सामयिक

न काहू से दोस्ती न काहू से बैर – राजीव चैटर्जी

 

  • राजीव चैटर्जी

 

पत्रकारिता का पैमाना काफी समय से बदल चुका है। अब हर माध्यम सिर्फ अपने विचारधारा के उपयुक्त खबरें चलाते हैं और सोशल मीडिया के योद्धा सही घटना को सामने लाते है। यद्यपि मिलावट यहाँ भी है। लेकिन अब सोशल मीडिया भी सेलेक्टिव होता जा रहा है। वो कबीर सिंह जैसे सिनेमाई चरित्र पे ज़्यादा लिखता है नाकि किसी दमित या वंचित महिला पे। हमें इस माध्यम का उपयोग ऐसी महिलाओं का आवाज़ बनाने पे करना चाहिए जिनको न्यूनतम मानवीय ज़रूरतो को पूरा करने के लिए किसी के अमित अत्याचार या दमित वासना का शिकार होना पड़ता है। पिछले दिनों नॉएडा मे एक घरेलु सहायिका की संदिग्ध अवस्था मे मृत देह दो सोसाइटी बिल्डिंग के बीच मे झूलती हुई मिली। क्योंकि वो एक गरीब युवती थी इसलिए मृत्यु को प्राकृतिक मौत घोषित कर दिया गया बिना समय गवाये। बिहार के रामनगर मे दो दिन पूर्व एक जघन्य घटना हुई जिसमे शौच करने गयी युवती के साथ सामूहिक बलात्कार के पश्चात स्तन काटने के उपरान्त हत्या की गयी। इस युवती के घर शौचालय निर्माणाधीन था। कितना दुर्भाग्य है इस देश का की जीवन इतना सस्ता है किसी युवती का, यौवन इतना खतरनाक है उसके लिए की वो नित्य कर्म करने के लिए भी जाए तो काल के गाल मे समां जाए। कोई ज़रूरत नहीं हमे आर्टिकल 15 के काल्पनिक गांव मे जाने की या काल्पनिक कबीर सिंह महाशय को कोसने की। जब तक एक घरेलु सहायिका को हम यौन उत्पिरन या मालिक के शोषण से मुक्ति नहीं दिलवा सकते, नित्य कर्म के लिए मजबूरी मे घर से निकलने वाली युवती की सुरक्षा नहीं कर सकते। सोशल मीडिया ने अरब क्रांति करवा दी लेकिन स्त्री सुरक्षा की बात आते ही हमारे समाज मे इसका चयनित उपयोग होता है जो एक खतरनाक प्रवृति है। एक वर्ग के लेखक दूसरे वर्ग या विचारधारा पे निशाना साध के खुश हो जाते है।

अनुच्छेद 370 के समाप्ति के बाद भी कोई स्त्री विचारक का लेख इस विषय पे ना आना मेरी बात को पुष्ट करता है। किस तरह से जम्मू कश्मीर प्रदेश की स्त्रियों को संपत्ति अधिकार से वंचित होना पड़ता था अगर वो अन्य प्रदेश् के किसी भारतीय पुरुष से विवाह करती थी। लेकिन अगर वो पाकिस्तानी पुरुष से विवाह करे तो उनको वंचित नहीं होना पड़ता। ये भी तो पितृसत्तात्मक अत्याचार हुआ ना? 350 पाकिस्तानी मूल की उन औरतो का भी कोई खबर नहीं आता जिनको विवाह पश्चात कश्मीरी पतियों ने छोड़ दिया और दोनों तरफ की सरकार ने भी। एक सिहरन पैदा करने वाली खबर मैं साझा करना चाहूँगा पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से जहाँ की गरीबी और दिवालियापन की खबरें मीडिया मे चटकारा लेकर दिखाया जा रहा है की कैसे वो गधों और कुत्तों को निर्यात कर के देश चला रहे हैं। अब वहाँ से पाकिस्तानी लडकियां भी सीपीइसी मे कार्यरत चीनी नागरिको के ज़रिये चीन निर्यात की जा रही है जिनका उपयोग कुछ समय देह व्यापार के लिए करने के पश्चात मानव अंगो की ज़रूरत पूरी करने के लिए की जाती है।

“जिनको ये विषय निरर्थक लगे वो याद रखे की बेटियों दोनों देशो की सांझी है, स्व. सुषमा जी के शब्दों में”

लेखक पेशे से अधिवक्ता और यौन कर्मियों के अधिकार के पैरोकार हैं|

सम्पर्क- +919300166733

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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