मुद्दासमाज

मानसिक स्वास्थ्य : समस्याएँ एवं कानून

 

  • डॉ  मिथिलेश कुमार तिवारी

 

मानव स्वास्थ्य एक बहु-आयामी विषय है लेकिन सैधान्तिक और व्यावहारिक रूप से इसका तात्पर्य केवल शारीरिक स्वास्थ्य से ही लगाया जाता है| सैधान्तिक रूप से मेरा तात्पर्य यह है की आज 21वी सदी में भी अपने देश में शारीरिक स्वास्थ्य के लिए हॉस्पिटल बहुतायत में मिल जाएँगे लेकिन मानसिक स्वास्थ्य के लिए उचित सुविधाए अभी भी नगण्य है| जबकि व्यावहारिक रूप में आज भी लोग किसी भी प्रकार की समस्या के लिए शारीरिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित सुविधाओं को ही अप्रोच करते है|
मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी के पीछे बहुत सारे कारण हो सकते है जैसे आम जनमानस में व्याप्त मानसिक स्वास्थ्य के प्रति नकारात्मक अभिवृत्तिया, सामाजिक-सांस्कृतिक गतिरोध, उपलब्ध सेवाए तथा मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी आम जनमानस में जागरूकता एवं शिक्षा का अधिकार जैसा मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धित कोई उचित क़ानून इत्यादि|

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मानसिक समस्याओं के प्रति लोगों की मानसिकताएँ जानने के लिए लाइव लव लाफ फाउंडेशन ने 8 शहरों के 3556 लोगों के ऊपर एक सर्वे किया जिसके परिणाम बहुत अचंभित करने वाले है | 47% प्रतिभागी जो कि उच्च आर्थिक- सामाजिक स्तर तथा शिक्षित वर्ग से थे, का मानना था की जो लोग अवसाद ग्रसित है उनसे एक सुरक्षित दूरी बना के रखना चाहिए। इसी सर्वे के दूसरे हिस्से का अध्ययन करने से पता चलता है की लोग ऐसे व्यक्तियों के लिए कितनी घृणा रखते है तथा ऐसे शब्दों का चयन करते है।
जहाँ तक क़ानून का प्रश्न है, भारत सरकार ने विकलांगों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन 2009 का अनुपालन करने के लिए दशकों पुराने मानसिक स्वास्थ्य क़ानून (1987) में आवश्यकता अनुरूप संशोधन करके मानसिक स्वास्थ्य देखभाल बिल – 2016 प्रस्तुत किया जो कि 2017 में क़ानून के रूप में लागू हुआ।

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इस क़ानून की एक ख़ास बात है की इसमें बहुत गम्भीर मानसिक बीमारियों पर ही ध्यान ना देकर बल्कि दैनिक जीवन की मानसिक समस्याओं को भी शामिल किया गया है। साथ ही साथ आत्महत्या को अपराध की श्रेणी से निकाल दिया गया है। ये क़ानून सरकार द्वारा एक रोगी केंद्रित क़ानून बनाने की पहल दिखती है लेकिन क़ानून के अन्य नियम और शर्तें इसमें व्यावहारिक रूप से बाधा पहुँचती है, जैसे मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धित सेवाए देने वाली संस्था या व्यक्ति के पास लाइसेन्स होना चाहिए। ऐसी स्थिति में बहुत सारी संस्थाए संसाधनो के अभाव में तथा दूसरी समस्याओं से बचाने के लिए मानसिक स्वास्थ्य सेवाए देने से माना कर सकती है। हमारे देश में आज भी लोगों की बहुत समस्याओं का हल स्पिरिचूअल हीलर्ज़ के द्वारा होता है ऐसे में लाइसेन्स जैसी व्यवस्था उनके लिए भी समस्या प्रस्तुत कर सकती है।

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ये क़ानून मानसिक रोगी को अपना इलाज कैसे होगा, कहा होगा इत्यादि चुनने का अधिकार देता है। लेकिन बहुत मानसिक व्याधियों से ग्रसित व्यक्ति ऐसे निर्णय लेने में असमर्थ होता है, ऐसी स्थिति में उसके उपचार सम्बन्धित निर्णय परिवार के सदस्यों के द्वारा लिया जाना चाहिए जिसको लेकर इस क़ानून में कोई उचित व्यवस्था नहीं है।

इस क़ानून में मेडिकल इंश्युरेंस की भी व्यवस्था की गयी है जैसे अन्य शारीरिक बीमारियों के लिए किया जाता है जो की एक अच्छा क़दम है। कुछ इंश्युरेंस कम्पनीज़ ने मेडिकल इंश्युरेंस शुरू भी कर दिया है।

इन सब के बावजूद, धरातल पर मानसिक रोगों के समुचित इलाज के लिए कोई ख़ास परिवर्तन नहीं दिख रहा है। क़ानून के साथ साथ व्यापक स्तर पर जन मानस के स्तर पर लोगों की मानसिक रोगों तथा रोगीयो के प्रति रुदियुक्तियो एवं धारणाओं को बदलने की ज़रूरत है। मानसिक स्वास्थ्य सेवाए देने वाली संस्थाओ का ढाँचागत एवं संसाधनो के स्तर पर परिवर्तन लाने की ज़रूरत है।

लेखक सुंदरवती महिला महाविद्यालय, भागलपुर में मनोविज्ञान विभाग में सहायक प्राध्यापक हैं|

सम्पर्क- +917408807646,

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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