अंतरराष्ट्रीयस्त्रीकाल

आधी आबादी की अस्मिता का सवाल

 

डॉ. अमिता

अभी कुछ दिन पहले खाना खाते-खाते टीवी देख रही थी। टीवी पर समाचार के बाद अंतराल के दौरान जो विज्ञापन दिखाया गया उसमें अभिनेता अक्षय कुमार की एक महिला सुरक्षा गार्ड के द्वारा तलाशी ली जा रही थी और वह बार-बार यह पूछ रही थी कि “कहां है डॉलर? डॉलर कहां है ?” इस सवाल के तत्काल बाद अक्षय कुमार अपने जांघिये के पट्टी की ओर इंगित करते हुये कहते हैं, उस महिला सुरक्षा गार्ड से कहते हैं, “यहां है डॉलर।” फिर सुरक्षा के लिए तैनात महिला डॉलर ब्रांड को देखकर अक्षय कुमार के आगे अपने आप को समर्पित करती हुयी दिखायी जाती है। इस विज्ञापन में जिस तरह से एक महिला की छवि को धूमिल की गयी है, तथा कर्तव्यों के प्रति गैर जिम्मेदारी दिखायी गयी है, वे ना केवल पूरे महिला समुदाय के लिए शर्मनाक है, बल्कि महिला के रूप में तैनात सुरक्षा कर्मचारियों के कर्तव्यनिष्ठा पर भी सवाल उठाया गया है।

एक महिला अपने कर्तव्यों के प्रति जितनी जिम्मेदारी होती है और इस कर्तव्यनिष्ठा के लिए उनके अंदर जो समर्पण होता है, वह शायद ही किसी और के अंदर हो सकता है। यही कारण है, आज महिलायें घर और बाहर दोनों ही जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रही हैं। वास्तविकता देखें तो हम यह भलीभांति जानते हैं कि एक महिला, खासतौर पर भारतीय महिला की छवि त्याग, निष्ठा और समर्पण के लिए प्रसिद्ध रही है। फिर भी इस पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं की छवि को धाराशायी करने का प्रयास निरंतर जारी है।

यह कोई पहला विज्ञापन नहीं है जिसमें महिलाओं को इस प्रकार से चित्रित किया गया है, ऐसे अनगिनत विज्ञापन हैं जिसमें महिलाओं को परफ्यूम और अंतःवस्त्रों के विज्ञापन में खूशबू और ब्रांड के आगे अपने आप को पुरूषों के सामने समर्पित करते हुये दिखाया जाता है, उनका गलत तरीके से प्रदर्शन किया जाता है। ऐसे विज्ञापन सिर्फ महिलाओं की ही छवि को धूमिल नहीं करती बल्कि उस सभ्यता, संस्कृति को भी धूमिल करती है, जहां धन-समृद्धि, विद्या, शक्ति सभी चीजों के लिए महिला की पूजा की जाती है। हमारी जननी भी महिला है और जिस धरती पर हम पैदा हुये हैं, वे धरती भी महिला का ही रूप है। महिलाओं के इतने समृद्ध, दृढ़ और शक्तिशाली रूप के बावजूद कोई उन्हें परफ्यूम और अंतःवस्त्रों से प्रभावित होकर अपने-आप को समर्पित करते हुये कैसे दिखा सकता है? अगर इस रूप में महिलाओं का प्रस्तुतीकरण किया जा रहा है तो कहीं न कहीं हम इसे पितृसत्तात्मक समाज की साजिश कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।

हमारे देश में 8 मार्च, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है, जिसकी शुरूआत के पीछे मुख्य कारण रहा है, समाज में व्याप्त महिलाओं के प्रति असमानता को मिटाना और महिला-पुरूष को समान दर्जा देना। लेकिन एक महिला होने के नाते, खासतौर पर एक कामकाजी महिला होने के नाते अक्सर मैं यह  महसूस करती हूँ कि हमारा यह पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं की हर क्षेत्रों में मौजूदगी को बर्दाश्त करने में आज भी असहाय प्रतीत हो रहा है। महिला बाॅस को बर्दाश्त करना, उनकी आज्ञा मानना पुरूषों के जीवन में खलल पैदा करने जैसा है, साथ ही इससे उनके आत्मसम्मान को भी ठेस पहुँचाने जैसा भी है, जिसका बदला लेने के लिए पुरूषों को अक्सर महिलाओं अथवा महिला बाॅस के प्रति अश्लील बातें करते हुये सुना जा सकता है, उनकी चरित्र पर उंगली उठायी जाती है, उनका चरित्र हनन करने की कोशिश की जाती है और अंततः उन्हें वेश्या, कुल्टा आदि का दर्जा दे दिया जाता है और जिनके कारण महिला वेश्या और कुल्टा बनती हैं, वह नापाक करार कर दिये जाते हैं। इसी लिए पुरूषों के चरित्र हनन के लिए इस पुरूषवादी समाज में कोई शब्द भी नहीं व्याप्त हैं।

