समाज

मेरा गाँव : बदलाव के कुछ कदम – प्रेमपाल शर्मा

 

  • प्रेमपाल शर्मा

 

पहले भूगोल : गाँव दीधी, परगना पहासू ,तहसील खुर्जा, जिला बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश। दिल्ली से 110 किलोमीटर। जीटी रोड के रास्ते से खुर्जा से निकलती एक पतली सड़क पर। आसपास मुगल सल्तनत के कुछ अवशेष। नवाब छतारी, नवाब पहासू में आज भी कायम। पास में 5 किलोमीटर पर बहने वाली नदी का नाम काली नदी। प्रदूषण के कारण अपने इसी नाम से कुख्यात। ऊपरी गंग नहर से दो बमबे उर्फ कैनाल मेरे गाँव को छूते हुए निकलते हैं। इसलिए कहीं से भी कुआँ खोदो, नल लगाओ बहुत शुद्ध पानी। पिछले कुछ दिनों से 2 किलोमीटर पर चीनी मिल खुल जाने के कारण पानी में प्रदूषण की शिकायतें आ रही हैं। कुल आबादी लगभग 4000। करीब 600 जादव, इतने ही ब्राह्मण, 400 के लगभग माली, 300 मुसलमान, तेली, कोरिया, भर भुजा, खटीक, गर्डिया आदि, 10 परिवार जमादार उर्फ हरिजनों के। गाँव में न एक ठाकुर और न जाट। हालांकि आस-पास के गांवो में जाट और ठाकुर पर्याप्त हैं। गाँव का नाम एक खत्री परिवार से जुड़ा हुआ है जो यहाँ के सबसे ज्यादा जमीनों के मालिक थे, जमींदार थे। अभी भी हैं उनकी हवेली इसका प्रमाण है। मुख्य सड़क से सटा हुआ और गाँव दिधी की सड़क पर अटेर ना और बैनेल जैसे गाँव का भी स्टैंड। आपको बता दें बनेल गाँव के रज्जू भैया भी थे। रज्जू भैया उर्फ राजेन्द्र सिंह हालांकि उनका गाँव से सम्पर्क बहुत कम ही रहा और उन्होंने न किसी रॉब के चक्कर में कोई विशेष अहमियत दी जैसा अमूमन राजनेता या उससे जुड़े लोग अपने नाम की नकली वाह-वाही के लिए करते हैं।

 

स्कूल/पुस्तकालय : दो सरकारी प्राइमरी स्कूल, मैं अपने जन्म से ही देखता आया हूँ। एक कन्या पाठशाला और दूसरे में दोनों। सन 2000 में प्रकाश चन्द्र प्रधान जीने दूसरे स्कूल में आठवीं तक की तीन क्लासें और जुड़वा दी। इससे आगे हम सब पढ़ने के लिए पास के कस्बे पहासू, करोरा गए। डिग्री के लिए खुर्जा। खुर्जा का कॉलेज बुलंदशहर के मुकाबले ज्यादा मशहूर रहा है हालांकि फिलहाल वह भी पतन के रास्ते पर है।

 

बदलाव के कदम : शिक्षा की बिगड़ती स्थितियों को देखते हुए वर्ष 2007 में एक स्कूल के कमरे में 8 अलमारी और लगभग 2000 पुस्तकों से पुस्तकालय की शुरुआत कराई थी। तत्कालीन जिलाधीश आलोक कुमार भी आए थे और आसपास के गाँव की जनता भी। बहुत भव्यता से शुरुआत हुई लेकिन 2 साल के अंदर ही नदी सूखने लगी। सूखने के कारणों पर जाएँ तो उत्तर भारत का पूरा समाज झांकने लगेगा। शुरू में और आज भी कुछ बुजुर्ग कुछ महिलाएँ किताबें ले जाती हैं, पढ़ती भी हैं विशेषकर रामायण, कल्याण और प्रेमचंद की कहानियाँ जैसी किताबें। लेकिन नई पीढ़ी उतनी ही दूर होती चली गयी। गहराई में जाने से पता लगा कि जिन स्कूलों में भी पढ़ रहे हैं वहाँ पढ़ाई चौपट हो चुकी है। कहने की जरूरत नहीं उत्तर प्रदेश की एक सरकार तो नकल कराने के घोषणा पत्र से सत्ता में आयी थी और उसके बाद स्कूलों का पतन आज तक नहीं रुका।

