लोकसभा चुनाव

‘कुटमैती’ के नाम पर ‘कौम’ की राजनीति – अनीश अंकुर

 

  • अनीश अंकुर 

 

  बेगूसराय चुनाव: एक संस्मरण (भाग -5)

 

चाय की दुकान से हम सभी अजय के गाँव, बरौनी फ्लैग, गए।  पेड़ों की बहुतायत के बीच अजय का घर काफी अच्छा लगता है। मैं यहाँ पिछले वर्ष नवम्बर में आ चुका था। रामशरण शर्मा जन्मशताब्दी वर्ष पर हुए आयोजन में उस समय इतिहास के प्रोफेसर पटना से ओ.पी. जायसवाल और भागलपुर से के.के. मंडल साथ थे। तब  बरौनी के ही भक्तियोग पुस्तकालय में एक बड़ी सभा हुई थी। अजय जी का घर न सिर्फ बरौनी बल्कि बेगूसराय में कम्युनिस्ट पार्टी के लिए महत्वपूर्ण रहा है। अजय जी के पिता जिन्हें लोग छोटे बाबू कहा करते थे इस जिले के प्रारम्भिक कम्युनिस्टों में से थे। अजय जी ने बताया कि उनके पिता को कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य प्रख्यात इतिहासकार रामशरण शर्मा ने बनाया था। वहाँ एक दिलचस्प बात ये पता चली कि उनके पिताजी के पहले जो कम्युनिस्ट थे वे बेहद गरीब  थे, गाँव के दबंग लोग कुछ समझते ही नहीं थे, कोई सम्मान न था, कोई कुछ भी बोल देता था। इस कारण बकौल अजय जी ‘‘ आर.एस.शर्मा जैसे लोगों ने योजना बनाकर मेरे पिता जी को कम्युनिस्ट बनाया। उसके बाद कम्युनिस्टों की सामाजिक रूप से प्रतिष्ठत व्यक्ति के जुड़ने से बेमतलब की टीका टिप्पणी से निजात मिली।’’

ये बातें हो ही रह थी कि हममें से किसी ने कहा सभा का समय हो गया है। थोड़ी दूर पर ही फिल्म अभिनेत्री शबाना आजमी और प्रकाश राज की सभा होने वाली थी। बरौनी से पहले वाली सभा का लाइव  मोबाइल पर देखा जा रहा था। किसी ने कहा कि शबाना उस सभा में देर से पहॅंची है अतः यहाँ आते-आते भी देर होगी। इसी बीच बातें होती रही। फिर हम सभा के लिए चल पड़े। हमलोगों के पहुँचते – पहुँचते शबाना आजमी का भाषण समाप्त हो गया था। काफी बड़ी भीड़ जमा थी। अधिकांश युवाओं ने अपना मोबाईल निकाला हुआ था और भाषण को रिकॉर्ड कर रहे थे मौजूद लोग बेहद उत्साहित लग रहे थे। भीड़ में से कुछ लोग कन्हैया के आने के सम्बन्ध में पूछ रहे थे। प्रकाश राज बोल दक्षिण भारतीय टोन के साथ हिन्दी में बोल रहे थे रहे थे ‘‘ मै भी कन्हैया की माफिक एक गरीब माँ का बेटा है। लेकिन अब मेरे पास बहुत पैसा है। मेरा बच्चा लोग अमेरिका में पढ़ता है। लोग मुझे अब बड़ा आदमी कहता है। लेकिन कन्हैया मुझसे भी बड़ा है, बहुत बड़ा। मै खुद भी चुनाव लड़ रहा है बैंग्लोर से, निर्दलीय। लेकिन मै आज कन्हैया के लिए आया है। आप लोग भी वोट देकर उसे जिताइए। ’’ फिर वे वहाँ मौजूद लोगों से कन्हैया को वोट देने के लिए अपील करते हैं। नौजवानों का समूह सीटी बजाकर, हल्ला कर प्रकाश राज की बातों को रिस्पोंड करता है। प्रकाश राज अपना भाषण समाप्त करने लगते हैं। दर्शकों की ओर फिल्म का कोई डॉयलॉग सुनाने का ‘डिमाँड’ किया जाता है। प्रकाश राज अपनी आवाज में थोड़ा बेस लाकर बोलते हैं ‘‘ आटा माटी सटक ली ’’। ये डॉयलॉग मैं नन्हें भाँजों के मुख से पहले भी कई दफा सुन चुका था। ये बाहुबली फिल्म का डॉयलॉग था। हालाँकि मैं ये फिल्म नहीं देख पाया था

