सामयिक

कश्मीर को कश्मीरियत ही बचा सकती है – विनोद शाही 

 

  • विनोद शाही 

 

धारा 370 के कुछ प्रावधान हटाकर उसे कमजोर करने से कश्मीर अब अपने विशेषाधिकार खो बैठा है। इन विशेष अधिकारों का इतिहास हमें इस राज्य के लोगों की रजामंदी के महत्व को समझने की ओर ले जाता है। इन की मौजूदगी ने 1947 के उन हालात को अभी तक ज़िंदा बनाये रखा है जिनके तहत यहाँ के सीमान्त प्रदेशों के लोग यह तय करने के लिये आज़ाद हो पाते हैं कि वे भारत के साथ रहना चाहते हैं या नहीं। और यदि वे आजाद रहना चाहते हैं, तो भी उसमें उनकी रजामंदी सर्वोपरि हो जाती है। स्पष्ट है कि यह बात राष्ट्रवादी विचारधारा के बिल्कुल अनुकूल नहीं है, जिसका मूल सरोकार भारत की अखंडता है। यह अखंडता अब लोकचित्त में निर्विवाद रूप में स्वीकृत हो गयी है। इसका विरोध करने के लिये हमें राष्ट्रवाद को बहुसंख्यक हिन्दू का साम्प्रदायिक एजेंडा कहना पड़ता है। परन्तु उसके सह समांतर एक और तरह का राष्ट्रवाद भी है, जिसे विकल्प के रूप में पेश किया जाता है। वह भारत के संघीय ढांचे से जुड़ा राष्ट्रवाद है, जो भारतीयता को विविध संस्कृतियों की परस्पर पूरकता की तरह विकास करने वाली चेतना मानता है। कश्मीर के संदर्भ में हम इस सकारात्मक विकल्प को खोलने की बाबत अगर ज़रा सी उम्मीद भी रखते हैं, तो हमें अपना ध्यान कश्मीरियत पर केन्द्रित करना चाहिये। यह कदम ठीक है या गलत, इसे लेकर राजनीतिक क्षेत्र विभाजित हैं। परन्तु इधर या उधर खड़े होने से बात उलझती ही अधिक है। वह काम अपनी जगह महत्वपूर्ण है, परन्तु आप चाहे जिस कोण से विचार करें, रास्ता अगर निकला, तो कश्मीरियत की मार्फत निकलेगा।

जब कश्मीर का भारत में कुछ शर्तों के आधार पर विलय हो गया था, तो इसका सहज परिणाम यह होना चाहिए था कि वहाँ भारतीयता का संस्कृति के रूप में विकास होता और उसके तहत कश्मीरियत की बात केन्द्र में आती। परन्तु हालात ऐसे हुए कि बात तीनों संभव विकल्पों के लिए खुली रह गयी। कुछ लोग वहाँ आज भी पाकिस्तान में जाने की बात करते हैं। कुछ लोग आज भी आजाद होना चाहते हैं, जबकि बहुत से लोग भारतीय संघ में रहते हुए विशेषाधिकारों को गंवाये बिना विकास करना चाहते हैं। कश्मीर को इस असमंजस की स्थिति में डालने के लिए उन संप्रदायिक ताकतों की बड़ी भूमिका है, जो कश्मीर में कश्मीरियत तो चाहते हैं, पर भारतीयता के लिए कोई गुंजाइश नहीं पाते । लेकिन  उनके लिये कश्मीरियत भी अधिक महत्व नहीं रखती, जिनकी निगाह में मुस्लिम राज्य के रूप में कश्मीर के होने की बात सबसे ऊपर है। पर आज जब धारा 370 के कुछ प्रावधानों को हटाकर कश्मीर के विशेषाधिकार बहुत हद तक समाप्त कर दिए गए हैं, तो बात फिर से कश्मीरियत के विकास के आस पास आकर अटक गयी है।

कश्मीरियत को ठीक से समझें, तो पायेंगे कि इसके  इस ओर भारतीयता है और दूसरी ओर साम्प्रदायिक आधार वाले मुस्लिम राष्ट्र की परिकल्पना है। ऐसे मुस्लिम राष्ट्रवादी कश्मीर को भारत से आज़ाद कराने की बात अधिक ज़ोर शोर से करते हैं। अतः ठीक से देखा जाए तो यह समस्या मूलतः कश्मीरियत के ठीक से विकसित न होने या उसके नुमाया न होने की समस्या है।

