मुद्दा

निषाद कल और वर्तमान : लोकतन्त्र में उसके सरोकार – सुशान्त मिश्रा

 

  • सुशान्त मिश्रा

 

विश्व की किसी भी संस्कृति का विस्तार करने वाले व उसके वाहक नाविक ही होते हैं, संस्कृति का बीज उन्हीं में छिपा होता है, भारत की संस्कृति को सूदूर दक्षिण एशियाई देशों व विश्व के कोने-कोने तक ले जाने वाले, सदियों तक भारत के व्यापारिक प्रभुत्व का परचम लहराने वाले निर्भीक नाविक ही थे, दुर्भाग्यवश भारत में निषाद समाज एक लम्बे समय से उपेक्षा का शिकार रहा है।

 

ब्रिटिश साम्राज्य 1857 की क्रान्ति के बाद भारतीय उपमहाद्वीप में अपने साम्राज्य को एक सांख्यिकी इकाई का स्वरूप देने का प्रयास करता है, जिससे वह अपने अधीन लोगों के ऊपर एक बेहतर नियंत्रण स्थापित कर सके। इस प्रक्रिया में दो तथ्य महत्वपूर्ण हैं, यह प्रक्रिया पश्चिम में उत्पादित ज्ञान का देशज ज्ञान के सीमित सहयोग से शक्ति एवं ज्ञान का सफल प्रयोग था, इस विषय पर मानवविज्ञानी एवं उपनिवेशवाद पर विद्वत लेख लिखने वाले बरनार्ड कोन ने फूको से बहुत पहले ही विस्तार से लिखा है कि उपनिवेशों में विशेषकर ब्रिटिश अधीन भारत में ज्ञान को किस प्रक्रिया से तैयार किया गया व देशज स्रोतों एवं देशज ज्ञान का प्रयोग कर पूर्वाग्रहित पश्चिमी परिस्थितियों का सम्राज्यवादी हितों के लिए निष्पादन किया गया, साथ ही साथ वे बताते हैं कि उपनिवेश मात्र सैन्यशक्ति द्वारा स्थापित नहीं हुए अपितु वह पश्चिमी ज्ञान व संस्कृति के अधिरोपण से भी शक्तिशाली एवं समृद्ध हुआ। उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में यह देखने मे आता है कि इस सांख्यकी प्रक्रिया का स्वरूप नृवंशविज्ञान का झुकाव लिए हुए है जिसके विषय में हमे बर्नार्ड कोन के शिष्य निकोलस डर्क्स अपनी पुस्तक ‘कास्ट्स ऑफ माइन्ड : कॉलोनिअलिस्म एंड द मेकिंग ऑफ मॉडर्न इंडिया’ में  विस्तार से जानकारी प्रस्तुत करते हैं कि कैसे सम्राज्यवादी हितों के लिए भारत में ‘एथनोग्राफी स्टेट’ खड़ा किया गया। भारतीय जनजातियों को उनकी बनावट, खानपान, जीविका, रहन-सहन, पहनावे के आधार पर चिन्हित किया गया एवं पश्चिमी समाज के मापदंड तथा उपनिवेश के दूरगामी हितों के आधार पर उन्हें क्रिमिनल घोषित कर दिया जाता है।

निषाद जनजाति जो कि भारतीय उपमहाद्वीप में कई उपजातियों में पायी जाती है, इसे भी सम्राज्यवादी शक्ति का दंश सहना पड़ा है। निषादों को एक लम्बी कष्टप्रद यात्रा करनी पड़ी है जिसका अन्त अभी भी लोकतन्त्र में मृगतृष्णा सा प्रतीत होता है। निषाद अपने जल-जीवन पर अधिकारों के लिए तो लड़ ही रहा है साथ ही साथ वह अपनी अस्मिता व पहचान की लड़ाई भी लड़ रहा है, जिसे वह अब अपनी राजनीतिक भागीदारी एवं गोलबंदी द्वारा प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहा है।