सत्येंद्र जी, जे.पी, गालिब कलीम और जफर एक साथ थे। सभा में कई पुराने लोग मिले। गम्भीर किस्म के कुछ लोगों को मुँह बाये कौतुहल वश पूरे नजारे को देखता पाया। सभा के बाद पूणे से आए एक बुजुर्ग  मिले जिन्होंने बताया कि वे कन्हैया के प्रचार में आए हैं। उन्होंने बताया कि वे 1970 में सोवियत संघ गए थे। वे डांगे की चर्चा करते बड़े लगाव के साथ करते रहे। कन्हैया एक उम्मीद लेकर आया है। उनका पुत्र उन्हें लेकर बेगूसराय आया था। ऐसे ही कई लोगों पर नजर पड़ी। दिल्ली में रहने वाले हिन्दी के प्रोफेसर अभय जी मिले जिन्होंने बताया कि चूँकि घर यहीं है लिहाजा छुट्टी लेकर चुनाव तक यही रहूँगा। ‘कशिश’ टी.वी. वाले सन्तोष जी पर नजर पड़ी। कुछ दिनों पूर्व वे कन्हैया पर एपीसोड चला चुके थे। लेकिन उनसे बात न हो पायी।

सभा में बड़ी संख्या में युवाओं को लाल गमझा अपने कन्धे पर डाले देखा। कन्हैया ने प्रचार के नये तरीके अपनाए थे। टी शर्ट, बैज, स्टीकर और लाल गमझा से मानो पूरा मैदान पटा पड़ा था। सत्येंद्र जी को  लाल गमझा बेहद पसन्द आया उन्होंने कहा गमझा खरीदा जाये। एक लड़के से पूछा तो उसने बताया कि मेरी खुद की दुकान है कई बार थौक के थौक मँगाया गया लेकिन सब खत्म हो जाता है। क्या भगवा गमझा भी है? उसने मुँह बनाकर उसका तो यहाँ कोई खरीददार ही नहीं है।

सभा वाली मैदान में हम देर तक मौजूद रहे वहाँ दो किशोर बच्चे साईकिल पर बैठे , कम्युनिस्ट हँसुआ बाली का सी.पी.आई.  का झन्डा  लिए, पूरे मैदान में इधर-उधर घूम जा रहे थे। साईकिल के कैरियर पर बैठक बच्चा झन्डा पकड़े था, साईकिल चलने पर झन्डा हवा में खूब लहराता दिखता। हमने सोचा बच्चे पर खेलवश झन्डा पकड़े हैं। उसे पास बुलाकर पूछा गया? कि ये झन्डा किसका है छूटते ही बोल पड़ा  ‘‘ कन्हैया का! वही जीतेगा!’’  नाम पूछने पर पता चला दोनों मुसलमान बच्चे हैं। जिनलोगों ने कम्युनिस्ट पार्टी के लिए अपना खून व पसीना दिया है, इस राजनीति को आपना वक्त दिया हो उसे उन बच्चों को झन्डा लहराने वाला दृष्य उमंग पैदा करता।

हमलोग ये बातें करते रहे कि बरौनी जहाँ हम हैं ये तेघड़ा विधानसभा क्षेत्र में आता है और कम्युनिस्ट पार्टी यहाँ 1962 से 2010 तक यानी लगभग 48 वर्षों तक यहाँ से कम्युनिस्ट पार्टी जीतती रही है।

