार वर्तमान में भारत में लगभग 150 मुक्केबाज हैं और ज्यादातर वहीं की हैं|

आज स्त्री परप्रकाशित जीवन त्याग कर स्वयं प्रकाशित, स्वयं सिद्ध जीवन जीना चाहती है| और ऐसा सम्भव होने पर ही उसका सशक्तीकरण सम्पूर्ण होगा| एक बात और किसी ने कहा था कि ‘स्त्री मुक्ति की चाबी, उसी के पास है, पर वह उस चाबी को सारी दुनिया में खोज रही है,सिर्फ अपने को छोड़कर|’

इस कथन के मर्म को समझकर स्त्री को भी संविधान से मिले अपने अधिकारों के उपभोग की क्षमता अपने अंदर विकसित करनी होगी तभी स्त्री और पुरूष दोनों की मानसिकता बदलेगी| अपनी शक्ति को पहचानने के बाद ही स्त्री को मुक्ति का मार्ग मिलेगा| मुक्ति की खोज उसे स्वयं करनी होगी स्त्री मुक्ति और स्त्री शक्ति के सम्मिलन से ही स्त्री सशक्त होगी|

 

लेखिका कवयित्री और प्राध्यापक हैं|

सम्पर्क- +919451814967, dr.ranjana.jaiswal@gmail.com

 .

Facebook Comments
. . .
सबलोग को फेसबुक पर पढ़ने के लिए पेज लाइक करें| 

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *