स्त्रीकाल

नवजागरण और मुस्लिम स्त्रियाँ

 

  • रूपा सिंह 

 

हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने वाले यूं तो हमारे यहाँ कई बड़ी हस्तियाँ हैं, लेकिन रामचंद्र शुक्ल का ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ किसी भी भारतीय भाषा का पहला साहित्येतिहास है। इसमें कथित रूप से तत्कालीन परिस्थितियों के बरक्स साहित्य को देखा गया और एक कार्य-कारण सम्बन्ध की तलाश की गई है। तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार, शिक्षित जनसमूह की बदलती हुई प्रवृत्तियों के आधार पर उन्होंने कुछ नोट्स बनाये और रचना की विभिन्न शाखाओं को इतिहास के कालविभाजन का नाम दे दिया। इस क्रम में उन्होंने ‘वीरगाथाकाल’ को विदेशी आक्रमण के सिद्धांत का रूप दिया तो, ‘भक्तिकाल’ को पराजय के अवसाद का, और रीतिकाल को अवसाद से उपजी उसकी कुंठा का। आधुनिककाल में उन्होंने सारा ध्यान गद्य की परम्परा-भाषा खोज निकालने में लगा दिया। नवजागरण वहाँ नहीं है।

यह महत्वपूर्ण है कि एक विशाल और बहुभाषायी, विभिन्न धर्मों वाले इस देश में जहाँ स्त्री, पुरूष, दोनों समान राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक उथल-पुथल से गुजर रहे थे, उनके सभी अनुप्रयोग के ‘डिटेल्ज’ तैयार होने जरूरी थे जिससे नवजागरण के सभी पहलूओं पर स्वतंत्र चेतना से सोचा जा सकता था। निश्चित ही इसमें दलितों, किसानों और स्त्रियों का प्रश्न सर्वोपरि था।

हमारे यहाँ ‘नवजागरण’ सीधे-सीधे 19वीं सदी की आधुनिकता और स्वाधीनता-संग्राम के आन्दोलन से जुड़ा हुआ आया है। हालांकि यह शब्द ‘नवजागरण’ यानि ‘रेनेसां’, पुर्नजागरण, पुनरूत्थान, रीबर्थ, आदि नामों से भी जुड़ा हुआ है लेकिन साहित्य में सर्वप्रथम रामविलास शर्मा ने ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण’ (1977) नामक पुस्तक लिख इस नाम को स्वीकृति प्रदान की। यह शब्द ‘रेनेसां’ दरअसल यूरोप का शब्द है जो एक प्रकार से 14वीं से 17वीं सदी में फ्रांस में शुरू हुए सामाजिक, सांस्कृतिक नवोत्थान से जुड़ा हुआ है। फ्रांस के द्य मिशे सेंट और इटली के बर्कहार्ट ने इस शब्द को प्रचलित किया। उस समय में यूरोप के लिए।

यह आदर्श शब्द था क्योंकि चैदहवीं, पंद्रहवीं सदी से पहले यूरोप के एक हजार साल का इतिहास अंधकार युग के समान था। रोम, यूनान आदि महान साम्राज्यों के पतन होने के बाद अब यूरोप में राजनीतिक, सांस्कृतिक रूप से मौलिक और क्रांतिकारी परिवर्तनों का दौर आरंभ हुआ था। सबसे बड़ा काम ’रेनेसां’ का यह था कि उसने मनुष्य में उसकी उपलब्धियों और संचार के प्रति उसकी रूचि को परिष्कृत किया। ‘डिस्कवरी ऑफ लिट्ररी टम्र्स’ में ’रेनेसां’ के बारे में कहा गया

In literature the period was notable for a revival of interest in the humanities and a rediscovery of classic work of greek and roman origin. The renaissance, now ever, was a many on the importance of human lived as contrasted with the subordination of individuals pronged era that included rigorous new trends in art, science, religion and politics, also the renaissance ushered in the growth of cities of commerce, as well as increased bravel throughout Europe and resolute and determined colonization in new world. Intellectually and socially the period witnessed increased emphasis.1

अर्थात् कुल मिलाकर यहाँ नवजागरण का अर्थ था, मध्ययुग की रूढ़ियों से मुक्ति और व्यक्तित्व का विकास, व्यक्ति-स्वतंत्रता की प्रतिष्ठा और धर्म का एकाधिकार समाप्त होना। परलोक से बड़ा हुआ इहलोक। नये धर्म का आह्वान किया गया जहाँ मनुष्य सर्वोपरि । जहाँ संन्यासियों की जगह ऐसे बुद्धिजीवियो को महत्व मिलने की बात हुई जहाँ स्वभाव और मन को वश में करने के बदले उसके विकास और परिणति में विश्वास की शुरूआत हुई और यह इटली से शुरू होकर इंग्लैण्ड तक जा पहुंचा।

अब जब हम भारत के परिप्रेक्ष्य में इस ’नवजागरण’ को देखते हैं तो पाते हैं कि हमारी 19वीं सदी का प्रारंभ स्वाधीनता प्राप्ति, औधोगिकीकरण और समाज सुधार परिवर्तनों से शुरू होनेवाला युग है। इसीलिये इसे ’नवजागरण’ या ’पुर्नजागरण’ नाम दिया गया। लेकिन यूरोप के ’रेनेसां से एक मुख्य अन्तर यहाँ यह था कि हमारा मध्ययुग बिल्कुल भी अंधकार युग नहीं था। हमारे यहाँ धर्म या मंदिर चर्च की तरह राजनीतिक सत्तावान न थे। वे आस्था के प्रतीक भी थे और अंग्रेजों के आगमन से पूर्व भारत की सामाजिक और आर्थिक संरचना कई अर्थों में अतुलनीय थी। हमारे यहाँ तो पूरा मध्ययुग ‘स्वर्णिम युग’ है। आखिर ऐसा क्या था जो ‘रेनेसां’ और नवजागरण के बावजूद देश और भी उंधता रह गया? पर्याप्त चैतन्य न हो सका? इस पर एक शोधपूर्ण दिलचस्प टिप्पणी डॉ. देसाई देते हैं। उनके अनुसार मुसलमानों के समय ऐसा नहीं हुआ। वे कहते हैं –

‘‘तुर्कों के समय में कभी भी नगरों का विनाश नहीं हुआ। अंग्रेजों के समय में नगर वीरान हो गए, कारीगर मुफलिस हो गये तथा भाग कर गाँव पहुँच गए, खेती करने को जमीन न मिली तो जमींदार की बेगारी करने को मजबूर हो गए। जितनी ज्यादा गाँव में इनकी मात्रा बढ़ती गयी, उतना ही द्विज और शूद्र का भेद बढ़ता गया, हिन्दू-मुसलमानों में भेद डालने की नीति भी शुरू हुई। जाहिर है उन्होंने भारत पर यूरोपीय ढंग के मध्यकाल की जड़ता और क्लेश जर्बदस्ती थोपने की कोशिश की। वे कारण जर्बदस्ती पैदा किये गये जिससे सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक विषमतायंे बढ़े।2

ऐसा नहीं है कि इस प्रक्रिया को भारतीय नहीं देख या समझ रहे थे। समझ रहे थे। तभी विरोध और विद्रोह कर रहे थे। इतिहास गवाह है कि 1857 के गदर से पहले कई असंगठित विद्रोह हुए और गदर के बाद अनवरत संघर्ष करने का ही परिणाम था कि जन-जन में राष्ट्रीय भावना का उदय हुआ। हमारे यहाँ का नवजागरण यूरोप के नवजागरण से भिन्न था और उनकी प्रेरणा/कृपा से नहीं आया था। यह हमारी अपनी आंतरिक परिस्थितियों की उपज से उत्पन्न हुआ और नई आशा, नये विचार, उम्मीद के साथ न केवल राष्ट्रीय चेतना बल्कि व्यक्ति-चेतना से भी गहरे जुड़ गया। राजा राममोहन राय से शुरू होकर स्त्री, पुरूष, हिन्दु मुस्लिम सबको आलोड़ित और प्रभावित किया। लेकिन दुर्भाग्य से दो बातें हुई। एक तो, स्वाधीनता आन्दोलन में अपनी सारी ताकत झोंक देने वाले नेताओं के पास आजाद भारत का कोई ठोस प्रोग्रामिंग या प्रारूप तैयार नहीं था दूसरे बोई गयी विषबेल ने विभाजन के रूप में देश को सांप्रदायिकता की आग में झोंक दिया था और बची हुई संस्कृति, सामंती और सियासी चालों में डूबी-उतरी, राजनैतिक महत्वाकांक्षियों के अधीन हो गई थी। अब नवजागरण ऐसा था जिसका संकेत ’वीरभारत तलवार’ अपने शोध-पत्र में करते हुए लिखते हैं –

‘‘नवजागरण में हाशिये पर पड़े दलितों, किसानों और स्त्रियों के सवालों को लेकर स्वतंत्रता संग्रामी और तमाम समाज सुधारक, आन्दोलनकर्ता आगे तो बढ़े लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उनके अपने हित आपस में टकराने लगे। सदियों की सामंती शैली ने परंपरा और राष्ट्रवाद की बेदी पर इन सभी मुद्दों की बलि चढ़ा दी और स्त्री, दलित, मुसलमानों और किसानों का प्रश्न महत्वहीन हो गया।3

रामचन्द्र शुक्ल

इसीलिये आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि उस समय लिखे गये किसी इतिहास-ग्रंथ में इनकी चर्चा नहीं है। रामचंद्र शुक्ल के इतिहास-ग्रंथ में महादेवी वर्मा, सुमद्रा कुमारी चैहान के नामोल्लेख के अतिरिक्त न तो किसी और स्त्री कवयित्रियों का नाम है न ही उनकी प्रकाशित कृतियों का उल्लेख । जब हिन्दू स्त्रियों के नामोल्लेख के साथ ऐसी कोताही बरती गई तो उन मुस्लिम स्त्रियों का नाम कैसे और क्योंकर आता जिनके यहाँ शोषण का दुहरा-तिहरा चक्र, पर्दा प्रथा से लेकर उनके धर्म की आड़ में सदियों चलता रहा है?

इसी सिलसिले में दूसरी गंभीर बात यहाँ यह भी है कि फिराक गोरखपुरी ने जब ’ऊर्दू भाषा और साहित्य का इतिहास’ रचा तब उसमें भी दूर-दूर तक एक भी स्त्री कवयित्री का नाम शामिल नहीं किया। इस दौर में प्रकाशित अनेक पत्र-पत्रिकाओं के अध्ययन से ज्ञात होता है कि स्वतंत्रता संग्राम में और अपनी स्वतंत्र इयत्ता, चेतना की पहचान में कई मुस्लिम खातूनों ने हुंकारी स्वर में बगावती और क्रांतिकारी कविताओं, शायरी की रचना की है। फिराक गोरखपुरी द्वारा रचित इस महान इतिहास ग्रंथ में इन कववित्रियों की अनुपस्थिति देखकर संदेह ही नहीं विश्वास होता है कि यह मात्र एक ऐतिहासिक भूल नहीं थी। सदियों की पितृसत्तात्मक सोच और सामंती सियासी शैली का यह गहरा षड़यंत्र भी था जहां स्त्रियों और उनके लिखे को नकार दिया गया।

यह और गौरतलब है कि फिराक साहब के इतिहास-ग्रंथ में एक पूरा अध्याय ’सामाजिक चेतना और नयी कविता’ से संबंधित लिखा गया है लेकिन एक भी स्त्री या उसके गीतों के बाबत यहाँ सख्त चुप्पी है। हां, कथाकारों में अवश्य इस्मत चुगताई, खदीजा मस्तूर, हाजरा मसमा का जिक्र अया है लेकिन कविता लिखना, वह भी स्त्रियों द्वारा, शायद सभी संस्कृतियों में रूमानी गुनाह है।

हम जानते हैं कि स्त्री की स्वाधीतना का एक क्षेत्र साहित्य भी है। यहां वह अपनी आत्मामिव्यक्ति के माध्यम से अपनी अस्मिता की पहचान करती है और स्वंतत्रा की व्यंजना भी। स्वतंत्रता और नवजागरण के इस दौर में इतनी मुस्लिम कवयित्रियों का सामने आना यह भी प्रदर्शित करता है कि उस समय के समाज और संस्कृति ने उन्हें यह छूट दी थी लेकिन बाद में वैसे ही उन्हें उपेक्षित कर दिया गया, जैसे “द्वितीय विश्व युद्ध के राष्ट्रवादी उन्मादी समय में जापानी सैनिकों की यौन-भूख मिटाने के लिए जापान, चीन, कोरिया, इण्डोनेशिया आदि देशों से राष्ट्र के नाम पर लायी गयी लगभग दो लाख स्त्रियों को वेश्या बनने के लिए मजबूर किया गया था। ‘अनभै सांचा’ में मैनेजर पाण्डे लिखते हैं, कि उन्हें ’आरामदेह औरतें’ कहा जाता था।’’4

राष्ट्रभक्ति के उन्माद में और जोशोखरोश के लिये इन कवयित्रियों के गीतों का इस्तेमाल करना लेकिन बाद में उन्हें इतिहास और प्रकाशन-निकाला देना कुछ इसी प्रकार का किस्सा मालूम होता है।

बकौल जवाहर लाल नेहरू, नवजागरण का एक अर्थ स्वाधीनता संग्राम की भावना थी और यंत्रमूलक औद्योगिकी सभ्यता से जुड़ाव भी। लेकिन दूसरे अर्थ में, साहित्यिक और सांस्कृतिक अर्थ में, वह ऐसी स्वाधीनता की परिचायक भी थी जहाँ पुरूष और स्त्री-दृष्टि की भिन्नता को उनकी विशेषताओं में स्वीकृति मिले । एक मूलगामी दृष्टि, जहाँ दोनों ने कौम की हिफाजत और तरक्की के तराने लिखे। मुगल राजवंश में जन्म लेनेवाली ’शहजादी तैयूर जहाँ देहलवी’ की कुछ पंक्तियों को देखें

‘‘गर है हिम्मत तो न यूं वक्फे फुँगा हो जाओ

एक दिल एक जिगर एक जबाँ हो जाओ।

कतरे मिल जायें जो आपस में तो दरिया होगा।

कौम के दर्द का इस तरह मुदावाँ (उपाय) होगा।

जान और माल दो तुम अपनी इज्जत के लिए

जिन्दगी वक्क करो, कौम की खिदमत के लिये।’’

उल्लेखनीय है कि हिन्दी में महिला मदुवाणी’, ’स्त्री-कवि-कौमुदी और हिन्दी काव्य की कोकिलाये” अलग से प्रकाशित हो चुकी थी और इधर ऊर्दू में भी ’तज्किारातुल खवातीन’, ’शायराते उर्दू’ भी। इन दोनों पुस्तकों में कई उई शायरानों के नाम और शेर-दोनों सम्मिलित थे। इन गीतों का मुख्य स्वर राष्ट्र-चेतना से पूरित था।

