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महादेव सड़क पर, खतरे में ज्ञानवापी मस्जिद, मोदी का क्या होगा?

महान संस्कृति के पतन की महागाथा

  • अजय मिश्र

बनारस में आजकल चारों ओर, विशेषतः पक्का महाल में, जिसकी बसावट गंगा-तट पर मुख्यतः विश्वनाथ मन्दिर के आसपास 15 मुहल्लों में है और जिसमें दशाश्वमेध, राजेन्द्र प्रसाद घाट, मानमन्दिर, त्रिपुरा भैरवी, मीरघाट, ललिता घाट, मणिकर्णिका घाट सरीखे विश्वविख्यात घाट हैं, शोक, क्षोभ, गुस्से और आक्रोश के साथ ठगे जाने का माहौल है।

लोगों का आक्रोश उस एक शख्स पर केन्द्रित हो रहा है, जिसने स्वयं को गंगा-पुत्र कह 2014 के लोकसभा चुनाव में वोट बटोरे थे, जनता क्षुब्ध है कि गुण्डई और सीनाजोरी का मुहावरा प्रदेश एवं केन्द्र सरकार की पहचान बनता जा रहा है. जनतंत्र में एकाध झूठ को जनता नजरअन्दाज कर देती है लेकिन जहाँ सरकार झूठ के पुलिन्दे पर बैठी हो और हर रोज ‘विकास’ के नाम पर एक झूठ का हथौड़ा सिर पर मार देती हो, वहाँ लहु-लुहान जनता सरकार की निर्जज्ज अनैतिकता, झूठे आश्वासनों और हिंसा से तंग आ अगले चुनाव में भाजपा को अँगूठा दिखाने का मन बना चुकी है।

एक ओर सर्वशक्तिमान सरकार की हिंसा है, दूसरी ओर निरीह नागरिक। सरकार के पास शक्ति है, ताकत है, कार्यपालिका है, विधायिका है, पार्षद है, कारकून हैं और है डण्डेवाली, राइफलधारी पुलिस। सरकारी मनमर्जी का आलम यह है कि दशाश्वमेध से चैक जाने वाला रास्ता बिना किसी पूर्व सूचना के कभी भी बन्द कर देती है। लाहौरीटोला की गली में एक माह से स्थान-स्थान पर मलबा पड़ा है, गली में पैदल चलना सम्भव नहीं, नागरिक घरों में कैद हैं। अचानक कोई भी मकान गिराया जाने लगता है। लाहौरी टोला, विशालाक्षी, ब्रह्मनाल, सरस्वती फाटक तथा कालिका गली के वाशिंदे नहीं जानते पता नहीं कब किसे दर बदर होना पड़े।

           इस भयानक नौटंकी की शुरुआत हुई जीत के बाद कृतज्ञता ज्ञापन के लिए मोदी के विश्वनाथ मन्दिर आने से, वापसी में मोदी ने विश्वनाथ मन्दिर विकास प्राधिकरण की घोषण के साथ मणिकर्णिका से मन्दिर तक साठ फीट चैड़ा रास्ता बनवाने का संकल्प लिया। सरकार की नजर सबसे पहले ज्ञानवाणी परिसर स्थित  केदारनाथ व्यास के भवन पर पड़ी। मकान पुराना था, मरम्मत का तलबगार था किन्तु 86 वर्षीय व्यासजी साधन विहीन होने के कारण असहाय थे। उनकी असमर्थता सरकार के लिये मौका बनी। जहाँ सरकार लोककलाओं के संरक्षण/संवर्धन में हीला-हवाली करती हो, संस्कृति के प्रोत्साहन की जिम्मेदारी से कन्नी काट चुकी हो, वहाँ एक ऐतिहासिक भवन, जिसके तलघर में 300 वर्ष प्राचीन देवालय भी हो, के संरक्षण की बात सरकारी एजेण्डे में कैसे हो सकती है। अतः मकान खरीदने का प्रस्ताव दिया गया, जिसे व्यासजी ने ठुकरा दिया। तब उनके पड़ोसी ब्रजेन्द्र गोस्वामी का मकान खरीद कर गिरा दिया गया। पक्का महाल में मकान एक दूसरे की पीठ के सहारे बने हैं। एक मकान गिरने पर तीन और मकान कमजोर हो जाते हैं। व्यासजी का मकान कमजोर हुआ, सरकार ने इसे बिना मुआवजा दिये गरा दिया। तबसे व्यासजी वृद्धआश्रम की शरण में हैं। सरकार ने इस सफलता को एक सर्वव्यापी नीति में बदलते हुए तय किया कि मन्दिर के आसपास के पुराने, जर्जर, कमजोर मकानों को असुरक्षित घोषित कर खाली करवा औना-पौना मुआवजा दे खरीद लिया जाय। जब इससे भी ललिताघाट से मन्दिर तक के प्रस्तावित गलियारे का स्वप्न पूरा होते नहीं लगा तो केन्द्र सरकार की शह पर राज्य सरकार के मंत्रीमण्डल में ‘मन्दिर विस्तार प्राधिकरण’ नाम दे एक अलोकतांत्रिक अध्यादेश पारित किया। मध्ययुगीन बर्बरता का इतिहास, भूमण्डलीकरण के नाम पर फैल रहे निरंकुश उपभोक्तावाद, आवारा पूँजी के सचल निवेश के बीच मनुष्य का नैतिक संघर्ष  किस तरह कराह कर दम तोड़ता है आगे की कथा में लोभ, लालच, झूठ, काईयांपन और प्रमादी व्यवहार के बीच दम तोड़ती संस्कृति और मनुष्यता की लाचारगी भरी वह कथा है जिस पर न्यायालय की उदासीनता चैंकती है और सरकार को इतिहास से सबक न लेने वाली ऐसी सरकार साबित करती है जिसकी निगाह में लोकहित के बजाय पूँजीपतियों की पाँच सितारा सुविधाएँ अधिक महत्वपूर्ण हैं।

आगे की कथा कहने से पहले मैं पाठकों से क्षमा माँग लेता हूँ कि मैं जो कहने जा रहा हूँ उसमें पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धान्त ‘घटना के दोनों या सभी पक्षों का पक्ष रखने का पालन इसीलिए न कर सकूँगा क्योंकि केन्द्र या राज्य सरकार ने मन्दिर के सम्बन्ध में पारित अध्यादेश को सार्वजनिक नहीं किया है, दो वर्ष बीतने को आए लेकिन प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या किसी अन्य मंत्री ने आधिकारिक रुप से निर्माणधीन ‘मन्दिर का कारीडोर’ की योजना के बारे में नहीं बताया है, शहर दक्षिणी के मंत्री नीलकण्ठ तिवारी, स्थानीय पार्षद नरसिंह बाबा स्वयं को अनभिज्ञ बताते हैं।

सरकार ने अध्यादेश के अनुसार हास्यास्पद फैसला ले मन्दिर विस्तार के लिये एक स्वतंत्र प्राधिकार का गठन किया है, जो वाराणसी महानगर प्राधिकार के कार्य एवं अधिकार में हस्तक्षेप करता है। मन्दिर क्षेत्र के 15 मुहल्लों का जलकर, भवनकर तथा सीवर टैक्स कौन वसूलेगा, सफाई तथा सुरक्षा की जिम्मेदारी किस पर होगी, नागरिक शिकायतों पर कौन कार्रवाई करेगा आदि महत्वपूर्ण प्रश्न अनुत्तरित हैं। ऐसी स्थिति में यानी आधिकारिक जानकारी के अभाव में जितने मुँह उतनी बातें कहावत को स्थानीय मीडिया हवा दे रहा है। समाचारपत्रों में परस्पविरोधी, अफसोस जनक हास्यास्पद, अफवाहों पर आधारित समाचारों की बाढ़ आई हुई है। ऐसे में यह संवाददाता अपनी जानकारी और दुश्वारी को यथासम्भव तार्किक दृष्टि से तौलते हुए यह रिपोर्ट तैयार करने के लिए पूरे घटनाक्रम को तीन हिस्सों में बाँट रहा है –

  1. अतीत का ब्यामोह या इतिहास के प्रेत
  2. वर्तमान का संकट
  3. भविष्य के संकेत।

इनमें मैंने अपनी ओर से कोई छूट नहीं ली है। सबकुछ समय-समय पर नव गठित प्राधिकार के सी.ई.ओ. के अखबारी बयानों तथा भुक्तभोगियों की विपद कथा पर आधारित है। एक मुख्यमंत्री प्रदेश के प्रति तथा देश का प्रधानमंत्री अपने संसदीय क्षेत्र से इनता असंवेदनशील कैसे हो सकता है कि शासनतंत्र के मद में मध्यमवर्ग की नैतिकता का तार-तार कर उसे भोगवादी संस्कृति की ओर ढकेलने की जिद ठान ले- इस हद तक कि उसके लिए तानशाह शब्द भी छोटा लगे। प्रधानमंत्री पर प्रतिपक्ष अंकुश लगाने की स्थिति में नहीं है क्योंकि भारतीय राजनीति में जातिवाद, अवसरवाद तथा धार्मिक उन्माद जिस हद तक पैठ बना चुका है, उसमें प्रतिपक्ष को मुँह खोलने में मुस्लिम वोट बैंक से हाथ धोने का खतरा नजर आता है।

दरअसल, मन्दिर कारीडोर ऐसा दुधारी मसला बन गया है, जिसे प्रतिपक्ष अपनी गैर साम्प्रदायिक छवि के लिये इस्तेमाल करने की चालाकी करते रहा है। जनतांत्रिक मूल्यों, व्यक्तिगत अधिकारों की खुलेआम हत्या के बावजूद प्रतिपक्ष मौन है, मीडिया चुप है, धर्माधिकारी, महामण्डलेश्वर फिलहाल कुम्भ में अपने अखाड़ों के लिए स्थान हासिल करने की कोशिश में व्यस्त है।

इतिहास के प्रेत

इतिहास को कुछ विचारकों ने अन्त हुआ माना है, जबकि कुछ का इतिहास की घटनाएँ, भले ही काल्पनिक रुप में क्यों न वर्णित हुई हों प्रेत के रुप में पीछा करती हैं। भाजपा इस प्रवृत्ति से कभी मुक्त न हो सकी है- मुगल शासक यहाँ तक कि अकबर भी उसके लिये निन्दनीय ही है। जहाँ तक बात काशी की है अपने शासन के प्रारम्भिक दौर में औरंगजेब का उदार, सर्वधर्म समभाव का चेहरा मिलता है, जिसमें मन्दिरों का संरक्षण भी शामिल है। किन्तु अपने शासन के उत्तरकाल में औरंगजेब क्रूर, हिंसक, उन्मादी शासक की छवि को पुष्टि करता है, लोभ, लालच, धूर्तता और धार्मिक उन्माद उसके शासन की विशेषता बनी। फलतः काशी के अनेक मन्दिर-विशेषतः विश्वनाथ मन्दिर, बिन्दुमाधव मन्दिर, माधवराव का धरहरा ध्वस्त हुआ। यही वह दौर था जब हिन्दू पण्डित, वेद-पुराण के विद्वान, धर्मशास्त्री तथा पुजारियों के साथ काशी के हिन्दू रईसों ने भी शहर का त्याग कर प्राण बचाये, विश्वनाथ मन्दिर के ध्वस्तीकरण और मन्दिर के स्थान पर मस्जिद निर्माण में जल्दबाजी के कारण मन्दिर का दक्षिणी भाग तोड़ा न जा सका, उसका अवशेष आज भी मस्जिद का हिस्सा होते हुए भी चीख चीख कर मन्दिर होने की पुष्टि करता है.