वर्तमान परिदृश्य पर हम नजर दौड़ायें तो हम देखते हैं कि आज की महिलायें प्रायः सभी क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी दर्ज कर चुकी हैं, जिसकी कुछ दशक पहले शायद कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। यह मौजूदगी महिलाओं के जूनून, जज़्बे और जोश का परिणाम है, जो उन्हें शून्य से चरम तक पहुँचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। घर की चार दीवारी से बाहर निकलकर पुरूषों के कंधे से कंधा मिलाकर चलना आज भी उतना सहज नहीं है, जितना सहज प्रतीत होता है। महिला होने का संघर्ष हमें हर मुकाम पर करना पड़ता है। पितृृसत्तात्मक सोच, नजरिया और मानसिकता लगातार महिलाओं को भेदती हुयी गुजरती है, जहां महिलाओं को अपनी तटस्थता का निरंतर परिचय देना होता है। इसी सोच को नतीजा है कि आज भी महिलाओं को अधिकांशतः भोग-विलास की ही वस्तु समझा जाता है। कभी उन्हें आयटम बना दिया जाता है तो कभी माल कहकर संबोधित किया जाता है या फिर उन्हें देवी बना दिया जाता है, किंतु आम इंसान की जिंदगी आज भी बहुत कम महिलाओं को नसीब होती है। इस बात को हम ’मी टू’ मुहिम, ’मेरी रातें, मेरी सड़कें’ मुहिम आदि से भली भांति समझ सकते हैं। या फिर निरंतर बलात्कार की शिकार हो रही महिलाओं को देख सकते हैं, जिसके आंकड़े में कमी आने के बजाय निरंतर उछाल ही आता जा रहा है। ऐसी मुहिम और घटनाओं के माध्यम से महिलायें पितृसत्तात्मक समाज में लगातार अपनी बराबरी के लिए ही संघर्षरत हैं। फिर भी आजादी के सात दशक बाद भी महिलाओं की स्थिति में बहुत सुधार नहीं देखा जा रहा है। उनकी स्थितियां बदली है, लेकिन उनका शोषण खत्म नहीं हुआ है, बस शोषण के स्वरूप में परिवर्तन प्रतीत होता है।

इस पुरूषवादी समाज में अधिकांश गालियां भी महिलाओं को केंद्र में रखकर ही बनायी गयी है। पुरूषों द्वारा जिस प्रकार की अभद्र महिला सूचक गालियों का प्रयोग किया जाता है, उससे भी हमे पुरूषों के मन में महिलाओं के प्रति विद्यमान नजरिये और इज्जत का स्पष्ट तौर पर पता चल जाता है।

महिला में पैदा होने के साथ ही हम कई बंदिशें भी अपनी जिंदगी में लेकर पैदा होते हैं, जिससे उबर पाना काफी मुश्किल होता है। इन बंदिशों के साथ-साथ हम सामाजिक भेदभाव भी लेकर इस धरती पर आते हैं जो हमें अक्सर कुंठा और मानसिक प्रताड़ना के शिकार बना देता है।

हमारे देश में महिलाओं के नाम पर लगातार विमर्श हो रहे हैं। उनके उत्थान हेतु महिला दिवस मनाकर गैर बराबरी मिटाने की पुरजोर वकालत की जा रही है, उनकी उपब्धियों को लगातार विश्व फलक पर उजागर किया जा रहा है। उन्हें आरक्षण दिया जा रहा है, किंतु अधिकांश सरकारी घोषणायें और योजनायें कागजों तक ही सिमट कर रह जाती हैं। महिलाओं को उनका उचित लाभ और अधिकार मिलना असंभव सा प्रतीत होता है, जिसकी वे हकदार होती हैं।

अतः हम यह कह सकते हैं कि स्त्री अथवा महिला विमर्श और महिला दिवस का औचित्य तभी सार्थक होगा, जब सामाजिक सोच में परिवर्तन होगा और महिलाओं को भोग विलास की वस्तु न समझकर, उन्हें देवी का दर्जा न देकर एक आम इंसान का दर्जा दिया जायेगा। साथ ही महिला दिवस पर खर्च किये जाने वाले सरकारी खजानों का प्रयोग उनके उत्थान में किया जायेगा।

लेखिका गुरू घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर (छ.ग.) में सहायक प्राध्यापक हैं |

मो.न.. 9406009605

 

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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