बिहारलोकसभा चुनाव

मुजफ्फरपुर लोकसभा चुनाव और कुछ बातें

 

  • ब्रह्मानन्द ठाकुर 

 

मुजफ्फरपुर लोकसभा के लिए मतदान  5 वें चरण में  यानि 6 मई को होने हैं। इस बार यहाँ  एनडीए और महागठबंधन  के उम्मीदवार  चुनाव मैदान में आमने सामने हैं। दोनो प्रत्याशी एक ही जाति (निषाद समुदाय) से आते हैं। महागठबंधन ने  यहाँ से भीआईपी के डाक्टर राजभूषण निषाद को और एनडीए ने भाजपा के निवर्तमान सांसद अजय निषाद को  मैदान में उतारा है।  पिछले 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी  अखिलेश प्रसाद सिंह यहाँ से दूसरे स्थान पर रहे। उन्हें कुल 2 लाख 46 हजार 873 वोट मिले थे जबकि भाजपा के अजय निषाद  ने 4 लाख 69 हजार  295 वोट प्राप्त कर अपनी जीत दर्ज कराई थी। तब आज की तरह जदयू एनडीए  में शामिल नहीं था। विजेन्द्र चौधरी को जदयू ने इस सीट से अपना उम्मीदवार बनाया था और वे 85 हजार 140 वोट लाकर तीसरे नम्बर पर रहे। अब यही विजेन्द्र चौधरी कांग्रेस में शामिल होकर महागठबंधन का हिस्सा बन चुके हैं। दल बदलने में माहिर विजेन्द्र चौधरी को कांग्रेस का दामन थामने  के पीछे भी यही रणनीति काम कर रही थी कि पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी को दूसरे स्थान पर रहने के कारण इस बार यह सीट कांग्रेस के खाते मे जाएगी और श्री चौधरी को यहाँ से टिकट मिलेगा।  महागठबंधन में सीटों के तालमेल में वैसा नहीं हुआ और यह सीट भीआईपी  के हिस्से में चली गई और एक नया चेहरा डाक्टर राजभूषण चौधरी निषाद को यहाँ से महागठबंधन का प्रत्याशी घोषित कर दिया गया। डाक्टर राजभूषण चौधरी निषाद भीआईपी पार्टी के प्रदेश कोषाध्यक्ष बताए जाते हैं। वे खगडिया जिले के मूल निवासी हैं और रोसडा (समस्तीपुर)  में अपना क्लिनिक चलाते हैं। महागठबंधन से डाक्टर निषाद को प्रत्याशी घोषित करने के बाद   महागठबंधन के घटक दलों में उदासी  का आलम देखा जा रहा है। हालाँकि इस बारे में घटक दलों के नेता  खुल कर  कुछ भी बोलने से तो परहेज कर रहे हैं, लेकिन  प्रत्याशी चयन को लेकर घटक दलों में अन्तर्कलह  सतह पर आ गया है। वैसे भी महागठबंधन में शामिल राजद और कांग्रेस को छोड किसी दूसरी पार्टी का जिले में कोई ठोस जनाधार नहीं है। डाक्टर निषाद को मुजफ्फरपुर लोकसभा क्षेत्र से महागठबंधन का उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद हम पार्टी के एक नेता और पूर्वमन्त्री अजित कुमार की नाराजगी से भरी प्रतिक्रिया  अक्सर अखबारों की सूर्खियां बनती रही हैं। रालोसपा का जिला से लेकर प्रखंड और पंचायत स्तर पर कोई मजबूत संगठन  ही दिखाई नहीं दे रहा है। भीआईपी की भी कमोवेश यही स्थिति  है।  इस लोकसभा सीट से कांग्रेस के दावे को खारिज कर भीआईपी कोटे से उम्मीदवार दिए जाने से कांग्रेस खेमें मे भी उदासी का नजारा देखा जा रहा है। एक वरिष्ठ कांग्रेस कार्यकर्ता ने अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर  पार्टी  के प्रदेश नेतृत्व के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि प्रदेश नेतृत्व ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष को गुमराह कर दिया नहीं तो कोई कारण नहीं था कि मुजफ्फरपुर लोकसभा सीट कांग्रेस  के खाते मैं नहीं जाती। वे कहते हैं कि हमलोग पहले से ही मन बना चुके थे कि मुजफ्फरपुर सीट से इस बार कांग्रेस हर हाल में अपना उम्मीदवार  खडा करेगी। यहाँ  सम्भावित तीन उम्मीदवार का पैनल भी बन चुका था लेकिन प्रदेश नेतृत्व ने राजद के समक्ष घुटने टेक दिए। जिसका परिणाम हुआ कि यह सीट भीआईपी पार्टी के कोटे में चली गई।  उन्होने कहा कि बिहार में कांग्रेस को 15 सीटें मिलनी चाहिए थी। यदि ऐसा होता तो मुजफ्फरपुर लोकसभा सीट निश्चित रूप से  कांग्रेस के खाते में जाती। जाहिर है महागठबंधन में शामिल कांग्रेस के नेता व कार्यकर्ता ऊपर से भले ही अपनी पार्टी कै फैसले को शिरोधार्य करने  एवं एकजुटता की बात कहें लेकिन भीतर ही भीतर उनमें नाराजगी  का भाव स्पष्ट महसूस किया जाने लगा है।

