उत्तरप्रदेश

कालाकांकर राजघराना: तीन पीढ़ियों का कांग्रेसी, अब भाजपाई

 

  • शिवाशंकर पाण्डेय

 

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का पर्याय समझे जाने वाला कालाकांकर राजघराना आखिरकार भाजपाई हो गया। प्रतापगढ़ समेत राज्य की अन्य कई सीटों पर होने वाले उपचुनाव के मौके पर कालाकांकर राजघराने का भगवा रंग में रंग जाना, भाजपा के लिए किसी अभेद्य दुर्ग को फतह करने और कांगे्रस पार्टी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। राजघराने की राजकुमारी रत्ना सिंह ने 15 अक्टूबर को समर्थकों के साथ कांग्रेस को अलविदा कहकर भाजपा का दामन थाम लिया। अचानक उनके इस कदम से सियासी भूचाल आ गया है। प्रतापगढ़ से लेकर दिल्ली तक इसका असर दिख रहा है।

Image result for कालाकांकर राजघराना

कालाकांकर राजघराना तीन पीढ़ियों से कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है। राजघराने की वारिस और विदेश मंत्री रह चुके राजा दिनेश सिंह की पुत्री राजकुमारी रत्ना सिंह प्रतापगढ़ से तीन बार सांसद रह चुकी हैं। इनके पिता राजा दिनेश सिंह विदेश मंत्री के अलावा चार मर्तबा सांसद रहे। कांग्रेस और कालाकांकर राजघराने के जुड़ाव का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि कांग्रेस ने सात बार टिकट देकर राजकुमारी रत्ना सिंह को प्रतापगढ़ से चुनाव लड़ाया। पिछली बार प्रत्याशी रहीं रत्ना सिंह के लिए राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी ने यहाँ आकर प्रचार किया। पूर्व विदेशमंत्री राजा दिनेश सिंह के निधन के बाद पुत्री रत्ना ने उनकी सियासी विरासत संभाली। सन् 1996, 1999 और 2009 में यहाँ से राजकुमारी रत्ना सिंह सांसद चुनी गयीं।

प्रतापगढ़ में उपचुनाव है। मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में 15 अक्टूबर को चुनावी सभा करने आए। इसी बीच रत्ना सिंह ने सभा में पहुंचकर कांग्रेस को अलविदा कहते हुए भाजपा का दामन थाम लिया। मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने उनको बाकायदे पार्टी की सदस्यता ग्रहण कराई। कांग्रेस की पहचान रहीं रत्ना सिंह ने भाजपा में शामिल होने के बाद योगी और मोदी को देश का सबसे बड़ा भक्त बताया तो मुख्यमंत्री योगी ने रत्ना सिंह को जनता के बीच रहने वाली काबिल नेता की संज्ञा दी।

Image result for रत्ना सिंह एंड योगी आदित्यनाथ

कालाकांकर (प्रतापगढ़) राजघराना कांग्रेस का पर्याय के रूप में जाना जाता रहा है। आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के खिलाफ यहाँ कई बड़े आन्दोलन की रूपरेखा बनी। राजघराने के प्रमुख रामपाल सिंह कांग्रेस के संस्थापक सदस्य रहे। राजकुमारी रत्ना सिंह के पिता राजा दिनेश सिंह पूर्व विदेशमंत्री के अलावा यहाँ कांग्रेस से चार बार सांसद चुने गए। इंदिरा गांधी के खास सिपहसालार और निकटवर्ती की पहचान रखने वाले राजा दिनेश सिंह बाद में राजीव गांधी के भी भरोसेमंद गिने जाते रहे। इनकी सियासी हनक का अंदाज इससे भी लगाया जा सकता है कि बगैर सांसद रहे दिनेश सिंह केंद्र में मंत्री पद पर आसीन रहे। बहरहाल, ऐन चुनाव के मौके पर रत्ना सिंह का भाजपा में शामिल होना कांग्रेस को बड़ा झटका और भाजपा का बड़ा फायदा माना जा रहा है। उत्तरप्रदेश की सियासत में अचानक आए सियासी तूफान ने आक्सीजन पर पहुंची कांग्रेस के लिए और भी ज्यादा मुसीबत खड़ी कर दी है। चुनावी लिहाज से देखा जाए तो प्रतापगढ़ में ठाकुर बाहुल्य वोटरों को साधने के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का यह बड़ा दांव माना जा रहा है।

Image result for कालाकांकर राजघराना

प्रतापगढ़ में राजा भैया, प्रमोद तिवारी और रत्ना सिंह सियासी मठ के तीन ‘शक्तिपीठ’ माने जाते रहे हैं। इसके अलावा यहाँ क्षत्रिय और ब्राम्हण दोनों बिरादरी दो खेमे में बंटी रही है। ब्राम्हणों के अलावा क्षत्रियों को साथ लेकर भाजपा दोहरा सियासी दांव चला। ब्राम्हण, क्षत्रिय के अलावा पिछड़ा कार्ड भी यहाँ भाजपा खेलना चाह रही है। चुनावी रूख मोड़ने के लिए यह प्रभावी माना ज रहा है। गौरतलब है कि मोदी लहर को छोड़ दें तो प्रतापगढ़ जिला भाजपा के लिए लंबे अरसे से ऊसर साबित रहा है। बेंती राजघराने के रघुराज प्रताप सिंह ‘राजा भैया’ और कांग्रेस के नेता प्रमोद तिवारी का यहाँ प्रभाव रहा। शुरू से लेकर 2012 तक भाजपा यहाँ तीसरे नंबर की पार्टी रही। मोदी लहर और अपनादल गठबंधन के बाद भाजपा प्रतापगढ़ में ताकतवर साबित हुई। बगल के जिले कौशांबी और प्रतापगढ को मिलाकर बनी संसदीय सीट से विनोद सोनकर दो बार और सहयोगी दल अपनादल के हरिवंश सिंह एक बार सांसद बनकर भाजपा का परचम लहराया। बहरहाल, तीन पीढ़ियों से लगायत कई दशक तक कट्टर कांग्रेसी की पहचान रखने वाले कालाकांकर राजघराने का भाजपा का दामन थाम लेना सियासी क्षेत्र की बड़ी घटना है। इसके कई निहितार्थ भी निकाले जा रहे हैं।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार, और सबलोग के यूपी ब्यूरोचीफ हैं|

सम्पर्क –  +918840338705, shivas_pandey@rediffmail.com

.

Facebook Comments
. . .
सबलोग को फेसबुक पर पढ़ने के लिए पेज लाइक करें| 

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *