Democracy4you

मर्डर ऑफ डेमोक्रेसी

 

  • नवल किशोर कुमार

 

जानता हूँ कि आप मेरे इस कथन का विरोध करेंगे कि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी देश में लोकतान्त्रिक व्यवस्था का खात्मा कर देना चाहते हैं और वे ऐसा कर भी रहे हैं। संभव है कि आपके पास मेरे कथन के विरोध में कई सारे तर्क हों, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं अपनी बात न रखूं। इस देश का नागरिक होने के नाते मैं जो महसूस करता हूँ, वह कहने का अधिकार तो है ही। कम से कम तबतक जबतक कि भारत का संविधान बदल न दिया जाय।

चलिए कुछ उदाहरणों से समझते हैं कि कैसे एक-एक कर नरेन्द्र मोदी ने लोकतान्त्रिक व्यवस्था को तार-तार कर दिया है और हालात यह हो गया है कि देशवासियों के मन में सरकार के प्रति विश्वास कम होता जा रहा है। परेशानी यह है कि शुरूआत कहाँ से की जाय। लोकतन्त्र में सबसे महत्वपूर्ण संसद है। इस बार जो लोकसभा चुनाव हुआ, उसमें नरेन्द्र मोदी सर्वशक्तिमान बनकर उभरे। कहना गलत नहीं कि देश के सभी सीटों पर चुनाव नरेन्द्र मोदी बनाम अन्य ही हुआ। यहाँ तक कि भाजपा के सांसद भी जो जीते हैं, वे इससे इन्कार नहीं कर सकते हैं कि चुनाव में मिली जीत उनकी जीत नहीं बल्कि नरेन्द्र मोदी की जीत है। आप कहेंगे कि इससे क्या परेशानी है आपको?

परेशानी है मेरे दोस्त। ऐसे सांसद जनप्रतिनिधि तो बिल्कुल भी नहीं हैं। वे मुखौटे मात्र हैं। उनके पास न तो जुबान है और न ही जुबान रखने की कोई जरूरत। मुझे लगता है कि वर्तमान संसद के इस रूप पर जो मेरी मान्यता है, देश में ऐसे लोग बड़ी संख्या में हैं जो इससे सहमत हैं अथवा होंगे। वैसे भी विपक्ष के बगैर संसद का क्या महत्व। फैसला चाहे पीएमओ में हो या फिर संसद में। कोई फर्क नहीं पड़ता है।

संसद को छोड़िए सड़क पर चलते हैं। अभी हाल ही में सरकार ने नया ट्रैफिक कानून बनाया है। सरकार की नीति दंड के सहारे लोगों को सभ्य बनाना है। लेकिन हो क्या रहा है, यह देखने के लिए सड़क पर जाइए। लोगों के चेहरे पर खौफ है। क्या लोगों को खौफजदा रखना लोकतान्त्रिक सरकार की सफलता है? यह सवाल आप लोगों के लिए। मैं तो एक दूसरी तस्वीर देख रहा हूँ। एक वीडियो वायरल हुआ है। लोग एक पुलिस वाले पीट रहे हैं। वजह यह कि उसने हेलमेट नहीं पहना। एक दूसरा वीडियो है जिसमें एक पुलिसकर्मी गुंडा स्टाइल में अपनी मोटरसाइकिल पर चला आ रहा है। एक नौजवान उससे पूछता है कि हेलमेट क्यों नहीं पहना। नोंक-झोंक देखते-देखते मां-बहन तक पहुंच जाती है। पुलिस वाला गुंडा नौजवान का कॉलर पकड़कर उसे घसीटता है। नौजवान वर्दी वाले गुंडे का विरोध कर रहा है। फेसबुक पर एक पोस्ट में केन्द्रीय मन्त्री नीतिन गडकरी बिना हेलमेट पहने स्कूटी चला रहे हैं। किसी ने उन्हें मां-बहन की गाली दी है।

इसका मतलब क्या है? जरा सोचिए।

हो यह रहा है कि सरकार का इकबाल खत्म हो रहा है। पूरा देश अराजक हो रहा है। मैं दावे के साथ तो नहीं कह सकता लेकिन अनुमान जरूर लगा सकता हूँ कि यदि नरेन्द्र मोदी भी बिना हेलमेट के सड़क पर उतर गए तो लोग उनको घेरकर पीटेंगे तो नहीं (या हो सकता है कि पीट भी दें, लोगों के मुंह को स्वाद मिल चुका है) गालियाँ जरूर देंगे।

सबसे अधिक नुकसान अदालतों को पहुंचा है। पटना हाईकोर्ट के एक जज राकेश कुमार ने तो इसे स्वीकार भी किया है। इसके पहले पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों (इनमें से एक आज चीफ जस्टिस भी हैं) ने सर्वोच्च अदालत में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर किया।

चुनाव आयोग की निष्पक्षता खत्म हो चुकी है। लोकसभा चुनाव के दौरान इसके कई प्रमाण सामने आए। आज देश भर में ईवीएम पर सवाल उठ रहे हैं। आप कहेंगे कि यह विपक्षियों की चाल है। लेकिन सवाल तो हैं और सवालों को जन्म किसने दिया है? सीबीआई और ईडी का उपयोग अपने राजनीतिक दुश्मनों को जेल में बंद करने के लिए किया जा रहा है। यह केवल मेरा मानना नहीं बल्कि ऐसा मानने वाले लोग बड़ी संख्या में हैं। रिजर्व बैंक की साख भी गिर चुकी है। रंगराजन से लेकर उर्जित पटेल तक उदाहरण हैं। कुछ खास कहने की जरूरत महसूस नहीं हो रही। अर्थव्यवस्था की तस्वीर देखनी हो तो निर्मला सीतारमण की तस्वीर देख लिजीए। तेज बड़ी तेजी से गायब हो रहा है।

आखिर में सवाल सेना को लेकर। चलिए सेना पर सवाल नहीं करते हैं। देश में सेना की हुकूमत है। यही मान लेते हैं। नहीं मानने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं। विकल्प है भी तो मेरे बाल-बच्चे हैं। उनके लिए रोटियाँ कमानी हैं मुझे।

 

लेखक फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली के सम्पादक (हिन्दी) हैं|

सम्पर्क-  naval4socialjustice@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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