शख्सियत

कुलदीप नैयर की याद – घनश्याम

 

  • घनश्याम

स्मृति शेष-1

नैयर साहब से पहली बातचीत
बात सन् 87 की है। सम्पूर्ण क्रांति मंच के बैनर तले एक पदयात्रा बांझी से दुमका तक के लिए निकल चुकी थी। 19 अप्रैल से निकल कर यह पदयात्रा एक मई को दुमका पहुंचने वाली थी। सभी साथियों ने मिलकर मुझे इस यात्रा का संयोजक बनाया था। उस समय जस्टिस वीएम तारकुंडे सम्पूर्ण क्रांति मंच के राष्ट्रीय संयोजक थे और श्री कुलदीप नैयर राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष। तब रघुपति जी और अनिल प्रकाश जी राष्ट्रीय सह संयोजक बनाये गये थे।

इस पदयात्रा की पूर्व तैयारी में रघुपति जी और बजरंग जी ने पूरी ताकत लगा दी थी। साथी अरविंद जी भी इसे सफल बनाने में लगे थे। अग्रिम तैयारी में बजरंग जी और उनके साथी पूरी तन्मयता से काम कर रहे थे। बरहेट पहुंचते ही हमसबों को बजरंग जी ने यह जानकारी दी कि श्री नैयर साहब यात्रा में शामिल होने के लिए आ रहे हैं। नैयर साहब को हमसब पहले से जानते थे। उनकी धारदार पत्रकारिता के हमसब कायल थे। उनके आने की खबर ने सभी यात्रियों में उत्साह भर दिया।

संभवतः 25 अप्रैल को (मुझे ठीक ठीक तिथि याद नहीं है) लिट्टीपाड़ा के आसपास नैयर साहब बजरंग जी के साथ आये। रघुपति जी ने उनकी अगवानी की। सभी साथियों ने लोकनायक जयप्रकाश जिंदाबाद तथा सम्पूर्ण क्रांति जिंदाबाद के नारों से उनका स्वागत किया। कुछ दूर पैदल चलने के बाद हमसब एक घने पेड़ के नीचे बैठे। नैयर साहब भी हमसबों के साथ ही जमीन पर बैठ गए। मैं भी उनके सामने बैठ गया। रघुपति जी ने मेरा परिचय नैयर साहब से कराया। यह उनसे मेरा पहला परिचय था। इसके पहले कई सभाओं में सुना था। लेकिन परिचय पहली बार हो रहा था। मेरी लंबाई को सराहते हुए उन्होंने ने चुटकी ली और कहा तुम तो हमसे भी लंबे हो। मैंने झट से कहा – लंबा तो हूं पर आपकी बराबरी का नहीं! और आपकी “ऊंचाई” तो गगनचुंबी है। इस बात पर सभी हंस पडे। फिर चर्चा होने लगी यात्रा पर। उन्होंने सभी यात्रियों को चिलचिलाती धूप में पदयात्रा करने के लिए बधाई दी और सबों की हौसला अफजाई की।

इसके बाद नैयर साहब संताल परगना की परिस्थितियों पर चर्चा करने लगे। विस्तार से उन्हें यहां के इतिहास, भूगोल और राजनीतिक के बारे में हमने बताया। सिदो-कान्हू के हूल पर बातें सुन वे बहुत प्रभावित हुए। तब आदिवासियों के नेतृत्व में इतनी बड़ी क्रांति हुई थी और हजारों लोगों ने शहादत दी थी यह उनके लिए आश्चर्य की बात थी। सुनकर उनका चेहरा क्रांतिमान हो उठा। उस दिन उनके चेहरे को देख लगा इस आदमी के अंदर अभी क्रांति की ज्वाला जल रही है। मेरे मन में तबसे ही यह बात बैठ गयी कि इनके साथ हमसबों का वैचारिक तालमेल हो सकता है।

तबसे लेकर अब तक वे हमसबों के वैचारिक अभिभावक – से थे। उनका जाना हमसबों की वैचारिक क्षति है। उन्हें हमसबों का हूल जोहार और सादर नमन….

 

स्मृति शेष- 2

बांझी से दुमका पदयात्रा
नैयर साहब ने पदयात्रा के उद्देश्य के संबंध में पूछा। बारी बारी से रघुपति जी, बजरंग जी और मैंने अपनी बातें रखीं। संताल परगना में जंगल की क्या स्थिति है? जानने की इच्छा प्रकट की। मैंने कहा सरकारी आंकड़ों के अनुसार तो लगभग 22 प्रतिशत (1987 में उतना ही था) है, लेकिन जमीनी सच्चाई अगर बतायें तो सघन वन 12-15 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। वे सुनकर चौंक उठे। उन्होंने ने कहा कि यहां की भूआकृति (टोपोग्राफी- इसी शब्द का उन्होंने प्रयोग किया था) के अनुसार तो यह खतरनाक स्थिति है। हमसबों ने कहा कि इसीलिए तो यह पदयात्रा है ताकि सरकार और लोगों का ध्यान इस ओर खींचा जा सके।

वे अपनी शानदार मूंछों के बीच मुस्कुराये और कहा – क्या यह नहीं लगता कि तुमसब हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हो? उनकी बातें सुन हमसब एक-दूसरे के मुंह ताकने लगे। इसी बीच पाडरकोला के परगना दुबराज टुडू ने कहा – नहीं साहेब, ऐसी बात नहीं है। नैयर साहब उनको देखने लगे! पूछा – सो कैसे? दुबराज जी ने कहा – अभी जंगल की जड़ें बची हुई हैं। जबतक इसकी जड़ें हैं तबतक हमसब लड़ाई हार नहीं सकते। इनकी बात सुन नैयर साहब की उत्सुकता और बढ़ गई। वे अब सजग पत्रकार की भूमिका में आ गये। सवाल दागा- सो कैसे? जड़ों के बचने से क्या हो जायेगा परगना साहेब?

