मुद्दा

सेल्फी की सनक में गुम होती जिन्दगी – देवेन्द्रराज सुथार 

 

  • देवेन्द्रराज सुथार 

 

आज इस उत्तर आधुनिकतावाद के दौर में जी रहे इन्सान की आत्म-मुग्धता चरम पर है। वैज्ञानिक एवं तकनीकी दक्षता से परिपूर्ण एवं अणु-परमाणु बमों से अपनी शक्ति आंकने वाला आधुनिक मनुष्य अपना वर्चस्व दिखाने का कोई भी मौका छोड़ना नहीं चाहता। वैश्विक ग्राम की साकार होती परिकल्पना ने विश्व को संकीर्ण किया है, तो वहीं इन्सान की संवेदनशीलता को भी छीन लिया है। यही कारण है कि मानवीय प्रेम और परोपकारिता की भावनाएँ खत्म होती जा रही हैं और स्वार्थ की संकुचिता अपना स्वर बुलन्द कर इन्सान के नैतिक मूल्यों का ह्रास करने पर आमादा है।

20वीं सदी के प्रारम्भ में जब कैमरा असानी से उपलब्ध नहीं था तो राजा-महाराजा अपनी तस्वीर बनाने का काम चित्रकारों को देते थे। लेकिन बदलते दौर और विज्ञान के विकास के बाद कैमरा आसानी से उपलब्ध होने लगा। हर छोटे से छोटे फोन को कैमरे की तकनीक से लैस करने की जुगत ने इसके प्रयोग के प्रति इन्सान को लालायित किया। पहले खुद के कैमरे से दूसरों की तस्वीर खींचने का ट्रेंड चला तो अब खुद के कैमरे से खुद की तस्वीर यानी सेल्फी लेने का खुमार परवान पर है। सेल्फी की ये सनक ऐसी कि जिसके आगे न जिन्दगी का ख्याल और न ही मौत का खौफ। अपने को सभी से विचित्र दिखाने की जद्दोजेहद में कई बार जिन्दगी हाथों से फिसलकर रह जाती है। लेकिन फिर भी सेल्फी का नशा है कि कम होने का नाम नहीं लेता है और न ही सबक लेता दिखता है। स्मार्टफोन के अपरिहार्य उपयोग के बाद सेल्फी का सुरूर सिर चढ़कर बोल रहा है। तकरीबन प्रत्येक स्मार्टफोन यूजर सेल्फी का दीवाना है।

हाल ही में इंडिया जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एँड प्राइमरी केयर की रिपोर्ट के अनुसार भारत में सेल्फी के कारण सबसे अधिक मौतें हुई हैं। भारत में सेल्फी से होने वाली मौत का यह आंकड़ा साल दर साल बढ़ता गया वो भी तब जब फोन से परफेक्ट शॉट लेना थोड़ा मुश्किल था, ऐसे में सेल्फी स्टीक के आने से हर कोई परफेक्ट फोटो लेने के लिए जोखिम उठाने लगा। अक्टूबर 2011 से नवंबर 2017 के बीच दुनियाभर में लगभग 259 लोगों की मौत सेल्फी लेने के दौरान हुई। जबकि इसी समय के बीच शार्क के हमले से मरने वालों की संख्या केवल 50 थीं। रिपोर्ट के मुताबिक सेल्फी लेने में महिलाएँ सबसे आगे है जबकि युवा पुरुष जोखिम लेने में नहीं हिचकिचाते। यह सभी मिलकर सेल्फी से होने वाली मौतों को तीन हिस्सों में बांटते हैं जिसमें डूबने, दुर्घटनाग्रस्त होने और सेल्फी के दौरान गिरना शामिल है।136 करोड़ जनसंख्या वाले भारत में लगभग 80 करोड़ लोग मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में खुद की फोटो लेते समय मरने वालों की संख्या में 159 लोगों के साथ भारत सबसे आगे हैं। यह आंकड़ा पूरी दुनिया में मरने वालों में आधे से ज्यादा है।

आज सेल्फी की इस बीमारी से केवल लड़के-लड़कियां ही नहीं बल्कि छोटे बच्चे, बच्चियां, बुजुर्ग भी अछूते नहीं रहे हैं। इसलिए सेल्फी के बीमार सड़क किनारे, पहाड़ों, पुलों, खेत-खलिहानों, पार्कों, होटल आदि सभी जगहों पर थोड़ा बौका मुंह बनाते मिल ही जाएँगे। लोगों पर सेल्फी का बुखार इस कदर हावी है कि सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते, नहाते-गाते, हंसते-रोते, चलते-फिरते, ड्राइव करते, भयानक जगहों तथा बेड पर बीमार पड़े रहने के बावजूद भी क्लिक लेने से नहीं चूकते। इतना ही नहीं सेल्फी के दीवानों का ये दीवानापन ऐसा है कि वे कब्रिस्तान, शमशान घाट, हॉस्पिटल, घर में लगी हुई आग, एक्सीडेंट के आगे भी सेल्फी लेने का मौका नहीं छोड़ते। शोध बताता है कि जो लोग दिन में तीन या इससे अधिक बार सेल्फी लेते हैं, वे सेल्फाइटिस से पीड़ित हो सकते हैं! सेल्फाइटिस के इस रोग के तीन स्तर है। जिसमें पहले स्तर पर लोग ज्यादा सेल्फी लेते हैं लेकिन सोशल मीडिया पर शेयर नहीं करते। जबकि दूसरे व तीसरे स्तर में लोग खूब सोशल मीडिया पर शेयर व वायरल करते हैं। सेल्फी लेते समय ध्यान भटक जाने के चलते अजीबोगरीब हादसे और एक्सीडेंट जैसी अनगिनत घटनाएँ भी अब अंजाम लेने लगी हैं। मसलन- मध्य प्रदेश के अशोक नगर जिले में आने वाली पर्यटन नगरी चंदेरी में एक महिला की सेल्फी लेने के दौरान ऊंचाई से गिरने के कारण मौत हो गई। हैदराबाद से मनाली घूमने गए इंजीनियरिंग के 25-30 छात्रों ने तेज रफ्तार में बहती लहरों को नजरअंदाज करके सेल्फी लेने के चक्कर में अपनी जान गंवा दी।

 

दरअसल, सेल्फी से जुड़े आज ऐसे हजारों किस्सें दुनिया में जन्म ले रहे हैं, जो मानवीय संवेदना के अंत, अविवेक, आत्म-मुग्धता व लापरवाही की पराकाष्ठा को साफ इंगित करते हैं। निःसंदेह, आज सेल्फी की यह संस्कृति विश्वभर में सनक का रूप लेती जा रही है। व्यक्ति अलगाव और तनाव में आकर आत्म-मुग्धता, आत्म-केंद्रीयता और निजी स्वार्थ को ही सबकुछ समझने लगता है और सामूहिकता की तलाश में वह आभासी जगत की शरण में जा बैठता है। आभासी जगत की सामूहिकता के क्षणिक आनंद के बाद जब उसका सामना आभासी जगत की असलियत से होता है, तब उसका अलगाव और बढ़ने लगता है। किसी मृतक के अंतिम संस्कार के समय सेल्फी खींचने या किसी डॉक्टर द्वारा गंभीर हालत में मरीज का इलाज करने से पहले सेल्फी खींचकर सोशल मीडिया में अपलोड करने जैसी घटनाएँ समाज की सांस्कृतिक एवं नैतिक पतनशीलता को दर्शाती है। कुछ खास पलों को कैद करना हुनर हो सकता है, यादों को कैमरे में कैद करना जरूरी हो सकता है पर जान से खेलकर अपनी सेल्फी क्लिक करना कहां की अकलमंदी है? सेल्फी लेना गलत नहीं है लेकिन आस-पास के परिवेश के बारे में जागरूक होना बहुत जरूरी है। खतरनाक स्थानों पर सेल्फी लेने से परहेज करना चाहिए, क्योंकि हमेशा ही खेद जताने के बजाय सुरक्षित रहना ज्यादा बेहतर होता है। सरकार को भी चाहिए खतरनाक स्थलों पर ‘नो सेल्फी जोन’ घोषित करें।

लेखक स्वतन्त्र टिप्पणीकार है|

सम्पर्क- +91810717719, devendrakavi1@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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