मैं कहता आँखन देखी

पहल-118 में कन्हैयालाल कपूर को पढ़ते हुए

 

 

  • नवल किशोर कुमार

 

”…मज़हब बेवकूफों के लिए है। क्योंकि किसी भी मज़हब में कोई ऐसी बात नहीं बताई जाती जिसे एक ज़हीन आदमी पहले से न जानता हो। इसलिए ज़हानत मज़हब की मुहताज कभी नहीं रही है। हां, बेवकूफों को मज़हब की तौसत से बड़ी कामयाबी से फांसा जा सकता है।”

दिल्ली में जीवन भले सुकून वाली न हो, तमाम तरह की परेशानियां रात-रात भर बेचैन करती हों, लेकिन निराशा नहीं होती। एक उम्मीद हमेशा रहती है। इस उम्मीद की एक बड़ी वजह यह कि यहां पढ़ने को किताबें, पत्र-पत्रिकाएं बिना मशक्कत के मिल जाया करती हैं। दीवाने दिल को और चाहिए भी क्या। हालांकि समय का फेरा बना रहता है। करीब बीस दिन हुए पहल के 118वें अंक को खरीदे हुए। जब-जब लैपटॉप बाहर निकालता, पहल का यह अंक मुझे निहारता।

देर रात जब सुकून कोसों दूर था तब पढ़ने की तलब जाग उठी। वैसे तो पूरा अंक ही संग्रहणीय है। लेकिन जिस एक रचना ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया वह राजकुमार केसवानी का लिखा है। शीर्षक है – ऐसे होते थे कन्हैयालाल कपूर। केसवानी जी भोपाल के रहने वाले हैं। आज इस लेख को लिखने से पहले मैंने उन्हें फोन किया और उन्हें इसके लिए बधाई दी।

केसवानी साहब के इस लिखे को पढ़कर मन में उम्मीद जगती है। यह उम्मीद और इसकी वजह क्या है, उसका वर्णन लेख के अगले हिस्से में करूंगा। फिलहाल कन्हैयालाल कपूर के बारे में। जाहिर तौर पर उनसे जुड़े सभी तथ्यों का स्रोत राजकुमार केसवानी साहब का लेख ही है। पहले से मुझे कपूर साहब के बारे में कोई जानकारी नहीं रही है। अलबत्ता एकाध बार वागर्थ या पटना से जाबिर हुसेन द्वारा संपादित पत्रिका दोआबा (ठीक से याद नहीं) में पढ़ा था। लेकिन तब शायद सुकून और मुसीबतों के बीच जंग तेज रही होगी।

हंसराज ‘रहबर’ के हवाले से केसवानी साहब ने लिखा है – ‘…सिगरेट हाथ में थामे जब वह मुस्कराता था तो ”गुलीवर्स ट्रेवल्स’ का लेखक (जोनाथन) स्विफ्ट दिखाई पड़ता था।’’ कन्हैयालाल कपूर की एक और ख़ूबी उन्हीं के लफ्ज़ों में – ”उर्दू में लिखता हूं, पंजाबी बोलता हूं और अंग्रेज़ी पढ़ाता हूं।”

अहा! कितना सुंदर है यह – उर्दू में लिखता हूं, पंजाबी बोलता हूं और अंग्रेजी पढ़ाता हूं। भाषा को लेकर जिस तरीके की जंग और जिस तरीके से लड़ी जा रही है, यह वाक्य ही सुकून देता है। भाषा, मजहब के नाम पर सियासत करने वालों के नाम एक संदेश भी। खैर, यह वाक्य कन्हैयालाल कपूर का बायोब्लर्ब माना जाना चाहिए।

केसवानी साहब की शैली भी उतनी ही कमाल की है।  उन्होंने लिखा है -” कन्हैयालाल कपूर के पिता लाला हरी राम, ज़िला लायलपुर के एक गांव – चक 498 – के पटवारी थे। पैदाइश की तारीख 27 जून 1910 को मान लिया गया है, गो वे ख़ुद भी कभी-कभार 1 नवम्बर 1911 को इस सिलसिले में याद कर लेते थे।”

चक-498 में बड़ी आबादी बलूच पठानों की थी। कन्हैयालाल कपूर ने उनके बारे में लिखा है-  ”बलूच निहायत नेक और अल्लाह वाले लोग थे। मैंने उनसे ज़्यादा ख़ुदा तरस इंसान आज तक नहीं देखे। आम तौर पर वह किसी की दिल-आज़ारी (सताना/परेशान करना) नहीं करते थे। उनमे से कोई नौजवान जब बुराई की तरफ़  रािगब होता तो बूढ़े उसे समझाते, ‘ख़ुदा और रसूल को क्या मुंह दिखाओगे।’ यह महज़ उनका तकिया कलाम ही नहीं था, बल्कि उसूल-ए-ज़िन्दगी भी था। उन्हीं अनपढ़ बलूचों ने मुझे इंसानियत का पहला सबक दिया।”

कन्हैयालाल कपूर फितरतन तंज निगार थे। तंज निगार यानी व्यंग्यकार। उनके बारे में कृष्ण चंदर ने कहा – ”कन्हैयालाल हर उस चीज़ का मज़ाक़ उड़ाता है जो ज़मीन के ऊपर और आसमान के नीचे है।”

केसवानी जी ने अपने इस लेख में ”ग़ालिब जदीद शुअरा की मजलिस में” का विशेष तौर पर जिक्र किया है। उनके मुताबिक, “1942 के ”अदब-ए-लतीफ़ ‘‘ के एक अंक में प्रकाशित इस मज़मून ने एक हंगामा  सा बरपा कर दिया। इस मज़मून का रंग निराला था। इसमे रिवायती नस्र है, ड्रामा है और उसी के साथ एक ख़ास असर पैदा करने की गरज़ से पैरोडी का भी ख़ूबसूरत इस्तेमाल भी है। उस दौर के लिहाज़ से यह एक क़ाबिले-तहसीन कारनामा था। तकरीबन 80 बरस पहले लिखे गए इस मज़मून में जद्दीद शाइरी और शाइरों में पनपने वाली जिन घातक प्रवृतियों को निशाने पर लिया गया है, दुर्भाग्य से आज इन्हीं प्रवृतियों ने एक विकराल रूप धारण कर लिया है। इस जगह उर्दू और हिंदी की हालत एकदम यकसां है।”

दरअसल अपनी इस रचना में कन्हैयालाल कपूर ने कृष्ण चंदर के कहे को साकार किया है। उन्होंने गालिब को भी नहीं बख्शा और न ही फैज अहमद फैज को। ”ग़ालिब जदीद शुअरा की मजलिस में” के कुछ अंश केसवानी जी कृपा से पढ़ने को मिला। इसका वह हिस्सा जो मुझे खास रिझा गया, आपके समक्ष प्रस्तुत है।

पहला मंज़र है कि जद्दीद शाइरों के जलसे में ग़ालिब को जन्नत से ख़ास दावत देकर बुलाया गया है। जन्नत के हालात को लेकर शुरूआती बातचीत के बाद शुरू होता है मुशाइरा। आग़ाज़ के लिए ग़ालिब से अपनी कोई ग़ज़ल सुनाने की फ़ रमाइश होती है।

”ग़ालिब:- बहुत अच्छा साहिब तो ग़ज़ल सुनिएगा।
बाक़ी शोअ’रा:- इरशाद।

ग़ालिब:- अर्ज़ किया है;
ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के
(बाक़ी शोअ’रा हंसते हैं। मिर्ज़ा हैरान हो कर उनकी जानिब देखते हैं।)

ग़ालिब:- जी साहिब ये क्या हरकत है। न दाद न तहसीन। इस बे मौक़ा खंदा ज़नी (हंसी) का मतलब?
एक शाइर:- माफ़  कीजिए मिर्ज़ा, हमें ये शेर कुछ बेमानी सा मालूम होता है।