जब हालात कश्मीरियत को कमजोर करने वाली ताकतों के अपनी अपनी सत्ता स्थापित करने की ओर रुख करते हैं, तो नुकसान कश्मीर का होता है। भौगोलिक रूप में अब किसी राष्ट्र के आजाद होने या भौगोलिक सीमाओं के बदलने की संभावनाएँ बहुत कम रह गयी है। फिर भी जब इस तरह की बातें जोर पकड़ती है, तो उनके पीछे वह साम्प्रदायिक सोच काम कर रही होती है जो यह मानती है कि बेहतर राज्य या राष्ट्र धार्मिक सांस्कृतिक आधार पर खड़े होते हैं, या होने चाहिए। तुलना के रूप में पंजाब का उदाहरण ले सकते हैं। पाकिस्तान समर्थित खालिस्तान को लेकर वहाँ जो आतंकवादी लहर पैदा हुई थी, उसके पीछे भी सिख धर्म के खालिस, श्रेष्ठ, पवित्र अथवा शुद्ध होने की बात पुनरुत्थानवादी तरीके से सामने आई थी। धर्म के आधार पर राष्ट्र अब तभी खड़ा हो सकता है, जब अन्य धर्म के लोगों को डरा धमका कर  वहाँ से दूर भगाने का इंतजाम किया जाता है। ऐसा करने से ही बहुमत में आ गए सम्प्रदाय की सत्ता बेरोकटोक चल सकती है। हमने देखा था कि पंजाब में धार्मिक संस्थाएँ इस आतंकवाद का केन्द्र बन गयी थी पर तब पंजाब में जो हालात थे उनसे उबरने के लिए पंजाबियत काम आई थी। अतः हम उस दौर के अपने उस अनुभव से कुछ सबक तो सीख ही सकते हैं।

पंजाब में हालात तब सुधरे, जब  सिख हिन्दू दोनों अपनी-अपनी पंजाबियत की हिफाजत के लिए आगे आए। पंजाबियत के केन्द्र में आने से बात साम्प्रदायिक आधार वाली मानसिकता से परे हटनी आरंभ हो गयी थी। पंजाबियत अपने आप में प्रदेश की संस्कृति के रूप में सामने आई जिसे हम भारतीयता की ओर आगे बढ़ने के लिए एक चरण के रूप में देख सकते हैं।

जहाँ तक साम्प्रदायिक आधार वाली चेतना का सवाल है, उसका भारतीयता में विलय सीधे रूप में संभव नहीं होता। उसका कारण यह है कि वह आपने प्रदेश मूलक आधार से अलहदा होकर शाश्वत या सनातन होने के भ्रम में जीने लगती है। उस लिहाज से देखा जाए तो सिखों का तीर्थ स्थान तो ननकाना साहब है, जो अब पाकिस्तान में रह गया है। परन्तु जब खालिस्तान बनाने की बात उठी थी, तो उसमें अपने राज्य को ननकाना साहब तक ले जाने की बात किसी आतंकवादी संगठन ने नहीं की थी, क्योंकि उन्हें पाकिस्तान से सहायता और समर्थन दोनों मिल रहे थे।। स्पष्ट है कि वह जो प्रदेश से जुड़ी जमीनी बात है उसका धार्मिक संप्रदायिक चेतना में लोप हो जाता है। इससे वह अपने तौर पर पाक और पवित्र होकर स्वयंभू और आत्म स्वायत्त हो जाती है। वह आत्म स्वायत्तता उतनी ही निरंकुश होती है जितनी कि कोई भी तानाशाह सत्ता संरचना।

अब हम इस्लाम की आत्म स्वायत्तता के कश्मीर में जड़ें जमाने की ओर की ओर लौटते हैं। जब वहाँ के अलगाववादी संगठन इसलाम केन्द्रित राज्य के निर्माण की बात करते हैं तो वह दरअसल अल्लाह पाक की सल्तनत के विस्तार की बात होती है। इस बात का कोई भी खुल कर विरोध नहीं कर पाता है। इसके आधार पर प्रदेश की संस्कृति को पीछे धकेलने में कोई कठिनाई नहीं होती। इसके आधार पर अन्य धर्म के लोगों को आप काफिर भी कह सकते हैं। इस का अर्थ यह है कि  जब साम्प्रदायिकता जोर पकड़ती है , सांस्कृतिक आधार में लौटना मुश्किल हो जाता है। उसके लिए फिर से एक राष्ट्र को राष्ट्र के रूप में सामने आना पड़ता है। यानी हमें एक ऐसे राष्ट्र की तरह वापसी करनी पड़ती है, जहाँ भारतीयता केन्द्र में हो।

अब 1947 के आसपास के हालात में लौटते हैं। उस समय जिस भारतीयता की बात हो रही थी, वह समावेशी भारतीयता थी। वहाँ हिन्दू मुसलमान से जुड़ा हुआ जो विभाजन था, उसने पाकिस्तान बनाया; परन्तु उसकी वजह से जो भारत इधर रह गया, वह समावेशी संस्कृति वाला भारत बनकर सामने आया। पाकिस्तान और भारत की परिकल्पना में यही बुनियादी फर्क है। कश्मीर का भारत में विलय उसी भारतीयता में प्रवेश था। उसकी परिकल्पना समावेशी थी, पर इस बात को बाद में अलगाववादी ताकतों ने सिर उठाने के बाद नजरअंदाज किया। अलगाववाद और आतंकवाद के भीतर सांस्कृतिक तानाशाही की निरंकुशता के बीज होते हैं। कश्मीर की ज़मीन में बो दिये गये ये बीज अब अंकुरित होकर जड़ पकड़ने लगे हैं।