जिस दौर में खोज-खोज कर छोटे-बड़े देवालय नष्ट किये जा रहे थे नागरिकों ने खासकर पक्के महाल के नागरिकों ने सुरक्षा की दृष्टि से स्थान-स्थान पर दरवाजे (फाटक) बनवाए जिन्हें रात में बन्द कर दिया जाता था। सरस्वती फाटक, हाथी फाटक, बाँसफाटक आदि इतिहास के प्रेत ही हैं। यही नहीं बंगाली टोला, रानी भवानी गली, सकरकन्द गली, कचैड़़ी गली में फाटकों के अवशेष आज भी मौजूद हैं। कभी बेनियाबाग का क्षेत्र भी हिन्दु-बहुल रहा होगा क्योंकि फाटक शेख सलीम इसकी चुगली करता है। काशी के सांस्कृतिक इतिहास से सम्बन्धित पुस्तक के अभाव में हम यह मानते हैं कि मुगलिया शासन के धार्मिक उन्माद से देवालयों की सुरक्षा हेतु नागरिकों ने देवालयों को घरों की हदबन्दी में सुरक्षित किया। घरों के तलघर में अथवा दूसरी मंजिल पर देवालयों का निर्माण किया। सकरकन्द गली के मकान नं0 7/19 के तलघर में स्थित शिवलिंग, चैक के आसपास तथा गढवासी टोला में स्थित दूसरी मंजिल के देवालयों को प्रमाणस्वरुप देखा जा सकता है। यह क्रम दूर बुलानाला तक गया है। यह देवालय न केवल संरक्षित किये गये इनकी विधिवत पूजा-अर्चना, उपासना हेतु गृह-स्वामियों ने किसी योग्य पुजारी को सेवा के लिए घर में ही देवालय के समीप स्थान दिया। यह पुजारी ‘सेवाइत’ कहे गये। अपने आराध्य के प्रति आस्था और विश्वास की कीमत ऐसे गृहस्वामियों ने देवालयों का संरक्षण कर चुकाई-तीन सौ वर्ष से पीढ़ी दर पीढ़ी देवालयों का संरक्षण-संकल्प मामूली घटना नहीं। इसे नौकरशाही की संकीर्ण निगाह नहीं समझ सकती। इसके लिए यह मन्दिर अतिक्रमित भवन हैं। जाहिरन, यह गृह-स्वामियों को मुआवजा न देने का तर्क है। तीन सौ वर्ष से जो नागरिक देवालयों का संरक्षण करते आ रहे हैं उन्हें यदि आप पुरस्कृत नहीं कर सकते, तो अपमानित क्यों कर रहे हैं। जिस संस्कृति के संरक्षण के नाम पर भाजपा ने अपने पाँव पसारे हैं आज उसे समूल नष्ट करने के लिये बहानों की तलाश कर रही है। पूरा पक्का महाल एक विशाल कब्रिस्तान में बदलता जा रहा है।

वर्तमान का संकट

वर्तमान में सबसे बड़ा संकट यह है कि किसी को नहीं मालूम कल क्या होने वाला है? किसका मकान गिराया जाएगा? कौन दर-बदर होने वाला है? इस अनिश्चय ने परस्पर अविश्वास और सन्देह को जन्म दिया है आपसी रिश्तों में खटास आ रही है। सरकार ने मन्दिर क्षेत्र के 15 मुहल्लों के प्रत्येक घर, मकान, स्कूल, मन्दिर का सर्वे कर गिराये जाने वाले मकानों की सूची तैयार कर ली हैं किन्तु सूची को सार्वजनिक नहीं किया गया है। 15 मुहल्लों में यदि 600 मकान माने जाये तो औसतन प्रति मकान 5 परिवारों की रिहायशी और 6 सदस्यों की संख्या के आधार पर 18000 व्यक्ति भविष्य में दरबदर होने वाले हैं। इसके अलावा  दुकानों की संख्या के आधार पर प्रायः बीस हजार व्यक्ति आठ हजार परिवार प्रभावित हो सकते हैं। दो साल पहले जब योजना प्रारम्भिक अवस्था में थी तब सरकार की ओर से कहा गया था कि प्रत्येक मकान मालिक तथा किरायेदार को उचित मुआवजा दे पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। पुनर्वास योजना में मकान मालिक का जमीन तथा निर्मित सम्पत्ति का मुआवजा, मकान खाली करने के लिए तीन माह का समय, प्रधानमंत्री आवास योजना के अन्तर्गत दो कमरों का फ्लैट देने का प्रस्ताव था तथा किरायेदार को फ्लैट के साथ एक लाख की राशि। किन्तु अब जब मकान तोड़े जा रहे हैं प्राधिकार मुआवजा देने में हील-हवाली कर रहा है। यह मानने में परेशानी नहीं होनी चाहिये कि पैतृक सम्पत्ति से सम्बन्धित दस्तावेजों के संरक्षण तथा पीढ़ी दर पीढ़ी