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने पिछले 2 वर्ष में कुछ कदम तो उठाए हैं लेकिन शिक्षा के स्तर पर बहुत मामूली सुधार ही हुआ है। किताबें पढ़ना छूट गया तो छूट गया। यहाँ दोष बच्चों का नहीं उस पूरे माहौल का है जहाँ शिक्षक स्वयं किताबों से दूर है और गाँव की जनता भगवती जागरण जैसे आयोजनों में ज्यादा सार्थकता समझती है। वह छूटते ही कहते भी हैं की पढ़ कर क्या होगा। नौकरी तो मिलेगी ना। कॉउ बालक को चिपकवा दो। नकल की इसी दौर में शिक्षकों की भर्ती भी लाखों रुपए के लेनदेन से हुई हैं इसलिए पढ़ने और किताबों की अहमियत उनके लिए भी वक्त की बर्बादी है। खैर बावजूद सबके जिस स्कूल पहासू से मैंने और मेरे छोटे भाई ने पढ़ाई की, आठवीं दसवीं, तक वहाँ भी लाइब्रेरी शुरू करायी। पास के कस्बे छतारी की स्कूल में भी, खुर्जा के दो और गाँव में, दो लाइब्रेरी मथुरा में और दो अलीगढ़ में भी। लेकिन एक सा ही है। एक बार मेरे साथ कथाकार संजीव थे गाँव में। उनका कहना था कि यह लोग चाहते हैं कि लाइब्रेरी भी आप खोलें और पढ़ भी आप ले। बस इन्हें नौकरी दे दीजिए। हाँ, गंगा गढ़ के स्कूल में जो बारहवीं तक है उसमें पुस्तकालय का भरपूर उपयोग हो रहा है।

दो कारण : एक तो लड़कियों की संख्या ज्यादा है और दूसरा प्राइवेट होने के कारण समय-समय पर शिक्षकों और बच्चों को नई किताबों के बारे में बताना समझना,आसान है। लड़कियों की लगन मेहनत और निष्ठा को देखकर उम्मीद बनती है। इन्हीं अनुभवों से गुजरते हुए बार-बार की कोशिश से कुछ परिणाम आने शुरू हुए हैं लेकिन इसका बहुत बड़ा श्रेय नए प्रधान श्री मनोहर लाल के बेटे अनुस कुमार को है। इस नौजवान ने ब्लॉक के सभी अफसर एसडीएम, बेसिक शिक्षा अधिकारी आदि से सम्पर्क साध कर दोनों स्कूलों की हूलिया बदल दी है। एक वक्त पर जो स्कूल लगभग बंजर हो गए थे 40, 40 बच्चे रह गए थे अब दोनों स्कूलों में प्रत्येक में 100 से ज्यादा बच्चे हैं। इस बीच बच्चों की माँ बाप को भी प्रोत्साहित करने के लिए कंबल स्वेटर डिक्शनरी ड्राइंग बॉक्स आदि देने से बच्चों की संख्या बड़ी है। अनुस के प्रयासों से शिक्षकों की संख्या पूरी हो गयी है और दोनों स्कूलों में मैं छोटी लाइब्रेरी भी शुरू हो गयी है।