दुबराज टुडू ने अपनी अधपकी सघन दाढ़ी पर अपनी अंगुलियां फिरायी और कहना शुरू किया – नैयर साहेब, जंगल का एक विशेष गुण होता है, खासकर सारजोम (शाल) के जंगल का, कि जबतक उसकी जड़ें समाप्त नहीं हो जातीं तबतक वहां से (उससे) फुनगियों के निकलने की संभावना बनी रहती है। और यहां के इलाकों में शाल के ही जंगल ज्यादा हैं। इस पदयात्रा के माध्यम से हमसब यह भी संदेश दे रहे हैं कि जो जंगल कट गये हैं उनकी जड़ें सहेजो, दो-तीन साल के भीतर फिर हरा-भरा जंगल उठ खड़ा हो जायेगा। दुबराज टुडू की इस बात से नैयर साहब इतने खुश हुए किए उन्होंने उनकी पीठ थपथपाई। दिनेश मंडल ने जोर दार नारा दिया– ” क्या हैं जंगल के उपकार? साथियों ने दुहराया- मिट्टी, पानी और वयार।” इस नारे को सुन नैयर साहब बोले – यह तो चिपको आंदोलन का नारा है! दिनेश ने कहा– हां नैयर साहब , चिपको आंदोलन तो हम जैसे जंगल के निवासियों का ही आंदोलन है न! इसलिए उनका नारा हमारा नारा बन गया। सम्पूर्ण क्रांति मंच का नारा!

नैयर साहब ने मुस्कुराते हुए कहा – वाह,  तुमलोग तो रिश्ता जोड़ने में माहिर लगते हो। और सभी साथी उनकी खुशमिजाजी को देख हंसने लगे। दिवस नायक ने सीटी बजा दी। सीटी सुन सभी उठ खड़े हुए। नैयर साहब मेरे कंधे का सहारा ले उठे। सभी साथी नारा लगाते हुए चल पड़े- हम सोये वतन को जगाने चले हैं………

 

स्मृति शेष-3

सोये वतन जगाने वालों के साथ नैयर साहब
“हम सोये वतन को जगाने चले हैं।
मुर्दा दिलों को जिलाने चले हैं।” गीत गाते और अपने शहीदों के जयकारे करते पदयात्री बढ़ते जा रहे थे। नैयर साहब भी साथ चल रहे थे। चलते चलते बातें भी हो रही थीं। पदयात्रा में इनके अलावा संताल परगना के कई दिग्गज समाजसेवी और स्वतंत्रता सेनानी साथ चल रहे थे जिनमें खादी ग्रामोधोग संस्था के लखी भाई, काठीकुंड के कर्ण साहब, शिकारीपाडा के मिश्रा जी, आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता ईमामी मुर्मू, दुबराज टुडू, इत्यादि साथी सहित लगभग 60-65 साथी साथ थे। इतने लोगों का चिलचिलाती धूप में साथ चलना नैयर साहब के लिए एक अनोखा अनुभव था। पदयात्रा के अंत में गंगा मुक्ति आंदोलन के नेता और सम्पूर्ण क्रांति मंच के राष्ट्रीय सह संयोजक अनिल प्रकाश,  आशुतोष भी शामिल हुए।

साथ चलते हुए नैयर साहब की जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही थी। उन्होंने पूछा – यात्रा के बाद की तैयारी है? सम्पूर्ण क्रांति मंच को आगे कैसे मजबूत करना चाहते हो? संताल परगना की समस्याओं को कैसे देश के राजनीतिक फलक पर लाओगे? आगे के काम के लिये साधन जुटाने की क्या तैयारी है? इस तरह के सवालों की उन्होंने बौछार कर दी। वास्तव में हम सब इसके लिए तैयार नहीं थे। हम सबों ने विनम्रतापूर्वक कहा – जब आप हैं ही तो हमसबों को क्यों इसपर सोचना! वे मुस्कुराए, और आगे कहा – देखो सोचना तो पड़ेगा,  नहीं तो यह महज एक इवेंट बनकर रह जायेगा। चलो, अभी न सोचे हो तो न सही, लेकिन यात्रा के बाद हमसबों को मिलकर सोचना ही पड़ेगा। यात्रा के तुरंत बाद कुछ प्रमुख साथियों की बैठक बुलाओ। मैं भी आऊंगा। उनके इस आश्वासन ने हमसबों में उत्साह को और बढ़ा दिया।

लेकिन यह सब हो नहीं सका। दुमका पहुंचने के पहले मंच के शिखर नेताओं में विवाद इतना तीखा हो गया कि नैयर साहब का सपना अधूरा ही रह गया।

क्या हमसब उनके इस अधूरे सपने को साकार करने के लिए फिर से एक नई पहल की शुरुआत संताल परगना में कर सकते हैं? अगर पुराने अनुभवी साथी साथ आ जायें तो मुझे विश्वास है कि संताल परगना की तस्वीर बदली जा सकती है। नैयर साहब को नमन।

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और ‘जुड़ाव’ के प्रमुख हैं|

सम्पर्क- +919431101974, judav_jharkhand@yahoo.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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