सभा के बाद हम सभी गाड़ी से हम पाँचो बेगूसराय की आरे चल पड़े। जेपी ने गुंजन को फोन कर बेगूसराय दिनकर भवन मिलने के लिए कहा। गुंजन लगातार फेसबुक पर कन्हैया के पक्ष में लिखते रहे हैं। बेगूसराय पहुँचकर कार एक बाजार के एक संकरे रस्ते में फंस गयी। बड़ी जद्दोजहद के बाद हम किसी तरह दिनकर भवन पहुँचे। प्रवीण कुमार गुंजन से वहाँ देर तक बातें होती रही। उन्होंने हमें विभिन्न जातियों के समीकरण समझाने के साथ-साथ ये भी बताया कि लड़ाई टफ है और अन्तिम दो दिनों में काफी मेहनत करनी पड़ेगी। इसी पर सब कुछ निर्भर रहेगा। फिर गुंजन ने प्रस्ताव दिया कि चलिए हमारे घर। हम पाँचो उसके घर गए। गुंजन के कमरे में हम बैठे। उसका कैमरा रंगमंच के लिए मिले सम्मानों से भरा पड़ा था। रामगोपाल बजाज, राजेश जोषी, रतन थियम सहित ढ़ेंरों रंगमचीय शख्यीयतों के साथ गुंजन की तस्वीरें थी। रंगमंच सम्बन्धी किताबों की बड़ी लाइब्रेरी थी। पहले तल्ले से नीचे की ओर झांक कर गुंजन ने अपना रिहर्सल स्पेस दिखलाया। सबों को अच्छा लग रहा था। नाटक के लिए अपना रिहर्सल स्पेस होना, ये कोई सामान्य बात नहीं होती। मैं कई लोगों से गुंजन के रिहर्सल स्पेस के बारे में सुन चुका था, देखा आज पहली बार। गुंजन के कमरे में बैठक देर तक बेगूसराय के चुनावी हालात पर बातें होती रहीं। जैसे कि कम्युनिस्ट पार्टी के संगठन में दलितों-पिछड़ों के प्रतिनिधित्व का सवाल बनाम उनके मुद्दों के लिए संघर्ष का सवालों पर। सत्येंद्र जी ने अपने गया के उदाहरण से बताया कि पिछड़ों -दलितों की नुमाइंदगी की आड़ में सामाजिक न्याय की पार्टियों द्वारा सामंती शक्तियों से समझौते के खेल को भी हमें समझना चाहिए। पूरे बिहार भर में जो जमीनें कब्जा की गयीं उन पर दो लगभग हर जगह पिछड़े-दलितों को ही बसाया गया लेकिन वही लोग उसे उजाड़ने में भी लगे हैं। हम सभी इस बहस में षामिल रहे। गुंजन से रंगकर्मियों की ओर से कन्हैया के पक्ष में बयान जारी करने के लिए एक मीटिंग तय करने की भी बात तय हुई।

रात में हम देर तक बातें करते रहे। वहीं तनवीर हसन से सम्बन्धित दो दिलचस्प घटनाओं का पता चला। तनवीर हसन किसी नवाबनुमा मुसलमान के घर वोट माँगने गए। नवाब साहब ने उन्हें बड़ी इज्जत से घर में बिठाया ‘‘ आइए आइए तनवीर साहब। तशरीफ रखिए। कहिए कैसे-कैसे आना हुआ? ’’ तनवीर हसन ने कहा कि चुनाव में वोट  माँगने आया हूँ। नवाब साहब ने थोड़े व्यंग्य में कहा ‘‘ वोट माँगने आए हैं?’’ फिर उत्तेजित स्वर में पूछा ‘‘ कहाँ थे आप जब बारो जल रहा था?  रामनवमी के मौके पर जब बजरंग दल के लोग उन्माद फैला रहे थे तब तो आप नहीं दिखे थे। यही कम्युनिस्ट पार्टी के लोग, शत्रुध्न बाबू,  राजेंद्र सिंह जैसों ने हमारे घर में कई -कई रात रूककर हमारी जान बचायी। आप यदि हमारे अपने हैं तो लेकिन एक भी दिन आप पर नजर नहीं पड़ी? और अब चुनाव के वक्त वोट माँगने आ गए ?’’  तनवीर हसन को वहाँ से बैरंग लौटना पड़ा।

ठीक ऐसे ही एक और अनुभव स्थानीय कॉमरेड जुलम सिंह जिनका असली नाम चन्द्रभूषण सिंह था। मेरी उनसे भेंट भी हुई। तेघड़ा विधानसभा में तनवीर हसन की कोई रिश्तेदारी थी। जब वे उसके घर गए तो परिवार वालों ने कहा कि वे अपने दुकान पर हैं। तनवीर  अपने रिश्तेदार की दुकान पर गए जिसका नाम था ‘‘ हिन्द मेडिकल हॉल’’ । जुलम सिंह अपने ब्लडप्रेशर की दवा लेने उक्त दुकान पर गए। बकौल अजय जी ‘‘ जुलुम सिंह ने बताया कि वे दोनों पहले से किसी बात में मशगूल थे। ज्योंहि मैं दुकान पर पहुँचा दुकान वाला तेज आवाज में तनवीर हसन पर चिल्ला उठा ‘‘  कन्हैया देश की आवाज है। हम उसी को वोट देंगे। उसके नाम पर कोई समझौता नहीं। आपका इज्जत करते हैं। आपको खिलायेगे, पिलायेंगे लेकिन वोट की बात मत कीजिए। कुटमैती के नाम पर कौम की राजनीति मत करिए। ’’

