स्त्रीकाल

विवाह का अन्तः विस्फोट – निवेदिता मेनन

 

  • निवेदिता मेनन

 

परिवार के इस स्वरूप में हिंसा ऐसी अन्तर्निहित संस्था है जो ‘जेंडर’ के सार तत्व का निर्माण करती है। मैं यहाँ शारीरिक हिंसा की बात विशेष तौर पर नहीं कर रही हूँ। मेरा आशय इस तरह की हिंसा और उसके उस स्वरूप से है जो पूरे भारत में व्याप्त है। यह ऐसी हिंसा है जो एक औरत को विवाह करने को बाध्य करती है। हम यहाँ पितृवंशात्मक पौरुषता के बारे में नहीं सोच रहे हैं कि वह एक औरत के साथ क्या सुलूक करती है। वह जहाँ काम कर रही होती या माता-पिता के घर रह रही होती है को छोड़ देती है और पति या उसके माता-पिता के घर चली जाती है। वहाँ वह अपनी जाति बदल देती है, कुछ समूह में तो पूरा नाम ही बदल दिया जाता है, उसके बच्चे उसके पिता का नाम ही लगाते हैं। एकाध

कोई बहुत विरली ही अपना पूरा नाम विवाह के बाद बचाये रख पाती है।

विवाह के बाद एक औरत को अपने आपको पूरी तरह बदलने को सीखने पड़ता है। इन सबसे भी जो महत्वपूर्ण तथ्य है वह यह कि इस एक विवाह के पहले उसे बचपन से लेकर अब तक को सारा समय निश्चित भविष्य निर्माण के लिए कैरियर और नौकरी की तलाश में भाग लेने और पढ़ने में बीत जाता है।

जैसा कि एक युवा लड़की ने कहा ‘जब भी मैंने अपनी माँ को मस्ती करने के लिए कहा कि चलो रुचिकर कपड़े पहनकर बाहर चले तो माँ ने कहा कि अब मैं शादी-शुदा हूँ, अब वह सब मैं नहीं कर सकती हूँ। ‘यदि विवाह जीवन का अन्त है तो यह कैसे सम्भव है कि वह जीवन का उद्देश्य हो?’

यह वे सवाल हैं जो अक्सर हमारी तरफ चुनौतीपूर्ण ढंग से उछाले जाते हैं और इस पृष्ठभूमि से ही हमें इसे सम्बोधित करना होगा, परन्तु ‘औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन होती है?’  ‘यह सास नहीं है जो बहू के लिए सबसे क्रूर होती है?’  ऐसा होता क्यों है? इसका उत्तर दिए बिना हम इस सवाल को ऐसे पूछते हैं जो शायद ही पूछे जाते हैं?  ससुर दामाद के बीच शक्ति का संघर्ष क्यों नहीं होता है? क्योंकि उनके क्षेत्र पूर्णतः भिन्न हैं। क्योंकि उनके बीच शक्ति का ऐसा खेल नहीं होता जिसमें एक की शक्ति के बढ़ने का मतलब दूसरे की शक्ति का घटना होता हो। लेकिन औरत पुरुष शक्ति से घर की मालकिन होती है, जो अपनी शक्ति का इस्तेमाल मर्द अपने पति या बेटे के माध्यम से करती है, जो संयोग से दूसरी स्त्री बहू का पति का बन गया है। इस तरह की संरचना में दो औरतों के बीच सत्ता का संघर्ष अन्तर्निहित है और जिसे टाला नहीं जा सकता है। औरत होने भर से यह दुश्मनी नहीं होती है बल्कि दो दयनीय औरतों को एक-दूसरे के खिलाफ रख देने से होता है। एक ऐसी स्थिति की कल्पना कीजिए जिसमें ससुर और दामाद सीमित क्षेत्र में भी एक-दूसरे के विरोध में पड़ते, तो स्वभाविक रूप से दामाद ससुर की जगह हड़प लेगा। तब पुरुष, पुरुष का सबसे खतरनाक दुश्मन होगा!

दुबारा इस ताने पर सोचते है कि ‘औरत औरत की सबसे बड़ी दुश्मन होती है। जब हम मर्दवादी पितृसत्तात्मक संरचना को समझ लेते हैं तो हम जान जाते हैं कि कहानीकारों ने दयनीय औरतों को एक-दूसरे के खिलाफ लड़ाया है।

विवाह में अन्तर्निहित इस हिंसा को बढ़ाया जाता है, लेकिन जिस पर कभी विचार नहीं किया जा सका, औरतों के पास वह भाषा नहीं थी कि वे इसे समझ पाती। फिर भी धारा 498(ए) के तहत दहेज की माँग का आरोप हर जगह फैल रहा है। जिसे लोगों द्वारा दहेज विरोधी अधिनियम का ‘गलत प्रयोग’ कहा जाने लगा है। चूंकि दहेज में पैत्रिक संपत्ति होती है एक औरत यह आशा करती है या कम से कम इतना कर सकती है कि वह अपने सहारे के लिए दहेज वापसी पर आस लगा सकती है। सचमुच में औरत को अलगाव के क्रम में यह निर्देष दिया जाता है कि वह अपना दहेज वापस ले ले। पुलिस और वकील भी घरेलू हिंसा की शिकायत को दहेज विरोधी अधिनियम का उल्लंघन कराने के लिए प्रेरित करते है क्योंकि यह जल्दी और पहले से स्वीकृत धारा है।

इसके समानान्तर ही व्यवसायिक अभ्यास की संस्थाओं में नौजवान लड़कों को अपने वरिष्ठ छात्रों से हिंसक रैगिंग के द्वारा शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना सहनी पड़ती है, फिर भी उन्हें माता-पिता द्वारा बार-बार यह बताया जाता है कि वापस जाओ और उक्त हिंसक प्रताड़ना को सहो। जो खर्च हुआ है उसके बारे में सोचो, इसे सहो और सहते जाओ, अन्ततः वे मार दिए जाते हैं।

पुरुषों द्वारा ‘मिसयूज’ का तर्क व्यंग्यात्मक रूप से इस अर्थ में सही हे कि पितृसत्ता किस तरह से अपना काम करती है। यह पुरुष यह विश्वास करते हैं कि वे यूं ही ‘झूठे’ आरोपी ठहराये गये हैं। यह पुरुष असल में जो कह रहे हैं वह वह एक परिवार पत्नी से जो अपेक्षा रखता है उस प्रभाव के कारण कह रहे हैं। एक पत्नी के रूप में आपसे यह आशा की जाती है कि आप जो भी अपना समझती हैं वह सब छोड़ दीजिए। हमारी आपसे यह आशा है जिसे आपको पूरा करना है। यह है विवाह और औरत इस विवाह को मानने से इंकार करती है। इस अर्थ में पुरुषों के पास यह कहने का अधिकार है कि उन्हें ‘झूठा आरोपी’ ठहराया गया है- क्योंकि वे सब पितृसत्तात्मक परिवार के अनुरूप ही काम कर रहे हैं।

औरत की इस बदल हुई स्थिति के दुख का वर्णन नहीं किया जा सकता है। क्या एक औरत केवल यह कहकर अपने घर जा सकती है कि ‘मैं पत्नी नहीं बनना चाहती, मुझे यह नौकरी पसन्द नहीं।’

बचपन से लेकर बडे़ होने तक बाध्यतापूर्ण तरीके से तैयार विवाह कि लिए तैयार की गयी स्त्री के लिए विवाह के अलावा भविष्य में कोई और सपना देखने की इजाजत नहीं होती। वह आशा करती है कि विवाह के बाद उसकी जिन्दगी शुरू होगी लेकिन वह पाती है कि असल में यह उसकी जिन्दगी का अन्त है। इससे पैदा हुआ असन्तोष और कुंठा की परिणति जो मैंने देखा है वह विवाह के अंतःविस्फोट तक ले जाती है। जवान लड़की सहजता से एक पत्नी की भूमिका निभाने से मना कर देती है और सासू माँ और वह परिवार जिसमें उसका विवाह हुआ होता है का गुस्सा …

वैधानिम रूप से परिवार एक ऐसी वैधानिक संस्था के रूप में व्यवहार करता है जिसमें समाज के नियम लागू होते हैं। विवाह से सम्बद्ध जो ड्रकोनियन नियम है उनसे यह विचार पैदा होता है कि यह मर्द ही है जिसकी रक्षा की जानी चाहिए नहीं तो परिवार पर संकट खड़ा हो जायेगा। लेकिन ज्यादातर मामलों में आज भी औरतें ही कष्ट सहती हैं, इनमें से ज्यादातर औरतें अपनी सबसे अधिक उर्जा साहस और ताकत केवल हिंसक और अमानवीय विवाहों में बनी रहने के लिए खर्च कर देती हैं।

बहरहाल मातृवंशात्मक परिवार के लिए नहीं बल्कि पैतृक परिवार के लिए भी एक संपूर्ण आलोचना जरूरी है। यदि एक बेटी की शादी हुई, दहेज के कारण मारी गई तो भी उसके माता-पिता का विचार होता है कि दूसरी बेटी की शादी करके उसका भविष्य सुरक्षित कर दिया जाये।….

फिर भी एक परिवार का कार्य है औरत और मर्द को पैदा करना। जो … जो अपने माता-पिता की अषाओं को पूरा करें – उसकी सामाजिक हैसियता को बरकरार रखे और उनके बुढ़ापे का सहारा बने। उदाहरण के तौर पर रविन्दर कौर पंजाब के खेतिहर घरों में काम करती है, जिसने दिखाया कि घर में सभी बेटा के प्रति एक जैसी चाह नहीं है, अविवाहित बेटे खर्चीले प्रतीत होते हैं।

इस तरह से यह पितृसत्तात्मक परिवार वह चाहे विवाह के बाद की (पति परिवार) या विवाह के पहले (पिता) की हो, हिंसा और सत्ता के खेल की वह जगह हैं जहाँ से बाहर और भीतर किया जाता है।

विवाह और परिवार के इस स्वरूप के नष्ट हो जाने के संकेत बढ़ रहे हैं। हरियाणा देश का ऐसा राज्य है जहाँ पुत्र को सबसे अधिक वरीयता दी जाती है और जहाँ लिंगानुपात सबसे कम है। 2011 के अन्त में एक अखबार में एक घटना छपी कि और स्थानीय खबरों और अंग्रेजी के अखबारों में लगभग आधी दर्जन ऐसी खबरे होती है जिसमें पिता कभी और कभी माँ बेटों-बेटियों को सामाजिक तौर पर अपनी संपत्ति से बेदखल कर रहे हैं। यद्यपि इस तरह की सूचना वैधानिक नहीं है फिर भी वे ये  … तनाव के इतने विस्फोटक कारक हैं कि परिवार के खांचे में इनको संभाल पाना मुश्किल हो रहा है।

(लेखिका की पुस्तक ‘सीइंग लाइक ए फेमिनिस्ट’ से साभार)

अनुवाद : किंग्सन पटेल

लेखिका स्त्रीवादी चिन्तक और जेएनयू में राजनीति शास्त्र की प्रोफेसर हैं|

सम्पर्क- +919971268730, nivmen@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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