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‘मोदी समय’ और एक आकांक्षावान भारत का उदय – संजय द्विवेदी

 

  •  संजय द्विवेदी

 

नरेन्द्र मोदी सरकार ने पाँच साल की यात्रा पूरी कर एक बार फिर केन्द्र की सत्ता में शानदार वापसी की है। काल के प्रवाह में पाँच साल क्या होते हैं, शायद कुछ भी नहीं।  किसी भी देश का इतिहास इतने कम सालों में न तो बनता है, न बदलता है। राजनीति भी इतने कम समय में किसी परिणामकेंद्रित बदलाव का वाहक बन सकती है, कहना कठिन है। फिर भी बदलाव के सूत्र, आहटें, पदचाप और नीयत को महसूस करने के लिए पल भर का समय भी बहुत होता है। ‘नरेन्द्र मोदी परिघटना’ भारतीय राजनीति में इसलिए लम्बे अरसे तक महसूस की जाएगी, क्योंकि उसने राजनीति के बने-बनाए मानकों, खांचों और चौखटों को बदलकर रख दिया है। मोदी दरअसल देश की आकांक्षाओं के प्रतिनिधि बन गए हैं और उन्हें सामान्य शब्दों में ‘सपनों का सौदागर’ भी कहा जा सकता। यह चुनाव मोदी को वास्तविक नेता के रूप में स्थापित कर रहे हैं, क्योंकि पिछली बार की उनकी सफलता यूपीए सरकार, उसके प्रधानमन्त्री की विफलता व सरकार विहीनता का परिणाम थे। 2019 का चुनाव दरअसल मोदी की स्वीकार्यता का चुनाव है। यह साधारण नहीं है कि भाजपा को देश के 17 राज्यों में 50 प्रतिशत से अधिक वोट मिले, जिसमें उप्र और बिहार जैसे राज्य भी शामिल हैं।

नरेन्द्र मोदी क्योंकि एक विचार परिवार के प्रतिनिधि हैं, इसलिए दिल्ली में उनका आगमन सिर्फ एक नायक, राजनेता या प्रधानमन्त्री का आगमन नहीं था। उनका आगमन एक नई राजनीतिक संस्कृति, नई राजनीतिक चेतना, राष्ट्रबोध से भरे एक ऐसा नायक का आगमन था, जो बनी-बनाई परिपाटी से अलग देश को कुछ देना चाहता है। उनकी देहभाषा, उनकी वाणी, उनकी श्रमशीलता, उनका देशबोध, नागरिकों की समझ, समस्याओं का निदान करने की जिजीविषा, उनकी लोक को सम्बोधित करने की शैली सब कुछ एक अलग विश्लेषण की मांग करते हैं। नरेन्द्र मोदी राजनीति की उस शैली के जनक हैं, जिसमें ‘डिलेवरी’ पर जोर है। जो विकास के मन्त्र से प्रेरणा पाती है और लोगों की मुक्ति में ही उसकी मुक्ति है। उनकी राजनीति इसलिए पारम्परिक राजनीति से अलग है। यहाँ लोगों पर कृपा बरसाने पर नहीं, उन्हें स्वाभिमानी और सशक्त बनाने पर जोर है। यहाँ जोर है स्थाई विकास पर। इसलिए ‘नरेन्द्र मोदी परिघटना’ को समझना दरअसल एक नई राजनीतिक संस्कृति को समझना भी है। उसकी कार्यशैली को समझना भी है। गरीबों को मकान, शौचालय, उज्जवला गैस, जनधन योजना, हर गाँव को बिजली, असंगठित कामगारों के लिए पेंशन योजना और हर दूसरे माह 2 हजार रूपए की गरीब किसानों को मदद साधारण योजनाएँ नहीं है, यह परिणामों ने साबित किया है। सामान्य लोग अगर उनके साथ खड़े हैं, तो यह सिर्फ व्यक्तिगत लोकप्रियता का मामला नहीं है।

एक आकांक्षावान भारत का उदयः

नरेन्द्र मोदी की राजनीति उम्मीदों को जगाने वाली राजनीति है। वह सपनों की तरफ दौड़ लगाने वाली राजनीति है। वह आश्वस्त करती है कि सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। वह भरोसे का नाम है। वह बताती है अवसाद के बादल कितने भी घने हों, परिस्थितियाँ कितनी भी विकट हों अंधेरा, कितना भी घना हो, उम्मीद का दामन न छोड़ें। यहाँ नरेन्द्र मोदी एक ‘व्यक्ति’ के बजाए ‘विचार’ बन जाते हैं। एक ऐसा विचार जो नवाचारों के लिए समर्पित है। जो जड़ताओं को तोड़ना चाहता है। जो नवोन्मेष करना चाहता है। उसे हर नए विचार का स्वागत करते हुए खुशी मिल रही है।

आप याद करें नरेन्द्र मोदी किस कठिन समय में भारतीय राजनीति के परिदृश्य पर अवतरित होते हैं। यह वह समय है जब देश नाउम्मीदों से, अवसाद, भ्रष्टाचार की कथाओं से, सरकारविहीनता से, जड़ता और अवसाद से घिरा था। राजनीति और सत्ता निराश करने वाले शब्द बन गए थे। राजनीति से अनास्था चरम पर थी। अन्ना आन्दोलन के सुरों को याद करें और सोचें की राजनीति आखिर किस तरह हर भारतीय को निराश कर रही थी। किस तरह लोग अनास्था से भरे थे। अवसाद की परत मोटी होती जा रही थी। एक निराशा चारों ओर दिखने लगी थी, लोग सत्ता और राजनीति से निराश हो चुके थे। पिछले दो चुनाव हारकर मुख्यदल भाजपा खामोश बैठी थी तो सत्ता पर काबिज अल्पमत की सरकार के मदांघ मन्त्री दंभ भरी भाषा बोल रहे थे। अन्ना आन्दोलन ने देश में फैले गुस्से का प्रकटीकरण तो किया पर समाधान और विकल्प नदारद थे। ऐसे में राष्ट्रीय पटल पर नरेन्द्र मोदी का उदय दरअसल एक आकांक्षावान भारत का उदय भी था। आप देखें यही वह संधिस्थल है जहाँ सिर्फ भारत को एक विकल्प और नायक नहीं मिलता, बल्कि सपने मिलते हैं और आकांक्षाएँ फिर से हिलोरें लेनी लगती हैं।

2014 के ऐतिहासिक चुनाव अभियान की खूबी थी कि उसने निराश भारत को फिर से खड़ा किया और बताया कि कुछ हो सकता है। एक निराश देश फिर से उसी राजनीति से उम्मीदें रखने लगा, जिसने उसे ठगा और तिरस्कृत किया था। जनमानस नरेन्द्र मोदी की बातों पर भरोसा करने लगा, उसके अवसाद, निराशा को एक आस मिली उसने मोदी में बदलते भारत का अक्स देखा। मोदी जब कहा कि ‘मैं देश नहीं झुकने दूंगा’ तो जनता ने उनके इस वाक्य को आप्त वाक्य की तरह ग्रहण किया। देश को लगा कि राष्ट्र एक सुरक्षित हाथों में है। मोदी जब यह कहा कि ‘सबका साथ-सबका विकास’ तो देश को लगा कि एक नई राजनीतिक संस्कृति का प्रवक्ता मैदान में है और लोगों के दुख कम होगें।  जाहिर तौर पर यह समय मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में अवतरण के भी हैं और जनमानस में भरोसे के भी। 2019 का जनादेश इसी भरोसे की राजनीति का विस्तार दिखता है।

चिन्ता के केन्द्र में आम लोगः

नरेन्द्र मोदी की सरकार ने अपनी जनविकास को संबल देने वाली योजनाओं से साबित किया कि वे अंततः आम लोगों के लिए समर्पित हैं। सड़क,बिजली और मकान देने की तीन महत्वाकांक्षी योजनाओं के माध्यम से वे लोगों के दिलो में उतरे। इसी तरह उज्जवला योजना ने मातृशक्ति के प्रति उनकी संवेदना से परिचित कराया। सही मायनों में उन्हें सूट-बूट वाला राजनेता कहने वाले अब हैरत में हैं कि आखिर इस आदमी का क्या करें। उनकी सर्वदलीय घेरेबंदी का कारण और रणनीति के पीछे मोदी की आम जनता के बीच बढ़ती लोकप्रियता ही है। वे आज एक खास वर्ग या समाज के नेता नहीं हैं। किसी क्षेत्र के नेता नहीं हैं। वे सर्वसमाज और सर्वक्षेत्र में लोकप्रिय नेता हैं। एक वैश्विक छवि वाले नेता हैं। उनके अखंड परिश्रम का मुकाबला करने वाला दूर-दूर तक कोई दिखता नहीं है। वे सही मायने में भारत के मन को समझने और सम्बोधित करनेवाले नायक बन चुके हैं। अगर वे खुद को फकीर कहते हैं, तो इस पर लोगों ने भरोसा भी जताया है।

