झारखंडमुद्दा

मंडल डैम की व्यथा कथा

  • वीरेंद्र चौधरी

साल 1972 में मंडल डैम का निर्माण शुरू हुआ, 1993 में पूरा होते-होते रह गया। मुख्य अभियंता की हत्या काम बंद होने का कारण बना। फिर नक्सलवाद का आंदोलन शुरू हुआ। इस कारण काम फिर शुरू नहीं हो पाया। इसके साथ पलामूवासियों का सपना भी अधूरा ही रह गया। हालांकि वह सपना भी ऐसा था, जो लगता तो अपना था, पर वास्तव में था पराया। डैम था तब के पलामू जिले में और सिंचाई होनी थी औरंगाबाद,जहानाबाद और गया जिले में। इस बीच 10 साल के अंतराल पर पलामू जिला दो बार बंटा तथा गढ़वा और लातेहार नये जिले बने। मंडल डैम लातेहार में आ गया। इससे पहले ही बिहार राज्य का बंटवारा हो गया और पलामू जिला झारखंड राज्य में आ गया, जबकि औरंगाबाद, जहानाबाद और गया जिले बिहार में ही रह गये। यानी प्राकृतिक और भौगोलिक रूप से तो कुछ नहीं बदला, पर प्रशासनिक दृष्टिकोण से यह वृहत सिंचाई योजना दो राज्यों का मुद्दा बन गया। आज भी योजना का स्वरूप वही है। अर्थात डैम झारखंड में रहेगा और लाभ बिहार को मिलेगा।

एक लाख हेक्टेयर भूमि सिंचिंत होगी औरंगाबाद और गया की, जबकि मात्र 15 हजार हेक्टेयर भूमि पटेगी पलामू की। इस योजना की आखिरी कड़ी के निर्माण कार्य का शिलान्यास 5 जनवरी,  2019 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया । यदि यह योजना कार्यान्वित होती है, तो पलामूवासी होने के नाते यह समझ में नहीं आ रहा है कि मैं खुशी से ठहाका लगाऊं या दुख से आंसू बहाऊं, क्योंकि इस योजना का लाभ हमें नहीं, पड़ोसी को होने वाला है। वह भी प्रशासनिक पड़ोसी, कानूनन पड़ोसी, जहां स्थानीयता का लाभ नहीं मिलता।

जब काम शुरू हुआ था तो मैं और मेरी उम्र के लोग पैदा भी नहीं हुए थे या फिर नन्हें-मुन्ने बच्चे थे। इस कारण इस सिंचाई योजना की जानकारी बुजुर्गों से लेनी पड़ रही है। करीब 47 वर्ष पुरानी यह योजना फिर से लोगों को जगा रही है। 2019 शुरू हो गयी है। राजनीतिक दल सत्ता की दौड में हैं। नये एजेंडे ढूंढे जा रहे हैं। इसमें मंडल भी एक एजेंडा बन गया है। बिहार के चार सांसद और झारखंड के दो सांसद (ये दोनों भी बिहार निवासी हैं) एक साथ पीएमओ पहुंचकर मंडल डैम को पूरा करने का आग्रह किया। पीएमओ से योजना को स्वीकृति मिली  फिर तत्कालीन केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने स्थल निरीक्षण किया। उसके बाद योजना को हरी झंडी ही नहीं मिली, बल्कि पीएम के पलामू दौरे की तिथि निर्धारित हो गयी और राज्य सरकार को इसकी सूचना दे दी गयी। इसके बाद शुरू हुई मंडल डैम पर गप शॉप।

पलामू की प्राकृतिक वादियों में मंडल की राजनीति फिर शुरू हो गयी है। पुराने लोग बताते हैं कि 1972-73 में भी इस योजना के शुरू होने पर कई राजनीतिक नेताओं ने विरोध किया था। उनका कहना था कि पलामू में डैम रहेगा और औरंगाबाद, जहानाबाद, गया में सिंचाई होगी, यह अन्याय है। तब भी वही आश्वासन दिया जा रहा था,  जो आज भी दिया जा रहा है कि डैम बनने से पलामू का भू-जल स्तर ठीक हो जायेगा। परंतु लोग भूल जा रहे हैं कि नदियों और जलाशयों से भू-जल स्तर काफी दूर तक नहीं ठीक रहता। यह ठीक रहता है पेड़- पौधों और जंगलों से। यह थोथी दलील है,  जिससे पलामू के लोग छले जा रहे हैं।

