देशकालमुद्दा

आरक्षण: सामाजिक समरसता या सत्ता का रास्ता ?

 

  • करण सिंह 

 

साल की शुरूवाती महीने में संसद के पटल पर संविधान का 124वां संशोधन विधेयक केन्द्रीय मंन्त्री डॉ तावरचंद गहलोत द्वारा पेश किया गया था। जिसमें अनुच्छेद 15 और 16 में संशोधन किया गया जो अनुच्छेद 15 और 16 आरक्षण की बात करते है। इन्ही अनुच्छेद में जो आरक्षण की व्यवस्था थी उसको संशोधित करके आर्थिक आरक्षण के लिए अलग से प्रावधान किए गए है। दरअसल अनुच्छेद 15 (4) एवं 16 (4) में आरक्षण के मूलभूत संरचना का उल्लेख है। आपको बता दें कि अनुच्छेद 15(4) में यदि राज्य को लगता है कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए विशेष प्रावधान लाने की जरूरत है। इसी तरह संविधान का अनुच्छेद 16 (4) कहता है की राज्यों को लगता है की किसी वर्ग का या जाति का प्रतिनिधित्व सरकारी सेवाओं में कम है तो उस जाति,वर्ग और धर्म के लिए सरकारी सेवाओ में सीटे आरक्षित कर सकता है।

संविधान के इसी मूलभूत अनुच्छेद में सरकार ने संशोधन करते हुए उप-धारा 15 (6) और 16 (6) लाई है, जिसके बाद सभी अनारक्षित वर्ग किसी भी धर्म के आर्थिक तौर पर कमजोर लोगों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान दिया गया है। यह 10 प्रतिशत आरक्षण अनुसूचित जाति/ जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से अलग है। जिसमें किसी भी तरह की कोई छेड़-छाड़ नहीं की गयी है। इस नए प्रावधान के बाद भारत में कुल आरक्षण 49.5% से बढ़कर 59.5 % हो गया है। हमें लगता है कि किसी भी देश विशेष के लिए आरक्षण एक स्थायी तरीका है जब संविधान निर्माताओ ने आरक्षण की बात कही होगी या इसका प्रावधान किया था। जिसका विशेष उद्देश्य समाज के सभी शोषित, कुपोषित और निरक्षर लोगों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके साथ ही यह भी प्रावधान डाला गया कि हर दस वर्ष के बाद इसकी समीक्षा की जाएगी। लेकिन हम सब के लिए यह सोचनीय है कि क्या किसी स्तर की ठोस समीक्षा हुई और क्या उसका कोई सकारात्मक परिणाम आया ?

हमारे संविधान निर्माताओं के दूरदर्शी सोच का नतीजा था कि उन्होने आरक्षण की समीक्षा के लिए दस वर्षो का प्रावधान किया। इस उम्मीद में कि भविष्य के नीति निर्माता आरक्षण का सही रूप से अवलोकन करेंगे साथ ही समाज की जरूरत के हिसाब से इसमें संशोधन करेंगे। लेकिन बीते कुछ समय के साथ आरक्षण सामाजिक हित से ज्यादा राजनैतिक हित साधने वाला हथियार बन गया है। जो सोच आरक्षण के पीछे समाज के वंचित लोगों को मजबूती दिलाने की थी अब वहीं आरक्षण बीतते समय के साथ समाज को कमजोर और गुणवत्ता रहित कर रहा है। आरक्षण के हथियार को समय-समय पर राजनैतिक हितों  को साधने लिए प्रत्येक दल द्वारा अपने तरीके से प्रयोग करते रहे। इसके तमाम उदाहरण हमारे राजनैतिक गलियारों में उपलब्ध है- जैसे की 1990 मे वी. पी. सिंह सरकार द्वारा मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करना, सप्रंग सरकार द्वारा 2014 आम चुनाव से ठीक पहले जाठ आरक्षण नीति को लागू करना, 77वे संविधान संशोधन 2001 करके पदोन्नत्ति में आरक्षण का लाभ देना और अब राजग सरकार द्वारा आर्थिक आरक्षण संविधान संशोधन बिल पेश किया गया। सवर्ण आरक्षण राजनितिक लाभ लेने के लिए आम चुनाव 2019 से पहले लाया गया है । इस आर्थिक आरक्षण की निम्नलिखित शर्तों के तहत लाभ लिया जा सकेगा –

1) आठ लाख रूपए से कम सालाना पारिवारिक आय।

2) जिस परिवार के पास कृषि भूमि पांच एकड़ से कम हो।

3) आवासीय घर 1000 वर्ग फीट तक या उससे कम हो।

4) अधिसूचित न्यायपालिका में 100 गज तक या उससे कम का प्लाट हो।

5) गैर अधिसूचित न्यायपालिका में 209 गज का प्लाट या उससे कम हो।

अगर हम इसकी पात्रता की बात करें तो भारत गणराज्य में 95 फीसदी आबादी इसकी जद में आ जाएगी।  वहीं आठ लाख की आय पात्रता की बात करें तो इसको कुछ इस तरह समझा जा सकता है जैसे बिहार से आए एक रिक्शा वाला और प्रोफेसर दिल्ली में अपना जीवन यापन के लिए आते है। वहीं दोनों ही अनारक्षित वर्ग के है और दोनों ही आरक्षण का लाभ लेने के इच्छुक है तो इस आरक्षण की पात्रता दोनों को इस लाभ में बराबर लाकर खड़ा कर देगी। अब आप अपने विवेक से सोचिये की यह कितना न्यायसंगत होगा और इसका लाभ दोनों में से कौन ज्यादा ले जाएगा।

अगर आरक्षण एक प्रतिनिधित्व बढ़ाने का जरिया होता तो लगभग 6 दशक से लागू अनुसूचित जनजाति/जनजाति को आरक्षण से आर्थिक सामाजिक और शैक्षणिक आजादी मिल चुकी होती? सरकार ने एक आरटीआई(2017) के जवाब में बताया कि केन्द्रीय सरकारी सेवाओं में अन्य पिछड़ा वर्ग की भागीदारी अलग अलग सरकारी वर्गों में कुछ इस तरह है- वर्ग अ-14%, वर्ग ब-15%, वर्ग स-17%, वर्ग द-18%| यह जवाब 37 मंत्रालयों में से 24  मत्रालय द्वारा दिए गए जवाब से निकल कर आया है। अगर हम इस आरटीआई को आधार बनाकर बात करें तो मंडल कमीशन के 2 दशकों के बाद भी अन्य पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व सरकारी सेवाओं में अपने आरक्षित सीटो (27%) के बराबर भी नहीं पहुँच पाया है। क्योंकि सरकारों का चलन रहा है आरक्षण को एक लॉलीपोप की तरह उपयोग किया गया है, क्योंकि आरक्षण की सिफारिश लागू होने के बाद भी इनका क्रियान्यवन ठीक से नहीं हो पाया है।

पिछड़ा वर्ग जनसंख्या की बात करें तो मण्डल कमीशन ने यह आबादी 52% बताई है, अगर हम एनएफएचएस (नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (1998) के सर्वे के मुताबिक अन्य पिछडा वर्ग की जनसंख्या 33.5% है और साथ ही अगर एनएसएस (नेशनल सर्विस स्कीम ) के सर्वे की बात करें तो अन्य पिछड़ा वर्ग की जनसंख्या 36% प्रतिशत है। अगर 2011 की सेन्सस रिपोर्ट की बात करें तो अन्य पिछड़ा वर्ग की आबादी 68.52% तो इस जनसंख्या जो कि अलग- अलग संस्थानों द्वारा आया है। आज तक हम अन्य पिछड़ा वर्ग की सही जनसंख्या के बारे में पता नहीं लगा पाए। जिसकी वजह से हम पूर्व में लागू आरक्षण नीतियों का भी सही क्रियान्यवन नहीं कर पाए तो किसी भी सरकार को आरक्षण नीतियों को लागू करने से पहले उस समाज की सही जनसंख्या, सामाजिक जरूरत, आर्थिक जरूरत और शैक्षणिक जरूरत की समीक्षा करें। जिससे समाज के सही वर्ग तक नीतियों को पहुंचाई जा सके तथा सभी जाति , समुदाय और धर्म की समीक्षा कर सके, साथ ही उनके विकास के आधार पर आरक्षण सीमा तय कर सके, ना कि आरक्षण को चुनावी वादे या हथियार की तरह उपयोग करें। क्योंकि आरक्षण कभी कोई स्थाई इलाज नहीं है बल्कि समाज के शोषित और वंचित लोगों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने का तरीका है। अगर सरकार को सही मायने में आरक्षण का लाभ लोगों तक पहुंचना है तो इसकी समीक्षा प्रत्येक तीन वर्षो में जिला स्तर, ब्लॉक स्तर और तहसील स्तर पर आरक्षित वर्गों के विकास की जरूरतों की समीक्षा करनी होगी,  तभी आखिरी पंक्ति में बैठे आदमी तक इसका लाभ पहुंच पाए और उसका विकास हो पायेगा।

चूंकि हमने देखा, सुना और पढ़ा है कि आरक्षित वर्ग के सम्पन्न परिवार आरक्षण का बेवजह लाभ ले रहे है। जिन्हे सही मायनों में इसकी जरूरत है। वह परिवार संसाधनों की कमी के कारण इसका लाभ नहीं ले पा रहे है।  कितनी दुखद बात है जो आरक्षण भेदभाव को खत्म करने के लिए लाया गया था, उसी में भेदभाव हो रहा है जोकि आरक्षण की मूलभूत आत्मा की निर्मम हत्या है। सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि आरक्षण का लाभ जरूरमंद लोगों को मिले और आरक्षित वर्ग में सम्पन हो चुके, परिवारों को किसी भी तरह के आरक्षण लाभ से वंचित करें। आरक्षण के इत्तर हमें सामाजिक विकास के अन्य तरीकों पर बात करनी चाहिए- जैसे शिक्षा के लिए सरकारी आर्थिक मदद, युवा और किसानों को भिन्न-भिन्न प्रकार के कौशल सीखाना, दरअसल उन्हें आत्म-निर्भर बनाना, सरकार द्वारा चलाए जा रहे विकास उन्मूलन कार्यक्रमों के बारे में बताया जाए और उनका सही क्रियान्यवन करके ज्यादा से ज्यादा लोगों तक इसका लाभ पहुंचाया जा सके।

आइए एक नजर हम प्रमुख अंतरराष्ट्रीय इकाइयों द्वारा किये गए सर्वेक्षण जो कि भिन्न-भिन्न विषयों पर है वो हमें कहां ठहराते हैं। अगर हम रोजगार दर की बात करें तो भारत का स्थान 42/47(ओईसीडी सर्वे) पर है।  बेरोजगारी दर की बात करें तो भारत का स्थान 103/217(सीआईए वर्ल्ड फेक्ट बुक) बेघर लोगों की बात करें या उनकी आबादी की बात करें तो भारत का स्थान 8/52,ग्लोबल यूथ डेवलमेंट इंडेक्स की बात करें तो भारत का स्थान 134/183, सोशल प्रोगेस इंडेक्स 93/128, वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स 133/155 (यूनाइडेट नेशन), एजुकेशन इंडेक्स 145/191(यूएन), लिटरेसी रेट 167/234(यूआईएफएस), नम्बर ऑफ बिलिनेयरस 3/171 (फोर्ब्स)। आरक्षण इतना कठोर पुख्ता इलाज होता तो भारत कम से कम 50 उच्च स्थानों में होता। मैं मानता हूं कि अतर्राष्ट्रीय इकाई हमारे देश की भूगौलिक, आर्थिक और शैक्षणिक परिस्थति कितना समझते होंगे। हमें यह हमेशा याद रखना चाहिए की जिस देश और समाज को पिछड़ने की जल्दी हो वो समाज और देश आगे कैसे बढ़ पायेगा ?

लेखक कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल से जुड़े ज्ञानार्थी मीडिया कॉलेज में जनसंचार और मॉस कम्युनिकेशन के सहायक प्रोफेसर हैं|

सम्पर्क- +918826590040, karan11ksingh@gmail.com

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

2 thoughts on “आरक्षण: सामाजिक समरसता या सत्ता का रास्ता ?

  1. मनोरमा जैन पाखी Reply

    आपकेसबलोग में पब्लिश होने वाला हर आलेख पढ़ना चाहती हूँ अगर पक्षपात पूर्ण और भ्रामक न हो ।
    धन्यवाद

    1. sablogmonthly Post author Reply

      जी
      सबलोग के आलेख की सूचना व्हाट्सएप्प द्वारा पाने के लिए 8507734722 पर मैसेज करें।

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