ग़ालिब:- बेमानी?
हीराजी:- देखिए न मिर्ज़ा आप फ़ रमाते हैं ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो। अगर मतलब कुछ नहीं तो ख़त लिखने का फ़ायदा ही क्या। और अगर आप सिर्फ माशूक़ के नाम के ही आशिक़ हैं तो तीन पैसे का ख़त बर्बाद करना ही क्या ज़रूर, सादा काग़ज़ पर उसका नाम लिख लीजिए।

डाक्टर कुर्बान हुसैन ख़ालिस:- मेरे ख्याल में अगर ये शेर इस तरह लिखा जाये तो ज़्यादा मौज़ूं है;
ख़त लिखेंगे क्यों कि छुट्टी है हमें दफ्तर से आज
और चाहे भेजना हमको पड़े बैरंग ही
फिर भी तुमको ख़त लिखेंगे हम ज़रूर
चाहे मतलब कुछ न हो।
जिस तरह से मेरी इक-इक नज़्म का
कुछ भी तो मतलब नहीं।
ख़त लिखेंगे क्योंकि उलफ़त है हमें
मेरा मतलब है मुहब्बत है हमें
यानी आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के

ग़ालिब:- ये तो इस तरह मालूम होता है जैसे आप मेरे इस शेर की तर्जुमानी कर रहे हैं –
बक रहा हूं जुनूँ में क्या-क्या
कुछ ना समझे ख़ुदा करे कोई

पूरा लेख न सिर्फ पढ़ने योग्य है बल्कि संग्रह करने योग्य भी। यह भारत जो कभी अल्लामा इकबाल का हिन्दोस्तां हुआ करता था, के शानदार गंगा-जमुनी तहजीब का प्रमाण है। मुल्क के बंटवारे ने इस तहजीब को तार-तार कर दिया। कन्हैयालाल कपूर का निधन 20 जून 1960 को हुआ।  अपनी मौत से पहले उन्होंने खुद लिखा अपने बारे में।
”आज 20 जून 1960 को मशहूत तंज़ निगार कन्हैयालाल कपूर इस दुनिया से गुज़र गए। ”…ख़ुदा ब$ख्शे, बहुत सी ”ख़ामियां” थीं मरने वाले में। रूहानी तौर पर तो उनकी वफ़ात उसी दिन वा$के हो गई थी जब आज से तेरह बरस पहले उन्हें लाहौर छोडऩा पड़ा था। लेकिन जिस्मानी तौर पर वह आज इंतक़ाल कर गए। ग़ालिबा दुनिया के वह पहले अदीब थे जो पैदा एक बार हुए लेकिन मरे दो बार।”

अब जवाब उस सवाल कि जो मैंने शुरू में हाशिए पर रख दिया था। सवाल यह कि केसवानी साहब के द्वारा कन्हैयालाल कपूर पर लिखे इस लेख से मुझे किस तरह की उम्मीद बंधती है और क्यों? इसका एक जवाब फैज अहमद फैज की इस रचना में है।
फिर कोई आया दिल-ए-ज़ार, नहीं कोई नहीं
राह रू होगा कहीं और चला जाएगा
ढल चुकी रात, बिखरने लगा तारों का गुबार
लडख़ड़ाने लगे ऐवानों में ख़्वाबीदा चराग़
सो गए रास्ते तक-तक के हर इक राह गुज़र
अजनबी ख़ाक ने धुंधला दिए नए कदमों के सुराग़
गुल करो शमें, बड़ा दो मय-ओ-मीना-ओ-अयाग़
अपने बे-ख़्वाब किवाड़ों को मुक़फ्फ़ ल कर लो
अब यहां कोई नहीं कोई नहीं आएगा

बहरहाल, उम्मीद भी है कि भारत की विविधता में एकता बरकरार रहेगी। उन ताकतों का अंत होगा जो समाज में जहर फैला रहे हैं। इंसान-इंसान को बांट रहे हैं। आप ही बताइए कि टैगोर और अल्लामा इकबाल की रगों में जो खून बह रहा था, क्या उसका रंग अलग-अलग था या उनकी रचनाओं का रंग जुदा था?

पहल की पूरी टीम को एक बेहतरीन अंक के लिए बधाई।

लेखक फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली के सम्पादक (हिन्दी) हैं|

सम्पर्क-  nawal4socialjustice@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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