आर्थिकीमुद्दा

मोदी सरकार को जल्द तलाशना होगा आर्थिक मोर्चे पर सफलता पाने का मंत्र

 

  • दीपक कुमार त्यागी

 

भारतीय अर्थव्यवस्था जिस तरह से मंदी की तरफ बढ़ रही है वह स्थिति देश के लिए चिन्ताजनक है। मंदी की मार से बेहाल अर्थव्यवस्था पर अब तो सरकार के अंदर से ही आवाज़े आने लगी हैं। मंदी के चलते भारतीय शेयर बाज़ार लोगों की गाढ़ी कमाई को निगल रहा हैं, रुपया गोते खा रहा है, लोग आयेदिन बेरोजगार हो रहे हैं। लेकिन केन्द्र सरकार मंदी की इस बीमारी का सफल इलाज अभी तक नहीं ढूंढ पायी है। सरकार आर्थिक मोर्चे पर सफलता पाने का ठोस मंत्र अभी तक हासिल नहीं कर पायी हैं। मंदी की स्थिति और गम्भीर होने से पहले हालात से निपटने के लिये सरकार को जल्द ही प्रभावी कदम धरातल पर उठाने होंगे।

2016-17 में देश की जीडीपी विकास दर 8.2% थी, जो कि 2018-19 में 5.8% पर पहुँच गयी है। देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई की रिसर्च के मुताबिक 2019-20 की पहली तिमाही में यह और नीचे जाकर 5.6% पर पहुँचने की आशंका है। जो स्थिति बेहद चिन्ताजनक है क्योंकि हमारा देश एक युवा देश है जो कि बहुत तेजी के साथ विकसित होने की दिशा में अग्रसर है, लेकिन अगर इसी तरह मंदी की मार चलती रहेगी तो विकास के रथ का पहिया धीमा हो जायेगा और मोदी सरकार अपने फॉइव ट्रिलियन इकनॉमी के लक्ष्य को हासिल करने में पिछड़ जायेगी।

वैसे तो देश की अर्थव्यवस्था को लेकर नरेन्द्र मोदी सरकार ने समय-समय पर दावा किया है कि देश की अर्थव्यवस्था बेहद मजबूत स्थिति में है। लेकिन धरातल पर स्थिति सरकार के दावों के विपरीत है लोग बेरोजगार हो रहे है, व्यापार ठप हो रहे है, कल-कारखानों में काम कम होने की वजह से आयेदिन लोगों की नौकरी जा रही है। अब तो स्थिति यह है कि देश के बड़े-बड़े मीडिया हॉउस से भी लोगों को निकाला जा रहा है लेकिन फिर भी कोई मंदी की मार पर देश की जनता को सच्चाई बताने के लिए तैयार नहीं है। लेकिन अब सरकार के अंदर ही अर्थव्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगने लगे है।

समाचार एजेंसी ANI के मुताबिक, जिस तरह से वरिष्ठ अर्थशास्त्री व नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने देश में मौजूदा आर्थिक गिरावट को “अभूतपूर्व स्थिति” करार देते हुए कहा है कि, “..पिछले 70 सालों में (हमने) तरलता (लिक्विडिटी) को लेकर इस तरह की स्थिति का सामना नहीं किया, जब समूचा वित्तीय क्षेत्र (फाइनेंशियल सेक्टर) आन्दोलित है..”

नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने यह भी कहा कि सरकार को “..हर वह कदम उठाना चाहिए, जिससे प्राइवेट सेक्टर की चिन्ताओं में से कुछ को तो दूर किया जा सके..”

राजीव कुमार ने कहा, “सरकार बिल्कुल समझती है कि समस्या वित्तीय क्षेत्र में है… तरलता (लिक्विडिटी) इस वक्त दिवालियापन में तब्दील हो रही है.. इसलिए आपको इसे रोकना ही होगा..”

लिक्विडिटी की स्थिति पर बोलते हुए नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने यह भी कहा, “..कोई भी किसी पर भी भरोसा नहीं कर रहा है… यह स्थिति सिर्फ सरकार और प्राइवेट सेक्टर के बीच नहीं है, बल्कि प्राइवेट सेक्टर के भीतर भी है, जहाँ कोई भी किसी को भी उधार देना नहीं चाहता…”

उन्होंने कहा, “दो मुद्दे हैं… एक, आपको ऐसे कदम उठाने होंगे, जो सामान्य से अलग हों… दूसरे, मुझे लगता है कि सरकार को हर वह कदम उठाना चाहिए, जिससे प्राइवेट सेक्टर की चिन्ताओं में से कम से कम कुछ को तो दूर किया जा सके…”

भारत सरकार के नीति आयोग के उपाध्यक्ष व देश के वरिष्ठ अर्थशास्त्री राजीव कुमार की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब देश की अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही है।

वहीं इसके बाद शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अर्थव्यवस्था में सुधार करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदमों को उठाने की घोषणा करते हुए, देशवासियों को आश्वस्त किया है कि देश की अर्थव्यवस्था बहुत अच्छे हालात में है। भारत वैश्विक स्तर पर बाकी देशों से बेहतर स्थिती में है। एक तरफ मोदी सरकार आर्थिक मोर्चे पर भारत को उबारने का दावा कर रही है। लेकिन इसी बीच वित्त मंत्री के दावों के विपरीत क्रेडिट एजेंसी मूडीज ने भारत का घटाया जीडीपी ग्रोथ अनुमान जो स्थिति भविष्य के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ठीक नहीं है।

 

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने वर्ष 2019 के लिए आर्थिक मोर्च पर मोदी सरकार व वित्त मंत्री के इस दावे को जबरदस्त झटका दिया है, जिस दावे के अनुसार आर्थिक मोर्चे पर भारत को उबारने के लिए सरकार प्रभावी कदम उठा रही है। लगता है, एजेंसी सरकार के दावों से संतुष्ट नहीं है। क्योंकि सरकार के इन प्रभावी कदमों को उठाने के बाद भी मूडीज ने 2019 के लिए भारत के जीडीपी ग्रोथ का आंकड़ा घटा दिया है। मूडीज के मुताबिक भारत की जीडीपी ग्रोथ 6.2 प्रतिशत रहने का अनुमान है। जिस तरह से क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने वर्ष 2019 के लिए जीडीपी ग्रोथ दर घटाकर 6.2 फीसदी कर दिया है वह सोचनीय है। हालांकि इससे पहले इसी एजेंसी ने भारतीय अर्थव्यवस्था के 6.8 फीसदी की दर से आगे बढ़ने का अनुमान जताया था। लेकिन अब मूडीज ने जीडीपी ग्रोथ के अनुमान को 0.6 प्रतिशत कम कर दिया। साथ ही 2020 के लिए जीडीपी ग्रोथ दर के अनुमान को 7.30 से घटाकर 6.7 प्रतिशत कर दिया। क्रेडिट एजेंसी मूडीज की तरफ से जारी एक बयान में कहा गया है कि वैश्विक स्तर अर्थव्यवस्था में आई सुस्ती ने एशियाई निर्यात पर प्रतिकूल असर डाला है और कारोबार का अनिश्चित माहौल निवेश पर भारी पड़ा है। आपको बता दे कि इससे पहले जापान की ब्रोकरेज कंपनी नोमुरा ने भी जून की तिमाही में देश की जीडीपी ग्रोथ 5.7 फीसदी रहने का अनुमान जताया था।

जिस तरह से आज भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही है। उसकी मार के चलते देश के बिल्डरों व ऑटोमोबाइल सेक्टर की आज हालत बेहद ख़राब है। ऑटोमोबाइल सेक्टर में वाहनों की बिक्री में आई भारी गिरावट के चलते कंपनियों को न सिर्फ प्रोडक्शन बंद करना पड़ा है। वहीं मंदी के चलते आटो सेक्टर्स के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों के उधोगों को भी अपने कर्मचारियों की छुट्टी करनी पड़ रही है। हाल के दिनों के आकड़ों के अनुसार देश में बेरोजगारी दर कुल उपलब्ध कार्यबल का 6.1 प्रतिशत रही, जो कि 45 साल में सर्वाधिक स्तर पर है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) रिपोर्ट में बेरोजगारी से जुड़े पूर्व के आंकड़ों से तुलना की गयी थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक, बेरोजगारी दर पिछले 45 वर्षों के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच गयी है।

 

देश में हालात यह है कि निजी उपभोग की वस्तुओं में भारी गिरावट आने के चलते देश का आर्थिक विकास तेजी से पीछे जा रहा है। देश में निजी उपभोग भारत के विकास की मजबूत रीढ़ है जो अब दिन-प्रतिदिन कमजोर हो रही है। जीडीपी में इसका योगदान 60% है। लेकिन इसमें कुछ समय से लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। इस पर नज़र डाले तो वर्ष 2018-19 की दूसरी तिमाही से इसमें लगातार गिरावट दर्ज हुई है। अगर जल्द ही इस गिरावट पर लगाम नहीं लगाई तो यह गिरावट आगे चलकर अर्थव्यवस्था को और नीचे ले जाएगी। देश के सभी नीति-निर्माताओं को समझना होगा कि निम्न आय वर्ग और मध्यम आय वर्ग वाली कामकाजी आबादी के लिए उपभोग का खर्च सीधे उनकी आय से जुड़ा हुआ है। वो अपनी सीमित आय के अनुसार ही अपने खर्चों की प्राथमिकता को तय करता है और हमारे देश भारत की आबादी का अधिकांश हिस्सा इन्हीं वर्गों का है। इसलिए सरकार को यह समझना जरूरी है कि वह इन वर्गों के लोगों की उपभोग मांग को बढ़ाने के लिए इस वर्ग के लोगों की आय में वृद्धि के प्रभावी उपाय करें। केन्द्र सरकार को आज लोगों कि आय में सुधार, उनकी मांग और बचत को बढ़ाने वाले ठोस कारगर उपायों पर ध्यान देने की जरूरत है, जिस से भविष्य में देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो और मोदी सरकार अपने फॉइव ट्रिलियन इकनॉमी के लक्ष्य को हासिल कर सके।

लेकिन मंदी से लड़ने के भारत सरकार के अभी तक किये गये प्रयासों का धरातल पर कोई खास असर होता नहीं दिख रहा है, देश में मंदी का माहौल लगातार जारी है। एक तरफ वैश्विक स्तर पर मंदी के चलते देश का आईटी सेक्टर पहले ही मंदी की मार से बेहाल है और वहीं देश की अर्थव्यवस्था में आ रही मंदी से बैंक, इंश्योरेंस, ऑटो सहित लॉजिस्टिक और इंफ्रास्टक्चर जैसे सेक्टरों में नई नौकरियों के अवसर अब बहुत कम होते जा रहे हैं। सर्वेक्षण ऐजेंसी केयर रेटिंग्स लिमिटेड की एक वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में इन सेक्टर्स में नई नौकरियों के अवसर बहुत कम हुए हैं। वहीं इन सभी सेक्टर्स की ग्रोथ पहले के मुकाबले 1.9% कम रही। देश में मंदी की मार से जूझ रहे नॉन बैंकिंग फाइनेंस, वाहन, बिस्किट से लेकर टैक्सटाइल उद्योग में बड़े पैमाने पर छंटनी का अंदेशा आयेदिन बढ़ता जा रहा है लोगों में अपनी नौकरी को लेकर असुरक्षा का माहौल बनता जा रहा है जो अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं है।

 

वहीं हाल ही में आई एक और चिन्ताजनक रिपोर्ट ने लोगों का सरदर्द बढ़ा दिया है। मंदी की मार अब कई  ऐसे सेक्टर्स पर भी पड़ने वाली है, जो सीधे करोड़ों लोगों को नौकरियाँ देने वाले सेक्टर्स माने जाते हैं। क्योंकि आरबीआई द्वारा हाल ही में जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार देश में उद्योगों को दिए जाने वाले कर्ज में गिरावट हुई है। पेट्रोलियम, खनन, टेक्सटाइल, फर्टिलाइजर व संचार जैसे सेक्टर्स वाले उद्योगों ने अब कर्ज लेना कम कर दिया है। इसका सीधा असर बैंकों द्वारा दिए जा रहे लोन पर पड़ने की संभावना है। साथ ही भविष्य में बैंकों व इन सेक्टरों में रोजगार के अवसर उत्पन्न होने पर भी पड़ने वाला है।

आज देश के कुछ नामचीन उधोगों पर नज़र डाले तो मारुति सुजुकी, बजाज, टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, यूनाइटेड इंडिया इंशोरेस, नेशनल इंश्योरेंस आदि जैसी दिग्गज कंपनियाँ भी भारी मंदी की चपेट में दिखाई दे रही है। एक अनुमान के मुताबिक अकेले ऑटो सेक्टर में पिछले 4 माह में 3.5 लाख लोग बेरोजगार हो गए और 10 लाख लोगों की नौकरियों पर संकट के बादल दिखाई दे रहे हैं।

वहीं मंदी के चलते देश की सबसे बड़ी बिस्किट निर्माता कंपनी पारले प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड भी 10 हजार कर्मचारियों की छंटनी कर सकती है। जो कि आम भारतीय व अर्थव्यवस्था के लिए चिन्ताजनक खबर है।

 

वहीं मोदी सरकार व भारतीय अर्थव्यवस्था को राहत देने वाली बात यह है कि मोर्गन स्टेनली जैसी विश्व स्तरीय दिग्गज कंपनियाँ इस बात का दावा कर रही हैं कि वैश्विक स्तर पर छाई मंदी से भारत थोड़ा दूर रहेगा। लेकिन फिर भी आने वाला समय भारत समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद तनावपूर्ण है। भारत सरकार को अगर इसके असर को कम करना है तो सरकार को अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे और साथ ही जल्द तलाशना होगा आर्थिक मोर्चे पर सफलता पाने का कारगर मंत्र ।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार व स्तम्भकार हैं|

सम्पर्क- +919999379962, deepaklawguy@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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