अजय जी के घर पर पिछले पचास-बावन सालों से लाल झन्डा फहराता रहता है। अजय जी के बड़े भाई जो, कोल इंडिया में अधिकारी थे और कलकत्ता में रहते हैं, वे भी छुट्टी लेकर गाँव आए थे। वे बौलीवौल के राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रह चुके हैं। अपने गाँव में बौलीवौल खेलने वाले वे पहले बैच के खिलाड़ी थे। बौलीवौल में अजय जी भी प्रान्तीय स्तर के खिलड़ी रह चुके हैं। छोटे भाई विनय सिंह बिहारशरीफ में ट्रान्सपोर्ट में नौकरी करते हैं। घर की खेती बाड़ी सब विनय सिंह ही देखते हैं। उन्होंने अपने दोनों बड़े भाइयों के बारे में मजाक में कहा ‘‘ मेरे दोनों भाई घर में अतिथि की तरह ही आते हैं। सारा इंतजाम मुझे ही देखना पड़ता है।’’ कम्युनिस्ट पार्टी को लेकर विनय जी थोड़े क्रिटिकल थे,  पर सहयोग भी करते हैं। उन्होने कहा ‘‘ देखिए हम सच बात कहते हैं तो पार्टी के लोगों को जब्बूर (खराब)  लगता है।’’  विनय जी ने बताया ‘‘बेगूसराय में पार्टी बनाने में निस्संदेह सूरज नारायण सिंह की बड़ी भूमिका थी लेकिन जब वे वृद्ध हो गए तो अपने नजदीक चमचई करने वालों लोगों पर थोड़े निर्भर हो गए। उसमें कुछ ऐसे लोगों को उन्होने बढ़ावा दे डाला जो पूरी तरह कम्युनिस्ट न थे। इसका पार्टी को खामियाजा उठाना पड़ा।’’  अजय जी ने इसमें जोड़ा ‘‘ ऐसे ही एक व्यक्ति को जब सूरज बाबू ने टिकट देने का निर्णय, बगैर पार्टी की कमिटी से राय, ले लिया। जब विरोध होने लगा। तो मेरे पिता जी के पास आए फिर किसी तरह पिता जी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर मामले को दुरूस्त किया। अजय जी के पिता की मृत्यु हुए दो दशक से भी अधिक गुजर चुके हैं। लेकिन अगस्त माह में उनकी याद में हर वर्ष सलाना आयोजन होता है। उनके पिता जी ने कम्युनिस्ट पार्टी के लिए काफी निजी जमीन बेच दी थी

अजय जी की माँ हमारे गाँव के पूरब स्थित मशहूर गाँव कंचनपुर की थी। हालाँकि अब वो मगही भूल चुकी थी और बेगूसराय की भाषा में बात करती थी। उनके मामा मदन बाबू कंचनपुर के मुखिया भी हुआ करते थे। मैं उनका नाम सुन चुका था। वे भी कम्युनिस्ट थे लेकिन अपने अन्तिम दिनों में कम्युनिस्ट पार्टी से अलग हो गए थे। कंचनपुर के मुखिया मदन बाबू व हमारे गाँव अमहरा के मुखिया मिथेलश जी दोनों कम्युनिस्टों का बड़ा नाम था। दोनों सी.पी.आई में थे। मिथिलश जी अन्त-अन्त तक कम्युनिस्ट बने रहे। उनकी मौत इसी साल हुई है। क्या संयोग है कि मिथिलेश बाबू की ससुराल अजय जी के घर के बगल स्थित एक घर में था। उन्होंने वो घर भी दिखलाया ।

अजय जी के घर सुबह से लोगों का आना-जाना लगा रहता।  पार्टी के अंचल सचिव मोहन जी तो कई-कई बार आते। उनका घर ही बरौनी पंचायत- 3 का केन्द्र था। सुबह होते ही अजय जी व उनके बड़े भाई पार्टी के लोगों के साथ प्रचार में निकल जाते।

लेखक संस्कृतिकर्मी व स्वतंत्र पत्रकार हैं।

सम्पर्क- +919835430548, anish.ankur@gmail.com 

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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