चर्चा में

पी एम सी बैंक के बहाने

 

  • सतीश सरदाना

 

हम भारतीय यूटोपिया यानि स्वप्नलोक के वासी हैं। हम यकीन कर लेते हैं कि हमारा प्रधानमंत्री सर्वशक्तिमान, संसार का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति और स्वर्ग के राजा जैसा दिव्य और भव्य है। ईमानदार तो वह है ही। हमारा ईश्वर भी एक ऐसा चरित्र है जिसकी भार्या का अपहरण कर लिया गया था और जिसे छुड़ाने के लिए उसे वानर सेना की मदद लेनी पड़ी थी और उस अपहरणकर्ता के विरुद्ध युद्ध में उसका भाई मरते मरते बचा था।
हम भारतीय मान लेते हैं कि प्राइवेट बैंक जिनकी शाखाएं सरकारी बैंक के मुकाबले भव्य और कार्यकुशल होती हैं क्योंकि उसमें सुंदर और सभ्य लड़कियां लेटेस्ट फैशन का ऑफिस अटायर कैरी करती हैं और आप से सर सर करके पेश आती हैं। उसके मैनेजर फैंसी मैनेजमेंट कॉलेज ग्रेजुएट होते हैं और उन्हें ग्राहक सेवा और ग्राहक सेवा की बड़ी तमीज़ होती हैं इसलिए सरकारी बैंकों के बूढ़े, बदतमीज और ढीले ढाले स्टाफ के मुकाबले, सरकारी बैंक जिनका कंप्यूटर हमेशा खराब रहता है, पासबुक कभी पूरी नहीं करके देते, एहसान करके यदि किसी दिन पासबुक पूरी करके दे भी दें तो उसकी प्रिटिंग इतनी हल्की होती है कि पढ़ने के लिए बड़े लेंस की मदद लेनी पड़े,प्राइवेट बैंक में बचत खाता खोलना, फिक्स्ड डिपॉजिट करना अधिक सुविधाजनक और समय बचाने का माध्यम है। हमारे पढ़े लिखे और समझदार लोग प्राइवेट बैंकों का गुणगान करते नहीं थकते।

हमारे लोगों ने द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेजों की छत्रछाया के नीचे सुरक्षित जीवन गुजारा था और अंग्रेजों के जाने के बाद 72 वर्षों में से अधिकांश समय समाजवादी कांग्रेस के सरंक्षण प्राप्त बाजारवाद की छाया में जीवन गुजारा होता है। इसलिए हम जानते ही नहीं कि प्रधानमंत्री हमारी तुम्हारी तरह का एक व्यक्ति ही होता है जिसे हमसे वोट और पूंजीपतियों से नोट लेने के लिये तनी रस्सी पर चलने वाले नट की तरह संतुलन साधना होता है। उसका पूरा ध्यान रस्सी की कसावट और अपनी पकड़ पर होता है। उसे दर्शकों, यानि आम जनता के मनोरंजन और भोले अंधविश्वास की परवाह करनी होती है कि देखो नट कितना अधिक कुशल, साहसी और निडर है जबकि नट और प्रधानमंत्री कभी भी गिर सकते हैं और बैंक कभी भी फेल हो सकते हैं। नट, प्रधानमंत्री और बैंक सबको बाजार चलाता है। बाजार की चाबी हम लोगों यानि खुदरा ग्राहकों के हाथ में न होकर पूंजीपतियों के हाथ में होती है।

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पी एम सी बैंक या कोई भी अन्य बैंक प्राइवेट हो या सरकारी, सहकारी हो या राष्ट्रीयकृत सब हमारे दिए पैसे का बड़ा हिस्सा पूंजीपति को सौंप देते हैं। पूंजीपति को आसान शर्तों पर ऋण मिलता है और उस पर ऋण चुकाने की कोई जिम्मेदारी भी आयद नहीं होती क्योंकि पूंजीपति खुद ऋण नहीं लेता है, उसकी कंपनी ऋण लेती है। उसकी कंपनी भी इसलिए उसकी कंपनी है कि वह उस कंपनी का एम डी है, एम डी एक निश्चित वार्षिक फीस के बदले उस कंपनी का मुलाजिम भर ही है। कंपनी वास्तव में आपकी और हमारी ही है, आम जनता की ही है।यानि मोटा-मोटी आपने बैंक में अपना पैसा डिपाजिट किया, आपने ही कंपनी बनाकर बैंक से कर्ज ले लिया।आपने ही बैंक को कर्ज़ वापिस नहीं किया इसलिए बैंक डूब गया।आप अपने ही खिलाफ शिकायत किससे करेंगे।
हमारी भारतीय मध्यवर्ग कभी अध्ययन नहीं करता कि जिस बैंक में वह एक करोड़ तक पैसा डिपाजिट करने जा रहा है उसका बाजार पंजीकरण कितना है, उस बैंक ने पिछले वर्ष बैलेंस शीट में कितना लाभ दिखाया है, उसकी आस्ति की गुणवत्ता क्या है और उसके आय व्यय की गणना कितनी ईमानदारी से की गई है।हम भारतीय ग्राहक अपने बैंक की बैलेंस शीट का विश्लेषण करने की जरूरत ही नहीं समझते। ये सब बुरी आदतें हमें पहले अंग्रेजों ने और फिर कांग्रेस ने डाली हैं। सरंक्षणवाद के दौर की इन बुरी आदतों के चलते हमारे पढ़े लिखे लोग भी आर्थिक गड़बड़झाले को समझने के मामले में निरक्षर ही रहते हैं। इस लेख के माध्यम से लेखक का उद्देश्य इतना ही है कम से कम पढ़े लिखे लोग तो निवेश करते समय बैंक की वित्तीय सुदृढ़ता की तरफ़ एक नजरसानी कर लें।

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भारत में बैंकिंग उद्योग में तीन तरह के बैंक मौजूद हैं। एक तो सरकारी या अर्धसरकारी बैंक,जो अपेक्षाकृत विश्वनीय माने जाते हैं।दूसरे निजी बैंक जिनकी विश्वसनीयता उनकी लाभप्रदता पर आधारित है। तीसरे सहकारी बैंक जो सहकारी कानून द्वारा संचालित होते हैं। सभी तरह के बैंक (सहकारी बैंकों को छोड़कर)बैंकिंग कंपनी अधिनियम से संचालित होते हैं। बैंकों का उद्देश्य लाभ कमाना है। उनका अस्तित्व लाभप्रदता पर निर्भर है इसलिए भारत सरकार और विश्व की नियामक संस्थाओं ने कुछ नियम बनाए हैं जिनका पालन बैंक करते हैं:
1) पूंजी पर्याप्तता अनुपात
2) अनुपार्जक आस्तियां
3)प्रबंधन कौशल
4) आय प्राप्तियां
5)तरलता अनुपात
6) बाजार जोखिम के विरुद्ध संवेदनशीलता
7)प्रणाली का अनुपालन
इसके अतिरिक्त खुदरा निवेशकों को जोखिम से बचाने के लिए किए गए प्रबन्ध इनको कैमल्स रेटिंग के नाम से भी जाना जाता है। प्रत्येक निवेशक को इन सब आंकड़ों की समझ नहीं होती। अगर आप एक बैंकिंग कंपनी यानि उस बैंक की सभी शाखाओं में कुल मिलाकर एक लाख रुपये ही जमा कर रहे हैं तो आप को ज्यादा छानबीन की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर राशि बड़ी है तो बेहतर है कि आप छानबीन अच्छे से करें। आखिर आप लोग संपति में निवेश करते समय, कार खरीदते समय, जीवन बीमा खरीदते समय छानबीन करते ही हैं। फिर बैंक में पचास लाख रुपये डालते वक्त क्यों नहीं सोचते। मुंबई के सेठी जी जिनका नब्बे लाख रुपये पी एम सी बैंक में जमा था, इंजीनियरिंग ग्रेजुएट थे लेकिन उन्होंने ऐसी कोई जाँच-पड़ताल की थी ऐसी कोई संभावना नहीं लगती। पैसा फंसने के बाद मुसीबत में आये सेठी जी की हृदयाघात से मृत्यु हो गई। पीछे परिवार का क्या होगा?

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हर एक बैंक रिज़र्व बैंक के नियामक नियंत्रण के तहत हर वर्ष एक बैलेंस शीट और लाभ-हानि विवरण जारी करता है। लाभ हानि विवरण:आईये देखें इसे कैसे पढ़ा जाता है। एक तरफ आय दिखाई जाती हैं दूसरी तरफ खर्चे, आप देखें कि पिछले वर्ष के मुकाबले कितनी आय बढ़ी है या घटी है। यदि खुद समझ न आए तो किसी सी ए या बैंकर से सलाह ले सकते हैं। यदि आय घट रही है तो आप को सावधान हो जाना चाहिए।
दूसरे आप बैलेंस शीट में देखिए कि अस्ट्स यानि आस्तियां, उनकी गुणवत्ता क्या है। अर्थात उनमें से कितनी अस्ट्स नॉन परफोर्मिंग(एन पी ए) हैं। एपीएऐसी एसेट्स होती हैं जिन पर बैंक को कोई आय नहीं हो रही होती। इनकी वसूली भी संदिग्ध होती है। ये एसेट्स बैंक की लाभप्रदता को दो तरह से घटाती हैं। एक तरफ तो ये आय नहीं देती हैं दूसरी तरफ इनकी मूल राशि के विरुद्ध प्रोविजन करना होता है। यह प्रोविजन भी लाभ में से घटाया जाता है। अगर आप का बैंक ऐसा है जिसकी आस्ति गुणवत्ता खराब है तो मेरी सलाह यही है कि उस बैंक में एक लाख से ज़्यादा राशि न रखें।
बैंक में जो कैश रखा रहता है उसे बैंक की तरलता कहते हैं। इस तरलता में उस बैंक का पैसा जो दूसरे बैंक में करेंट एकाउंट में जमा है भी शामिल है।रिज़र्व बैंक इस तरलता अनुपात को नियंत्रित करता है। अभी सी आर आर अनुपात कुल जमा राशियों का चार प्रतिशत ही है। इसके अलावा एस एल आर 19.5 प्रतिशत है। ये दोनों मिलकर तरतला अनुपात बनाते हैं।कुल 23.5 प्रतिशत राशि ही ग्राहकों के लिए उपलब्ध होती है। बाकी 76.5 प्रतिशत राशि ऋणों और अन्य दीर्घकालिक निवेशों में लगा दी जाती है । अगर ऋण और दीर्घकालिक निवेश की राशि फंस जाए तो बैंक जमाकर्ताओ का सारा पैसा वापिस करने में असमर्थ होता है। अब प्रश्न उठता है कि क्या सारे जमाकर्ता इकट्ठे पैसा निकालने आएंगे। बाजार में अफवाह फैलने पर सारे ग्राहक नहीं तो पिचासी से नब्बे प्रतिशत ग्राहक पैसा निकालने पहुंच जाएंगे। बैंक के पास तो 23.5 प्रतिशत ही है इससे बैंक में भुगतान संकट खड़ा होगा। यहां से रिज़र्व बैंक और भारत सरकार का रोल शुरू होता है। यदि रिज़र्व बैंक और भारत सरकार आश्वस्त कर दे कि ग्राहकों का पैसा सुरक्षित है तो ग्राहक पैसा नहीं निकालेंगे। कांग्रेस सरकार ऐसा ही इतने वर्षों तक करती आई थी। लेकिन यह सरकार ऐसा नहीं कर रही है।
इसके दो कारण है:
1)पूंजीवादी व्यवस्था के तहत सरकारी हस्तक्षेप कम करना
2)इस रास्ते डिपाजिट इन्शुरन्स कंपनियों को बढ़ावा देना। अभी फिलहाल खुदरा ग्राहकों को एक लाख तक डिपॉजिट इन्शुरन्स उपलब्ध है। डिपाजिट इन्शुरन्स के प्रीमियम का बोझ आखिर उपभोक्ता पर ही पड़ना है।
अंत में लेखक का इतना ही कहना है कि बैंक ग्राहक का दायित्व है कि वह निवेश करते समय अपने बैंक की आर्थिक स्थिति का आकलन कर ले क्योंकि दिक़्क़त आने पर सरकार मदद को आगे नहीं आएगी।


लेखक वित्त, अर्थशास्त्र और सामाजिक विषयों के जानकार हैं|

सम्पर्क- +919911956389

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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