आवरण कथा

जनस्वास्थ्य की दयनीय स्थिति – राम प्रकाश अनंत

 

  • राम प्रकाश अनंत

 

आज़ादी के समय शिक्षा एवं स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी सरकार ने ली थी। शुरुआत में सरकार ने एक हद तक इस ज़िम्मेदारी को निभाया भी। सरकारी अस्पताल व सरकारी स्कूलों की स्थापना हुई। लेकिन धीरे-धीरे सरकार अपनी इस ज़िम्मेदारी से हाथ खींचती गई और आज सार्वजानिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य दोनों ही बेहद दयनीय स्थिति में हैं।

आज सरकारी अस्पतालों में सिर्फ वही लोग इलाज़ करा रहे हैं जो प्राइवेट अस्पताल में इलाज़ कराने में सक्षम नहीं हैं। देश में प्राइवेट अस्पताल,  60 % से अधिक लोगों की पहुँच से बाहर हैं। ऐसे में यह जानना  महत्वपूर्ण हो जाता है कि देश में सार्वजानिक स्वास्थ्य की क्या स्थिति है।

अंग्रेजों ने  1943 में भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के लिए बोर कमेटी बनाई। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट 1946 में सरकार को सौंपी। बोर कमेटी की कुछ सिफारिशें निम्न लिखित हैं –

प्राइमरी हेल्थ सेण्टर शॉर्ट टर्म सिफारिशें थीं , 40000 जनसँख्या पर एक प्राथमिक चिकित्सा केंद्र जिस पर दो चिकित्साधिकारी, एक नर्स, चार हेल्थ नर्स , 4 मिडवाइफ , 4 प्रशिक्षित दाई , दो स्वास्थ्य सहायक, एक फार्मासिस्ट , दो सफाई निरीक्षक एवं 15 चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी कार्यरत होंगे। लॉन्ग टर्म प्रोग्राम में  10,000 से 20,000 की जनसँख्या पर 75 बैड का एक अस्पताल, 650 बेड  की सेकेंडरी यूनिट (कम्युनिटी हेल्थ सेण्टर CHC) और 2500 बैड  का जिला अस्पताल विकसित करना था। आज़ादी से एक साल पहले बोर कमेटी की रिपोर्ट आई थी और अब देश को आज़ाद हुए 72 साल हो गए। आइए एक नज़र सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर डालते हैं।

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बेहतर सार्वजानिक स्वास्थ्य के लिए  क्या ज़रूरी है ? स्वास्थ्य के लिए खर्च किया जाने वाला पर्याप्त बजट , अच्छे शिक्षण संस्थान जो जो अच्छे डॉक्टर तैयार  करें , पर्याप्त व अच्छा पैरामेडिकल स्टाफ, अच्छा व पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर  एवं अच्छा मैनेजमेंट। जहां अमेरिका , जर्मन, जापान, ऑस्ट्रेलिया , ब्राज़ील , बेल्जियम  जैसे देश जीडीपी के 10 % से ज़्यादा स्वास्थ्य पर खर्च कर रहे हैं। वहीँ भारत जीडीपी का मात्र 2 % हेल्थ पर खर्च कर रहा है। इतने कम बजट में न तो अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार हो सकता है , न नागरिकों को दवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं , न बेहतर इलाज संभव है। शिक्षण संस्थाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। बड़ी संख्या में प्राइवेट मेडिकल कॉलेज खोले गए हैं जिनका उद्देश्य अच्छे डॉक्टर्स तैयार करना नहीं है। उनका उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना है। इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि नीट पीजी में पहले रिज़र्व कैटेगेरी के लिए 40 % और अनरिजर्व के लिए 50 % कट ऑफ थी। अब यह परसेंटाइल में बदल दी गई है जिससे वैसे ही कई गुने स्टूडेंट क्वालीफाई कर जाते हैं। इसके बावजूद प्राइवेट मेडिकल कॉलेज कोर्ट जाकर 25 परसेंटाइल तक एडमिशन की मंजूरी ले आते हैं। उसके बाद प्राइवेट मेडिकल कॉलेज  मेडिसिन पेडियाट्रिक्स या रेडिओलॉजी जैसी ब्रांच जो सरकारी कॉलेज में 70 परसेंटाइल वालों को मिल पाती हैं , डेढ़ से दो करोड़ में 25 परसेंटाइल वाले को दे देते हैं।  जिसमें न तो योग्यता है और इतनी रकम खर्च कर एक तरह से डिग्री खरीद रहा है वह कैसा डॉक्टर बनेगा यह सोचने की बात है।

सरकारी शिक्षण संसथान अक्सर बजट की समस्या से जूझते रहते हैं और जो बजट आता है उसका भी बंदरबांट हो जाता है।  पीएचसी ( प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ) की स्थिति बहुत खराब है। सरकार ने  संख्या बढ़ाने के लिए पीएचसी या न्यू पीएचसी खोल दी हैं पर सालों से वहां किसी डॉक्टर की न्युक्ति नहीं की है। कई जगह तो इमारत बन कर जर्जर अवस्था में आ गईं मगर आज तक वहां किसी डॉक्टर की तैनाती नहीं हुई। कई जगह फार्मासिस्ट या वार्डबॉय ही अस्पताल चला रहे हैं। ऊपर से भ्रष्टाचार इस कदर है कि  जितना स्टाफ है उसमें से  कुछ लोग मुख्य चिकित्साधिकारी से सेटिंग कर लेते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानक है 1000 लोगों पर एक डॉक्टर। मगर हमारे देश की समस्या भिन्न है। भारत की 70 % जनसँख्या गांव में रहती है और गांव में डॉक्टर बहुत कम उपलब्ध हैं। डॉक्टर्स शहरों में ही सैचुरेटेड हैं। कर्नाटक के कुल डॉक्टर्स का 40 % बंगलौर में हैं। ऐसे में जब सार्वजनिक स्वास्थ्य अच्छी स्थिति में नहीं है ग्रामीण जनता अप्रशिक्षित डॉक्टरों पर निर्भर है और खराब स्वास्थ्य सेवाओं का खामियाजा भुगत रही है।

इधर पब्लिक हैल्थ सिस्टम में जो बदलाव आया है वह है पी पी पी मॉडल (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप ). इसमें हो यह रहा है है जो नेता और अधिकारीयों के चहेते हैं वे एनजीओ बना कर , कमीशन और सोर्स के बल पर हैल्थ सिस्टम के तमाम प्रोजेक्ट में अपनी भागीदारी कर रहे हैं। इनकी कार्य प्रणाली सरकारी सिस्टम से भी हज़ार गुनी बदतर है। जैसे जननी सुरक्षा योजना में खाने की जिम्मेदारी किसी एनजीओ को दे दी। वह प्रसूताओं को सफ़ेद पानी पिला रहा है और कागज में दूध बता रहा है।  थाली में दाल, चावल , सब्जी, दही रायता छः आइटम कागज में दिखा रहा है और वास्तव में चपाती और सबसे सस्ती सब्जी ही दे रहा है। यही स्थिति दूसरे प्रोजेक्ट की भी है।

पिछले कुछ समय से हम देख सकते हैं कि जनता में यह भावना भरी जा रही है कि सरकार जनता को कोई सुविधा देती है तो एक वर्ग विशेष उसका विरोध करने लगता है। आपको बहुत से लोग ऐसी वकालत करते मिल जाएंगे कि सरकार को जनता को कोई सुविधा मुफ्त नहीं देना चाहिए। वैसे भी सरकार अमीरों को जितनी सब्सडी देती है  उसकी तुलना में गरीबों को तो उसकी मेहनत का उचित दाम भी नहीं दिलवा पाती। बस वोट के लिए कुछ सुविधाएं जारी किए हुए है। सार्वजानिक स्वास्थ्य की स्थिति यह है कि अब सरकारी अस्पतालों में जनता को लगभग हर सुविधा की कीमत चुकानी पड़ती है। कई बार तो टेस्ट या दूसरी सुविधाओं के लिए जो शुल्क लिया जाता है वह प्राइवेट के लगभग बराबर ही होता है। सरकार जैसे किसानों के लिए सब्सिडी कर्जमाफी फसल बीमा आदि की घोषणाएं कर यह दिखाने की कोशिश करती रहती कि वह किसानों की हितैषी है वैसे ही वह ज़ोर शोर से स्वास्थ्य योजनाओं का प्रचार करती है। लेकिन सच्चाई यही है कि इन योजनाओं का लाभ जनता को कागज़ पर व प्रचार में ही मिल पाता है। उदहारण के तौर पर आयुष्मान भारत का कितना शोर हुआ। 50 करोड़ लोगों को 5 लाख के इलाज का बीमा। बिहार के सैकड़ों बच्चों की मौत की चीखें अभी भी वातावरण में गूँज रही है। यह लोग समाज के सब से गरीब लोग हैं , आयुष्मान भारत का कितना लाभ इन्हें मिला ?

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एक स्वस्थ समाज के लिए राजसत्ता की समाज के निचले तबके के लिए सक्रिय  भूमिका महत्वपूर्ण है। यह सुनिश्चित करना सरकार की ज़िम्मेदारी है  कि स्वास्थ्य सेवाएं उस व्यक्ति की पहुँच से बाहर न रहें जो समाज के सबसे निचले पायदान पर है। सिर्फ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना ही नहीं स्वस्थ समाज के लिए राज सत्ता की सक्रिय भूमिका अति आवश्यक है। बिना राज्य की सक्रिय भूमिका के कोई भी समाज स्वस्थ नहीं रह सकता। स्माल पॉक्स  व पोलियो जैसी बीमारियों का उन्मूलन बिना राज्य की सक्रिय भूमिका के संभव नहीं था। इस बात को हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि भारत में 1000 बच्चों में से 40 बच्चे 5 साल की उम्र तक मर जाते हैं जबकि यूरोपीय यूनियन देशों में यह दर 4  है। अमेरिका में 7 है। भारत में 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मौत के बड़े कारण डायरिया व साँस की संक्रामक बीमारी हैं।

यह सार्वजानिक स्वास्थ्य की खराब स्थिति को दर्शाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार की प्राथमिकता में अभी भी बहुसंख्यक जनता का स्वास्थ्य नहीं है।

लेखक उत्तरप्रदेश में वरिष्ठ चिकित्सा पदाधिकारी हैं|

सम्पर्क- +918077870505, dr.ramprakashanant@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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