सुभद्रा कुमारी चौहान

हिन्दी में जिस प्रकार, सुमद्रा कुमारी चैहान का स्वर न केवल राष्ट्र-भावना से ओत-प्रोत है बल्कि अपने व्यक्तित्व की गठन के लिए दृढ़संकल्पी आह्वान से भरा हुआ है, वैसे ही ‘रफीआ बाबू’, ‘मुज्मिर-मुज्मिर’ की कविता ’अज्म’ (संकल्प) इतनी महत्वपूर्ण है कि बिना उससे गुजरे ऊर्दू की फैजी इस्पाती ताकत और मुस्लिम स्त्री के बिंदास अंदाज का पता लगाना मुश्किल है। यह वह मूलगामी स्वर है जिसके बारे में माक्र्स ने कहा था कि, किसी बात को मूल रूप से समझना और फिर उसमें परिवर्तन लाने का संकल्प करना। रफीआ बाबू कहती हैं

‘‘बदल दूंगी निजामे-जिंदगी का सईए पैहम (श्रम) से

ज़माना काँप उठेगा मेरे अज्मे मुसम्मत (दृढसंकल्प) से

समाज़ो कुव्वतों के जोरे बाजू से मसल दूंगी’’

ये महकूमी (गुलामी) ये बंदिश, ये मज़ाको फिक्र की मस्ती से।’’

मुस्लिम समाज में आज भी स्त्री शिक्षा का जैसा अकाल है, सीमित साधन और परिवेश में उस समय क्या हाल रहा होगा, यह अंदाजा लगाना मुशिकल नहीं है। वे स्त्रियाँ न तो अखबार नवीस थीं न विविध चैनलों से न्यूज सुनने वाली आधुनिकायें। लेकिन वास्तविकता को भेदती उनकी निगाहों को पता था कि स्त्री की पराधीनता का सबब केवल लिंगभेद नहीं है बल्कि उसका सम्बन्ध वर्णगत और वर्गगत विषमता से भी है। इन मुक्तिकामी मुस्लिम स्त्रियों का स्वर उस विषमता की ओर बड़े गहरे तरीके से इशारा करता है। उन्होंने लिखा है

‘‘आह! ये आफ़त, ये बर्बादियाँ

हिन्द की ओर आह! ये शहजादियाँ

आह! ऐ हिन्दास्ताँ खस्ता हाल

भूख से बेताब है यूं तेरा लाल

आह! ऐ जन्नत निशाँ हिन्दोस्ताँ

तू कहाँ और यह तेरी हालत कहाँ ।”

विभाजन की त्रासदी के तन और मन पर झेलते, दरकते दिलों के साथ, पाकिस्तान की बजाय हिन्दुस्तान को इतने वतनी निगाहों से अंकित कर पाना न केवल इतिहास बल्कि वर्तमान की भी बड़ी पूंजी है। गांधीवादी दर्शन का राष्ट्रवादी स्वर कब हिन्दुस्तान के करीब मज़लूम, मजदूर और हाशिये के लोगों का रहनुमा बनकर उनकी लेखनी को प्रगतिशीन बना गया, यह कैलकुलेशन भले प्रगतिवादियों के जिम्मे हम छोड़े लेकिन उन मुस्लिम स्त्रियों का इतना प्रोग्रिसिव स्वर इतिहास में दर्ज होने से कैसे रह गया, हैरत अंगेज है। ऐसी प्रोग्रेसिव मुस्लिम कवयित्रियों में ’ताजवर जेव उस्मानियाँ’ का नाम प्रमुख है। उन्नीसवीं सदी की शुरूआत में इनका एक काव्य संग्रह भी आया जिसका शीर्षक था- ‘मुताम हरम।’ अर्थात् जीवन का उद्देश्य। ये चार पंक्तियाँ देखने लायक है जहां श्रमजीवी का साम्राज्य है, भावी हिन्दुतस्तान की सुदृढ़ रुप-रेखा है- हिलाल और मजदूर

‘‘वहां मजबूर भी होगा जमाना

वहां मगरुर भी जमाना ।

मगर मजदूर से नफरत न होगी

गरीबी-बाइस जिल्लत न होगी।’’

