व्यंग्य

अब झूठ बोलना पाप नहीं है –  यादवेन्द्र

 

  •  यादवेन्द्र

 

मुझे अच्छी तरह याद है कि उस दिन शाम मैंने अपनी जेब में 2000 रुपये का एक नोट रखा था और उसमें पहले से कुछ और छोटे नोट पड़े थे। अगली सुबह जब मैंने अपनी जेब देखी तो उसमें बाकी नोट तो थे लेकिन 2000 रुपये का नोट नहीं था – मुझे चिन्ता हुई और ऐसा लगा जैसे वह मुझसे कहीं गिर गया। मैं बार-बार अपने मन से उस नुकसान को निकालने की कोशिश करता था लेकिन फिर घूम-फिर कर 2000 रुपये का नोट मन में आ ही जाता था। बहुत सोच विचार के बाद मुझे शाम की एक घटना याद आई – जब लगभग आठ बजे ऑटो से घर लौटा था तो गली में घर से थोड़ा पहले ही उतर गया था। किराए के उसे 100 रुपये देने थे, मैंने जेब में हाथ डाला और 100 रुपये का नोट जब न दिखा तो मैंने 200 का नोट (अपनी समझ से) निकाल कर उसे थमा दिया। हम उस समय अंधेरे में खड़े थे, लाइट आस पास नहीं थी – ड्राइवर बड़ी देर तक मेरे दिए नोट को उलट पलट कर देखता रहा जैसे मैंने उसे नकली नोट थमा दिया हो। मुझे थोड़ी खीझ भी हुई थी कि वह बार-बार नोट को उलट पलट के क्यों देख रहा है और मुझे बाकी पैसे दे क्यों नहीं रहा है। फिर जब मैंने बाकी पैसे माँगे तो उसने मेरी तरफ मुँह उठाकर पूछा कि आपने कितने रुपए दिए हैं? मैंने कहा, 200 रुपये – फिर उसने 100 रुपये मुझे लौटा दिए और गाडी स्टार्ट कर धीरे धीरे चलता बना। अब जब बार-बार 2000 रुपये के नोट के बारे में सोचता रहा तो मेरे ध्यान में आया कि हो न हो जिस नोट को मैं 200 रुपये का समझ रहा था वह दरअसल 2000 रुपये का नोट था। ऑटो ड्राइवर तभी इतनी देर तक उसको बार-बार उलट-पलट कर तसल्ली कर रहा था, असल में उसने मेरा मन टटोलने के लिए मुझसे पूछा भी कि आपने कितने रुपए का नोट दिया था? जब मैंने उससे कहा 200 रुपये का नोट तब उसने मुझे बकाया 100 रुपये का नोट वापस किया और यहाँ से आगे बढ़ा। यह लीड मिल जाने के बाद 18 सौ रू के नुकसान का अफसोस तो जाहिर है खत्म नहीं हुआ पर उसका दंश जरूर कम हुआ – मैंने ऑटो ड्राइवर को धोखे के आरोप से मुक्त कर दिया क्योंकि पूरी पूरी गलती मेरी थी, उसने मेरी जेब में हाथ डाल कर पैसे तो झटके नहीं थे। ड्राइवर ने पर्याप्त संकेत दिए कि समय रहते मैं अपनी गलती का एहसास कर लूँ लेकिन मैंने महसूस नहीं किया। अपनी गलती मुझे उस समय नहीं पता चली इसलिए उसने अच्छा खासा समय भी मुझे दिया जिससे मैं अपने दिमाग पर जोर डालकर या जेब में हाथ डालकर एक बार देख लूँ कि कहीं रु 200 समझ कर रु 2000 का नोट तो उसे नहीं दिया – आम तौर पर किसी छोटे शहर में कोई ऑटो वाले को 100 रुपये काटने के लिए 2000 रुपये का नोट नहीं थमाएगा। हाँ, उसने सारा दारोमदार मेरे ऊपर डाल दिया, खुद आगे बढ़ कर यह नहीं कहा कि मैंने गफ़लत में उसे दो हजार रु का नोट दे दिया है। मैं जितना भी उस घटना के बारे में सोचता हूँ तो एक आम इंसान की ईमानदारी और सरलता पर भरोसा बढ़ता ही है… यह भी तो हो सकता था कि उसके हाथ में जैसे ही 2000 रुपये का नोट आया वह मुझे शेष 100 रुपये थमा कर तेज गति से गाडी भगाकर पल भर में मेरी निगाह से दूर चला जाता – बहुत सम्भव था कि मैं अगले ही पल अपनी गलती का एहसास करता और उसे ढूंढने की कोशिश करता लेकिन तब तक वह मेरी आँखों से ओझल हो जाता। पर उसने ऐसा किया नहीं – आज के धोखाधड़ी और लूट खसोट के दौर में यह उसकी नेकनीयती और सरलता का परिचायक नहीं है तो और क्या है?