हस्तान्तरण के मामले में भारतीय काफी उदासीन रहते हैं क्योंकि पुलिस उनमें भय का कारण बनती है और न्याय व्यवस्था में आस जन भरोसा लगभग खो चुका है। इसलिए कुछ ही ऐसे भाग्यशाली होंगे जिनके पास पैतृक सम्पत्ति के दस्तावेज सही सलामत हों। देखा गया है कि बाप-दादा की मृत्यु बाद भी सरकारी दस्तावेजों, महापालिका के कागजातों में उत्तराधिकारी अपना नाम नहीं चढ़वाते। पक्का-महाल के मकान भी इसका अपवाद नहीं इसलिये सरकार को मुआवजा न देने का ठोस बहाना मिल गया है। सरकार ललिता घाट से मन्दिर तक 60 फीट चौड़ा रास्ता बनाने के लिए 270 मकानों को ‘खरीद’ कर ध्वस्त करेगी. इनमें मन्दिर हैं. स्कूल हैं. पुस्तकालय हैं. नगर निगम की सम्पत्ति भी है। फिलहाल मन्दिर विकास प्राधिकरण को 3 लाख 60 करोड़ रुपये राज्य सरकार ने देना तय किया है। मन्दिर परामर्शदात्री कम्पनी के प्रोजेक्ट पर केन्द्र सरकार स्वीकृति की मुहर लगा चुकी है जिसके अनुसार मकान गिराये जा रहे हैं। चूँकि गृहस्वामी मकान छोड़कर जा चुके हैं। परामर्शदात्री कम्पनी को मकान तोड़ने से फुरसत नहीं इसलिए मलबा उठाना, साफ करना ऐसी समस्या बन गया है जिसका हल प्राधिकार के पास फिलहाल नहीं है। मोहन राकेश की एक कहानी है ‘मलबे का मालिक’। कमोबेश यही सवाल फिलवक्त पक्का महाल में मौजूद है कि इस मलबे का मालिक कौन है? कौन इसे साफ करेगा? गिराये जा रहे मकानों के बारे में आम धारणा है कि सरकार बाजार दर से चार गुना मुआवजा दे रही है, अतः नागरिक लोग और प्रलोभन के वशीभूत खुशी खुशी मकान बेच रहे हैं। यह आंशिक सत्य है अव्वल तो चार गुना मुआवजा देने की नीति ही नहीं है। मन्दिर प्राधिकार द्वारा गठित कमेटी द्वारा राशि मुआवजे के रुप में दी जा रही है, जो बाजार दर से कुछ ही अधिक है। मकान न बेचने वालों के घर जबरन गिराये जा रहे हैं। यहाँ तक कि हाईकोर्ट के स्टे की भी अनदेखी की गई है। ज्वलन्त उदाहरण 87 वर्षीय केदारनाथ व्यास जी का है। जिनका मकान जबरन गिरा दिया गया है और जो फिलहाल एक वृद्धआश्रम की शरण में हैं। ऐसा नहीं कि मुआवजा नहीं दिया जा रहा है बल्कि मुआवजे के रुप में भ्रष्टाचार की दरिया बह रही है। एक घोषित नीति के अभाव में मकान के क्षेत्रफल को मनमाने ढंग से घटाया बढ़ाया जा सकता है। तथा एक पुरसाहाल मकान के स्वामी की अधिक मुआवजा भी। जिन मकानों में दुकान हैं, उन्हें नियमतः अधिक मुआवजा मिलना चाहिए, पर ऐसा नहीं हो रहा है। दुकानदारों के लिए मुआवजे की कोई नीति नहीं है। मुआवजा केवल उन्हीं गृह-स्वामियों को मिल पा रहा है जिनके पास मकान  से सम्बन्धित सभी दस्तावेज हैं तथा जिन पर भवन भूमि कर, जल कर, सीवर टैक्स या बिजली बिल बकाया नहीं है। मन्दिर वाले घर मुआवजे से वंचित हैं यह पहले ही बताया जा चुका है। यही स्थिति किरायेदारों की भी है। कई  मामलों में तो प्राधिकार ने मकान न बेचने की जिद पर अड़े गृह-स्वामी की विवाहिता बहन से अनुबन्ध कर मकान खरीदे हैं।

स्पष्टतः वर्तमान संकट मुआवजे और सरकार की दबंगई का है। सरकार ने विवादग्रस्त क्षेत्र में स्थिति मन्दिरों का सर्वेक्षण कराया है, जिसके अनुसार सभी मन्दिर तीन से चार सौ वर्ष पुराने हैं- यही समय विश्वनाथ मन्दिर का भी है। जो टोडरमल के सहयोग से नारायण भट्ट नामक विद्वान ने 1585 के आसपास बनवाया। डॉ. मोतीचन्द्र की पुस्तक काशी का इतिहास को काशी के इतिहास के सम्बन्ध में सर्वाधिक प्रामाणिक माना जाता है किन्तु इस पुस्तक में विश्वनाथ मन्दिर के निर्माण के बारे में कहीं भी अधिकारपूर्वक नहीं लिखा गया है। शायद यही वजह है कि काशी के बारे सचल पुस्तकालय रुप में मान्यता प्राप्त ‘शिवप्रसाद मिश्र रुद्र काशिकेय डॉ. मोती चन्द्र के ‘काशी के इतिहास’ को प्रामाणिक नहीं मानते थे। उनके अनुसार यह काशी के इतिहास के बजाया अग्रवाल जाति का इतिहा है- विशेषतः स्वयं मोतीचन्द्र के परिवार का। विश्वनाथ मन्दिर के निर्माण के बारे में मोतीचन्द्र ने ‘‘शायद’’, ‘ऐसा जान पड़ता है’, ‘ऐसा पता चलता है’, ‘हो सकता है’ आदि शब्दों का इस्तेमाल किया है, जो पत्रकार की भाषा है किसी इतिहासवाद की नहीं। स्पष्टतः मोतीचन्द्र किसी भी तरह के विवाद से दूर रहना श्रेयस्कर मानते थे तथा उनका ‘‘होमवर्क’’ (शोध व अध्ययन) आधा-अधूरा है। जो हो, यदि वर्तमान विश्वनाथ मन्दिर का निर्माण काल 1585 है तो निश्चित ही ज्ञानवापी मस्जिद उसके बाद बनी है। डॉ. मोतीचन्द्र ने मस्जिद का निर्माण वर्ष नहीं बताया है। इतना तय है कि मन्दिर निर्माण के बाद ही पक्का महाल में सघन बसावट हुई। मन्दिर के आसपास रहने बसने की होड़ में स्कूल, पाठशाला, मठ, मन्दिर, क्षेत्र के साथ रिहायशी बस्ती का निर्माण हुआ-जिसे जहाँ खाली जगह मिली बस गया-कामोबेश यही है पक्का महाल के निर्माण की कथा। गंगा-तट पर अस्सी से राजघाट तक मल्लाहों, निषादों का जमावड़ा है। बीच-बीच में डोम बस्तियाँ भी हैं।  यह समाज वह वर्ग है जो कि हर तरह की सरकारी सुविधा से वंचित है। पक्का महाल सर्वाधिक सघन बसावट है ब्राह्मणों की, यह आधुनिक शिक्षा से अछूते हैं, पूजा-पाठ, कर्मकाण्ड ही इनकी जीविका का आधार है। मन्दिर क्षेत्र से निर्वासन वाद आजीविका इनकी सबसे बड़ी समस्या होगी।

भविष्य के संकेत

‘क्या विश्वनाथ मन्दिर दर्शन के लिए ललिताघाट से मन्दिर तक 60 फीट चैड़ा रास्ता बनाया जाना तर्कसंगत एवं सुविधाजनक है?’ दरअसल इसी प्रश्न में छिपे हैं भविष्य के संकेत तथा वह आगत जिसकी भाजपा आतुरता से प्रतीक्षा कर रही है। शहर बनारस इस समय ऐसे ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा है, जो अन्दर से सुलग रहा है। असंतोष और सांप्रदायिकता का यह लावा कभी भी फूट सकता है, तब इसका पहला शिकार बनेगी ज्ञानवापी मस्जिद। दरअसल मन्दिर कारीडोर के नाम पर बनारस को साम्प्रदायिकता हिंसा की प्रयोगशाला के रुप में तैयार किया जा रहा है। मन्दिर दर्शन के लिए सर्व-मान्य, सर्व स्वीकृत रास्ता है दशाश्वमेध घाट में स्नानवाद चितरंजन पार्क के सामने से प्रवेश कर त्रिपुरा भैरवी होते हुए सरस्वती फाटक के बाद मन्दिर की गली में प्रवेश यही सबसे सीधा सुलभ और मान्य रास्ता है। ललिता घाट या मणिकर्णिका घाट की ओर से इक्का-दुक्का तीर्थयात्री ही मन्दिर आते हैं। चूँकि  मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र का पौंव पैदल दौड़ा करने की जहमत नहीं उठाई है तथा उन्हें बनारस की गलियों की जानकारी नहीं, इसलिये वे बनारस को कारकूनों की आँख से देख रहे हैं। उन्हें जो बताया जाता है उसे सच मान लेते हैं। यह एक तानाशाह का नजरिया हो सकता है – लोकतांत्रिक नजरिया नहीं। अपने एकतरफा फैसले को जनता पर जबरन लादे जाने को किसी भी दृष्टि से लोकतांत्रिक या जनवादी नहीं कहा जा सकता। एक भाजपाई की ट्रेनिंग में सांम्प्रदायिक घृणा के जो बीज बोये जाते हैं वह उचित समय पर हिंसा के रुप में फूटते हैं इसलिये यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि चुनाव जीतने के बाद कृतज्ञता ज्ञापन के लिये विश्वनाथ मन्दिर आने पर मोदी को ज्ञानवापी परिसर में बनी मस्जिद फाँस-सी चुभी होगी। औरंगजेब के शासनकाल में सितम्बर 1669 में विश्वनाथ मन्दिर का एक हिस्सा गिराकर मस्जिद का निर्माण किया गया। मस्जिद बनाने के क्रम में मन्दिर की पश्चिमी दीवार गिरा दी गई। परिसर में स्थित छोटे मन्दिरों को जमींदोज कर दिया गया तथा मनिदर के पूर्वी द्वार को छोड़ अन्य तीन द्वार बन्द कर दिये गये और उनके स्थान पर गुम्बद बना दिये गये। मन्दिर का गर्भगृह मस्जिद के दालान में बदल दिया गया। मन्दिर का पूर्वी भाग तोड़कर एक बरामदे में बदल दिया गया, इससे अब भी प्राचीन शैली के पुराने खम्भे लगे हुए हैं। इसी दौर में पंचगंगा घाट स्थित बिन्दुमाधव मन्दिर तोड़कर वहाँ भी मस्जिद का निर्माण हुआ।