मुजफ्फरपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत विधानसभा की बोचहा, कुढनी, औराई, गायघाट, सकरा और मुजफ्फरपुर छ:  सीटें हैं। इनमें भारतीय जनता पार्टी और राजद की अच्छी पकड है। सकरा, औराई, गायघाट विधानसभा सीट से राजद के क्रमश: लालबाबू राम, सुरेन्द्र कुमार और महेश्वर यादव  विधायक हैं जबकि कुढनी से भाजपा के केदार प्रसाद गुप्ता और मुजफ्फरपुर से भाजपा के ही सुरेश कुमार शर्मा विधायक हैं। बोचहा से बेबी कुमारी निर्दलीय चुनाव लडी थी और जीतने के बाद अब भाजपा  के साथ हैं।  इस लोकसभा क्षेत्र में मतदाताओं की कुल संख्या 17 लाख 29 हजार 313 है जिसमें 8 लाख 7 हजार 356 महिला और 9 लाख 19 हजार 433 पुरुष मतदाता हैं।

आइए, अब हम मुजफ्फरपुर लोकसभा सीट की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर एक नजर डालते हैं। आजादी के बाद 1952 के लोकसभा चुनाव में मुजफ्फरपुर नाम से  सात लोकसभा सीटें थीं। 1. मुजफ्फरपुर सेंट्रल, 2. मुजफ्फरपुर कम दरभंगा वन, 3. मुजफ्फरपुर कम दरभंगा टू 4.  मुजफ्फरपुर नार्थ – इस्ट, 5. मुजफ्फरपुर इस्ट 6.  मुजफ्फरपुर नार्थ – वेस्ट वन और  7.मुजफ्फरपुर नार्थ – वेस्ट टू। इस में मुजफ्फरपुर, वैशाली, शिवहर, सीतामढी, दरभंगा और मधुबनी जिले का क्षेत्र शामिल था। 1952 का पहला लोकसभा चुनाव मुजफ्फरपुर सेंट्रल लोकसभा सीट से प्रख्यात शिक्षाविद और बिहार विश्व विद्यालय के कुलपति श्यामनन्दन सहाय जीते थे। 1957 में  मुजफ्फरपुर लोकसभा क्षेत्र हुआ और  यहाँ से  फिर श्यामनन्दन सहाय निर्वाचित हुए लेकिन दुर्भाग्य से उनका निधन हो गया।  फिर  1957 में ही दुबारा उपचुनाव कराया गया जिसमें अशोक रंजीतराम मेहता (गुजरात) यहाँ के सांसद बने थे। इसके बाद  16 चुनाव अब तक हो चुके हैं जिसमे 10 बाहरी उम्मीदवार  यहाँ से चुनाव जीते हैं।