दरअसल, पलामू प्रमंडल सोन, कनहर, कोयल, औरंगा, मलय जैसी नदियों के होने के बावजूद सुखाड़ क्षेत्र है। भूगोलवेताओं ने इसे वृष्टि छाया वाला क्षेत्र कहा है। जब पलामू में जंगल घने थे, तब यहां वर्षा ठीक होती थी, जिससे नदियों में बाढ़ भी आती थी और भू-जलस्तर भी ठीक रहता था। 1970-72 की तुलना में आज करीब 60-70 फीसदी जंगल नष्ट हो चुके हैं। इस कारण नेतरहाट की पहाड़ी पलामू के लिए अभिशाप बन चुकी है। वह दक्षिण – पश्चिम मानसून के बादलों को पलामू आने ही नहीं देती। अब यहां कभी – कभी ही औसत वर्षा होती है। दो-तीन वर्षों तक सूखा पड़ा रहता है। पलामू का यह सुखाड़ यहां की जिंदगी को रौंद रहा है। गर्मी का धूप लोगों का बदन जलाता है और जाड़े में ठंड कंपकंपाती है। वर्षा नहीं होने से हर साल चार-पांच लाख कृषि मजदूर बिहार और उत्तर प्रदेश में पेट के लिए पलायन करते हैं। पलायन करने वाले मजदूरों द्वारा लगाया गया अनाज पलामू प्रमंडल की आर्थिक रीढ़ है। यदि यह अनाज यहां न आये,  तो यहां गांवों के लोग भूख से बिलबिलाते हुए थोक भाव में मरने को विवश हो जायेंगे। दूसरा पहलू यह है कि पलामू के छत्तरपुर और रामगढ़ प्रखंड में आज भी लोग कंदा-गेंठी खाकर जिंदा रहने को विवश हैं। गढ़वा के भी कई क्षेत्रों में यह स्थिति है।

इस स्थिति में बिना सोचे समझे, बिना भविष्य को देखे 47 वर्ष पुरानी योजना को हू-ब-हू लागू करने से यहां के लोगों के घावों में बेचैनी पैदा कर रहा है। पुराने लोग बताते हैं कि मंडल डैम का विरोध को देखते हुए तब कनहर सिंचाई योजना, औरंगा सिंचाई योजना, बटाने सिंचाई योजना आदि की शुरुआत की गयी थी। इनमें कनहर का जन्म ही नहीं हुआ, औरंगा योजना की भ्रूण हत्या हो गयी और बटाने अधूरी फंसी हुई है। यहां सवाल यह उठता है कि सत्ताधारी अथवा विपक्ष के नेता कैसे अपने को जनसेवक बता कर मंडल के पक्ष और विपक्ष में बयानबाजी शुरू कर सकते हैं। मेदिनीनगर, जहां पीएम की सभा हुई, वहां गर्मी में पेयजल के लिए गोलियां चलती हैं। यह नगर निगम क्षेत्र है। फिर वहां से 40-50 किमी दूर किसी भी दिशा में जाएं, जल संकट मिल जायेगा। इस शहर से सटे एक गांव चुकरू के भूमिगत जल के दूषित होने के कारण सभी ग्रामीण अपंग हो चुके हैं, लेकिन सरकार वहां पानी की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं दे सकी। ऐसा लग रहा है मानों ये राजनीतिक नेता चुनावी ग्राउंड पर चौके-छक्के लगा रहे हैं, पर यह नहीं देख रहे कि उनका बॉल वास्तव में पलामू की ग्रामीण जनता है, जो उनके बैट से चोटिल हो रही है।

मैं व्यथित मन से यह कह रहा हूं कि मौजूदा पलामू प्रमंडल बौद्धिक बेईमानी बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है। बहुत हो गया राजनीतिक दांव पेंच और नौकरशाही कुटनीति। अब ठेठ भाषा में बताना होगा कि आप पलामू को क्या दे रहे हैं। पलामू देश के सबसे गरीब 10 जिलों में शामिल है। यहां के किसान, बेरोजगार, व्यापारी सब हतोत्साहित हैं। सबके बदन और कलेजे में घाव बन गया है। इस तरह की योजनाएं उसमें मरहम नहीं, नमक लगायेंगी। यहां हर जुबां पर दर्द है। दर्द के कारण यहां की आबादी सिसक रही है। गाहे-बेगाहे इसे कहीं भी देखा जा सकता है, पर यह रोज देखा जा सकता है कि 60-70 वर्ष के बूढ़े मां-बाप की आंखों में, जो दिल्ली, गुजरात, पंजाब, कर्नाटक आदि राज्यों में गये उसके युवा बेटे की राह ताक रही हैं। यहां कई गांव ऐसे हैं, जहां साल में कई बार युवा पलायन कर जाते हैं और गांव में सिर्फ बूढ़े बच जाते हैं। 2019 में कौन जीतेगा, कौन हारेगा, इससे पलामू के 40 लाख गरीबों को कोई मतलब नहीं है, मतलब सिर्फ इससे है कि आपके पास पलामू के विकास की रूपरेखा क्या है? कांग्रेस उम्मीदवार को वोट देंगे तो राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनेंगे और भाजपा उम्मीदवार को जिताएंगे तो नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे, आदि कैरमबोर्ड के खेल की तरह के डायलॉग्स सिर्फ राजनीति को अलंकृत करते हैं, मानव जीवन को नहीं।