विल्हेल्म रीख ने कहीं लिखा है कि यौन-जागरुक स्त्रियाँ निरंकुश सत्ता की समाप्ति का कारण बनती हैं। इसलिए भी सत्ताशाली कौम उसे दबाकर रखती है। शोषित और गुलाम वर्ग केवल आनंद उपभोग की वस्तु बनकर रहें लेकिन स्वयं अपनी ताकत और सौदर्य के प्रति जागरूक न हों जायें, सत्ता इस बात का विशेष ख्याल रखती है। अपनी यौनता और शरीर के प्रति जागरूक स्त्रियाँ उनकी नजरों में चरित्रहीन हैं, डायन हैं। राजनैतिक रूप से उनकी नजरों में आर्थिक रूप से पिछड़े मुस्लिम समाज में तो, और भी स्त्री को गुलाम बनाये रखने के कारगर उपाय रचे जाते है। सबसे उग्र और छली रूप उसकी नैतिक-व्यवस्था में दिखाई देता है। स्त्री वहां पुरूष के जांघ की हड्डी से निर्मित्त है और उसका एकमात्र मकसद उसे खुश करना है। इस रूढ़िवाद को ललकारती मुस्लिम कवयित्रियाँ कब काले बुरके से बगावत करके मुल्ला, मौलवियों के फतवे कदमों तले रौदंते, बावर्ची खाने में मांस पकाते, कलेजा जलाते अपनी यौन इयत्ता को पहचानने लगती है और अपनी ’पावर’ पर ऐसा गर्व करती हैं कि कृष्णा सोबती की ’मित्रों मरजानी’ कई-कई रुप धरे सामने आ खड़ी होती है। अपने इखलाक में ’पूरब की औरत’ में एक मुस्लिम शायरा कहती हैं-

‘‘कुर्बाने मुहब्बत हूं, तस्वीरें मर्सरत हूं।

फूलों की मैं न कहती हूं, दुनिया की मैं जन्नत हूं।

मशरिक की मैं औरत हूं।

दरिया-लताफ़त हूं, परवाने की फितरत हूं।

इक राजे-हकीकत हूं, इक गौहरे इस्मत हूं।’’

मशरिक की मैं औरत हूं।’’

स्त्री होने पर गर्व, आज भी स्त्री-विमर्श का बहुत बड़ा मुद्दा है। जहाँ कन्या भ्रूणहत्या का इतिहास पंजाब के बेदी परिवार से शुरू होकर आज के खाप पंचायत तक स्त्रियों को कत्ल कर देने के मंसूबे से भरा हुआ है, वहां स्त्री अपनी इयत्ता और अस्मिता की ताकत को पहचानने लगती है। यहां ’सीमोन द बोउवा’ का वह कथन याद आता है कि स्त्री की मुक्ति का रास्ता स्वयं उससे होकर ही गुजरेगा। अपनी ताकत, अपने इल्म को पहचानने के बाद ही वह न केवल अपनी स्थिति बल्कि राष्ट्र और परिवार की स्थिति में भी सुधार ला सकती है। क्रांतिकारी बदलाव उसी से संभव है। ‘तैमूर जहां देहलवी’ फरमाती हैं

‘‘इक इशारे से बदल सकती है आलम का निजाम

इक सदा से सारी दुनिया को जगा सकती है तू

आज की किस्मत पलट सकती है तू अवाम की

आज भी हर फ़र्द को अर्जुन बना सकती है तू।’’

