शख्सियत

रामकथा और फादर कामिल बुल्के – विद्याभूषण

 

  • विद्याभूषण

 

देश-देशान्तर तक फैले मित्रों, शुभचिन्तकों, प्रशंसकों और आत्मीय जनों के बीच फादर बुल्के जैसा संबोधन जिस बहुआयामी व्यक्तित्व के निर्मल अन्तरग व बहिरंग का परिचय कराता था, उसके कृतित्व की विशालता उसे अक्षरशः परिभाषित करती थी। उनके मानवीय गुणों के साक्षी लोग जब कल हमारे बीच नहीं रहेंगे, तब भी उनकी भाषिक उपस्थिति उनकी प्रतिभा के शिलालेख अंकित करेगी। शंकर दयाल सिंह ने उन्हें जायसी, रसखान और कबीर की परम्परा का संत कहा था। अक्सर प्रशस्ति लेखन में शब्द अपना अर्थ और अभिप्राय खोने लगते हैं और विशेषण या रूपक अर्थान्तर के वाहक बन जाते हैं। इसलिए डॉ. बुल्के के प्रसंग में यह याद दिलाना जरूरी है कि उनके समग्र कृतित्व को सामयिक इतिहास के किस अध्याय में रखा जाये, यह सुनिश्चित होना अभी शेष है।

भारतीय इतिहास के अंधकार काल को जैसा योगदान मैक्समूलर और काशी प्रसाद जायसवाल का है, भारतीय भाषाओं के वैज्ञानिक अध्ययन में जितना बड़ा काम जार्ज ग्रियर्सन और डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी ने किया, हिन्दी भाषा के प्रचलन को व्यवस्थित करने में जैसी मार्गदर्शी भूमिका भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अदा की, उसे अनुशासित करने का जो श्रेय कामता प्रसाद गुरु और किशोरी दास वाजपेयी को है, हिन्दी की शब्द संपदा के संधान और मानकीकरण के लिए जैसा यश नागरी प्रचारिणी सभा और डॉ. रधुवीर को प्राप्त है और आदिवासी अस्मिता के संदर्भ में जितने प्रासंगिक एच एच रिजले और शरतचन्द्र राय हुए, वैसी ही व्यापक मान्यता डॉ. कामिल बुल्के के बहुपक्षीय कृतित्व को भी मिली है। सच है कि उनका सम्मान उनके काम के स्तर और परिमाण का ही सम्मान है, यह नहीं कि उन्हें हिन्दी के प्रेमी और तुलसी के गुणग्राहक के रूप में एक विदेशी विद्वान होने के नाते अतिरिक्त महत्व दिया गया। भारतीय संस्कृति के प्रवासी इतिहास की पुरी सामग्री का उत्खनन और अंग्रेजी-हिन्दी कोश का निर्माण उनके व्यक्तित्व को मानक पहचान देते हैं। यहाँ यह बात रेखांकित करने योग्य है कि बहुत कम लोग यह याद रख पाते हैं कि डॉ. बुल्के ने मध्यपूर्व के सुदूर देशों में भारतीय संस्कृति के प्रसार के इतिहास की लुप्त होती कड़ियों को अपने गहन और व्यापक शोध अध्ययन से खोज निकाला था। यह अनकही कहानी वही कह सकता था जो डच-फ्लेमिश और फ्रेंच भाषाओं का समर्थ जानकार भी हो।

स्मरणीय है कि ब्रिटिश उपनिवेश बनने से पहले इंडोनेशिया डच उपनिवेश रहा था और वियतनाम, कंबोडिया, लाओस में फ्रेंच साम्राज्य का वर्चस्व स्थापित था। इन देशों में रामकथा पर आधारित हिन्दू-बौद्ध परम्परा की भारतीय संस्कृति से संबंधित जो आधारभूत सामग्री सुलभ थी, वह मूलतः फ्रेंच और फलेमिश में ही उपलब्ध थी। कहने की जरूरत नहीं कि इन भाषाओं में दक्षता के कारण ही इतिहास के उन लुप्तप्राय अभिलेखों का विस्तृत सर्वेक्षण कर डॉ. बुल्के रामकथा का एक विश्वकोश तैयार कर सके। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की डी.फिल. उपाधि के लिए, हिन्दी माध्यम से पहली बार प्रस्तुत, इस शोध प्रबन्ध (रामकथा: उत्पत्ति और विकास) के निर्देशक थे डॉ. माता प्रसाद गुप्त। सन 1947 में डॉ. बुल्के को उपाधि मिली और प्रबंध का प्रथम प्रकाशन प्रयाग विश्वविद्यालय के हिन्दी परिषद प्रकाशन ने सन 1950 में किया। इस ग्रंथ की सामग्री की एक संक्षिप्त परिक्रमा से भी उनके श्रम और समर्पण, वस्तु विवेचन और तर्कपूर्ण विश्लेषण से साक्षात्कार सुलभ हो जाता है जिसके लिए डॉ. धीरेन्द्र वर्मा ने कभी लिखा था-‘हिन्दी क्या, किसी भी यूरोपीय अथवा भारतीय भाषा में इस प्रकार का कोई दूसरा अध्ययन उपलब्ध नहीं है।‘

