पर्यावरणमुद्दा

प्लास्टिक मुक्त भारत की दिशा में सार्थक कदम

 

  • देवेन्द्रराज सुथार 

 

हाल ही में 73वें स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराते हुए भारत को प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्त करने की बड़ी घोषणा की है। प्रधानमन्त्री ने कहा कि देश को प्लास्टिक कचरे से मुक्त करने के अभियान की शुरूआत राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती (02 अक्टूबर) से एक साथ पूरे देश में की जाएगी। जिसके तहत सरकार देश को सिंगल यूज प्लास्टिक (एक बार प्रयोग होने वाली प्लास्टिक) से मुक्त बनाएगी।

प्रधानमन्त्री की पहल पर एक बार इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक के खिलाफ चौतरफा अभियान शुरू हो गया है। लोकसभा सचिवालय ने इसे लेकर जारी निर्देश में संसद भवन में काम करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों को प्लास्टिक के सामान के बजाय पर्यावरण के अनुकूल थैलों या सामान का इस्तेमाल करने की सलाह दी है। इससे पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने सभी केंद्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों में एक बार इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है। गौरतलब है कि भारतीय रेलवे देश को सिंगल यूज प्लास्टिक से मुक्त करने की दिशा में पहले ही बड़े पैमाने पर अभियान शुरू कर चुका है। 02 अक्टूबर से रेलवे स्टेशन सहित समूचे रेलवे में इसके इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक रहेगी। हालांकि, इसके अलावा प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल जारी रहेगा, लेकिन अब यह जगह-जगह फेंकी नहीं जाएगी, बल्कि यात्रियों से लेकर इसका संग्रह किया जाएगा। इसका जिम्मा भारतीय रेलवे खानपान एवं पर्यटन निगम (आईआरसीटीसी) को सौंपा गया है। इसके साथ ही प्लास्टिक की बोतलों को नष्ट करने की भी प्रत्येक स्टेशन पर व्यवस्था की जाएगी। मौजूदा समय में देश के 170 रेलवे स्टेशनों पर प्लास्टिक की बोतलों को नष्ट करने की व्यवस्था है।

प्लास्टिक का बढ़ता इस्तेमाल एक वैश्विक समस्या है। हमारे दिन की शुरूआत से लेकर रात को सोने तक हम प्लास्टिक से निर्मित संसाधनों से घिरे रहते हैं। जहां प्लास्टिक हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में बहुत उपयोगी साबित हो रहा है वहीं यह हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण को बड़ी ही तेजी से नुकसान पहुंचा रहा है। प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या दिनोंदिन कम होने के बजाय विकराल रूप धारण करती जा रही है। भारत जैसे प्रकृति की पूजा करने और पर्यावरण से मित्रवत् नाता रखने वाले देश में प्लास्टिक का धड़ल्ले से उपयोग अब आम बात हो चुकी है। यहां तक कि भारत में प्लास्टिक कचरे का निस्तारण, इसके सही से कलेक्शन और रख-रखाव की व्यवस्था भी नहीं है। स्थिति ये है कि भारत में सड़क से लेकर नाली, सीवर और घरों के आसपास प्लास्टिक कचरा हर जगह नजर आता है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में हर साल 5.6 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। देश के 60 फीसद प्लास्टिक कचरे को दुनिया के महासागरों में फेंक दिया जाता है। एनवायरमेंट साइंस एंड टेक्नोलॉजी के अनुसार दुनिया की दस नदियों में से तीन जो महासागरों में 90 फीसद प्लास्टिक ले जाती हैं, उसमें भारत के तीन प्रमुख नदी सिंधु, गंगा और ब्रम्हपुत्र हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जनवरी 2015 की आकलन रिपोर्ट में कहा था कि भारतीय शहर हर दिन 15 हजार टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न करते हैं। यह कचरा 10 प्रति टन पर 1,500 ट्रक भरने के लिए पर्याप्त है।

 

प्लास्टिक की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि यह किसी अन्य तत्व या जैविक चीजों की तरह पर्यावरण में घुलता नहीं, बल्कि सैकड़ों साल तक वैसे ही बना रहता है। साथ ही प्लास्टिक जिस जगह पर पड़ा रहता है उस जगह को अपने केमिकल से जहरीला भी बनाता जाता है। जिस मिट्टी में यह प्लास्टिक जाता है, उसे बंजर बना देता है। पानी में जाता है, तो पानी को न केवल जहरीला बनाता है, बल्कि जलीय जीवों के लिये मौत का कारण बन जाता है। बीते 50 वर्ष में हमने जितना उपयोग प्लास्टिक का बढ़ाया है, किसी अन्य चीज का इतनी तेजी से नहीं बढ़ाया। 1960 में दुनिया में 50 लाख टन प्लास्टिक बनाया जा रहा था, आज यह बढ़कर 300 करोड़ टन के पार हो चुका है। यानी हर व्यक्ति के लिये करीब आधा किलो प्लास्टिक हर वर्ष बन रहा है। हर साल तकरीबन 10.4 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा समुद्र में मिल जाता है। 2050 तक समुद्र में मछली से ज्यादा प्लास्टिक के टुकड़े होने का अनुमान है। प्लास्टिक के मलबे से समुद्री जीव बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। कछुओं की दम घुटने से मौत हो रही है और व्हेल इसके जहर का शिकार हो रही हैं। प्रशांत महासागर में द ग्रेट पैसिफिक गार्बेज पैच समुद्र में कचरे का सबसे बड़ा ठिकाना है। यहां पर 80 हजार टन से भी ज्यादा प्लास्टिक जमा है।

यह वैज्ञानिकों द्वारा प्रमाणित किया गया है कि प्लास्टिक के सामान के उपयोग से 90 प्रतिशत कैंसर की संभावना होती है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ का लक्ष्य 2030 तक स्ट्रॉ और पॉलिथिन बैग जैसी सिर्फ एक बार प्रयोग की जा सकने वाली प्लास्टिक की वस्तुएं को इस्तेमाल से हटाने का है। वैज्ञानिकों के अनुसार एक बार यूज होने वाली प्लास्टिक सबसे ज्यादा खतरनाक है। प्लास्टिक कचरे में सबसे ज्यादा मात्रा सिंगल यूज प्लास्टिक की ही होती है। हाल में हुए एक शोध के अनुसार एक वर्ष में एक व्यस्क इंसान 52 हजार से ज्यादा प्लास्टिक के माइक्रो कण खाने-पानी और सांस के जरिए निगल रहा है। अध्ययन में पता चला था कि लगभग सभी ब्रांडेड बोतल बंद पानी में भी प्लास्टिक के ये सूक्ष्म कण मौजूद हैं। कनाडाई वैज्ञानिकों द्वारा माइक्रोप्लास्टिक कणों पर किए गए विश्लेषण में चौंकाने वाले नतीजे मिले हैं। विश्लेषण में पता चला है कि एक वयस्क पुरुष प्रतिवर्ष लगभग 52000 माइक्रोप्लास्टिक कण केवल पानी और भोजन के साथ निगल रहा है। इसमें अगर वायु प्रदूषण को भी मिला दें तो हर साल करीब 1,21,000 माइक्रोप्लास्टिक कण खाने-पानी और सांस के जरिए एक वयस्क पुरुष के शरीर में जा रहे हैं। हर साल उत्पादित होने वाले कुल प्लास्टिक में से महज 20 फीसद ही रिसाइकिल हो पाता है। 39 फीसद जमीन के अंदर दबाकर नष्ट किया जाता है और 15 फीसद जला दिया जाता है। प्लास्टिक के जलने से उत्सर्जित होने वाली कार्बन डायऑक्साइड की मात्रा 2030 तक तीन गुनी हो जाएगी, जिससे हृदय रोग के मामले में तेजी से वृद्धि होने की आशंका है।

 

अत: हमें समझना होगा कि पर्यावरण जैसी साझी विरासत की रक्षा करना हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी है। प्लास्टिक को केवल कानून बनाकर व जुर्माना लगाकर बैन नहीं किया जा सकता बल्कि हमें इसके नुकसान को लेकर जन-जागृति लाने की आवश्यकता है। जब आमजन में यह समझ विकसित होगी कि प्लास्टिक जैसा पदार्थ बेजुबान पशुओं की मौत से लेकर भूमि की उर्वरता क्षमता को नष्ट करने वाला सबसे बड़ा कारक है तो इसको लेकर लोग जरूर सचेत होंगे।

लेखक स्वतन्त्र टिप्पणीकार है|

सम्पर्क- +91810717719, devendrakavi1@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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