साक्षात्कार

मिथक अलग होता है तथ्‍य से – देवदत्‍त पट्टनायक

 

 

(लेखक देवदत्‍त पट्टनायक कहते हैं कि मिथकशास्‍त्र मानव मस्तिष्‍क का नक्‍शा होता है। संसार, जीवन और संस्‍कृति को समझने में यह आपकी मदद करता है। यह स्‍मृति पर आधारित विषयनिष्‍ठ ज्ञान होता है।)

 

भारतीय मिथकशास्‍त्र पर देवदत्‍त पट्टनायक से ऐसा सवान पूछना जिसका वे पहले जबाव न दे चुके हो, इसकी तुलना में घास के ढेर में से सुई खोजना कहीं ज्‍यादा आसान है। 40 से ज्‍यादा पुस्‍तकों, 1000 से ज्‍यादा लेखों और ढेर सारे वार्ता कार्यक्रमों के माध्‍यम से 48 वर्षीय देवदत्‍त जी ने बहुत सारे मिथकीय बिंदुओं का खुलासा किया है।

 

राजा रवि वर्मा की चित्रकारी के पीछे निहित परिवेश और चिंतन पर व्‍यापक प्रकाश डालने के सिलसिले में देवदत्‍त गत अगस्‍त माह के अंतिम सप्‍ताह में बेंगलुरु के राजा रवि वर्मा हेरिटेज फाउंडेशन में थे। देवदत्‍त ने दि हिन्दू के लिए इस उत्‍कृष्‍ट कलाकार पर और इनके अतिरिक्‍त अन्‍य विषयों पर भी प्रवीण सुदेवन के साथ बातचीत की। इस बातचीत का हिंदी उल्‍था यहाँ प्रस्‍तुत है –

राजा रवि वर्मा की कला के विषय में आपको क्‍या मंत्रमुग्‍ध करता हैॽ

यह कला लोकप्रिय है। मेरी रुचि इसमें है कि कैसे पुराने विचारों को आधुनिक भाषाओं में अभिव्‍यक्‍त किया जाता है। 19 वीं सदी में और शुरुआती 20 वीं सदी में ईश्‍वर ज्‍यादा मानवीय हो गये।

यह उनकी प्रस्‍तुति में एक बदलाव था। रवि वर्मा के बाद वे आपकी और मेरी तरह दिखने लगे। इससे पहले वे ऐसा नहीं दिखते थे।

उनकी आँखें बड़ी थीं और उसी प्रकार की दूसरी चीजें थीं … यह यथार्थवाद न था।

जिस तरीके से हम ईश्‍वरों को देखते थे, क्‍या राजा रवि वर्मा ने उस तरीके को बदल डालाॽ

     हाँ, कारण कि यह वह समय था जब नये कला विद्यालय उभरे। कला की संपूर्ण अवधारणा ही भारत में बदल गई। अंग्रेज चिंतन के नये रूप लेकर आये। चित्रकारी के नये प्रारूप उभरे। उनमें देह को देखने के नये तरीके थे। भारतीय कला सदैव प्रभाववादी थी। रवि वर्मा ने इसे स्‍वाभाविक बनाया।

 

ऐतिहासिक और मिथकीय सत्‍य अक्‍सर एक ही तरह पढ़े जाते हैं। इनकी उपशाखाएँ क्‍या हैंॽ

यहाँ सत्‍य की तुलना में ज्ञान ज्‍यादा उपयुक्‍त शब्‍द है। प्रत्‍येक व्‍यक्ति के तथ्‍यों पर आधारित ज्ञान इतिहास होता है। किसी व्‍यक्ति विशेष के तथ्‍यों पर आधारित ज्ञान मिथक होता है। मिथक तथ्‍य से अलग चीज होती है। ईश्‍वर, शैतान, स्‍वर्ग और नर्क गणितीय रूप से प्रमाणित नहीं किये जा सकते। इनमें से कोई अपना प्रमाण नहीं रखता।

मिथकशास्‍त्र अवधारणात्‍मक होता है। इतिहास जैसा कि हम जानते हैं, यह सिर्फ 150 साल पुराना है। प्रमाण आपको सिर्फ इतना ही बता सकते हैं। यह एक भिन्‍न तरीके से चीजों को समझने में आपकी मदद करता है। और मिथकशास्‍त्र स्‍मृति पर आधारित होता है। और क्‍या स्‍मृति मायने रखती हैॽ अगर यह नहीं रखती है, तो आदिवासी संस्‍कृति जीवित कैसे रहेगीॽ कारण कि उनके पास लिखित पाठ नहीं होते हैं। अगर आप एक बैगा आदिवासी व्‍यक्ति से पूछते हैं कि ‘संसार की उत्‍पत्ति क्‍या हैॽ’ और उनके जबाव बिग बैंग सिद्धांत से मेल नहीं खाते तो क्‍या आप उन्‍हें मूर्ख मानकर नकार देंगेॽ

महाभारत में, कम से कम उसके लोकप्रिय संस्‍करण में हमें सौ पुत्रों की माँ और विध्‍वंसक हथियार मिलते हैं। बहुत से राजनीतिक नेताओं ने इन काल्‍पनिक चीजों को विट्रो निषेचन और परमाणु हथियार सरीखे आधुनिक वैज्ञानिक आविष्‍कारों से यह दावा करते हुए जोड़ा है कि प्रचीन भारत में इनका अस्तित्‍व था।

आप इन व्‍याख्‍याओं को कैसे देखते हैंॽ हर संस्‍कृति के पास ऐसी कहानियाँ होती हैं। इन्‍हें वैज्ञानिक नहीं कहा जा सकता। लोग विज्ञान के साथ आस्‍था को लेकर भ्रमित हो जाते हैं। विज्ञान संदेह पर आधारित होता है और धर्म आस्‍था पर। आस्‍था और संदेह एक-दूसरे के विरोधी होते हैं।

वे सेब और संतरे हैं ; आप उन्‍हें एक ही टोकरी में नहीं डाल सकते। जो लोग इन कहानियों को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ते हैं, वे सिर्फ अपने पूर्वजों को लेकर सुख अनुभूति के लिए ऐसा करते हैं – यह सिर्फ उनके अहम् को सहलाता है।

 

मिथकशास्‍त्र में आपकी रुचि किसने पैदा कीॽ

मिथकशास्‍त्र मानव मस्तिष्‍क का नक्‍शा होता है। यह संसार को, जीवन और संस्‍कृति को समझने में आपकी सहायता करता है। मिथकशास्‍त्र का अध्‍ययन करना लंबे समय तक मेरी रुचि थी। बीस साल पहले इसने गंभीरता अर्जित कर ली।

मिथकशास्‍त्र के साथ आपकी मुठभेड़ कैसे हुई थीॽ

सामान्‍यत: अमर चित्र कथा और दूसरी चित्रकथाओं (कॉमिक्‍सों) से … । यह तो यों ही मैं इसे लेकर गहन अकादमिक अध्‍ययन में चला गया।

 

     क्‍या अमर चित्र कथा और टीवी कार्यक्रम भारतीय मिथकशास्‍त्र का सरलीकृत संस्‍करण प्रस्‍तुत करते हैंॽ

वे सिर्फ आपको कहानी सुनाते हैं। जादू तब घटित होता है जब आप इन कहानियों पर बातचीत करते हैं और उन्‍हें व्‍याख्‍यायित करते हैं जिसे एक चित्रकथा पुस्‍तक नहीं कर सकती। चित्रकथा पुस्‍तकें कहानी का सिर्फ पहला संस्‍तरण होती हैं। हम जो उनमें नहीं पाते, वे चीजें हैं – संस्‍तरणीकरण और अंत: संबद्धता।

लोग महसूस नहीं कर पाते कि परंपरागत रूप से इसे कैसे आख्‍यायित किया जाता है। जब एक माँ अपने बच्‍चे को कहानी सुना रही होती है तो वह उसके साथ अपनी भावनाओं, संवादों को भी जोड़ रही होती है और इसे दिन प्रतिदिन के जीवन से संबद्ध कर रही होती है। यही चीज एक चित्रकथा में से गायब रहती है।

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आपकी सोच के मुताबिक मिथकशास्‍त्र के लिए सबसे बेहतर दृष्टि क्‍या हैॽ

यह (मिथक) एक मनोवैज्ञानिक परिघटना होती है। यह वस्‍तुनिष्‍ठ नहीं होता है। यह रूपक सरीखा होता है। गणित में एक और एक दो होते हैं ; किन्तु कविता में ये ग्‍यारह हो सकते हैं। धर्म के विरुद्ध एक मुख्‍य तर्क यह है कि इसने पूरे मानव इतिहास में रक्‍तपात को बढ़ावा दिया है। क्‍या एक नास्तिक समाज प्रभावी ढंग से कहीं ज्‍यादा अहिंसक हो सकता हैॽ क्‍या वियतनाम का युद्ध धर्म आधरित थाॽ क्‍या पहले और दूसरे विश्‍वयुद्ध धर्म पर आधारित थेॽ धर्म युद्ध का कारण बनता है, यह विचार हमें किसने दियाॽ

धर्म के बिना लड़े गये युद्धों के बहुत सारे उदाहरण हैं। किसी ने हमें गलत पढ़ाया है। हम ऐसा क्‍यों सोचते हैं कि शिक्षाविद् झूठ नहीं बोलतेॽ

 

हमारे महाकाव्‍य दीर्घकाल तक मौखिक रूप से आगे बढ़े जब तक कि इन्‍हें पाठ की शक्‍ल में एक औपचारिक रूप नहीं दे दिया गया। इसकी परिणतियाँ क्‍या हुईंॽ

100 पाठ हैं जो ठीक-ठीक वाल्‍मीकि रामायण होने का दावा करते हैं। कुछ भी निर्धारित नहीं है। यह सिर्फ इस्‍लाम और यहूदी जैसे धर्मों में है कि तमाम विविधताओं को दूर हटा देने का सचेतन प्रयास वहाँ रहा। हिन्दू धर्म में ऐसा प्रयास नहीं रहा। यह तो अभी-अभी की बात है कि बाहर रहने वाले हिन्दू ऐसा करने का प्रयास कर रहे हैं।

प्रवीण सुदेवन द्वारा लिया गया देवदत्‍त पट्टनायक का यह साक्षात्‍कार मूलत: 30 अगस्‍त, 2019 के दि हिन्दू में छपा है।

 

(अनुवादक :– डॉ. प्रमोद मीणा, सहआचार्य, हिंदी विभाग, मानविकी और भाषा संकाय, महात्‍मा गाँधी केंद्रीय विश्‍वविद्यालय, जिला स्‍कूल परिसर, मोतिहारी, जिला–पूर्वी चंपारण, बिहार–845401, ईमेल – pramod.pu.raj@gmail.com, pramodmeena@mgcub.ac.in; दूरभाष – 7320920958 ) 

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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