इसी पलामू में जंगल पहाड़ बन गये, फिर पहाड़ों को घायल कर उन पर भी कब्जे कर लिये गये। जंगल उजड़ने से महिलाओं को 5-10 किमी दूर से चूल्हे जलाने के लिए लकड़ियां ढूंढनी पड़ती हैं। यहां की जमीनें चार-पांच महीने की कमाई कराती हैं। फिर पलायन का रास्ता बना देती हैं। ग्रामीण गांव छोड़कर शहरों में बसने लगे हैं। गांव उजड़ने लगे हैं। होली, दशहरा, दीवाली में भी गांव उदास रहने लगे हैं। इसमें सरकार के विकास आंकड़े हमें चिढ़ाते हैं। आज की पीढ़ी यह सोच रही है कि ये इंदर सिंह नामधारी, राधाकृष्ण किशोर, रामचन्द्र केशरी, भानू प्रताप शाही, ददई दूबे, रामचन्द्र चन्द्रवंशी, सत्येन्द्र नाथ तिवारी, अनंत प्रताप देव, दशरथ सिंह, गिरिनाथ सिंह, केएन त्रिपाठी, केडी सिंह, घूरन राम जैसे नेता आखिर हैं कहां और क्या कर रहे हैं? क्या वाकई ये जनप्रतिनिधि हैं? या फिर स्वप्रतिनिधि अथवा अपनी पार्टी के प्रतिनिधि हैं? क्या सत्ताधारी लोग सिस्टम को सिर्फ अपने हक में ही हांकते हैं? जनता ये सवाल कर रही है कि अपना प्रतिनिधि तो हमने चुना है, तो फिर से हमारे हित में क्या कर रहे हैं? योजनाएं हमसे पूछ कर कार्यान्वित करायी जा रही हैं, या हमारी सहमति का ढिंढोरा पीट कर अपनी सत्ता की राह बनायी जा रही है? सवाल गंभीर है,  पर जवाब तो ढूंढना ही पड़ेगा। कई सत्ताधारी जनप्रतिनिधियों को फोन लगाये जा रहे हैं, पर पता नहीं क्यों वे फोन नहीं उठा रहे? वे खुशी में उछल रहे हैं, यह तो मालूम है, पर यह खुशी पलामू को छलने की है या फिर बिहार को आबाद करने की, यह समझ में नहीं आ रहा है। यह तो तय है कि बिहार के सांसदों ने अपने यहां की खेती के महत्व को समझा है, तो फिर ये झारखंड के सांसद क्या उन्हें ही खुश कर रहे हैं? मंडल से बिहार में खेती होगी, बढ़ेगी, तो पलामू के और भी मजदूर बिहार जायेंगे, कहीं यह उसकी खुशी तो नहीं है? इन सवालों का जवाब अब पलामूवासियों को ढूंढना पड़ेगा। वक्त आ गया है। तमाशायी बनकर रहने और वोट की राजनीति से खुद ही तमाशा बन जाने का भय है।

जाति एवं स्थानीय प्रमाण पत्र भी नहीं बनता सर..

विस्थापितों ने पलामू आयुक्त मनोज झा समेत जिले के उपायुक्त, एसपी एवं वन विभाग के अधिकारियों को अपना दर्द बताते हुए कहा कि डुब क्षेत्र में रहने के कारण उनलोगों का स्थानीय एवं जाति प्रमाण पत्र बनाने में कठिनाई होती है। वे लोग सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधा से वंचित हो जाते है।

बरवाडीह थाना परिसर में अधिकारियों के साथ बैठक में कोयल परियोजना से विस्थापित हो रहे ग्रामीणों ने एक स्वर में अधिकारियों से अपना हक मांगा। इस दौरान ग्रामीणों ने कहा कि पुनर्वास नीति के तहत ही उनको विस्थापित किया जाय। बैठक में ग्रामीणों ने जमीन, नौकरी समेत अन्य सुविधा की मांग की। बैठक  में ग्रामीणों ने कहा कि वे सरकार की परियोजना को विरोध नहीं करना चाहते है सिर्फ उन लोगों का जो हक है उसे दिया जाय। ग्रामीणो ने कहा कि विस्थापित होने से पहले उन्हें बसाया जाय तभी परियोजना प्रारम्भ करवाने की बात कही। इस दौरान ग्रामीणों ने अधिकारियों को पूर्व में विस्थापितों को मिले मुआवजा की जानकारी देने की भी मांग की।

लेखक डंडा प्रमुख सह भाकपा माले जिला कमिटी के सदस्य हैं|

सम्पर्क- +919431775536, bk7368894804@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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