अप्रतिम साहसी राजनेताः

नरेन्द्र मोदी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे अप्रतिम साहसी राजनेता हैं। जीएसटी, नोटबंदी, कैसलेस अभियान जैसे संकल्प साधारण व्यक्ति की बात नहीं है। राजनेता निर्णय राजनीति के नफे-नुकसान देखकर लेते हैं। किंतु नरेन्द्र मोदी फैसले लेते हैं और परिणाम की परवाह नहीं करते। उन्हें अपनी नीति, नीयत और देश की जनता पर भरोसा है। नोटबंदी जैसे फैसले तभी कोई राजनेता कर पाता है, जब उसके अंदर अप्रतिम साहस हो। इसी तरह राजनीतिक फैसले लेने में भी उनके साहस की दाद देनी पड़ेगी। कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार बनाना साधारण निर्णय नहीं था, पर मोदी की हिम्मत पर भाजपा ने यह आत्मघाती कदम उठाया और लम्बे समय तक गठबंधन धर्म निभाया। नरेन्द्र मोदी इसी तरह के फैसलों के लिए एक दुस्साहसी राजनेता भी कहे जा सकते हैं। उनकी भारतीय राजनीति में मौजूदगी साधारण नहीं है। वे एक अलग राजनीतिक संस्कृति के प्रतिनिधि हैं और इसे साबित भी करते हैं। चुनावों में जिस तरह उतर कर वे सेनापति की भूमिका निभाते हैं, वह साधारण नहीं है। इन अर्थों में सफलताएँ पाकर चुप बैठ जाने वालों में नरेन्द्र मोदी नहीं आते। वे निरंतर चलते रहने में यकीन करते हैं और खुद को साबित करते रहते हैं।

नरेन्द्र मोदी के शासन के पाँच साल दरअसल भारतीय पारम्परिक राजनीति के लिए चुनौती हैं। लुटियंस जोन में आज भी उनकी स्वीकृति नहीं है। भारत के तथाकथित बौद्धिक समाज के लिए वे दिल्ली में एक अवैध उपस्थिति हैं। संघ परिवार से आने के नाते उन्हें अतिरिक्त आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा है। गुजरात से दिल्ली तक वे कुछ लोगों के निशाने पर हैं जो निरंतर मोदी की आलोचना करते हुए अपना जीवन-यापन कर रहे हैं। व्यक्ति का विरोध भी भारतीय राजनीति का एक प्रमुख एजेंडा बना चुका है, यह बातें हम मोदी विरोधी राजनीति से सीख सकते हैं। किंतु आप देखें तो मोदी इन बातों से बेपरवाह नजर आते हैं। वे जानतें हैं कि एजेंडा आधारित पत्रकारिता का मुंह बंद नहीं किया जा सकता। इसलिए वे इन अभियानों की उपेक्षा करते हुए अपना काम करते हैं। बावजूद इसके उन्हें हिटलर और वैचारिक आपातकाल लगाने वाला कहने वालों की कमी नहीं है। यह सुखद ही है कि इन पंक्तियों के लेखक समेत अनेक मोदी आलोचकों  ने आपातकाल के काले दिन न देखें हैं न ही उनके बारे में ठीक से पढ़ा है। इसलिए इमरजेंसी शब्द उन्हें एक नारे की तरह सुखद लग रहा है।  ऐसे में नरेन्द्र मोदी को आपातकाल लगाने वाला कहकर विरोधी सुर्खियाँ तो बटोर सकते हैं किंतु उन्हें जानना होगा कि वास्तविक आपातकाल के समय मोदी और संघ परिवार के लोगों ने लड़ाई लड़ी थी। जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के लोग आपातकाल के समर्थन में इंदिरा जी के साथ खड़े थे।

संगठन को दी शक्ति, संघ परिवार में बेहतर संवादः

यह माना जाता रहा है कि सत्ता में होने पर आमतौर पर संगठन काफी कमजोर हो जाता है और उसकी उपस्थिति बहुत मायने नहीं रखती। पार्टी के सत्ता में आने पर प्रायः दल के सभी ताकतवर नेता सरकार में चले जाते हैं और संगठन में दूसरे दर्जे का नेतृत्व काम करता है। पार्टी का अध्यक्ष भी प्रधानमन्त्री पद की आभा में दब जाता है और तदर्थ रूप से काम करता है। ऐसे में यह सवाल उठता था कि नरेन्द्र मोदी जैसे कद्दावर राजनेता तो शायद ही संगठन को शक्तिवान बनाने का उपक्रम करें। लेकिन इस दौर में एक अलग ही कथा लिखी गयी, भाजपा संगठन, सरकार के समानांतर ही ताकतवर होकर उभरा। अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा को एक बहुत ताकतवर अध्यक्ष मिला जिसकी सत्ता में एक हनक है। आज सरकार और संगठन में संगठन की उपस्थिति कतई कमतर नहीं है। संगठन की प्रभुता स्थापित हुई है और प्रधानमन्त्री के समांतर भी पार्टी अध्यक्ष को शक्ति और प्रभाव हासिल हुआ है। निश्चित ही यह साधारण बात नहीं है।