लेखक का मानना है कि प्रस्तावित मन्दिर गलियारा उस बड़ी योजना का अंग है, जिसके अन्तर्गत मस्जिद गिराने की योजना पर भविष्य में अमल किया जाना है। यदि बात केवल ललिता घाट से मन्दिर तक गलियारा बनाने की होती तो मन्दिर के चारों ओर के मकान न ढहाये जाते। फिलहाल जिस योजना पर काम चल रहा है उसके अन्तर्गत सरस्वती फाटक, कालिका गली, ब्रह्मनाल, त्रिपुरा भैरवी, विश्वनाथ गली तथा अपारनाथ मठ के सामने स्थित मकानों को गिराया जाना है ताकि मन्दिर परिसर एक बहुत बड़े मैदान का रुप ले ले जिसमें 5-6 लाख की भीड़ के लिये जगह बन सके।

अगला चरण होगा धार्मिक उन्माद फैलाना, साम्प्रदायिक हिंसा को हवा देना। धार्मिकता तथा धर्मान्धता दो अलग-अलग चीजें हैं, यह जानते समझते हुए भी पढ़े-लिखे समझदार लोग अपनी समझदारी और विवेक ताख पर रख ज्ञानवापी मस्जिद गिराने के पक्ष में तर्क देने लगते हैं। जाहिर है साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिये बनारस जैसे धार्मिक शहर में मोदी या योगी को अधिक पसीना नहीं बहाना होगा।

धर्मनिरपेक्षता की चादर फेंकने में धर्मान्धों को अधिक देर नहीं लगेगी। एक बात समझ लेनी चाहिए कि अयोध्या के बरक्स बनारस में धर्मान्धता को हवा दे भीड़ जमा करना कहीं अधिक आसान हैं। रामलला के मामले में आडवाणी को रथयात्रा निकालने की जरुरत पड़ी थी, जबकि ज्ञानवापी के मामले में रथयात्रा की अनिवार्यता नहीं है क्योंकि विश्वनाथ मन्दिर की दक्षिण भारत में एक ‘पीठ’ के रुप में काफी लोकप्रियता एवं मान्यता है। प्रतिदिन दक्षिण भारत से लाखों तीर्थयात्री विश्वनाथ दर्शन के लिये काशी आते हैं। ऐसे में एक साम्प्रदायिक तकरीर ही भीड़ जमा करने के लिये काफी होगी। बाकी काम साम्प्रदायिक ताकतें कर देंगी। लेखक का मानना है कि 2019 और 2022 के चुनाव ज्ञानवापी मस्जिद के लिए निर्णायक साबित होने वाले हैं।

(ये लेखक के विचार हैं.)

अजय मिश्र

लेखक वरिष्ठ पत्रकार  हैं.

मो. 7905970373

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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