मैं कहता आँखन देखी

रहिमन मुलूक रखिए, बिन मुलूक सब सून

 

  • नवल किशोर कुमार

 

हर शब्द सबके लिए अलग-अलग होते हैं। अलग-अलग मतलब अलग-अलग मायने। सबकी हैसियत के हिसाब से। जैसे मुल्क शब्द को ही देखिए। कितने मायने हैं इसके। राजनीति करने वालों, सत्ता की मलाई चाभने वालों, अखबारों-किताबों में कलम घिसने वालों के लिए मुल्क का मतलब एक देश होता है। एक देश मतलब जिसका कोई निश्चित भूगोल हो जैसे कि गांवों में किसी खेत का होता है। उसकी पैमाइश होती है, उसकी चौहद्दी खाता और खेसरा नंबर के साथ पटवारी के पास दर्ज रहता है। वैसे ही देश काा भी क्षेत्रफल होता है। सबकुछ मापा-जोखा। सीमाओं पर एक रेखा भी होती है। उस रेखा के उस पार कोई और मुल्क और इस पार कोई और मुल्क।

निश्चित भौगोलिक सीमा के अलावा अब आसमान में भी मुल्क का अस्तित्व होता है। इसको वायु सीमा की संज्ञा दी जाती है। अभी हाल ही में पाकिस्तान ने नरेंद्र मोदी को अपनी वायु सीमा में घुसने की इजाजत नहीं दी। वैसे ही भारत ने अपनी वायु सीमा को प्रतिबंधित कर रखा है। अजब-गजब है मुल्क। जमीन पर भी मुल्क और आसमान में भी। नदियां और पहाड़ भी मुल्क के हिसाब से अलग-अलग। वैसे यह गलत भी नहीं है। जब चूल्हा-चौका अलग तो फिर क्या नदियों की लहरों के धुन और क्या पहाड़ों के बेल-बूटे। केवल हवा और बादल मनुष्यों के सबसे बड़े विरोधी हैं। कमबख्त मुल्क की परिभाषा ही नहीं समझते।

फिर आजकल ‘नो मैन्स लैंड’ भी होते हैं सीमाओं पर। मतलब दोनों मुल्क अपने-अपने हिस्से की कुछ जमीन छोड़ देते हैं। और यह मान लेते हैं कि यह हिस्सा किसी का नहीं है। कोई आदमी नहीं रहेगा। रहेगा तो गोलियों से भून दिया जाएगा। फिर आदमी इस मुल्क का हो या उस मुल्क का। ‘नो मैंस लैंड’ में गोलियां मुल्क नहीं पहचानतीं।

वैसे मुल्क के लिए जमीन ही महत्वपूर्ण नहीं है। एक सरकार भी जरूरी होती है। सरकार यानी एक सिस्टम जो सबकुछ देखे। कौन आदमी कितना खा रहा है, कितना पी रहा है, कौन इस लायक है कि मरने के लिए छोड़ दिया जाय और वे कौन हैं जिनको बचाने के लिए मुल्क का खजाना दोनों हाथों से लुटाया जा सकता है। सरकार के पास डंडा भी होता है। डंडा शब्द छोटा अथवा कम प्रभावकारी लगे तो हंटर या फिर चाबुक मान लिजीए। मुल्क का मतलब तभी है जब कोई हंटर चलाने वाला हो। एक न्यायपालिका भी आवश्यकता हमेशा बनी रहती है। चाबुक के हर प्रहार को न्यायोचित साबित करने के लिए। ऐसा न हो तो मुल्क और मुल्क वालों की आत्मा बेचैन रहती है। आत्मा की संतुष्टि के लिए जरूरी है।

मुल्क मतलब वह जिसके पास संप्रभुता हो। यानी किसी के वश में न हो। अब इसका मतलब यह नहीं कि कोई मुल्क नंगा नाच करे। मुल्कों के उपर भी मुल्क होता है। इस बड़े मुल्क के अपने कायदे-कानून होते हैं। मामला अंतरराष्ट्रीय होता है। प्रत्यक्ष तौर पर मुल्क के किसी गांव-कस्बे-शहर में रहने वाले से कोई मतलब नहीं।

मुल्क उनके लिए अलग मायने रखता है जो खाए-पिए-अघाए हैं। उनको मुल्क से बहुत प्रेम होता है। उनके मन में आए तो मुल्क के लिए सबकुछ कर सकते हैं। बस अपनी धन-संपत्ति और बेटा-भाई को छोड़कर। उनके बेटे और भाई यदि फौजी बन देश की सीमा पर तैनात होंगे तो उनके मुल्क में कोहराम न मच जाएगा। इसलिए फौजी तो वे लोग होते हैं जो गरीब होते हैं। बेरोजगार भी कह सकते हैं। फौज नहीं बनेंगे तो क्या गांवों में कौन सा बकरी चराने का रोजगार बचा है। ऐसे लोगों के लिए मुल्क मतलब पैसा है, दारू है, देशभक्ति है।

मुल्क मजदूरों का भी होता है। खासकर वे मजदूर जो सुदूर इलाकों से बड़े शहरों में आते हैं। नंग-धड़ंग। रेलगाड़ियों, बसों में कोंचा-कोंची करके जैसे-तैसे चले आते हैं। नयी दिल्ली स्टेशन पर पहुंचते ही उन्हें लगता है कि यह कोई नया मुल्क है। मुंबई, और सूरत में भी लोगों की सूरत ऐसी ही होती है। नये मुल्क में आने की खुशी और अपने मुल्क से दूर होने का गम। हालांकि मुल्क से दूर होने का गम मतलब अपने बाल-बच्चों से दूर होने का गम अधिक महत्वपूर्ण होता है। उस मुल्क के लिए कैसा गम जो दो जून की रोटी न दे सके।

मुल्क हम पढ़ने-लिखने वालों के लिए भी अलग मतलब रखता है। थोड़ा अधिक पढ़-लिख गए तो फिर मुल्क का मतलब ही कुछ और हो जाता है। आदमी वर्ल्ड सिटीजन यानी विश्व का नागरिक हो जाता है। वह हिन्दुस्तान में रहे या जापान में। अमेरिका में रहे या इंग्लैंड में। आदमी आदमी होता है, मुल्क गया तेल लेने।

बहरहाल, मुल्क शब्द की लीला अपरंपार है। जिसका मुल्क होता है, उसका ही इतिहास होता है। मुल्क नहीं तो इतिहास नहीं, वर्तमान और भविष्य भी नहीं। आदमी जमीन और आसमान के बीच अटका मालूम होता है। फिर उसकी हालत मंदिर में लगे घंटे की तरह होता है। जो आता है बजा जाता है। पहले मुंबई में बाल ठाकरे और उसके गुंडे बजाते थे, अब दिल्ली में सिविल सोसायटी के ध्वजवाहक अरविन्द केजरीवाल बजा रहे हैं। कसूर इनका नहीं है कि ये बजा रहे हैं। बजाना इनका अधिकार है क्योंकि ये मुल्क वाले हैं। सारा कसूर तो उनका है जो मुल्क वाले नहीं हैं। केंद्र सरकार एनआसी बना रही है। इसमें जिसका नाम रहेगा वह मुल्क का नहीं तो बे-मुल्क का। इसलिए रहीम के दोहे की पैरोडी बनाइए और अमल करिए।

रहिमन मुलूक रखिए, बिन मुलूक सब सून,
बिन मुलूक गोली खाइए, बेभाव बहाइए खून।

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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