रामकथा उत्तर और दक्षिण भारत तथा पूर्व और पश्चिम भारत समेत श्रीलंका, इंडोनेशिया, मारिसस आदि देशों के लोक जीवन में सदियों से भिन्न-भिन्न रूपों में प्रचलित रही है। इतिहास की दृष्टि से इन रूपान्तरों की खोज बौद्ध धर्म और जैन धर्म ग्रंथों में वर्णित रामकथाओं में की जा सकती है। फादर कामिल बुल्के ने अपने रामकथा विषयक अध्ययन की सामग्री को चार भागों में विभाजित किया है। जैसे-प्राचीन रामकथा साहित्य, रामकथा की उत्पत्ति, अर्वाचीन रामकथा का सिंहावलोकन और रामकथा का विकास। प्रत्येक खंड में अनेक अध्यायों-शीर्षकों-उपशीर्षकों के अन्तर्गत ब्योरेवार वस्तुविवेचन किया गया है। प्रथम भाग में पांच अध्याय हैं-वैदिक साहित्य और रामकथा, वाल्मीकिकृत रामायण, महाभारत की रामकथा, बौद्ध रामकथा और जैन रामकथा। दूसरे भाग में रामकथा की उत्पत्ति पर विस्तृत रूप में विचार किया गया है। तीसरे भाग में भारतीय भाषाओं के प्राचीन और आधुनिक साहित्य में, सतरहवीं सदी तक की रचनाओं में, रामकथा विषयक लेखन का सर्वेक्षण किया गया है। अध्याय 12 में आधुनिक भारतीय भाषाओं में रामकथा का संक्षिप्त परिचय दिया गया है। तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, कश्मीरी, असमिया, बंगला, उड़िया, मराठी, गुजराती, उर्दू, फारसी और हिन्दी साहित्य में रामकथा का यथोचित विस्तार से उल्लेख किया गया है। इस प्रबंध-ग्रंथ का अन्तिम व चौथा भाग सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विस्तृत है, लगभग साढ़े चार सौ पृष्ठों का। यहाँ रामकथा के विकास से संबंधित सुलभ सूचनाओं का तुलनात्मक विवेचन और विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

वैदिक साहित्य में कोई रामकथा नहीं है, लेकिन रामकथा के कई  पात्रों-चरित्रों का उल्लेख विविध रूपों और प्रसंगों में हुआ है। उनका विस्तृत विवरण प्रथम भाग के प्रथम अध्याय में सुलभ है। ऋग्वेद और ब्राह्मण ग्रंथों में इक्ष्वाकु, राम, सीता आदि नाम आये हैं। वाल्मीकिकृत रामायणशीर्षक अध्याय में रामायण के उपलब्ध पाठों यथा गौड़ीय पाठ, पश्चिमोत्तरीय पाठ और दक्षिणात्य पाठ का तुलनात्मक विवेचन किया गया है। यूरोपीय अध्येताओं के आधार पर रामायण का रचना-काल निर्धारित करने का प्रयत्न भी किया गया है।

रामकथा के मूलस्रोतों पर विचार करते हुए फादर ने यह पड़ताल भी की है कि उसके अलग-अलग प्रसंगों में कितने भारतीय और विदेशी रूपान्तर मिलते हैं, और ऐसे अवसरों में कितना सादृश्य है और कितना विभेद है। इस विवेचन-विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि ऐतिहासिक अनुक्रम की दृष्टि से रामकथा की कौन सी बातें पुरानी हैं और कितनी प्रक्षिप्त। डॉ. बुल्के ने रामकथा की सामग्री की एकरूपता की परीक्षा के क्रम में वाल्मीकि रामायण के विभिन्न पाठों का पर्यवेक्षण करते हुए यह माना है कि वाल्मीकि का प्रचलित दक्षिणात्य पाठ अधिक प्राचीन है।