सरकारी स्कूलों में ना आने के लिए सरकार और समाज समाज दोनों ही जिम्मेदार हैं। सरकार ज्यादा क्योंकि उसने अंग्रेजी के नाम पर स्कूलों को खूब बढ़ावा दिया है। जिस क्षेत्र में केवल सरकारी स्कूल थे अब वहाँ 10 गुना ज्यादा निजी स्कूल हैं और यह सिर्फ धन्धे के लिए हैं। अंग्रेजी माध्यम के नाम पर खूब फीस वसूल रहे हैं। दूसरा काम उन्होंने यह किया कि गाँव के बेरोजगार नौजवानों को अपने स्कूलों में तथाकथित शिक्षक बना लिया और उनके लिए ज्यादा बच्चे लाओ, ज्यादा तनखा पाओ। बस वे गाँव-गाँव मोहल्ले मोहल्ले से इन निजी स्कूलों के लिए बच्चे पढ़ने के लिए ले आते हैं।यही दौर सरकारी स्कूलों में कुव्यवस्था का रहा। कहीं-कहीं 5 क्लास ओं के लिए एक शिक्षक और कहीं वह भी नहीं। शिक्षामित्र से काम चलाया जा रहा है। खुर्जा के पास ही मुस्लिम बस्ती के पास 4 करोड़ की लागत से एक नया स्कूल बना है लेकिन छठी से बारहवीं तक के  स्कूल में केवल एक शिक्षक है। पिछले 3 साल से। बच्चे ऐसे माहौल को देखकर ही वापस लौट जाते हैं। एक शिक्षिका ने कोशिश करके नवी में बच्चों को दाखिल किया। ज्यादातर मुसलमान परिवारों की लड़कियाँ हैं और यही अब दसवीं में आ गयी हैं। शिक्षक बीच बैठता है। एक तरफ नवी क्लास, दूसरी तरफ दसवीं क्लास। यहाँ ऐसा बड़ा स्कूल खोलने की जरूरत ही नहीं थी क्योंकि उसके पास में आठवीं तक का सरकारी स्कूल पहले से ही है और 12वीं तक का भी बहुत दूर नहीं है। लेकिन कुछ वोट बैंक की मजबूरियों से पैसा झोंक दिया गया। बताते हैं कि जिला में बुलंदशहर में ऐसे दर्जन भर स्कूल हैं। एक तरफ निरक्षर आबादी और दूसरी तरफ इतने बड़े बड़े स्कूल सरकारी, गैर जिम्मेदारी की बदौलत खाली पड़े हैं।

 

नए तालाब : शायद उत्तर प्रदेश सरकार की एक अच्छी योजना के तहत सरकारी तालाबों को बढ़ावा मिला है और गाँव के जिस प्रधान या जिम्मेदार आदमी ने तालाबों के महत्व को समझा है उसमें गाँव दीघी  भी शामिल है। दो बहुत बड़े बड़े तालाब खोदे गए हैं मेरे गाँव में। क्षेत्रफल के हिसाब से कहे तो प्रत्येक 5 से 10 बीघे में। गंग नहर का पानी उनमें भर दिया गया है और एक तालाब में तो सिंघाड़ा की खेती भी शुरू कर दी गयी है। अभी हाल में 24 जुलाई को इन तालाबों के किनारे जामुन नीम पीपल आम वड, शीशम आदि के 300 पेड़ लगाए गए। पूरे गाँव में 2000 नए वृक्ष लगाने की योजना है। इसी में एक अच्छा कदम उत्तर प्रदेश सरकार का मेरी नोटिस में आया है और वह है हर गाँव में एक सफाई कर्मचारी की व्यवस्था। हमारे गाँव में काम करने वाला नौजवान राजस्थान का है। बहुत मेहनती इसी को पेड़ों में पानी लगाने की जिम्मेदारी भी दी गयी है। गाँव के एक तालाब में जलकुंभी ने कब्जा कर रखा था। उसे भी ग्राम प्रधान और दूसरे लोगों की मदद से साफ करके बढ़िया बना दिया गया है। इसका पूरा श्रेय नौजवान प्रधान को जाता है जिसने गाँव को मिले सरकारी पैसे का सही इस्तेमाल किया है। गाँव की कोई भी गली अब कच्ची नहीं है और न कहीं कीचड़ और पानी दिखता।

 