आर्थिक और व्यावसायिक उन्नति के साथ साथ बढती जाती बेईमानी और धोखाधड़ी जोड़ने वाले अनेक अध्ययन हालिया वर्षों में प्रोफेशनल जर्नल में प्रकाशित हुए हैं …..पिछले कुछ वर्षों में “द (ऑनेस्ट) ट्रुथ अबाउट डिसॉनेस्टी : हाऊ वी लाई टू एवरीवन – एस्पेशली अवर्सेलव्जपुस्तक बहुत चर्चा में रही है। लेखक अमेरिकी ड्यूक यूनिवर्सिटी में साईकोलॉजी और बिहेविरल इकोनोमिक्स के प्रो डैन एरिएली हैं जिन्होंने इस तरह के बर्ताव पर गहन अध्ययन किया है- उनका मानना है कि हम सब छल कपट और ढकोसले के अभ्यस्त हो गए हैं….बड़ी बात यह है कि ऊँगली दिखाने पर हमने इससे झटपट इनकार करना और झूठ बोलना भी सीख लिया है।

अपनी लैब में वे अध्ययन करने के लिए लोगों को लेकर आते हैं (अबतक पचास हजार)और सुरक्षा की ओर से आँखें मूँद कर उन्हें वहाँ आसपास रखे पैसों को चुराने का प्रलोभन देते हैं….नतीजा यह सामने आया कि यह समझ कर कि कोई देख नहीं रहा ज्यादातर लोगों ने पैसे चुरा लिए। पर एक पैटर्न देखने में आया कि कुछ गिनेचुने लोगों ने मुट्ठी भर-भर के पैसे चुराए (कुछ सौ डॉलर) लेकिन बड़ी संख्या लगभग तीस हजार ऐसे लोगों की रही जिन्होंने थोड़े-थोड़े पैसे चुराए पर कुल मिला कर यह राशि साठ सत्तर हजार डॉलर हो गई। एक और बात उन्होंने देखी कि बेईमानी या धोखाधड़ी की शुरूआत करने के बाद जब पकड़ा नहीं गया तब लोगों ने निडर होकर और ज्यादा सहस दिखाते हुए बड़ी चोरियाँ करना जारी रखा और यह सिलसिला चल निकला – इसे वे “स्लिपरी स्लोप” नाम देते हैं। इसके लिए वे गवर्नेंस को दोषी मानते हैं जो लोगों को दंडित करने के बदले बेईमान होने के लिए अवसर और प्रोत्साहन प्रदान करता है। उनका अध्ययन सिर्फ़ अमेरिकी समाज पर आधारित नहीं है बल्कि विभिन्न देशों के नागरिकों पर भी खरा उतरता है।

निष्कर्ष साफ़ है – अधिकांश लोग अब यह मानने लगे हैं कि थोड़े बहुत पैसों की हेरा-फेरी कोई अनैतिक काम या चोरी नहीं है। उनका कहना है कि ज्यादातर इंसानों के अन्दर एक खेल चलता रहता है – आप अपने आप को समझाते रहते हो कि मैं नेक ,ईमानदार और नायाब इंसान हूँ पर मन के दूसरे कोने में “थोडा बहुत हेरा-फेरी कर के कुछ लाभ मिल जाए तो उसको लेने में भी भला क्यों चूकूँ” यह खेल भी साथ साथ चलता रहता है। वास्तविकता यह है कि आप आप थोड़ी बेईमानी कर के भी ईमानदार होने का आनन्द और फ़ख्र महसूस करते रह सकते हैं। हमारी आज की नैतिकता इसी धरातल पर खड़ी है।

प्रो डैन एरिएली व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को यह सलाह देते हैं कि आम तौर पर हम बड़े धोखेबाजों को प्रमुख दोषी मानते हैं जबकि हमें छोटे-छोटे घोटाले करने वाले बहुसंख्यक कर्मचारियों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए क्योंकि व्यवसाय को अन्दर से वे ज्यादा खोखला करते हैं।

नैतिकता की राह छोड़ने जाने के बर्ताव को सूत्रबद्ध करते हुए वे कहते हैं : “सामने चलते क्रियाकलाप की ओर से जान बूझ कर आँखें मूँद लेने का नाटक ही बेईमानी है।”

लेखक वैज्ञानिक और साहित्यकार हैं|
सम्पर्क- +919411100294, yapandey@gmail.com
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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