‘रफीआ बानू’ की बानगी देखें

“यह रूठों की गुलामी, यह सियहकारी, यह बदमस्ती

मै उस दुनिया को ’मुज्मिर’ अपने नारों से हिलाउंगी

फ़रोगे-सोजे-गम से आग दुनिया में लगाउंगी

उठूंगी मै जलालो-अज्मों हिम्मत का आलम लेकर

मेरे बिगड़े हुए तेवर से तूफां-दम-बेखुद होंगे।

मेरे बिफरे हुए नारों से इसां-दमबखुद होंगे।

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नवजागरण के संवेदनशील समय मे मुक्तिकामी मुस्लिम स्त्रियों का यह मुक्त स्वर इतने जोशोखरोश और रवानगी से भरा था कि कई हिन्दू स्त्रियों ने भी अपने कलाम लिखने के लिए उर्दू भाषा का सहारा लिया। भाषायी राजनीति करने वालों के लिए यह याद रखना महत्वपूर्ण है। इन कवयित्रियों में प्रायः सभी ने स्वतंत्रता चाहे, वह व्यक्तिगत हो या राष्ट्रसंबधी, उसके अलावा मुअज़न की अज़ां, पुजारी के भजन से लेकर, पीसन हारियों के गीत, पालकी वालों और श्रमिकों, कहारों के गीत और फकीरों की सदा तक को अपने नग्मों में समेटा है। इनकी बहुतायत देखकर आधुनिक युग के पुरोधा भारतेन्दु हरिश्चंद्र को भी कहना पड़ा था

‘भाषा भइ जग की ऊर्दू,

अब इन ग्रंथंन वीर बढ़ाइये ।”

इब्सन ने एक बार कहा था कि, आधुनिक समाज, मानव समाज नहीं है, यह केवल पुरूषों का समाज है। ऐसे समाज में स्त्री के पढ़ने और लिखने का अर्थ है, स्त्री-दृष्टि से समाज के इतिहास को देखना समझना। अब तक के इतिहास लेखन में मनुष्य का अर्थ पुरूष ही रहा है, इसलिए स्त्री अपनी दृष्टि से समाज और संस्कृति के इतिहास को देखना, समझना चाहती है। बल्कि यह और सुखद है कि औरत की दास्तां सुनाती मुस्लिम महिलाओं की मुक्तिकामी चेतना अपनी राजनैतिक आकांक्षाओं को भी प्रकट करती है और उसे हासिल करने का हौसला करती है-

‘सुन चुके माहे गुज़िश्ता में ही मर्दों का बायाँ ।

अब सुनो मेरी जुबानी औरतो की दासतां

क्यों न हम फरियादी बने, हम भी तो रखती हैं जुबां।

हो चुका, बस हो चुका, बस इन्तज़ामे कौमो-मुल्क।

आपकी बदइन्तज़ामी पर है रोता आसमां

आजमाइश में हुए हो, हर जगह नाकामयाब ।

अब यह बेहतर है, मिले हमको, हुकुमत की अनाँ।’’

 

समाप्ति की ओर बढ़ते हुए मै यह कहना चाहूंगी कि यह आलेख समाप्ति के लिए नहीं बल्कि नई शुरूआत के लिए लिखने की कोशिश भर है। यदि अब भी इनका अंकन-संकलन नहीं हुआ तो हमारी स्मृतिहीनता हमें इतिहास-हीनता की ओर ले जाने वाली यात्रा सिद्ध होगी।

संदर्भः

1.कर्मेन्दू शिशिर-नवजागरण और संस्कृति-आधार प्रकाशन, पंचकूला (हरियाणा), 2000

2.मुशीरूल हसल भारत में राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक राजनीति-ग्रंथ शिल्पी (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड 2008

3.हेरम्ब चतुर्वेदी-दासतां मुगल महिलाओं की-लोकभारती प्रकाशन, 2013

4.राजेन्द्र यादव तथा मुर्शरफ आलम जौकी (संपादक)- कथा जगत की बागी मुस्लिम औरतें- राजकमल प्रकाशन, 2006

5.अध्यापक जहूर बख़्श- मुस्लिम महिला रत्न-स्वर्ण जयंती, दिल्ली, 1998

6.रोहिणी अग्रवाल- स्त्री लेखनः स्वप्न और संकल्प-राजकमल प्रकाशन-2011

7.डॉ. रफीक जकरिया-बढ़ती दूरियाँ: गहराती दरार- राजकमल प्रकाशन, 2006

 

लेखिका मत्स्य विश्विद्यालय, अलवर (राजस्थान) में हिन्दी की एसोशिएट प्रोफ़ेसर हैं|

सम्पर्क- +918178820925, rupasinghandpreet@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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