स्कूलों की व्यवस्था, तालाबों के निर्माण, पक्की गलियाँ आदि के कारण शासन की नजर में गाँव दीधी मॉडल गाँव के रूप में  उभरा है। इसका प्रमाण यह भी है कि 22 जून को बुलंदशहर के इसी गाँव से उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मंत्री स्वतंत्र सिंह (फिलहाल उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष) ने जल संरक्षण कार्यक्रम शुरू किया। जब मंत्री आए तो जिला अधिकारी समेत अन्य अधिकारी भी। वे भी स्कूलों की प्रगति से खुश नजर आए। इसी कड़ी में 1 जुलाई 2019 को बुलंदशहर जिले का सामूहिक विवाह कार्यक्रम जिला अधिकारी की देखरेख में दीधी में संपन्न हुआ। हालांकि मेरा व्यक्तिगत मानना है सामूहिक विवाह जैसी बातें समाज के आगे बढ़ने का संकेत नहीं है। इसका चाहे जो अर्थ निकाला जाए। हमें जनता को अपने पैरों पर खड़े होना सिखाना है, उन्हें शिक्षित करना है, उन्हें ऐसे स्किल काम सिखाना है जो हमारी अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है। उन्हें खेती के बेहतर तरकीब सिखाने की जरूरत है। दुग्ध उत्पादन, सब्जी फल उत्पादन के महत्व को समझाना है। 24 जुलाई  2019 को मेरे साथ गए पूर्व राजदूत अनूप कुमार मुद्गल का कहना था कि जिस क्षेत्र में ऐसा मीठा पानी है, जमीन उपजाऊ है, सड़क के किनारे बसा है, दिल्ली से बहुत दूर नहीं है, वहाँ ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने की जरूरत है। खेती को आधुनिक बनाने की जरूरत है पैदावार बढ़ाने की, चारों तरफ आम के घने बाग हैं, दूसरे पेड़ की भी कमी नहीं है, फिर भी बेरोजगारी। बदहाली का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है की बीच में आधा गाँव लगभग खंडहर में बदल चुका है। यानी जो लोग एक बार गाँव से शहर की तरफ गए वे लौटकर नहीं आए। वक्त आ गया है कि पढ़े-लिखे लोग लौटकर गाँव की तरफ देखें और देश के विकास के साक्षी बने। शिक्षा उस में पहला कदम होगा। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में विभूति नारायण राय भी ऐसे ही मिशन में जुटे हैं। कोलकाता के प्रोफेसर अमरनाथ जी भी हर वर्ष इसी उद्देश्य से उत्तर प्रदेश के अपने गाँव में कई तरह की शिक्षा संस्कृति की गतिविधियाँ करते हैं।

कुछ और योजनाओं की भी शुरुआत की गयी है गाँव में शराबबंदी उनमें प्रमुख है। 24 जुलाई को स्कूली बच्चों और गाँव वालों को शराब न पीने की शपथ या कहे कसम दिलाई गयी कि वे न पिएँगे न किसी को पीने देंगे। हमारे गाँव को बर्बाद करने के लिए शराब की भूमिका भी सरकार से कम नहीं रही। वहाँ उपस्थित जिला अधिकारियों से यह भी फरियाद की गयी कि खेल के मैदान बनाए जाएँ। युवा पीढ़ी के बर्बादी का कारण खेल संस्कृति आदि की सुविधाएँ न होना भी है। जरूरी नहीं कि सब किताब को ही रटे, अगर उनकी क्षमता खेल या दूसरे व्यवसायों में है तो उसे बढ़ानेने की जरूरत है। आश्वासन तो मिले हैं देखिए यह सुविधाएँ कब तक पहुँचती हैं।

वक्त आ गया है दिल्ली कोलकाता मुंबई में रहने वाले सभी प्रबुद्ध पढ़े-लिखे लोग अपने अपने गाँव को गोद ले। सब कुछ सरकार ही नहीं करेगी। एक कदम हम बढ़ाएँगे तो दो कदम सहयोग सरकार का भी मिलेगा। कुछ कुछ बदलाव मेरे गाँव में महसूस हो रहा है लेकिन मैं तो कहूँगा अभी दिल्ली बहुत दूर है।

 

लेखक पुर्व संयुक्त सचिव, रेल मंत्रालय और जाने माने शिक्षाविद है|

सम्पर्क-   +919971399046 , ppsharmarly@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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