अब हालात यह हैं कि भारत में हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना से जुड़ी हुई भारतीयता का उभार हुआ है।  भाजपा के द्वारा जब धारा 370 के कुछ अनुच्छेद हटाए जाने की बात सामने आई है, तो उसे बहुत से लोग हिन्दू राष्ट्रवादी साम्प्रदायिक प्रवृत्ति का उदाहरण मानते हैं। यह फर्क नजरिये का है। यदि इस कदम को भारतीयता के नुक्ते निगाह से देखा जाए तो इसका मकसद अलग हो जाता है।

सीधा रास्ता है, कश्मीर में कश्मीरियत का विकास करते हुए अंततः उसका भारतीयता में विलय। परन्तु यदि यह हिन्दू राष्ट्रवादी अवधारणा भर है, तो यह केवल दमनकारी तरीके से मुस्लिम समाज को दबाने या तबाह करने की भूमिका बनायेगा।  जहाँ तक भाजपा सरकार की बात है, उसका सही मूल्यांकन तो इतिहास करेगा। परन्तु हाल ही में हिन्दू राष्ट्रवाद से जुड़ी साम्प्रदायिक प्रवृत्तियों ने बार-बार सिर उठाया है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। हालांकि केन्द्र में बनी सरकार यह  प्रयास कर रही है कि वह स्वयं को भारतीयता से जुड़े समावेशी राष्ट्रवाद को मुखर बनाने के लिए काम करने वाली सरकार की तरह पेश करे। गृह मन्त्री अमित शाह ने धारा 370 के कुछ अनुच्छेद हटाने की बाबत जो घोषणा की, उसमें उन्होंनेयह कहा कि इससे कश्मीरियत और भारतीयता को विकसित होने का एक मौका मिल सकेगा और अलगाववादी एवं आतंकवादी संप्रदायिकता को पराजित करने में मदद मिलेगी। यहाँ यह बात भी गौरतलब है कि सरकार ने कश्मीरियत के विकास के लिए आधार इस बात को बनाया है कि वहाँ भ्रष्टाचार मुक्त शासन लाया जाएगा, जो प्रदेश के विकास के लिए प्रयास करेगा। जहाँ तक इन बातों के सीधे अर्थ है, वह समावेशी भारतीयता की नीति को लागू करने से जुड़े प्रतीत होते हैं। इनके निहितार्थ क्या है, इसको समय ही हमारे सामने लाएगा। यहाँ जो बात सबसे अधिक चिन्ताजनक है, वह यह है कि यह घोषणाएँ करते हुए भाजपा सरकार ने कश्मीर के लोगों से न तो राय ली और न उन्हें विश्वास में लिया। इसके बारे में उनका यह तर्क विचार करने लायक है कि यदि वे ऐसा करते तो अलगाववादी ताकतों को शह देने वाले पाकिस्तान की भूमिका के वहाँ परोक्ष परिणाम नकारात्मक हो सकते थे। यह आशंका निर्मूल भी नहीं है। इसलिए संचार व्यवस्था को पड़ोसी राष्ट्र से काटकर अब केवल वही के लोगों की आपसदारी से निकलने वाली राय तक पहुंचने के लिए हालात पैदा करने का प्रयास किया जा सकता है। यह सारा संकट नीयत का है। यदि नीयत साफ है तो यह प्रयास दमनकारी तानाशाही निरंकुशता को आधार बनाने वाले न होकर, हमें समावेशी भारतीयता के विकास की ओर ले जा सकते हैं।

तथापि पूरी समस्या के केन्द्र में कश्मीरियत के विकास का संकट है। उसे मजबूत करने की जरूरत पड़ेगी। वह कैसे होगा, उसके लिए कश्मीर की समृद्ध सूफी संतों की परंपरा की ओर देखा जा सकता है। वहाँ के साहित्य में भी भारतीय परंपरा और विरासत के मानवीय पक्षों को मुखर होने का बार-बार मौका मिला है। वहाँ बहुत बड़े बड़े नाथ योगी पैदा हुए हैं। वेदांत पर गंभीर विमर्श हुआ है। बड़े सूफी सामने आए हैं, जो मुल्ला मौलवी के संकीर्ण अलगाववादी साम्प्रदायिक तौर-तरीकों और प्रचार का खुलकर विरोध करते रहे हैं। उनकी विरासत का पुनरुदबोथन कश्मीरियत के विकास में मददगार हो सकता है। परन्तु क्या हमारे सत्ता पक्ष के लोग और भारत के बुद्धिजीवी इस संभावना की ओर देखना और इस पर काम करना अपनी ऐतिहासिक जिम्मेवारी समझेंगे ?  बात केवल पर्यटकों को सुविधा देने या उनके साथ जुड़ी आर्थिकता के द्वारा कश्मीरियों के बाकी सब से अच्छे रिश्तो के बने रहने की ही नहीं है। और न केवल वहाँ की स्थानीय विकास क्षमताओं को बेहतर परिणतियों तक ले जाने की है। वह सब तो होना ही चाहिये, पर इसे गहरा कर कश्मीरियत के विकास से जुड़ी सांस्कृतिक आधार तक ले जाना पड़ेगा।

 

लेखक हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक हैं|

सम्पर्क- +919814658098,

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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