Related image

फादर बुल्के ने रामकथा के वाल्मीकि की रामायण में वर्णित रूप को ही मूल और मुख्य माना है। यह उल्लेख्य है कि वाल्मीकि रामायण के रचना काल के संबंध में अब तक कोई सर्वसम्मत निष्कर्ष नहीं मिल सका है। रामकथा में वर्णित विभिन्न स्थलों की भौगोलिक पहचान के बारे में भी मतभेद सामने आये हैं और उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के विषय में मतान्तर मिलते हैं। यूरोपीय और भारतीयविद्वानों का एक वर्ग रामकथा के आधारों की खोज में अभारतीय स्रोतों को भी विचारणीय कहता रहा है। प्रोफेसर बेवर ने सीताहरण और ट्रोजन युद्ध में हेलेन के अपहरण के बीच सादृश्य का उल्लेख करते हुए कहा है कि रामकथा का एक संभावित स्रोत ग्रीक भी हो सकता है। डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी और डॉ. सुकुमार सेन ने भी विदेशी स्रोत की संभावना  से इनकार नहीं किया है। रामकथा ऐतिहासिक है या रूपक मात्र है या ब्राह्मण-बौद्ध संघर्ष का प्रतीक है या अरब देश मिस्र के राजा रेमसेस का इतिहास है, इन प्रश्नों से संबंधित मत-मतान्तरों पर विचार करते हुए डॉ. बुल्के ने बहुसंख्यक विद्वानों के इस मत का समर्थन किया कि रामायण की मुख्य कथावस्तु के लिए भारतीय परम्परा के ऐतिहासिक आधार को स्वीकार करने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

रामकथा के मूल स्रोतों की खोज करते हुए अनेक देशी-विदेशी विद्वानों की धारणाओं को भ्रामक मानते हुए उन्होंने अपनी स्थापना इन शब्दों में दी है-‘सदियों से यह बात प्रसिद्ध है कि वाल्मीकि रामायण रामकथा का सबसे पहला महाकाव्य है। लेकिन इस बात के बड़े स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं कि यह कथा जनसाधारण के बीच वाल्मीकि से पहले ही प्रचलित थी। यह गाथाओं या गीतों के रूप में सुनी-सुनायी जाती थी और इस प्रकार इसका रूप आख्यान काव्य का था। बौद्ध त्रिपिटिक, महाभारत और वाल्मीकि रामायण के अनुशीलन से पता चलता है राम सम्बन्धी आख्यान काव्य की उत्पत्ति वैदिक काल के बाद, लेकिन चौथी शताब्दी ई.पू. से कई शताब्दियों पहले हुई। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रामकथा के अनेक धार्मिक संस्करणों पर विचार करते हुए उनका अभिमत था कि ‘रामकथा भारतीय संस्कृति में इतने व्यपक रूप से फैल गयी थी कि राम को उस समय के तीन प्रचलित धर्मों में एक निश्चित स्थान प्राप्त हुआ। ब्राह्मण धर्म में विष्णु के अवतार, बौद्ध धर्म में बोधिसत्व तथा जैन धर्म में आठवें बलदेव के रूप में। आगे चल कर साहित्य की प्रत्येक शाखा में, अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य में, भारत के निकटवर्ती देशों में सर्वत्र रामकथा का स्पष्ट प्रभाव दिखलायी पड़ता है।

डॉ. बुल्के के अध्ययन की व्यापकता और वैविघ्य के प्रमाण इस महाग्रंथ में शीर्षकों-उपशीर्षकों में विभाजित विषयगत प्रसंगों और उनमें विवेचित सामग्री के विश्लेषण के क्रम में मिलते जाते हैं। विदेशों में रामकथा शीर्षक अध्याय में उन्होंने तिब्बती रामायण, खोतानी रामायण, इंडोनेशिया के प्राचीन और अर्वाचीन रामकाव्य, पतानी रामकथा, जावा के सेरत काण्ड, हिन्दचीन, श्याम, ब्रह्मदेश, बर्मा आदि के रामकाव्यों का परिचय तो दिया ही है, यूरोपीय साहित्य में भी यत्रतत्र जो रामकथात्मक प्रसंग उपलब्ध हैं, उनका भी यथोचित उल्लेख किया है। तथ्यतः फादर कामिल बुल्के का यह शोधकार्य इतने बड़े विषय फलक को आत्मसात करता है कि उसकी परिधि में रामकथा के उद्भव और विकास के लगभग तमाम पहलुओं पर सतर्क दृष्टि जाती है, और इस समग्र विमर्श में देश-देशान्तर की भाषिक-सांस्कृतिक-धार्मिक-राजनीतिक सीमाएं टूट जाती हैं।

लेखक प्रतिष्ठित कवि, आलोचक एवं साहित्यकर्मी हैं

सम्पर्क- +919955161422

 

 

 

Facebook Comments
. . .
सबलोग को फेसबुक पर पढ़ने के लिए पेज लाइक करें| 

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *