मैं कहता आँखन देखी

मुलाकात एक घुसपैठिए से

 

  •  नवल किशोर कुमार

 

आपको याद है वह बच्चा, जो बाबू रामजीदास की ओर गुरूकते हुए जाता था और कहता था – ताऊजी, हमें लेलगाड़ी ला दोगे। उस ताई को तो आप जानते ही होंगे, जिसके बारे में विश्वंभर शर्मा कौशिक ने लिखा था। वह बच्चा आज मिला मुझे। हंस के सितंबर, 2019 के अंक में। नाम है ओवैस रजा।


हंस में उसकी कहानी झूला प्रकाशित हुई है। हंस ने नया प्रयोग किया है यह घुसपैठियों से मिलने-मिलवाने की। रूकिए, घुसपैठिया का कोई गलत अर्थ मत लगा लिजीए। ये वे घुसपैठिए हैं जो साहित्य में अपनी पैठ बना रहे हैं। या यह भी कहिए कि हंस ने उन्हें अवसर दिया है पैठ बनाने की। वरना कौन किसी को कोई जगह देता है मठों में। हर मठ में बड़े-बड़े मठाधीश बने पड़े हैं। खुद ही गढ़ते हैं, खुद ही सुनते हैं और खुद ही पुरस्कृत भी होते रहते हैं। जन्मजात आरक्षण वाले साहित्य की दुनिया में ओवैस रजा जैसे बच्चे घुसपैठिए ही कहे जा सकते हैं जो आगे बढ़कर स्वर्ग पर दावा ठोक सकते हैं।

ओवैस की कहानी विश्वंभर शर्मा कौशिक की कहानी जैसी नहीं है। उसमें साहित्य का वह सौंदर्य नहीं है जिसे पढ़कर आपको कोई सुख मिले। उसकी कहानी में तो वह है, उसका दोस्त मुस्तकीम है, चाचा हैं, चाची हैं, सांप, वैद्य और बकरी है। चाचा उसे झूले पर झूलाते हैं। वह गिरता है। चोट लगती है। वह फिर भी झूलना चाहता है। उसके चाचा उसे डांटते हैं। उसकी चाची उसके साथ खड़ी होती है। फिर उसकी चाची सांप देख बेहोश हो जाती है और फिर वैद्य और बकरी की दास्तां।

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दरअसल, ओवैस की कहानी एक मानक की तरह प्रतीत होती है। आप विश्वंभर शर्मा कौशिक की कहानी को इस कसौटी पर कसिए। कितना अंतर है। वह कहानी बच्चे की नहीं है। उस महिला की भी नहीं है जिसे ताई की संज्ञा दी गयी है। सच्चाई तो यह है कि ताई कहानी भारतीय समाज के मर्दों की है। भारत के पुरूष हमेशा अपना अधिकार बनाए रखना चाहते हैं। बच्चा उनके लिए या तो मनोरंजन का सामान है और महिलाएं गुलाम। महिला को यह अधिकार कहां कि वह यह सोच सके कि उसका अधिकार क्या है।

दूसरी ओर ओवैस की रचना में मौलिक तत्व हैं। उसकी कहानी का पात्र चाचा को चाचा ही कहता है। ताई कहानी के जैसे नहीं कि तुतलाए भी और ताऊ को ताऊजी कहे। ओवैस की कहानी का वैद्य बकरी चराता है। कोई चमत्कार नहीं करता। ओवैस की कहानी में घर का दरवाजा छोटा है। एकदम दड़बे के जैसा। लेकिन यह दड़बा किसी बड़ी हवेली से कम नहीं। उस दड़बे में एक ड्योढ़ी है और एक आंगन भी। दरवाजे पर एक पेड़ भी है। वहां झूला है। बचपन है। जीवन है।

कमाल का है यह नन्हा घुसपैठिया।

हंस को बधाई।

लेखक फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली के सम्पादक (हिन्दी) हैं|

सम्पर्क-  nawal4socialjustice@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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