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कायम है भूख और कुपोषण की जकड़न – जावेद अनीस

 

  • जावेद अनीस

 

भारत में कुपोषण और खाद्य सुरक्षा को लेकर कई योजनायें चलायी जाती रही हैं लेकिन समस्या की विकरालता को देखते हुये ये नाकाफी तो थी हीं साथ ही व्यवस्थागत, प्रक्रियात्मक विसंगतियों और भ्रष्टाचार की वजह से भी ये तकरीबन बेअसर साबित हुयी हैं. दरअसल भूख से बचाव यानी खाद्य सुरक्षा की अवधारणा एक बुनियादी अधिकार है जिसके तहत सभी को जरूरी पोषक तत्वों से परिपूर्ण भोजन उनकी जरूरत के हिसाब, समय पर और गरिमामय तरीके से उपलब्ध करना किसी भी सरकार का पहला दायित्व होना चाहिये. 2001 में पीयूसीएल (पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज) द्वारा बड़ी मात्रा में सरकारी गोदामों में अनाज सड़ने को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गयी थी जिसे भोजन के अधिकार केस के नाम से जाना जाता है. इसमें संविधान की धारा 21 का हवाला देते हुए भोजन के अधिकार को जीने के अधिकार से जोड़ा गया. इस जनहित याचिका को लेकर न्यायालय में एक लंबी और ऐतिहासिक प्रक्रिया चली जिसके आधार पर भोजन के अधिकार और खाद्यान सुरक्षा को लेकर हमारी एक व्यापक और प्रभावी समझ विकसित हुई  है. करीब 13 सालों तक चले इस केस के दौरान सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये विभिन्न निर्णयों में खाद्य सुरक्षा को एक अधिकार के तौर पर स्थापित किया गया और भोजन के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिये केंद्र व राज्य सरकारों की जवाबदेही तय की गयी.

इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2013 में भोजन का अधिकार कानून लाया गया जिसे राष्ट्रीय खाद्य-सुरक्षा विधेयक 2013 भी कहते हैं. इस कानून की अहमियत इसलिये है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहला कानून है जिसमें भोजन को एक अधिकार के रूप में माना गया है. यह कानून 2011 की जनगणना के आधार पर देश की 67 फीसदी आबादी (75 फीसदी ग्रामीण और 50 फीसदी शहरी) को कवर करता है.

 

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून के तहत मुख्य रूप से 4 हकदारियों की बात की गयी है जो योजनाओं के रूप में पहले से ही क्रियान्वयित हैं लेकिन अब एनएफएसए के अंतर्गत आने से इन्हें कानूनी हक का दर्जा प्राप्त हो गया है. इन चार हकदारियों में लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), एकीकृत बाल विकास सेवायें (आईसीडीएस), मध्याहन भोजन (पीडीएस) और  मातृत्व लाभ शामिल हैं.

जाहिर है भारत में भूख और कुपोषण की समस्या को देखते हुये खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 एक सीमित हल पेश करता ही है, उपरोक्त चारों हकदारियां सीमित खाद्य असुरक्षा की व्यापकता को पूरी तरह से संबोधित करने के लिये नाकाफी हैं और ये भूख और कुपोषण के मूल कारणों का हल पेश नही करती हैं लेकिन अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद भारत के सभी नागिरकों को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में इसे एक बड़ा कदम माना जा सकता है.

आज राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून को लागू हुये करीब पांच साल हो रहे हैं.लेकिन पिछले करीब पांच साल के अनुभव बताते हैं कि इसे ही लागू करने में हमारी सरकारों और उनकी मशीनरी ने पर्याप्त इच्छा-शक्ति और उत्साह नहीं दिखाया है. नवम्बर 2016 में खाद्य मंत्री रामविलास पासवान द्वारा घोषणा की गयी थी कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू कर दिया गया है और इसी के साथ ही इस क़ानून के दायरे में देश के 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लगभग 80 करोड़ लोग आ गए हैं. साल 2013 में खाद्य सुरक्षा कानून के लागू होने के बाद राज्य सरकारों को इसे लागू करने के लिए एक साल का समय दिया गया था लेकिन उसके बाद इसे लागू करने की समयसीमा को तीन बार बढ़ाया गया और इसको लेकर कई राज्य उदासीन भी दिखे. दरअसल राज्यों द्वारा खाद्य सुरक्षा कानून को लागू करने में देरी का मुख्य कारण ढांचागत सुविधाओं और मानव संसाधन की कमी, अपर्याप्त बजट और लाभार्थियों की शिनाख्त से जुड़ी समस्याएँ रही हैं.