इसी तरह संघ विचार परिवार के संगठनों से संवाद और संपर्क का मामला भी इस सरकार में ज्यादा बेहतर नजर आता है। जबकि वाजपेयी सरकार में संघ परिवार और भाजपा के कई सवालों पर मतभेद सामने आ  गए थे। समन्वय और संवाद के मोर्चे नरेन्द्र मोदी की सरकार पिछली भाजपा सरकारों की तुलना में ज्यादा सफल कही जा सकती है। संघ विचार परिवार के अनेक संगठन अपने कई मतभेदों के बाद भी सरकार से संवाद कर रहे हैं और जनता का पक्ष रखते हुए लोगों को न्याय दिलाने में लगे हैं। स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय मजदूर संघ, आखिलभारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीत शिक्षण मंडल, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के अनेक सुझावों पर सरकार ने विचार किया है। इन अर्थों में जनसंगठनों के साथ संवाद करते हुए सरकार अनेक उलझे-प्रश्नों के समाधान खोज रही है।

जाहिर तौर पर मोदी सरकार के पाँच साल भारत की आत्मा के खोज के साल भी हैं। इन दिनों में नरेन्द्र मोदी ने भारत को विकास के महामार्ग पर डाल दिया है। अनेक महत्वाकांक्षी योजनाएँ प्रारंभ की हैं। देश के सपनों रंग भरने का काम प्रांरभ किया है। भारत जैसे महादेश में बदलाव आते-आते हैं। बदलाव दिखते-दिखते हैं।  फिर भी बदलाव के रंग दिखने लगें हैं। परिर्वतन के बिंदु भी दिखने लगे हैं। एक नया देश बनता हुआ दिख रहा है। यह देश आगे बढने को आतुर है। अपनी आकांक्षाओं के साथ आगे आने को आतुर है।

2019 के जनादेश ने साबित किया है कि भारत अपने आत्म को पहचान रहा है, आत्मदैन्य से मुक्त हो रहा है। वह बढ़ चला है। भारतीय जन भी अपने राजनेता नरेन्द्र मोदी की नीयत और उनके सपनों से खुद को जोड़ रहा है। लोगों को अब लगने लगा है कि समस्याएँ जो भी हों मोदी की नीयत में खोट नहीं है। वे सच्चे मन से आम लोगों का भला चाहने वाले, राष्ट्रभक्त राजनेता हैं। देश उनके हाथों में खुद को सुरक्षित पाता है। उनकी ईमानदारी, शुचिता, पवित्रता और आत्मविश्लास पर भरोसा करता है। 2014 का चुनाव जीतकर लोकतन्त्र के मंदिर (लोकसभा) पर पहुँच कर जब मोदी ने अपना माथा संसद की सीढ़ियों पर रखा था, इसके बाद जब संसद में उनकी आवाज गूंजी तो यही थी कि उनकी सरकार गरीबों को समर्पित है । इसलिए आम लोग उन्हें भरोसे से देखते हैं। आम जनता का यही विश्वास नरेन्द्र मोदी की शक्ति भी है। 2019 के ऐतिहासिक चुनाव अभियान से अपने कठिन परिश्रम और संवादकला से एक बार फिर वे शिखर पर हैं। उनके साथ जनाकांक्षाएँ संयुक्त हैं। मोदी को अब लोगों के सपनों और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए फिर जुटना है। दूसरी पारी के लिए देश की आम जनता ने उन पर भरोसा किया है। जनाकांक्षाओं से छल न हो, लोगों न्याय मिले और व्यवस्था ज्यादा संवेदना के साथ सामान्य जनों से पेश आए तो यह बात भारत के माथे पर सौभाग्य का टीका साबित होगी। साथ ही उन्हें अपेक्षित संवेदना,संवाद,सरलता, उदारता के साथ उन वर्गों के भ्रम और अविश्वास दूर करने के भी सचेतन प्रयास करने होगें जो आज भी भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को अविश्वास से देखते हैं। मोदी ऐसा कर पाए तो ‘महानायक’ वे बन ही चुके हैं, ‘इतिहास पुरुष’ भी कहे जाएँगें।

 

लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं स्तम्भकार हैं|

सम्पर्क – +919893598888, mediavimarsh@gmail.com

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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