समाज

मेरा गाँव बदल गया है -2 – रविशंकर सिंह

 

  •          रविशंकर सिंह

 

बदलते हुए गाँव का न केवल परिदृश्य बदला है,  बल्कि गाँव की तहजीब भी बदली है। हमारे पुरखों में जो बड़ों के प्रति अदब और संस्कार थे वे समय के अनुसार धूमिल होते जा रहे हैं। हाँ, लोग शिक्षित हुए हैं लेकिन ज्ञान का विकास नहीं हो सका है। मैंने अपने पुरखों के आचार – व्यवहार को देखा है और वर्तमान पीढ़ी के आचरण को भी देख रहा हूँ। वे लोग और वे दिन , जिन्हें अब लौटाया नहीं जा सकता, लेकिन उन्हें भुलाया भी नहीं जा सकता है।

मेरे दादाजी तीन भाई थे। तीनों भाइयों में कुल पाँच बेटे। इन पांचों में सबसे बड़े और सबसे छोटे को पढ़ने लिखने की पारिवारिक अनुमति प्राप्त थी। बीच वाले तीन भाइयों को लोअर प्राइमरी की शिक्षा देकर खेती गृहस्थी में जोत दिया गया। उनकी सोच थी कि घर के सारे बच्चे पढ़ लिख लेंगे तो 100 बीघा की खेती कौन संभालेगा ? सबसे बड़े बेटे को पढ़ाई लिखाई में रुचि नहीं थी। वे सवेरे सवेरे दही चूड़ा खाकर स्कूल के लिए निकलते तो जरूर थे, लेकिन स्कूल बहुत कम ही दिन पहुंचते थे। उन दिनों उन्हें जेब खर्च के रूप में रोज एक रुपैया मिलता था, जो दिन भर की मौज मस्ती के लिए काफी होता था। उन दिनों गाँव गाँव में स्कूल नहीं होता था। वे पढ़ने के लिए तीन चार कोस दूर घोड़े पर सवार होकर जाते थे। वे किसी पेड़ की छाया में घोड़े को बांध देते और अपने यार दोस्तों के साथ ताश खेलकर दिन बिता देते थे। स्कूल में छुट्टी  होते ही वह बकायदा घर वापस आ जाते थे। इस तरह एक दिन उन्होंने पढ़ाई लिखाई को तौबा कर दिया। वे संगीत के शौकीन थे। वे हारमोनियम , तबला डुग्गी, कलारनेट आदि का रियाज करते थे। दरवाजे पर प्राय:  रात में महफिल सजी रहती। दूर-दूर के नचनिया, भजनियाँ, कीर्तनियाँ  का तांता लगा रहता। अपने छोटे भाइयों पर उनका खूब रौब दाब रहता था। घर की बहुओं का क्या मजाल कि कोई घूंघट काढ़कर उनके सामने से गुजर जाए।  दरवाजे के आगे से पार करने के पहले बहुएं पता कर लेती थीं कि मालिक दरवाजे पर है या नहीं ?

घर के सबसे छोटे बेटे को हॉस्टल में रखकर मैट्रिक तक की विधिवत शिक्षा दी गई। सबसे छोटे काका के पिताजी का देहाँत हो गया था। टूअर हो जाने के कारण उनको परिवार का विशेष नेह- छोह प्राप्त था। मेरे पिताजी पढ़ने के लिए घर से भागकर अपनी बहन के यहाँ चले गए थे। वहाँ से उन्होंने मैट्रिक तक की पढ़ाई पूरी की। एक काका ने सातवीं तक पढ़ाई की थी। किसी कारण से एक बार वे घर से रूठ कर भाग गए। उन्होंने एक मारवाड़ी की गद्दी में हिसाब किताब करने का हुनर सीख लिया। उसके बाद उम्र के आखिरी पड़ाव तक वे वर्ष में एक बार 3 महीने के लिए एक सेठ की गद्दी में जाते थे और उनका हिसाब किताब करके घर वापस आ जाते थे। उन दिनों नगदी पैसा आने से घर को काफी आर्थिक बल मिला था। दो काका ने बाकायदा ऐडमिशन लेकर अमानत की  डिग्री ली थी। कालांतर में यह काम उनकी आजीविका का साधन बन गया था। काका बार बार कहते , ” आजकल खेती में क्या रखा है ? हम लोगों को घर से बाहर जाकर नौकरी करने की गुंजाइश होती तो कब का खेती छोड़ दिया होता। ”

अंततः भाइयों में पारिवारिक बंटवारा होना ही था और हुआ भी। बंटवारे के बाद भी मैंने अपने पिताजी के पांचों भाइयों को आपस में बहस करते हुए कभी नहीं देखा। परिवार में बड़े भाई का अदब था। सबसे छोटे भाई को तो मुंह खोलने की इजाजत ही नहीं होती थी। छोटा अगर कभी कुछ बोलना चाहता तो बड़ा उसे डांट देता , ” चुप रहो । आजकल तुम बहुत बोलने लगे हो। ”

छोटा चुप। जबकि छोटे काका भी बाल-बच्चे दार हो गए थे। अब ना तो संयुक्त परिवार रहा न तो वैसा आपसी मेलजोल। वह अदब तो परिवार से कपूर की तरह काफूर हो गया।

लेखक सेवामुक्त प्राध्यापक और हिन्दी के कथाकार हैं।

सम्पर्क-  +917908569540

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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