1896 में प्रकाशित ‘ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ द नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविन्स एंड अवध’ में विलियम क्रूक विस्तार से निषादों का विवरण प्रस्तुत करते हैं तथा उनके भौगोलिक स्थान को निर्दिष्ट ही नहीं करते अपितु विस्तार से उनकी उपजातियों का विवरण देते हैं। क्रुक बताते हैं कि विन्ध्य पर्वत के समीप मिर्ज़ापुर एवं वृहद क्षेत्र में निषाद जनसंख्या विद्यमान पायी जाती है । गरुड़ पुराण में भी निषाद जाति को विन्ध्य शैलनिवासिक बताया गया है (श्रीवास्तव निर्मला, निषाद केवट:परिवर्तन की ओर), रामायण काल में निषादों की राजधानी श्रृंगवेरपुर थी, इसी स्थान पर श्रृंगी ऋषि का आश्रम था जिन्होंने राजा दशरथ के आग्रह पर अयोध्या में पुत्रयेष्ठि यज्ञ संपन्न कराया था। निषादों के आत्म इतिहास लेखन में महाराज निषादराज गुह द्वारा आदिपुरुष राम को इसी स्थान पर गंगा नदी पार कराने का वर्णन हमें प्राप्त होता है जिसकी जानकारी हमे रामायण से भी प्राप्त होती है। निषादराज गुह को गले लगाकर राम ने भी उस समय काल के लिए भारतीय समाज को एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया होगा साथ ही साथ इतिहास दृष्टि से देखा जाए तो निषादराज गुह जो स्वयं एक विशाल क्षेत्र के स्वतन्त्र शासक थे जिन्होंने अयोध्या के राजकुमार की ओर अपनी मित्रता का हाथ बढ़ाया था, भारतीय संस्कृति के अध्याय में स्वयं में यह एक महत्वपूर्ण घटना रही होगी। निषाद आत्म इतिहास लेखन की प्रवृत्ति में उभार हमें कांशीराम के 90 के दशक के प्रतीक चिन्हों के आन्दोलन के समय से विशेष रूप से दिखता है। निषाद आत्म इतिहास में उनके शौर्य, गर्व, स्वाभिमान, त्याग एवं क्षोभ के प्रतीकात्मक पहलु विद्यमान रहते हैं, एक तरफ एकलव्य अपने गुरु के प्रति निष्ठावान हैं एवं त्याग के प्रतीक हैं तो बिना अंगूठे के चार अंगुली से धनुर्विद्या का कौशल दिखाता एकलव्य जरासन्ध की ओर से स्वयं कृष्ण से लड़ता है जो उनके शौर्य का प्रतीक है। वास्तव में निषाद समाज इन कहानियों को  पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी स्मृतियों में जीवित रख कर भारतीय संस्कृति पर अपने अधिकार का बार-बार भान कराता है तो दूसरी ओर भारतीय समाज में तथा इस जनतन्त्र में अपनी हिस्सेदारी की पेशकश करता है।

निषाद जिनकी उतपत्ति ‘निखाद’ से हुई है, जिसका धातुमूलक अर्थ है बैठने वाला या बैठाने वाला जिसे हम लोकभाषा में केवट या मल्लाह कहते हैं। ईसाई मिशनरी एवं नृवंशविज्ञानविद एम.ए. शेरिंग हिन्दुओं के धर्मान्तरण में जब असफल हो जाते हैं तो काफी हताशा में जैसा कि सभी शुरूआती मिशनरी जाति प्रथा से कुंठित व हताश रहे (डर्क्स,2002), तो उन्होंने बनारस में रह कर विभिन्न जातियों पर शोध शुरू किया, उनका मानना था कि ब्रिटिश आधुनिक मूल्यों, संस्थाओं व भारतीय अभिजात वर्ग के सहयोग तथा सार्वभौमिक ईसाई मत द्वारा भारतीय समाज को जाति की जंजीरों से बाहर निकाला जा सकता है, शेरिंग ने बनारस के मल्लाहों पर विस्तार से काम किया है जिसकी विस्तृत जानकारी हमें ‘हिंन्दू ट्राइब्स एंड कास्ट्स’ से मिलती है जो तीन खण्ड में लिखी गयी है। (एसा, डोरोन, 2008)

विलियम क्रूक महोदय ने निषादों (मल्लाह) की उपजातियों को इस प्रकार से बताया है बिंद, चाईं(मथुरा), धीमर, कहार, केवट, मुरियारी, सोरहिया, तियर, माँझी आदि। क्रूक महोदय प्रकाश डालते हैं कि कुछ उपजाति आज भी अपने पारंपरिक जीविका पर निर्भर हैं और कुछ खेती करने लगे हैं, कुछ पालकी ढ़ोने का काम करते हैं जो कहार कहलाते हैं, कुछ निर्माण का कार्य करते हैं जो बिंद कहलाते हैं तथा मथुरा के क्षेत्र में चाईं जाति के लोगों को ठग प्रवृत्ति का बताया है, हालाँकि कुबेरनाथ राय ने ‘निषाद बाँसुरी’ में बताया है कि चाईं उपजाति स्वयं को निषादों में सबसे श्रेष्ठ होने का दावा करती हैं। एसा डोरोन जिन्होंने वर्ष 2000 से लेकर 2008 तक बनारस के मल्लाहों पर गहन काम किया है, अपनी पुस्तक ‘कास्ट, ऑक्यूपेशन एंड पॉलिटिक्स ऑन दी गेंजस'(2008) में विस्तार से चर्चा करते हैं कि कैसे मल्लाहों को क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871 के अन्तर्गत कैसे लाया गया, वे बताते हैं कि चूंकि निषादों का खान-पान, उनकी व्यक्तिगत स्वच्छता तथा उनके समाज की महिलाओं को प्राप्त आंतरिक स्वतन्त्रता अंग्रेजों व उन भारतीय सेवकों जिन्होंने इन जातियों की जानकारी क्षेत्र- कार्य मे आकड़े इकट्ठा करने में अंग्रेजों की सहायता की उनके मानक अनुसार अनुचित था, इन सभी प्रवृति को आपराधिक श्रेणी में चिन्हित किया गया। मल्लाहों में बलि देने की कुछ घटनाओं को भी मानवशास्त्रीय सहित्य में विशेष स्थान दिया गया है। सड़क एवं रेल मार्ग के विकास से पहले भारतीय उपमहाद्वीप में जलमार्ग ही यातयात का उत्तम साधन था, उत्तर भारत मे व्यापार व वाणिज्य गंगा रूपी धमनी द्वारा ही सदियों तक उन्नत एवं समृद्ध बना रहा, औपनिवेशिक शासकों के लिए यह अत्यंत आवश्यक था कि वे अपने वाणिज्यिक हितों की रक्षा के लिए  नौपरिवहन पर सम्पूर्ण नियंत्रण स्थापित करें। बंगाल से आने वाले वाणिज्यिक मालवाहक नौकाओं की लूट व डकैती के भी विवरण हमे मिलते हैं जिसके पीछे बंगाल के बिंद, मल्लाहों एवं मांझियों का विद्रोह उनके जलजीवन में औपनिवेशिक अतिक्रमण का ही परिणाम था। निषादों को औपनिवेशिक आधिकारिक साहित्य में आपराधिक प्रवृत्ति का घोषित करके उन्हें अन्ततः 1871 क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट में सूचीबद्ध कर तथा गंगा रिवर नेविगेशन एक्ट 1867 द्वारा उनके जलजीवन व अधिकारों को नियंत्रित कर लिया जाता है।

फूलन देवी

स्वतन्त्र भारत में भी सरकार व समाज का रवैया अनुदार ही रहा है, 1981 के बेहमई कांड और फूलन देवी से जुड़े सामाजिक प्रतीक लोकतन्त्र में अन्तर्निहित द्वंद को दर्शाते है। हालाँकि इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि फूलन देवी के संसद पहुँचने व 1993 में एकलव्य सेना के गठन से निषाद समाज मे एक आत्म सम्मान व राजनैतिक जागृति का संचार हुआ है। निषाद जो कि मूलतः नदी, तालाब व पोखरों पर अपनी आजीविका के लिए निभर्र रहते हैं, उन्हें समय-समय पर सरकार के नियम व नीतियों का सामना करना पड़ता है। स्थानिय प्रशासन द्वारा मछली पकड़ने पर पाबंदी एक साधरण शिकायत रहती है। निर्माण कार्य में काम आने वाली बालू निदियों से ही प्राप्त होती है परन्तु निषाद समाज का इससे कोई विशेष आर्थिक सबलीकरण नहीं हो सका है। उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड क्षेत्र अपने कृत्रिम तालाबों तथा यमुना व उसकी सहायक नदियों से प्राप्त उत्तम बालू के लिए जाना जाता रहा है परन्तु आज बुंदेलखंड के तालाब जो एक समय निषादों के लिए जलकृषि के साधन थे वे इतिहास के पन्नों में ही दर्ज रह गए हैं तो दूसरी ओर यमुना की प्रमुख सहायक केन नदी सूखने की कगार पर है। केंद्र व राज्य सरकारों के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि वे निषादों को नदी परियोजनाओं से बाहर रख कर न देखें। नदियों की स्वच्छता व जीर्णोद्धार निषादों की भागीदारी के बिना सम्भव नहीं है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज भी निषाद नदियों पर अपने अधिकार व संसाधनों के लिए लड़ रहा है, लोकतन्त्र में हिस्सेदारी के लिए वह सजग तो हुआ है पर अभी भी उसके लिए राह आसान नहीं दिख रही है। राम को नदी पार कराने वाला निषाद आज इस जनतन्त्र के हाशिये पर खड़ा है उसकी नाव कौन पार लगाएगा? इस प्रश्न पर सरकार एवं समाज को अवश्य ही विचार करना चाहिए।

समाज विज्ञानियों का यह दायित्व है कि वे अध्यन करे कि क्या स्वतन्त्रता के बाद भारतीय लोकतन्त्र में हाशिये पर खड़े निषाद एवं अनेक जनजाति समूह जिन्हें 1952 में विमुक्त तो किया गया परन्तु क्या लोकतन्त्र व भारतीय समाज ने उन्हें स्वीकार किया है?

 

लेखक युवा इतिहासकार हैं और इन दिनों उत्तरप्रदेश के उपेक्षित समुदायों पर शोध कर रहे हैं।

सम्पर्क- +919559128991, sushant.1911@rediffmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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