नाटक

थियेटर में ही जीना-मरना : प्रीति झा तिवारी

 

  • आशा 

 

पिछले दिनों केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी द्वारा विविध कलाओं के लिए दिए जाने वाले सालाना पुरस्कारों के अंतर्गत अभिनय के क्षेत्र में भोपाल की रंगकर्मी प्रीति झा तिवारी का नाम घोषित हुआ| एक थियेटर प्रोजेक्ट के सिलसिले मैं पिछ्ली गर्मियों में प्रीती झा तिवारी से मिली थी| सौम्य और मिलनसार स्वभाव की धनी प्रीति ने अपनी व्यस्त दिनचर्या में से समय निकालते हुए मुझ अपरिचित की सहायता की|

मूल रूप से बिहार के पटना की निवासी प्रीति झा के पिता पत्रकार थे| ये पाँच बेटियों के पिता चाहते थे कि उनकी बेटियाँ कुछ अलग करें| पिता प्रीति को पत्रकार ही बनाना चाहते थे किन्तु प्रीति ने दो साल शास्त्रीय संगीत सीखा| जब प्रीति दस साल की थी तो उन्हें एक नाटक में शादीशुदा औरत का अभिनय करने का मौका मिला| दर्शकों से मिली उत्साहवर्द्धक प्रतिक्रिया से प्रभावित प्रीति ने संगीत को एक तरफ करके अभिनय की तरफ रुझान कर लिया| पहले-पहल कीर्तनिया नाटक किया| मैथिली के बड़े निर्देशक श्री कुणाल जी के साथ मैथिली नाटक किये| बिहार के संस्कृति मंत्रालय की ओर से दो साल की फैलोशिप भी मिली| इसके बाद मंच पटना ग्रुप के साथ विजय कुमार के निर्देशन में फणीश्वरनाथ रेणु की तीन कहानियों के लिए अभिनय किया| इस प्रस्तुति के बाद प्रीति की पहचान निभाये गये चरित्र ‘मुनिया’ से बन गयी| यह प्रस्तुति बहुत सराही गयी| यहाँ तक कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पहले भारंगम में इसे स्थान मिला| इस प्रस्तुति के बाद प्रीति ने निर्णय कर लिया कि अब आगे नाटक ही करना है| मंच पटना के साथ काम चलता रहा| बीच में बीएससी और एमएससी करने के लिए थोड़ा ब्रेक लेने के बाद पूर्ण रूप से रंगमंच में आ गयीं| 2002 में श्री राम सेंटर रंगमंडल और 2004 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल में चयन हो गया| इस अवधि में प्रीति तिवारी ने हिन्दी के लगभग सभी बड़े निर्देशकों के साथ विविध नाटकों में बेहतरीन काम किया|  प्रसन्ना के निर्देशन में ‘उत्तररामचरित्’, देवेन्द्रराज अंकुर के निर्देशन में ‘बटोही’, ‘मौसम दर मौसम’, राम गोपाल बजाज के निर्देशन में ‘दिमागे हस्ती दिल की बस्ती है कहाँ’, ‘जानेमन’ आदि|

प्रीति का कहना है कि रंगमंच की दुनिया में वे आज जो कुछ भी हैं उसके पीछे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में किया गया रंगकर्म ही है – यहीं से उन्होंने अनुशासन और समय के मूल्य को गहराई से समझा| श्रीराम सेंटर रंगमंडल में ही चन्द्रहास से भेंट हुई जो प्रेम-विवाह में तब्दील हो गयी|

विवाहोपरांत प्रीति भोपाल आ बसीं| पति की बीमारी और संयुक्त परिवार की सामाजिक रुढियों और घरेलू व्यस्ताओं के चलते थियेटर छूट गया| पति चूँकि रंगकर्मी थे, वे कलाकार की जिजीविषा को समझते थे, अतः इन बाधाओं को पार करते हुए 2006 में पति चंद्रहास के साथ मिलकर ‘द राइजिंग सोसायटी ऑफ़ आर्ट्स एंड कल्चर’ की स्थापना की जिसमें चंद्रहास के निर्देशन में फिर से अभिनय की शुरुआत की| दो साल के अन्तराल के बाद एकबारगी स्टेज पर जाने से पहले आत्मविश्वास डिगा जरूर किन्तु स्टेज पर पहुँचते ही अपनी दुनिया में रम गया| इस संस्था के अंतर्गत बच्चों के लिए वर्कशॉप आयोजित करने का सिलसिला भी शुरू हुआ|

2013 में पति चंद्रहास की असामयिक मृत्यु ने प्रीति को गहरा झटका दिया| जीवन शून्य में लटक गया| गहरी निराशा के साथ दो बच्चों के साथ अकेली औरत का सरवाइव करना मुश्किल हो गया| लेकिन भोपाल के रंगकर्मी साथियों और माता-पिता के सहयोग से प्रीति दुबारा जी उठीं| अनेकानेक मुसीबतों के बावजूद अपनी रंग-यात्रा पुनः जारी की| चंद्रहास के साथ प्रीति, अनूप जोशी के निर्देशन में ‘प्लीज़ मत जाओ’ नाटक में अभिनय करती थी, अब अनूप जोशी के साथ अभिनय करती हैं – लेकिन चन्द्रहास की स्मृतियाँ पूरे नाटक में बिजली की तरह कौंधती रहती हैं| अब भी भारत भवन में अकेले जाना उन्हें गहरी टीस देता है|

