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यूपी बिहार में गठबन्धन का नया गणित

  • योगेन्द्र

कांग्रेस को छोड़ कर सपा,बसपा और आरएलडी गठबंधन उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने जा रहा है। उनका अपना समीकरण है और उन्हें इन दलों के नेता मूर्त रूप देने जा रहे हैं। इस समीकरण ने पिछले दिनों मुख्यमंत्री आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री की सीट भाजपा से छीन ली थी। स्वाभाविक है कि वे इससे ज्यादा उत्साहित हैं। कांग्रेस से सपा बसपा ने दूरी बना रखी है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव में उन्होंने अपने अपने उम्मीदवार उतारे भी। कांग्रेस जीतने को जीत तो गयी, लेकिन सपा बसपा का साथ मिलता तो भाजपा की पूरी धुलाई हो जाती। इससे विपक्षी दल चूक गये।

कांग्रेस के लिए अच्छा हुआ कि उसको एक नेता मिल गया,जो अब चुनाव जिता भी सकता है। मध्य प्रदेश में विपक्षी एकता की संभावना भी प्रकट हुई, सपा के अखिलेश यादव और बसपा की मायावती ने बिना शर्त समर्थन की घोषणा की।इसका संदेश साफ है।जब केंद्र में सरकार बनाने का अवसर आयेगा तो यह गठबंधन कांग्रेस के साथ होगा, न कि भाजपा के साथ। हां, फिलहाल भाजपा समर्थक चैनलों को एक मुद्दा मिल जायेगा जिसे हर शाम वे चबाया करेंगे। उत्तर प्रदेश में बसपा या सपा को इतनी सीट नहीं मिल सकती कि कांग्रेस के कुल सीटों से ज्यादा हो। अगर विपक्षी गठबंधन की शर्त यही हो कि जिस दल को ज्यादा सीट मिलेगी, उसी दल का प्रधानमंत्री होगा तो कांग्रेस सबसे आगे होगी। कांग्रेस को काटकर अगर विपक्षी दल हराना चाहे तो फिलहाल कई तरह की मुश्किलें हैं। कांग्रेस को भी हर अवसर पर उदारता प्रकट करते रहना चाहिए जिससे बडे़ भाई होने का दावा कायम रहे।

इधर बिहार में भी एक खेल जारी है। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा महागठबंधन में शामिल हो गयी है और मौसम वैज्ञानिक भी पतरा दे रहे हैं। महागठबंधन में अब राजद,कांग्रेस ,रालोसपा,हम, वामपंथी पार्टी और शरद यादव की पार्टी शामिल है। कांग्रेस को यहाँ के विपक्षी दल अलग नही कर रहे हैं ,जबकि कांग्रेस बिहार में भी बहुत प्रभावी नहीं है। न ढंग के लीडर हैं, न जनाधार। नये खून का प्रवाह भी रूका हुआ है और नया खून आता भी है तो पुराने लीडर प्रदूषित कर देते हैं। हां,राजद के पास जनाधार है, एक हद तक रालोसपा और हम के पास भी। अगर महागठबंधन जीतता है तो राहुल गांधी को स्वीकारने में बहुत मुश्किल नहीं होगी। लालू प्रसाद के जेल में रहने से राजद की धार कम रहेगी, लेकिन तब भी वह प्रभावी होगी। जदयू इधर लगातार सक्रिय है। सभा सम्मेलन ,कमिटी आदि बना रही है। बीजेपी लगभग मौन है। उसे एकमात्र भरोसा नरेन्द्र मोदी पर है। उनके लीडरों में सत्ता का चस्का लग गया है और हाथ पैर भोथरे हो गये हैं। उसे जितना पाना था, पा लिया। बढ़ने की संभावना नहीं है। नीतीश कुमार के पलटने से महागठबंधन की सरकार गयी। लोग उनसे नाराज दिखते हैं, तब भी वे चुनाव में प्रभावी होंगे।

  • योगेन्द्र

लेखक वरिष्ठ प्राध्यापक, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रखर टिप्पणीकार हैं।

 

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

One thought on “यूपी बिहार में गठबन्धन का नया गणित

  1. ब्रज किशोर सिंह Reply

    सच है नितीश कुमार ने महागठबन्धन से निकल कर बड़ी गलती की पर उनकी भी मजबूरी थी। सालों मुख्यमंत्री रहने के बावजूद उनपर भ्र्ष्टाचार के कोई गम्भीर आरोप नही लगे तो फिर सिद्ध भ्रष्टाचारी के साथ कैसे रहते । नितीश जातिवादी नहीं, भ्रष्टाचारी नहीं, अहंकारी नहीं,बिहार को गुंडागर्दी, जातिवादी दलदल से निकालने वाले , बिहार को न्याय के साथ विकास की अवधारणा देने वाले एक राजनेता हैं जिसे समाज का हर समूह स्वीकारता है। सच कहूँ तो प्रधानमंत्री पद के लिए आज भी वही सर्वाधिक योग्य व्यक्ति है। अगर बिहार में एन डी ए जीतता है तो वह नितीश की जीत होगी मोदी की नहीं। मोदी तो बिहार में सर्वाधिक अलोकप्रिय है। बिहार चुनाव में उनके आने से एन डी ऐ के वोट प्रतिशत में गिरावट ही होगी।

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