शुरू में यह लोकसभा क्षेत्र कांग्रेस का अभेद्य दुर्ग माना जाता था। 1952  से लगातार 1977 से पहले तक  यहाँ से कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार ही विजयी होते रहे। 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी ने कांग्रेस के इस अभेद्य दुर्ग को सफलता से वेध कर  इस पर अपना कब्जा जमाया, तब प्रख्यात समाजवादी और मजदूर नेता जार्ज फर्नांडिस (अब स्वर्गीय) तिहार जेल में बंद रहते हुए यहाँ से रेकार्ड मतों से चुनाव जीते थे। 1977 और 1980 के चुनाव में यहाँ  जनता पार्टी के उम्मीदवार जीते। इसके बाद  1989,1991, और 1996 के चुनाव में जनता दल ने इस सीट पर कब्जा जमाया। 1998 में राजद की जीत हुई। 1999, 2004 और 2009 मे यह सीट जदयू के कब्जे में रही।  कैप्टन जयनारायण प्रसाद निषाद यहाँ से 4 बार और जार्ज फर्नांडिस 5 बार जीत हासिल किए। 2014 के लोकसभा चुनाव में कैप्टन निषाद ने अपनी राजनीतिक विरासत अपने पुत्र अजय निषाद को सौंप  दी। तब  कांग्रेस  हुकूमत के प्रति मतदाताओं मे व्याप्त आक्रोश और मोदी लहर के प्रभाव का लाभ उठा कर अजय निषाद  इस लोकसभा  सीट से भारी मतों से विजयी हुए थे। उन्होने कांग्रेस प्रत्याशी अखिलेश  सिंह को लगभग सवा दो लाख मतों से पराजित किया था। इस बार भी  एनडीए प्रत्याशी के रूप में अजय निषाद  चुनाव मैदान मे पूरे दमखम के साथ डटे हुए हैं। इनका मुकाबला महागठबंधन के  डाक्टर राजभूषण चौधरी निषाद से  है।

आसन्न लोकसभा चुनाव में यदि जनता से सीधे जुडे उसके बुनियादी सवालों, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की बात  करें तो ऐसे सभी मुद्दे इस चुनाव  से गायब हैं। ऐसे मुद्दे विपक्ष के लिए इस चुनाव में कारगर  हथियार बन सकते थे किन्तु वहाँ भी इसकी चर्चा नहीं सुनाई दे रही है। इन पंक्तियों को लिखते वक्त  मतदान के मात्र तीन सप्ताह  बचे हैं, ग्रामीण क्षेत्रों के मतदाताओं में चुनाव की कोई सरगर्मी नहीं है।  चुनावी  चर्चा अखबारों और सोशल मीडिया तक ही केन्द्रित है, जिसके प्रति आम मतदाताओं की कोई खास रूचि नहीं होती। न तो कहीं चुनावी नारे सुनाई देते हैं न ही कोई पोस्टर-बैनर ही दिखाई दे रहा है। आम मतदाताओं की चुप्पी उम्मीदवारौं की नींद हराम करने वाली है। मुजफ्फरपुर  उत्तर बिहार का प्रमुख आर्थिक केन्द्र और बिहार की अघोषित राजधानी मानी जाती है फिर भी विकास के मामले में यह आज भी काफी पिछड़ा हुआ है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क  कृषि और रोजगार के लिए कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना इस चुनाव मे कोई मुद्दा नहीं बन पाया है। पिछले कुछ बर्षों  मे  मुजफ्फरपुर शहर का चौतरफा तेजी से विस्तार हुआ है जिससे अनेक समस्यायें भी पैदा हुईं है। इस ओर अब तक किसी  नेता का ध्यान नहीं गया है।

हालाँकि  महागठबंधन के घटक दल  इन्हीं स्थानीय मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाने की बात कह रहे हैं। लेकिन महागठबंधन के सहयोगी दलों (राजद को छोड कर) में अन्तर्कलह  चरम पर है। गायघाट के राजद विधायक महेश्वर प्रसाद यादव पहले ही  मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जता चुके हैं। उनका कहना है कि इस चुनाव में वे महागठबंधन के प्रत्याशी का समर्थन नहीं करेंगे।  उनके इस ‘समर्थन न करने’ का निहितार्थ यही है कि वे एनडीए प्रत्याशी का ही साथ देंगे। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से। उधर, एनडीए प्रत्याशी अजय निषाद  एवं उनके समर्थकों को इस बात का पूरा भरोसा है कि इस बार भी उनकी चुनावी नैया मोदी लहर  और राष्ट्रवाद के सहारे पार  हो ही जाएगी। बहरहाल इतना तो तय है कि तह लोकसभा चुनाव का परिणाम अगले साल होने वाले बिहार विधान सभा चुनाव की दशा और दिशा तय करने वाली साबित होगी।

लेखक साहित्यकर्मी एवं स्वतन्त्र पत्रकार हैं|

सम्पर्क- +919931668606, brahmanandmuz@gmail.com

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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