सामयिक

1947 के और वर्तमान समय के समाचार पत्र पर एक नजर – रेशमा त्रिपाठी

 

  • रेशमा त्रिपाठी

 

“यह वह दौर था जब एक तरफ स्वतंत्रता का उल्लास था तो दूसरी तरफ दंगों का मातम, कश्मीर को पाकिस्तान द्वारा अधिकृत किए जाने का दुख़,नक्सलवाद,आतंकवाद आदि राष्ट्रीय मुद्दे मुख्य रूप से नजर आते थे यदि देखा जाय गौंर से तो वर्तमान समय में भी 1947 के ही दौर का दूसरा संस्करण समाचार पत्रों में पढ़ने को मिल रहा हैं क्योंकि हाल ही में कश्मीर राज्य को भारत देश ने पूर्ण रूप से अपने अधिकृत कर लिया हैं जो कि 1947 में ही होना चाहिए था।

आज भी क्रमशः राष्ट्रीय मुद्दे वहीं हैं । किन्तु वहीं लगातार भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति , प्रत्येक क्षेत्र का विकास ,अनेकों अन्तरिक्ष राकेट यान , विभिन्न देशों में भारत गोल्ड मेडल जीतने के साथ –साथ वह अब चांद पर घर बनाने की संकल्पना लिए सतत् प्रयासरत हैं जो कि एक सुखद अनुभूति कराता है यदि लोकतंत्र की बात करें तो 1947 के दौर में गाॅ॑व एक जर्जर हालातों से गुजर रहा था जहाॅ॑ पर अखबार 12 पैंसे तो आलू 20पैंसे में मिलते थे किन्तु उस दौर में 20 पैंसें आज के समय में बीस हजार रूपए के समान ही लगते थे क्योंकि रहने के लिए लोगों के पास घर नहीं थे और रोजगार का कोई ठोस आधार नहीं था वहीं देश अपनी गरीबी की चरम सीमा पर था किन्तु आज देश विश्व के आर्थिक विकास में छठे नम्बर पर आकर खड़ा हो गया हैं किन्तु किसानों की दशा में आज भी कोई ठोस कदम सरकार नहीं उठा रही हैं इसलिए 1947से आज तक किसानों की दशा पर प्रश्न खड़ा हो रहा हैं यही कारण हैं कि आज भी किसान समाचार पत्रों की सुर्खियों में बना रहता हैं । और यदि महिला सशक्तीकरण की बात करें तो शायद 1947के दौर की और आज के दौर की महिलाओं में अन्तर बस इतना हुआ की आज की महिलायें अपना आस्तित्व स्थापित करने के लिए सजग हो उठी है जो कि एक सुखद और सार्थक प्रयास कर रही हैं किन्तु आज भी उनकी अस्मिता,बलात्कार,घरेलू हिंसा,शोषण समाचार पत्रों में अपना आस्तित्व खोज रहा हैं ।

शायद उनका आस्तित्व आज भी 1947 के दौर से गुज़र रहा हैं जो कि दुखद है । और कुछ घटनाएं तो ऐसी स्थिति में हैं जिस पर बात करना मतलब विवाद खड़ा करना है क्योंकि यह मात्र चुनाव के दौंरान चर्चा में मुद्दा उठाया जाता हैं जैसे –कि अयोध्या मन्दिर विवाद प्रश्न यह है कि यह हिन्दू धर्म का है या मुस्लिम समाज का । कुछ का मानना है कि मस्जिद में मूर्ति स्थापित है तो कुछ का मूर्ति पर मस्जिद इस तरह के सिलसिले आज भी समाचार पत्रों की सुर्खियों में बने हुए हैं जो कि 1947के दौर की झलक प्रस्तुत करता हैं । किन्तु वर्तमान समय में भी कुछ ऐतिहासिक चित्र भारत की अखंडता को प्रदर्शित करता जो कि 1947 के दौर में भी प्रदर्शित करता था। जैसे कि दिल्ली के लाल चौक पर दोनों तरफ आंख उठाकर देखने पर लाल किला और फतेहपुर सीकरी मानों आंख मिला रहे हो, वहीं सड़क के एक किनारे कैथोलिक चर्च तो उसकी दूसरी ओर खड़ा गौरी शंकर मन्दिर,वहीं कोने से झांकता शीशगंज का गुरुद्वारा लगता है कि मानों पूरा भारत एक जगह एकत्रित हो गया हैं यह दृश्य इतिहासकारों के पन्नों में दर्ज हुआ हैं और भारत यही पर एकता में अनेकता की अखंडता को प्रदर्शित करता हैं । जो कि इस वर्ष भी 2019 का 15 अगस्त अपनी अखंडता को प्रदर्शित करते हुए सम्पूर्ण भारत में मात्र एक अपना राष्ट्रीय ध्वज फहरायेगा तिरंगा 1947के 15 अगस्त के जश्न में और 2019के 15,अगस्त के जश्न में फ़र्क बस इतना सा हैं कि उस समय देश ने आजादी का जश्न मनाया था और इस बार पूरे भारत में मात्र एक राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया जाएगा जो कि इतिहास के पन्नों में इंकित होगा । जो कि 1947 के दौर का दूसरा संस्करण प्रस्तुत होगा शायद अखबार के पन्नों में। वन्दे मातरम् जय हिन्द ।।”

लेखिका हिन्दी भाषा साहित्य से जेआरएफ हैं और पीएचडी प्रवेश की तैयारी कर रही हैं|

सम्पर्क- +919415606173, reshmatripathi005@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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