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प्रीति आज थियेटर के सहारे ही अपना और बच्चों का सफलतापूर्वक जीवन-यापन कर रही हैं| बकौल प्रीति रंगमंच की दुनिया में एक औरत का दुःख यह है कि यहाँ रंगकर्मी महिलाओं की समस्याओं पर कोई ध्यान ही नहीं देता| एक रंगकर्मी होने के साथ ही वह पत्नी और माँ भी होती है| घर-भर की जिम्मेदारी संभालती है| ऐसी स्थिति में एक महिला के लिए थियेटर के साथ संतुलन बिठा पाना असंभव तो नहीं, चुनौतीपूर्ण अवश्य है जो अपार धर्य की माँग करता है| प्रीति स्वयं का उदाहरण देते हुए कहती हैं कि उन्होंने विंग्स में बैठकर अपनी बच्ची का होमवर्क करवाया है| अपनी बेटी को प्रीति ने थियेटर से जोड़ रखा है और जब उसे स्टेज पर देखती हैं तो गहरी संतुष्टि और उपलब्धि के भाव से अभिभूत हो जाती हैं| रंगकर्म का सुख प्रीति के लिए यह है कि यह उनके मन का काम है जिसमें कुछ घंटों के लिए घर, परिवार, समाज सब भूलकर रंगमंच की दुनिया में जीती हैं|

 

अपनी अभिनय-प्रक्रिया के विषय में प्रीति बताती हैं कि वे सबसे पहले चरित्र के अतीत और वर्तमान से स्वयं को जोड़कर देखती हैं क्योंकि नाटक के किसी भी दृश्य की स्थितियाँ कहीं-न-कहीं, किसी-किसी स्तर पर जिन्दगी के यथार्थ से जुड़ ही जाती हैं – अतः उन्हें ‘री-कॉल’ करके अपनी एक्टिंग में डालने के कोशिश करती हैं| चरित्र पर रिसर्च करती हैं, धीरे-धीरे ‘प्रोसेस’ में आती हैं, बहुत जल्दी नहीं आ पातीं लेकिन जब कोई रोल एक बार तैयार हो जाता है तो सालों-साल उसे नहीं भूलती| वे संवाद से ज्यादा दृश्य को महत्त्व देती हैं| हालाँकि अपने चरित्र के संवाद काटे जाना उन्हें बिलकुल पसंद नहीं है| खुद के नाटकों में कहीं-न-कहीं गाना डालने की कोशिश करती हैं|

प्रीति ने अब तक बहुत-सारे नाटकों में अभिनय किया है किन्तु वे किसी भी भूमिका से पूर्णतः संतुष्ट नहीं हैं – दर्शकों और समीक्षकों की सराहना के बावजूद उन्हें लगता है कि ‘और अच्छा’ हो सकता था| प्रीति इस बात से सहमत हैं कि नाटक में निभाया जा रहा चरित्र कलाकार के जीवन को भी प्रभावित करता है| सबसे पहले अभिनेता/अभिनेत्री को प्रभावित करता है, फिर दर्शक को अपने होने का अहसास दिलाता है| एक सीमित अवधि में दर्शक को मनोरंजन, शिक्षा, जागरूकता, खुशी देना चुनौतीपूर्ण है लेकिन रंगकर्मी की यह जिम्मेदारी है कि वह अपनी कला के बल पर इसके लिए भरसक प्रयास करे| रंगमंच करने वाले को तो विवेक-दृष्टि देता ही है दर्शक को भी अच्छे-बुरे की समझ देता है| प्रीति को किसी भी नये नाटक की स्क्रिप्ट शिशु की भाँति लगती है – रंगकर्मी उस स्क्रिप्ट के भविष्य के बारे में सोचते हैं – वृक्ष की तरह सींचते हैं – पालते-पोसते हैं – जब काम अच्छा बन जाता है तब उस अहसास को अभिव्यक्त कर पाना कठिन होता है|

हिन्दी रंगमंच में बहुत सारी महिलाएँ काम कर रही हैं लेकिन संख्या अभी भी संतुष्टिजनक नहीं है – इसका मुख्य कारण सामाजिक रूढ़ियाँ और बंधन ही हैं – ऐसा प्रीति का मानना है| रंगमंच सौ प्रतिशत की माँग रखता है किन्तु पारिवारिक-सामाजिक बन्धनों के चलते महिलाओं के लिए ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है| फिर उनका बाहरी-भीतरी संघर्ष चलता है और कहीं-न-कहीं वे पीछे रह जाती है| एक महिला द्वारा रंग-संस्था को चलाना एक साहसिक काम है| पचास लोगों को एक साथ मिलाकर काम करना आज की स्थितियों में बहुत कठिन है| आज की पीढी में समर्पण की कमी है – वर्कशॉप में कम प्रोडक्शन में ‘दिखना’ महत्त्वपूर्ण हो गया है| किसी कलाकार को बड़ी मेहनत से तैयार किया जाता है किन्तु वह एक-दो शो के बाद ही छोड़कर चला जाता है – ऐसे में स्थिति बड़ी विकट हो जाती है| इसके अलावा भी अनेक समस्याएँ हैं – रिहर्सल और मंचन के स्पेस की कमी, वित्तीय समस्या आदि| इसके बावजूद भी प्रीति का कहना है – “मैं मुम्बई नहीं जाना चाहती केवल थियेटर ही करना चाहती हूँ| थियेटर में ही जीना-मरना चाहती हूँ| थियेटर से ही मेरी पहचान बने – रोजी-रोटी चलती रहे – यही कामना है|” बहुत सारे लोग कहते हैं कि थियेटर में पैसा नहीं है| किन्तु प्रीति थियेटर को ’सैल्यूट’ करते हुए कहती हैं कि थियेटर पहले हमसे कड़े अनुशासन और मेहनत की माँग रखता है – वह पूरी हो जाने के बाद पैसा भी देता है|

लेखिका अदिति महाविद्यालय, दिल्ली में हिन्दी की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं|

सम्पर्क-  +919871086838, drasha.aditi@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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