लेकिन सबसे गंभीर चुनौती इसके क्रियान्वयन की रही है, केंद्र और राज्य सरकारों के देश के अरबों लोगों के पोषण सुरक्षा जैसी बुनियादी जरूरत से जुड़े कानून को लेकर जो प्रतिबद्धता दिखायी जानी चाहिये थी उसका अभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है और उनके रवैये से लगता है कि वो इसे एक बोझ की तरह देख रहे हैं. पिछले साल यानी जुलाई 2017 में सरकारों के इसी एटिटूड को लेकर देश के सर्वोच्य न्यायालय द्वारा भी गंभीर टिप्पणी की जा चुकी है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह बहुत क्षुब्ध करने वाली बात है कि नागरिकों के फायदे के लिए संसद की ओर से पारित इस कानून को विभिन्न राज्यों ने ठंडे बस्ते में रख दिया है. राज्यों द्वारा इस कानून के क्रियान्वयन के लिये जरूरी ढांचों जैसे जिला शिकायत निवारण अधिकारी की नियुक्ति, खाद्य आयोग और सतर्कता समितियों का गठन, सोशल ऑडिट की प्रक्रिया शुरू नहीं की गयी है. अभी भी हालत ये हैं कि मार्च 2018 तक केवल बीस राज्यों द्वारा ही खाद्य आयोग का गठन किया गया है. जिला शिकायत निवारण अधिकारी की नियुक्ति के नाम पर भी खानापूर्ति की गयी है जिसके तहत राज्यों द्वारा कलेक्टर को ही जिला शिकायत निवारण अधिकारी के रूप में नियुक्ति किया गया है जबकि कलेक्टरों के पास पहले से ही ढ़ेरों जिम्मेदारियां और व्यस्ततायें होती हैं ऐसे में वे इस नयी जिम्मेदारी का निर्वाह कैसे कर पायेंगें, इसको लेकर सवाल है.

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून 05 जुलाई, 2013 को लागू हुआ था जिसके इस साल पांच साल पूरे हो रहे हैं. किसी भी कानून के क्रियान्वयन के लिये यह अरसा काफी होता है. ऐसे में यह मुफीद समय होगा जब सरकार और नागरिक संगठनों द्वारा अपने-अपने स्तर पर इसकी समीक्षा की जाये जिससे इन पांच सालों में हुये अच्छे-बुरे अनुभवों से सीख लेते हुये राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधनियम के मूल उद्देश्यों की दिशा में आगे बढ़ा जा सके.

भूख कुपोषण और किसानों के आत्महत्या के मामले में मध्य प्रदेश देश के शीर्ष राज्यों में शामिल है जबकि दूसरी तरफ स्थिति ये है कि मध्यप्रदेश लगातार पांच वर्षों से कृषि कर्मण अवार्ड जीतता चला आ रहा है.

अभी भी राज्य के राज्य में तक़रीबन 43 लाख बच्चे कुपोषित हैंजबकि करीब 10 लाख बच्चे तो अतिकुपोषण यानी मौत के दहलीज पर हैं जिसका मतलब है कि यदि समय रहते इनके स्वास्थ्य की समुचित व्यवस्था नहीं की गयी तो ये कभी भी दम तोड़ सकते हैं.

इसी सन्दर्भ में मध्यप्रदेश में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधनियम का क्रियान्वयन 1 मार्च 2014 से शुरू किया गया है. खाद्य सुरक्षा अधनियम के प्रावधानों के लागू लागू होने के बाद प्रदेश के हर ग्राम पंचायत में राशन दुकान खोलना जरूरी है लेकिन मध्यप्रदेश में प्रदेश की करीब साढ़े चार हजार ग्राम पंचायतें ऐसी हैं जिनमें अब तक राशन दुकानें नही है.

साल सामाजिक संगठन मध्यप्रदेश लोक सहभागी साझा मंच द्वारा वर्ष 2016-17 में मध्यप्रदेश राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून के क्रियान्वयन की जमीनी स्थिति को लेकर एक अध्ययन किया गया था जिसके अनुसार इस अध्ययन में शामिल 26 प्रतिशत परिवारों द्वारा बताया गया कि उन्हें सावर्जनिक वितरण प्रणाली से मिलने वाली राशन की गुणवत्ता खराब होती है जबकि 56 प्रतिशत परिवारों को इस बारे में जानकारी ही नहीं थी कि कि पी.डी.एस. की शिकायत कहाँ दर्ज की जा सकती है. इसी तरह से अध्यन में शामिल कुल 87 आंगनबाड़ियों में से 79 प्रतिशत आगनवाडी में शौचालय नहीं हैं जबकि 59 प्रतिशत आगनवाडी में बच्चों के लिये पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है. अध्यन के दौरान पाया गया कि कुल 109 शालाओं में से 93 प्रतिशत शालाओं में मेनू के हिसाब से मध्याहन भोजन नहीं मिलता है और 18 प्रतिशत शालाओं में तो बच्चों को नियमित रूप से मध्याहन भोजन भी नहीं मिलता है.

प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के क्रियान्वन को लेकर भी मध्यप्रदेश में लगातार अनिश्चितता की स्थिति रही. प्रदेश में यह योजना दो विभागों स्वास्थ्य विभाग और महिला एवं बाल विकास विभाग के बीच झूलती रही है.1 जनवरी 2017 को शुरू हुयी इस योजना के क्रियान्वन की जिम्मेदारी महिला एवं बाल विकास विभाग को दी गयी थी और फिर इसके दो माह बाद यह जिम्मेदरी स्वास्थ्य विभाग को सौंप दी लेकिन स्वास्थ्य विभाग की ओर से भी योजना का क्रियान्वन नहीं किया जा सका तो फिर से इसकी जिम्मेदारी महिला एवं बाल विकास विभाग को दे दी गयी गई। लेकिन महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा दूसरी बार भी इसका क्रियान्वन नहीं किये जाने पर एक बार फिर से इसकी जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग की दे दी गयी. अब 26 मई 2018 को महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा जारी परिपत्र के अनुसार एक बार फिर से इस योजना का क्रियान्वयन महिला और बाल विकास विभाग द्वारा किया जायेगा.

लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं|

सम्पर्क- +919424401459, javed4media@gmail.com

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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